प्रवासी मजदूर जिनका कोई वतन नहीं

जनमत

कोविड-19 को लेकर हुए लॉक डाउन के बाद हमारे देश में प्रवासी श्रमिकों की समस्या सबसे बड़े रूप  में उभर कर सामने आई है. वे आज पूरे विमर्श और बहस के केंद्र मे हैं . मैं अपनी बात की शुरुआत आज की दो खबरों से  करना चाहूँगा. पहली खबर कर्नाटक से आई है. वहां के मुख्यमंत्री ने बिल्डरों और ठेकेदारों के साथ मीटिंग करने के बाद कहा कि प्रवासी श्रमिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, उनको कर्नाटक से नहीं जाने दिया जायेगा. उन्हें यहीं पर रहकर काम करने की जरूरत है. दूसरी खबर तेलंगाना से आई है जिसमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके यहाँ  बिहार और यूपी के जो प्रवासी श्रमिक हैं, वे उनको भेजना चाहते हैं लेकिन दोनों सरकारें (यूपी और बिहार की) इस बात के लिये तैयार नहीं हैं.

आज सुबह कर्नाटक के मुख्यमंत्री का आदेश आने के कुछ घंटे पहले कर्नाटक के शिमोगा जिले में फंसे ओम प्रकाश सैनी (मूल निवासी कुशीनगर, यूपी ) का मेरे पास फोन आया. उन्होंने बताया कि यहाँ यूपी और बिहार के 34 मजदूर पिछले 35-40 दिन से फंसे हुए हैं. मई के पहले हफ्ते में बड़ी मुश्किल से लगातार तीन दिन तक 30 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय जाने के बाद उन लोगों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन हो पाया है. रजिस्ट्रेशन करने के लिए आने-जाने में उन्हें दो हजार रुपये से अधिक खर्च करने पड़े. और आज जब किसी तरह से उनका रजिस्ट्रेशन हो गया तो कुछ ही घंटे बाद मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि मजदूरों को जाने की जरूरत नहीं हैं. ये सभी मजदूर बिहार के पश्चिम चंपारण और यूपी के कुशीनगर जिले के हैं जो शिमोगा की सुभद्रा नदी से बालू निकालने का काम करते थे. इसी वर्ष जनवरी में ही ये लोग यहाँ पंहुचे थे और बमुश्किल एक डेढ़ महीने ही मजदूरी कर पाए थे. जो कुछ रुपया-पैसा मिला था, उससे अब तक किसी तरह गुजरा करते रहे लेकिन अब उनके पास कुछ नहीं है. इस आपदा के बाद इन लोगों ने प्रधानमंत्री के नाम एक वीडियो भी जारी  किया था जिसमें उनसे गुहार लगाई थी कि यदि हम लोग घर न पहुंचे तो कोरोना से पहले ही भूख से मर जायेंगे. विडम्बना देखिए कि आज जब श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलने लगी है तो खबर आ रही है कि उन्हें जाने नहीं दिया जायेगा क्योंकि बिल्डर और ठेकेदारों को उनकी जरूरत है.

( इन मजदूरों में 24 को रजिस्ट्रेशन के एक पखवारे बाद और शेष 10 मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेन से यात्रा करने का अवसर मिल पाया.)

जब से लॉक डाउन शुरू हुआ है तभी से हम देख रहे हैं कि हजारों की संख्या में मजदूर हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, राजस्थान, हरियाणा या अन्य जगहों से पैदल, साइकिल, सामानों से लदे हुए ट्रकों और यहाँ तक कि  मिक्सर मशीन में छिपकर आने के लिए मजबूर हैं. नेशनल हाईवे पैदल या साइकिल से चलते जा हुए मजदूरों से भरा है.

महराजगंज जिले के कई मजदूर भिवंडी में लूम चलाते थे. वहां से साइकिल से घर के लिए चले. महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बॉर्डर सेंधुआ में एक मजदूर की मृत्यु हो गई. अररिया बिहार के एक मजदूर जो कि पैदल ही चले थे, गोरखपुर पहुँचते उनकी मृत्यु हो गई. ऐसे न जाने कितने किस्से हैं जिसके नायक अब कभी घर नहीं पहुँच पाएंगे. गोरखपुर के एक मजदूर हैदराबाद में बीमार पड़ गए. उनका छोटा भाई भी उनके साथ ही काम करता था. वह उन्हें लेकर करीब आधा दर्जन अस्पतालों में गया लेकिन ठीक से इलाज नहीं हो पाया. अंत में जब उनको लगा कि अब जीवन नहीं बचेगा तो उन्होंने अपने भाई से कहा कि मुझे घर ले चलो. मैं यहाँ परदेश में नहीं मरना चाहता. घरवालों ने ढाई बीघा जमीन में से डेढ़ बीघा जमीन को रेहन रखकर करीब एक लाख रुपये हैदराबाद भेजे. छोटे भाई ने  73,000 रूपये में एम्बुलेंस तय की और भाई को लेकर घर के लिए चल पड़ा. एम्बुलेंस तो गाँव पहुंची लेकिन बड़े भाई नहीं पहुँच पाए. अपनी आँखों में घर पहुचने की चाह लिए घर से 25 किलोमीटर पहले ही वे इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर गए.

22 मार्च, जब जनता कर्फ्यू का ऐलान हुआ था और 25 मार्च जब देशव्यापी लॉकडाउन घोषित किया गया तब से मैं बाहर से आ रहे और फंसे हुए प्रवासी मजदूरों और उनके समूहों से बात कर उनकी कहानी लिख रहा हूँ.  इनमें गुजरात, हैदराबाद, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक आदि तमाम जगह के मजदूर हैं. अभी एक मई को साइकिल से चलते हुए हैदराबाद से सात मजदूर महरागंज पंहुचे हैं.

दो दिन पहले उदयपुर (राजस्थान) की जैसमंद झील में मछली पकड़ने का काम करने वाले सीतामढ़ी (बिहार) के चार मजदूर आगरा तक पैदल आये और आगरा से 20 किलोमीटर आगे जब उनके पैरों ने जबाब दे दिया तो वे पास के गाँव में गए और गाँव वालों से कहा कि हमें किसी तरह साइकिलें दे दीजिये नहीं तो हम लोग रास्ते में ही मर जायेंगे. गाँव वालों ने उनको तीन साइकिलें दीं जिसके सहारे ये लोग तीन मई को सीतामढ़ी बिहार पंहुचे. ऐसी दर्दनाक कहानियां सैकड़ों की संख्या में हैं. हालत यह हो गई है कि ट्रकों में पचास, साठ, सत्तर की संख्या में भरे हुए मजदूर आ रहे हैं और इसके लिए उन्हें दो से ढाई हजार रूपए देने पड़ रहे हैं.

कुछ दिन पहले मुद्दा उठा कि मजदूरों के लिए जो ट्रेन चलाई जा रही है उसमें उनसे टिकट का पैसा लिया जा रहा है लेकिन केंद सरकार ने कहा कि हम 75 %  तथा राज्य सरकारें 25% सब्सिडी दे रही हैं. बाद में जब यह पूरी बात एक्सपोज हो गई कि मजदूरों से ट्रेन का किराया लिया जा रहा है और सामान्य दिनों से अधिक किराया लिया जा रहा है. जब यह बात सार्वजनिक हो गई तो बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि हम मजदूरों के वापस आने पर और 21 दिन क्वारंटीन रहने के बाद किराया और 500 रुपया देंगे.  मजदूरों के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है? मैंने बहुत सारे मजदूरों और मजदूर समूहों से बात की जो कर्नाटक से आये  या राजस्थान से. सबको घर वापस आने में 3  हजार से लेकर 8 हजार तक रूपये खर्च करने पड़े हैं. तमाम मजदूर तीन हजार की साइकिल 5 हजार या छह हजार में खरीद कर उससे चल कर घर पहुंचे हैं. इस खर्च के लिए पैसा उन्हें अपने गाँव से मंगाना पड़ा जिसका कि बड़ा हिस्सा कर्ज के रूप में है. प्रत्येक मजदूर जो किसी भी तरह से अपने गाँव पहुँचा है वह हजारों रुपये का कर्जदार हो चुका है.

सोचिये कि प्रवासी श्रमिकों के साथ यह व्यवहार क्यों हो रहा है ? आखिर क्या कारण है कि इतने श्रमिकों को अपना गाँव या शहर छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है ?  अपने गाँव से 1200,1500,1700 किलोमीटर दूर जाकर काम कर रहे मजदूरों (जिन्हें कर्नाटक के मुख्यमंत्री अर्थव्यस्था की रीढ़ कह रहे हैं) के साथ इस महामारी के समय कैसा बर्ताव किया जा रहा है ?

यदि हम यह जानने की कोशिश करें कि देश के विभिन्न राज्यों में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों की संख्या कितनी है तो कोई ठीक-ठीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. 2001 की जनगणना से पता चलता है कि उस समय 98 मिलियन लोग प्रवासी थे और 2011 का सेंसस बताता है कि इन दस सालों में इनकी  संख्या बढ़कर 139 मिलियन हो गई थी. अब इसमें प्रवासी मजदूर कितने होंगे यह जानना थोड़ा मुश्किल है . 2001 का सेंसस कहता है कि इसमें 40% ऐसे लोग थे जो काम और रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में गए थे. इससे आप समझ सकते हैं कि प्रवासी श्रमिकों की संख्या कितनी बड़ी है.

बिहार सरकार ने प्रवासी श्रमिकों के लिए एक हेल्पलाइन जारी की है जिससे पता चलता है कि इससे उन्हें 17 लाख श्रमिकों की जानकारी मिली है जिन्हें 1000 रूपये की सहायता राशि दी गई है. इसमें कोई शक नहीं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी. 2001 और 2011 का सेंसस यह भी बताता है कि सबसे ज्यादा माइग्रेंट श्रमिक यू पी और बिहार के हैं. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अर्थव्यस्था की रीढ़ बताये जाने वाले ये मजदूर किसी भी सरकारी स्कीम में कवर नहीं हैं.  इनके लिए कहीं कोई स्कीम नहीं है. न जहाँ से वे गए हैं वहां, न जहाँ वे काम कर रहे हैं वहां. कुछ वर्षों पहले कई राज्यों में तथा देश के स्तर पर भी निर्माण–मजदूरों का रजिस्ट्रेशन हुआ है. यहाँ इनके लिए कुछ स्कीम हैं लेकिन जो इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक गए हैं उनके लिए कोई स्कीम नहीं है जिससे अगर वे बीमार पड़ते हैं या किसी दुर्घटना में उनकी मौत हो जाती है या कोई और तकलीफ हो तो उन्हें सहायता दी जा सके. आज जब हम इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को पैदल या साइकिल से जाते हुए देख रहें हैं तब यह बात सामने आ रही है कि आज तक किसी भी सरकार ने इनके बारे में सोचा ही नहीं.

तस्वीर-राजेश कुमार

 

घर लौटे प्रवासी मजदूर बता रहे हैं कि जहाँ वे काम कर रहे थे उनको वहां की सरकार ने एक पैसे की मदद नहीं की. हैदराबाद के एक मजदूर जो कि पैदल चलकर अभी-अभी गाँव पहुंचे हैं, उन्होंने बताया कि वे चालीस दिन तक वहां थे ( कुल 20 लोग ) और पुलिस के तमाम लाठी-डंडे खाने के बाद केवल तीन किलो राशन पा सके. आप समझ सकते हैं कि हालात कितने दर्दनाक हैं |

आज मेरे पास जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले से अनिरुद्ध साहनी का फोन आया. उन्होंने बताया  कि वहां सात मजदूर फंसे हैं जिसमें पांच कुशीनगर के और दो महाराजगंज जिले के हैं.  उन्होंने कहा कि तीन दिन से वे लोग भटक रहे हैं. थाने पर जाते हैं तो कहा जाता है कि तहसीलदार के पास जाइए. तहसील जाते हैं तो कहा जाता है थाने जाइए वहां रजिस्ट्रेशन होगा. तीन दिन तक तमाम जगह भाग दौड़ करने के बावजूद कहीं कोई रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया. वेबसाइट पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के बारे में उनका कहना था कि यहाँ इंटरनेट काम ही नहीं कर रहा और आज तो पूरे दिन बंद है. तो मजदूरों की मदद ऐसे हो रही है. जम्मू–कश्मीर में सारी दुकानें बंद हैं, इंटरनेट अक्सर बंद ही रहता है तो बताइये कोई मजदूर रजिस्ट्रेशन कैसे करवाएगा.

(मजदूरों के इस समूह का आखिरकार रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया और वे पैदल ही निकल पड़े. कुछ दूर जाने के बाद सेना के जवानों ने उन्हें एक ट्रक पर बिठा दिया. ट्रक ने रस्ते में उतार दिया तो वे पैदल चल कर जम्मू पहुंचे. वहा पर मौजूद 40 से अधिक मजदूरों ने 3-3 हजार किराया देकर एक निजी बस तय किया और उससे गोरखपुर तक पहुंचे)

 मुझे लगभग दस साल हो गए प्रवासी श्रमिकों पर कार्य करते हुए लेकिन वे किन-किन क्षेत्रों में कार्य करते हैं इसका पूरा अंदाजा मुझे भी नहीं था. अब यही देखिये कि मछली पकड़ने के लिए सीतामढ़ी (बिहार) के मजदूर उदयपुर (राजस्थान) गए हुए हैं क्योंकि उनको बिहार में मछली पकड़ने का भी काम नहीं मिल पा रहा है. ऐसा नहीं है कि इस काम के लिए उन्हें उदयपुर में बहुत पैसे मिलते हैं, उनकी मजदूरी महज नौ हजार रूपये महीने है. वह भी तब जब वे लगातार काम करेंगे. इस काम के लिए ये मजदूर तीन महीने से उदयपुर में थे जिसमें उन्हें केवल 20-22 दिन ही काम मिला सका और मात्र छह हजार रूपये की कमाई हुई. इन लोगों ने लॉक डाउन के पहले ही तीन हजार रूपये घर भेज दिये थे. बाकी का भोजन-पानी में खर्च हुआ तो जब वे वहां से चले तो उन्हें साइकिल खरीदने और राह-खर्च के लिए अपने घर से पैसे मंगाने पड़े.

यूपी और बिहार के मजदूर कर्नाटक और जम्मू कश्मीर में बालू निकालने के लिए गए हैं. यह स्थिति बताती है कि यू पी, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में आर्थिक गतिविधि पूरी तरह से ठप है. इन राज्यों के पास इतना बड़ा जल स्रोत है फिर भी मछली पकड़ने, बालू निकालने जैसे कामों के लिए मजदूरों को बाहर जाना पड़ रहा है, यह विडम्बना नहीं तो क्या है ?  महराजगंज के एक  मजदूर, जिनकी रास्ते में मौत हो गई, उनको लूम में काम करने के लिए महाराष्ट्र जाना पड़ा जबकि कभी यूपी के मऊ, संत कबीर नगर, गोरखपुर, बनारस आदि जिलों के बुनकरों का काम पूरे एशिया में जाना जाता था. अब इन जगहों के पावर लूम कबाड़ में बिक रहे हैं और लूम मजदूर पलायन कर रहे हैं.

घर से 1500, 1600 किलोमीटर दूर गए इन मजदूरों की औसत मजदूरी प्रतिदिन 500 रूपये से ज्यादा नहीं है. इन प्रवासी मजदूरों को मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरु, दिल्ली, हैदराबाद आदि शहरों में 8-10 मजदूरों को एक साथ 10 x 9 के छोटे से कमरे में रहना पड़ता है जिसका किराया 4 हजार तक होता है. हमारे मजदूर भाइयों को महानगरों में जाने से केवल एक लाभ होता है कि उन्हें 20-25 दिन तक लगातार काम मिल जाता है और वे कुछ पैसे बचाकर घर भेज पाते हैं.

मजदूरों के पलायन का दूसरा जो सबसे बड़ा कारण है वह यह कि पिछले दो-तीन दशकों से हमारा सारा विकास शहर केन्द्रित हो गया है . सारा पैसा शहरों को ही बढ़ाने-फ़ैलाने में खर्च हो रहा है. गांवों में कृषि ही ऐसा क्षेत्र था जहाँ मजदूरों की सर्वाधिक जरूरत पड़ती थी. कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण हो जाने के कारण मजदूरों को भारी नुकसान हुआ है और उनकी भूमिका सिमटती जा रही है. इस समय हर राज्य में गेहूं की कटाई हार्वेस्टर से हो रही है जो 1 घंटे में ही तीन एकड़ खेत की कटाई कर देता है. यानि 45 मजदूरों की मजदूरी यह हार्वेस्टर एक घंटे में खा जाता है. कहने का मतलब यह कि गेहूं की कटाई में मजदूरों की भूमिका कम होती जा रही है . अब गांवों में खेती की गतिविधियों में केवल महिलाएं दिखती हैं. इन महिलाओं की मजदूरी पुरूषों की तुलना में काफी कम मिलती है.

दूसरा मद जिसमें मजदूरों को काम मिल जाता था वह मनरेगा था लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मनरेगा को लगातार हतोत्साहित किया गया है. मनरेगा के अन्दर काम दिलवाने में रोजगार सेवकों की बड़ी भूमिका होती है. अब हालात देखिये कि यूपी की 56000 ग्राम पंचायतों में सिर्फ 36000 में ही रोजगार सेवक कार्यरत हैं बाकी की लगभग 20000 ग्राम पंचायतें बिना रोजगार सेवकों के हैं. अब इन रोजगार सेवकों का हाल सुनिए. इनका मानदेय सिर्फ 6 हजार है और वह भी 18 महीनों से नहीं मिला है. (मई के दूसरे हफ्ते में यूपी सरकार ने रोजगार सेवकों के बकाया मानदेय का भुगतान किया.)

मनरेगा एक ऐसी स्कीम थी जो मजदूरों का थोड़ा-बहुत भला कर सकती थी लेकिन वर्तमान सरकार ने इसको लकवा ग्रस्त कर लगभग खत्म कर दिया है और अब जब प्रवासी श्रमिक वापस आ रहे हैं तो इन्हें मनरेगा की याद आ रही है.

रोजगार सेवकों से बात करके मैंने जाना कि मनरेगा में इस समय सिर्फ महिलाएं महिलाएं और बुजुर्ग ही काम करने आते हैं क्योंकि नौजवान मजदूरी करने शहर चले गए हैं.

यूनीसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि 2019 में  प्राकृतिक आपदा तथा जलवायु परिवर्तन के कारण  लगभग 50 लाख लोगों का आतंरिक प्रवासन हुआ है. मैंने पिछले तीन सालों में बिहार के कोसी नदी बेसिन, यूपी के शारदा नदी क्षेत्र (पीलीभीत विशेष) तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के राप्ती और गंडक नदी बेसिन विशेष रिपोर्टिंग की है. इस दौरान जो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है वह यह कि सर्वाधिक पलायन हमारे उर्वर कहे जाने वाले नदी क्षेत्रों में हुआ है. आजादी के ठीक बाद कोसी नदी पर बाढ़ नियंत्रण के लिए इसके दोनों तटों पर तटबंध बनाया गया और नदी के प्रवाह क्षेत्र को 40-50 किलोमीटर से 20-25 किलोमीटर में सीमित कर दिया गया. दोनों तटबंधों के भीतर करीब साढ़े तीन सौ गाँव आ गए और बाढ़ व सिल्टेशन से तटबंध भीतर पूरी फसल चौपट हो गई. हालात यहाँ तक पंहुच गए कि किसानों के खेतों में इतना सिल्ट जमा हो गया है कि न उसे हटाया जा सकता है न वहां खेती की जा सकती है. यहाँ पलायन का सबसे बड़ा कारण यही साबित हुआ. सरकार ने किसान से मजदूर बने लोगों के पलायन को खूब प्रोत्साहित किया. मजदूरों को बड़े महानगरों में ले जाने के लिए ट्रेनें चलाई. जून 2019 में मैं वहां गया था तो मुझे 100 से ज्यादा ऐसे मजदूर मिले जो गाँव लौटकर आये थे. बात-चीत के क्रम में उन्होंने बताया कि उनके पास 5-6 एकड़ खेत हैं लेकिन मुंबई, दिल्ली में वे मजदूर बनने को विवश हैं.

विडम्बना देखिए कि जिस नाविक ने मुझे कोसी नदी पार करवाया उसके पास दस एकड़ खेत थे . सिल्ट से पटे हुए अपने खेतों को दिखाते हुए बुजुर्ग नाविक ने कहा कि मुझे इन खेतों से कुछ नहीं मिलता. यह नाव ही मेरा सहारा है. उस गाँव के सारे नौजवान दिल्ली, मुम्बई जैसी जगहों पर जाकर ठेला आदि लगाने के छोटे-मोटे काम-धंधे कर रहे हैं. सोचिए कि इतनी खेती-बारी होने के बावजूद ये नौजवान दर-दर भटकने को मजबूर हैं. सरकारें आती रहीं जाती रहीं लेकिन सन 55 में तटबंध बनने से लेकर आज तक वहां के लोगों की जीविका का कोई प्रबंध नहीं किया गया और न ही बर्बाद हुए खेतों को खेती लायक बनाने का कोई प्रयास किया गया. अब दिहाड़ी मजदूर बन चुके इन किसानों को इसी सिल्ट पटे खेत की पूरी मालगुजारी देनी पड़ती है. इस मालगुजारी पर उन्हें रोड सेस, एजुकेशन सेस भी देना पड़ता है लेकिन उनके गांव में विकास के कोई चिन्ह नहीं दीखते हैं.

तो सूरतेहाल यह है कि कोशी क्षेत्र के मजदूर दिल्ली, मुंबई जाकर कमाते हैं और साल भर में एक बार वापस आकार अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मालगुजारी के रूप में सरकारी खजाने में भरते हैं. अब तटबंध का हाल देखिये. शुरूआती दिनों में तो यह ठीक-ठाक रहा लेकिन आज वहां सीपेज और भयंकर जलजमाव है. दिनों-दिन तटबंध के अन्दर का क्षेत्र ऊँचा होता गया है जिसकी वजह से बाहर सीपेज बढ़ता जा रहा है. यहाँ के लोग कहते हैं कि अन्दर नदी के साथ रहने वाले उजले पानी से परेशान हैं और हम बाहर वाले काले पानी से परेशान हैं. इस काले पानी (जल जमाव) से वहां के लोग साल के दस महीने घिरे रहते हैं. खेती पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है. बड़ी मुश्किल से अगैती धान की एक किस्म ‘गरमा’ की बुआई कर लोग भात खाने का जुगाड़ कर पाते हैं.

आजादी के इतने सालों बाद भी बिहार सरकार तटबंध के अन्दर और बाहर बर्बाद हुई हजारों एकड़ जमीन का खेती के लिए अनुकूलन नहीं कर पाई है. अगर सरकार ने इस जमीन के अनुकूल खेती का कोई इंतजाम किया होता तो शायद इतने लोगों को दिल्ली, मुंबई में दिहाड़ी मजदूर न बनना पड़ता .

यही स्थिति मैंने उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में शारदा नदी बेसिन में देखी. नदी का मार्ग बहुत तेजी से परिवर्तित हो रहा है जिससे नदी के दोनों तरफ के गाँव बुरी तरह से कट रहे हैं और खेती की जमीन नदी में समा रही है. मैंने कटान प्रभावित 24 गाँवो में जाकर देखा. इनमें बहुत सारे ऐसे गाँव थे जिन्हें प्लान करके बसाया गया था. आजादी के बाद इस क्षेत्र में कृषि विकास हेतु पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों को लाकर बसाया गया था और साठ के दशक में विस्थापित होकर आये बांग्लाभाषी लोगों को भी यहाँ जगह दी गई थी. आज इन सब लोगों के खेत नदी में समा रहे हैं और सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है . खेती बर्बाद होने के चलते वहां के नौजवानों को अपनी पढ़ाई छोड़कर मजदूरी के लिए दूर-दराज जाना पड़ा है. हालत यह थी कि पूरे गाँव में सिर्फ मातायें थीं. कोई नौजवान भूले से भी नहीं दिखा.

इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण बात निकल कर सामने आई कि पलायन करने वाले मजदूरों में सर्वाधिक संख्या दलित और ओबीसी वर्ग की है. इस लॉकडाउन के दौरान मैंने जितने मजदूर समूहों से बात की सब के सब दलित या ओबीसी वर्ग के थे. दलितों और ओबीसी की हितैषी पार्टियां बड़ी-बड़ी बातें तो करती हैं लेकिन इनकी स्थिति में सुधार हो इसके लिए कुछ नहीं करतीं. अस्मिता के नाम पर तमाम छोटी-छोटी पार्टियां बन गई हैं जो इन लोगों का वोट तो चाहती हैं लेकिन आज के इस भीषण संकट के दौर में यदि उनसे पूछा जाय कि वे इन असहाय लोगों के लिए क्या कर रही हैं तो उनके पास बताने के लिए कुछ नहीं है. दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, बेंगलुरु में फंसे मुसीबत झेल रहे ये मजदूर  दलित, निषाद, और ओबीसी आदि समुदायों के ही हैं लेकिन इनके नेता घनघोर चुप्पी ओढ़े घरों में बैठे हैं. कुछ ट्वीट कर सहानुभूति प्रदर्शित कर रहे हैं.

 सस्ता श्रम ऐसी चीज है जो सभी को चाहिए, क्या सरकार क्या मिल-मालिक. केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों से पूछा जाना चाहिए कि कोरोना लाकडाउन के पिछले डेढ़ महीने में उन्होंने मजदूरों के लिए क्या किया ? वे पैदल चलते रहे, आप बस तक नहीं दे पाये. ट्रेन चलाई तो उनसे किराया लिया. श्रमिक स्पेशल ट्रेन में श्रमिक  24 घंटे का सफ़र 50 -60 घंटे में भूखे-प्यासे करने को मजबूर हैं. कई श्रमिको व बच्चों की सफ़र में ही मौत की ख़बरें मिल रही हैं. एक तरफ यह स्थिति है तो दूसरी तरफ सैकड़ों को केंद्र सरकार विदेशों से हवाई जहाज में बैठाकर ले आयी . अपने को इतिहास की सबसे शक्तिशाली सरकार कहने वाली सरकार पिछले  डेढ़ महीने से हजारों की संख्या में हाइवे पर, पगडंडियों पर, रेल की पटरियों पर, पैदल चलते जा रहे प्रवासी श्रमिकों के लिए कोई व्यवस्था नहीं कर पायी. राज्यों के पास प्रवासी मजदूरों के लिए कोई नीति नहीं है. एक राज्य कहता है हम मजदूरों को वापस बुलायेंगे तो दूसरा राज्य कहता है हम भेज रहे हैं लेकिन अगली सरकार लेना नहीं चाहती. तीसरा राज्य कहता है कि हम जाने नहीं देंगे. अब सवाल उठता है कि इस पूरे मसले पर केंद्र सरकार क्या कर रही है ? इसका उत्तर है कि वह केवल भाषण दे रही है. इस सरकार ने प्रवासी मजदूरों को सड़कों पर चलते-चलते दम तोड़ने के लिए छोड़ दिया है.

मैंने 2009 में गोरखपुर इनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप की मदद से पलायन के मुद्दे पर एक छोटा सा सर्वे किया था. जब मैं पत्रकारिता में आया था तो पूरे इलाके में पलायन के दो कारण गिनाये जाते थे-एक यह कि यहाँ कोई फैक्ट्री नहीं है, दूसरी यह कि बाढ़ आती है. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिसे सुनते–सुनते हम उसके अभ्यस्त हो जाते हैं और हमें लगने लगता है कि यही सच है. उसी समय यह प्रचार भी बहुत तेजी से शुरू हुआ था कि मनरेगा ने पलायन को रोक दिया है और अब पंजाब में मजदूर ही नहीं मिल रहे हैं. मैंने अपने सर्वे में इन सब अवधारणाओं की वास्तविकता को जानने का प्रयास किया. सैम्पल के तौर पर गोरखपुर, महराजगंज और संत कबीर नगर के सात गांवों के करीब सौ प्रवासी मजदूरों  का चुनाव कर उनको एक प्रश्नावली दी गई और फिर उनके इन्टरव्यू भी किये गए. सर्वे में एक गांव ऐसा था जहाँ के मजदूर गुजरात के बंदरगाहों पर जहाज तोड़ने का काम करते थे. यह बहुत खतरनाक काम होता है इस काम में मजदूर विषैली गैसों और रसायनों के प्रभाव में आ जाते हैं. यदि कोई पांच-दस साल जहाज तोड़ने का काम कर ले तो वह टीवी व अन्य रोगों का शिकार हो जाता है और उसकी जिन्दगी ज्यादा दिन नहीं चलती. सर्वे में दो गाँव ऐसे थे जहां फैक्ट्रियां थीं. एक जगह चीनी मिल और डिस्टलरी थी. यह वही सरैया चीनी मिल का इलाका था जहां अमृता शेरगिल भी चार साल रहीं थी. अपने अनेक विश्व प्रसिद्ध चित्र उन्होंने यहाँ बनाये थे . इसके अलावा बाढ़ से प्रभावित होने वाले गांव भी इस सर्वे में शामिल थे.

इस सर्वे के निष्कर्षों को मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ जो आज भी कमोबेश वैसे ही हैं –

  • उस समय जो मजदूर बाहर जाकर काम कर रहे थे अधिकतम चार हजार और न्यूतम डेढ़ हजार रुपया कमा पा रहे थे .
  • इसमें पचास प्रतिशत ऐसे लोग थे जिनकी आयु पचीस से पैंतीस वर्ष थी और छह फीसदी ऐसे लोग थे जिनकी आयु बीस वर्ष से कम थी. 17 फीसदी लोगों कि उम्र बीस से पचीस वर्ष के बीच थी  |
  • 77 प्रतिशत लोग पहली बार घर से बाहर गए थे |

सर्वे में एक सवाल था कि बाहर जाकर काम करने से आपके जीवन में क्या फर्क आया है ? जबाब में 63 फीसदी मजदूरों ने कहा कि कोई फर्क नहीं आया है. जीवन स्थिति में कुछ सुधार आने की बात 37 फीसदी मजदूरों ने की. फिर इन लोगों से पूछा गया क्या सुधार हुआ है तो नौ फीसदी लोगों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि अब उन्हें कर्ज नहीं लेना पड़ता.

 

फोटो-राजेश कुमार

अगला सवाल मजदूरी से कमाई के खर्च को लेकर था कि आपने बाहर जाकर जो पैसा कमाया उसे किस कम में खर्च किया ?

  • 28 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने इस पैसे से अपना कर्ज चुकाया है . हम सभी लोग जानते हैं कि प्रवासी मजदूर अपनी जरूरत के लिए गाँव के ही कुछ बड़े लोगों से कर्ज लेते हैं. ये कर्ज दाता 5 से 10 फ़ीसदी प्रति माह के दर से कर्ज देते हैं. जो एक बार इनके कर्ज के दुश्चक्र में फंस गया वह फिर कभी निकल नहीं सकता. यह शिकारी के उस जाल की तरह है कि आप इससे निकलने के लिए जितना ही छटपटायेंगे उतना ही फंसते जायेंगे. गांवों में इस तरह के कर्ज के जाल का एक पूरा तंत्र विकसित हो गया है. मजदूरों के पास इस कर्ज को चुका पाने के लिए पलायन के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता.
  • तैंतीस फीसदी ऐसे लोग थे जिन्होंने जो कुछ कमाया था, वह परिवार के सदस्यों के इलाज में खर्च हो गया. यह हमारे स्वास्थ्य के ढांचे पर बहुत बड़ा सवाल है. हमारी जीडीपी का सिर्फ एक फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च होता है. यूपी जैसे राज्य में सरकार और प्राइवेट सेक्टर दोनों को मिलाकर एक व्यक्ति पर पूरे साल का सिर्फ 935 रुपया खर्च होता है जिसके कारण लोगों को अपनी जेबखर्च का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करना पड़ता है. इसी के साथ मैं यह भी जोड़ दूँ कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इन्सेफ़लाइटिस व चमकी बुखार से जो बच्चे मरे हैं उनमें 80 फ़ीसदी से अधिक प्रवासी मजदूरों के बच्चे हैं. ये मजदूर हमारे ख़राब स्वास्थ्य ढांचें के सबसे बड़े शिकार हैं जिसके लिए सीधे सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.
  • 39% मजदूरों की कमाई घर चलाने मसलन राशन, खेती, पढाई आदि में खर्च हुई थी |
  • सर्वे में एक भी ऐसा मजदूर नहीं मिला जिसने अपनी कमाई को किसी सुख-सुविधा पर खर्च किया हो जैसे कि बाइक खरीदी हो, फ्रिज खरीदा हो. हाँ श्रमिक मोबाईल जरूर इस्तेमाल कर रहे थे. अब आप इसे जरूरत समझ लें या लक्जरी समझ लें. मजदूरों की पूरी जिंदगी का हासिल यही है कि कर्ज चुका लेते हैं, थोडा बहुत इलाज करा लेते हैं और कुछ बच्चों की पढ़ाई में खर्च कर लेते हैं .

मजदूरों के पलायन का एक और सबसे बड़ा कारण भूमि हीनता है . प्रवासी मजदूरों में 40 फ़ीसदी ऐसे लोग थे जिनके पास पचास डिसमिल से भी कम जमीन थी. मतलब लगभग आधा एकड़. 44 फ़ीसदी ऐसे लोग थे जिनके पास 50 डिसमिल से एक एकड़ के बीच जमीन थी. अब हालात यह हैं कि मजदूरों के हाथ से यह बची-खुची जमीन भी छिन रही है, क्योंकि उनकी कमाई और जरूरत के बीच जमीन आसमान का अंतर है. आंकड़े भी बताते हैं कि 80 के दशक से लेकर आज की तारीख तक में भूमिहीनता की दर दोगुनी हो चुकी है.

अब बड़ा सवाल उठता है कि आखिर भूमि सुधार क्यों नहीं हुए ? महराजगंज, कुशीनगर, पश्चिमी चंपारण, जहाँ के मजदूरों की बात मैं कर रहा हूँ, वहां आज भी जाकर आप देखें तो सौ-सौ, डेढ़-डेढ़ सौ एकड़ के फॉर्म हॉउस दिखाई देंगे जो बाकायदा तारों से घेरे हुए हैं. जमींदारी ख़त्म हो चुकी है, सीलिंग एक्ट भी हमारे यहाँ लागू है इसके बावजूद कुछ लोगों के कब्जे में हजारों एकड़ खेत हैं. बिहार में नितीश कुमार ने डी बंदोपाध्याय आयोग से रिपोर्ट तो तैयार करवायी लेकिन लागू नहीं किया. यूपी में भूमि सुधार की तो कोई बात नहीं कर रहा. न सरकार, न विपक्ष और न बुद्धिजीवी. यदि आप चाहते हैं कि श्रमिकों का पलायन कम हो तो भूमि सुधार को तत्काल लागू कीजिये.

 पलायन का एक और महत्वपूर्ण कारण, जो सर्वे के दौरान मुझे समझ में आया, वह यह कि मजदूरों के अंदर अपने जीवन में कुछ बेहतर करने की बड़ी आकांक्षा है. एक सवाल के जबाब में ज्यादातर मजदूरों ने कहा कि वे बाहर जाकर अपनी जिन्दगी को बेहतर बनाना चाहते हैं. दस वर्ष पहले मुझे गाँव में महेश नाम का एक बीस वर्षीय युवक मिला जो पांच महीने मुम्बई रहकर आया था और वापस जाने की तैयारी कर रहा था. मैंने उससे पूछा कि बंबई जाकर तुम्हारे जीवन में क्या बदलाव आया है ? उसने मुझे अपने जींस की पैंट दिखाते हुए कहा कि यह बदलाव आया है. वह अपने परिवार के लिए भी नए कपड़े लाया था. इसे हम आप बहुत मामूली बात कहेंगे लेकिन उनके लिए यह बहुत बड़ी बात है.

सर्वे के दौरान हमने प्रवासी कामगारों की पत्नियों से भी बात कर दो-तीन सवालों पर उनकी राय जानने की कोशिश की थी. हमने उनसे पूछा था कि जब उनके पति शहर में मजदूरी के लिए काम पर चले जाते हैं तो क्या उनके साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ होती हैं ? इस सवाल का 16 फीसदी महिलाओं ने कोई जवाब नहीं दिया. इस बारे में वे बात ही नहीं करना चाहती थीं. जाहिर है कि यह सवाल उन्हें असहज कर रहा था. 15 फीसदी महिलाओं ने कहा कि हाँ उन्हें दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ता है.  88 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे घर में अकेला और असुरक्षित महसूस करती हैं. अभी इस लॉकडाउन के दौर में एक दूसरी त्रासदी सामने आ रही है जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है. प्रवासी कामगारों की पत्नियाँ पहले भी अवसाद और असुरक्षा में रहती थीं और अब जब उनके पति या बच्चे लॉकडाउन में फंस गए हैं तो उनके भीतर असुरक्षा और अवसाद बहुत बहुत बढ़ गया है. कई महिलाओं द्वारा ख़ुदकुशी की घटनाएँ सामने आई हैं.

सर्वे के दौरान 53 फीसदी महिलाओं ने कहा था कि वे अपने पति के साथ ही रहना चाहती हैं. बाकियों ने कहा कि वे जाना तो चाहती हैं लेकिन जा नहीं सकती क्योंकि वे समझती हैं कि पति की मजदूरी की कमाई इतनी नहीं है कि साथ रहने का खर्च उठाया जा सकता है. अभी कुशीनगर के एक सब्जी विक्रेता जिनकी बम्बई में मृत्य हो गई उनकी पत्नी से मैंने बात की थी. उन्होंने कहा कि तीस साल के वैवाहिक जीवन में वे सिर्फ 6 दिन अपने पति के साथ गई थीं वह भी तब जबकि उनकी बीमारी में यहाँ इलाज नहीं हो पा रहा था. प्रवासी श्रमिकों का दुःख अथाह है. और अंत में मुझे यह बात करते हुए गोरखपुर के एक बुजुर्ग की बात याद आ रही है. मै इंसेफेलाइटिस से मरे बच्चे के माता-पिता से मिलने गया था. बच्चे के पिता मुम्बई में मजदूरी करते थे और बच्चे की मौत के बाद भी घर नहीं आ सके थे. बच्चे की माँ गुमसुम बैठी थी और कुछ भी बोल नहीं रही थी. बुजुर्ग ही इस परिवार की व्यथा बता रहे थे. उन्होंने कहा कि इस परिवार का कोई वतन नहीं है. उन्होंने अपनी बात को समझाते हुए कहा कि इस परिवार के पास गांव में एक धूर जमीं नहीं है. हमारे घर के एक कमरे में रहते हैं. जिनके पास रहने का घर नहीं, खेती की जमीन नहीं उनका कोई वतन नहीं होता. प्रवासी मजदूरों का कोई वतन नहीं है.

(यह लेख पत्रकार मनोज कुमार सिंह के छह मई के समकालीन जनमत के फेसबुक लाइव का सम्पादित हिस्सा है. इसमें कुछ हिस्सों को अपडेट किया गया है. ट्रांस्क्राइब दीपक सिंह और कामिनी त्रिपाठी ने किया है.)

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