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गोरख स्मृति दिवस पर व्याख्यान और काव्य पाठ का आयोजन

इलाहाबाद. 29 जनवरी को परिवेश और जन संस्कृति मंच की तरफ से गोरख स्मृति व्याख्यान और काव्यपाठ का आयोजन किया गया. प्रो. अवधेश प्रधान ने व्याख्यान देते हुए कहा कि गोरख पाण्डेय की आत्महत्या को ही आधार बनाकर लेखकों और आलोचकों ने उनके सृजनकर्म का मूल्यांकन किया. ऐसा हादसा निराला के साथ हो चुका था. लेकिन इस परिघटना से हमारे समाज ने सबक नहीं लिया जिसकी परिणति मुक्तिबोध की बीमारी और गोरख पाण्डेय की आत्महत्या के रूप में हमारे सामने आयी.

प्रो. अवधेश प्रधान

रामविलास शर्मा ने निराला की समस्या को तो संवेदनशीलता से समझा लेकिन मुक्तिबोध को समझने में विफल रहे. वामपंथी विचारकों ने गोरख पाण्डेय को गंभीरता से नहीं लिया और गोरख को विचारों  की अतिवादिता का शिकार घोषित किया. यह एक नितांत छिछला मूल्यांकन है जबकि आत्महत्या एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्न है. हमारे देश में किसानों के बाद युवा वर्ग ही आत्महत्या कर रहा है.

गोरख विचार और आदर्श को सौ प्रतिशत जीते थे. एसे लोगों का आत्मसंघर्ष बहुत तीखा हो जाता है. गोरख पाण्डेय दुनिया की हलचलों से वाकिफ थे. उन्होंने मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन के दर्शन का गहन अध्ययन किया था तथा सार्थक बहसों को अग्रसित किया. गोरख की संस्कृत दर्शन, लोकगीत, उर्दू ग़ज़ल में गहरी अभिरुचि थी. गोरख के विचार सुस्पष्ट थे. इसलिए उनकी भाषा में स्पष्टता थी. गोरख की कविताओं में राजनैतिक और सांगठनिक तात्कालिक नहीं वरन विचारों का एक लंबा प्रवाह है. व्यंग्य कविता में गोरख का एक महत्वपूर्ण स्थान है. गोरख की कविता ब्रेख्त से प्रभावित है. ब्रेख्त की व्यंग्य कला को गोरख ने प्रभावात्मक ढंग से हिंदी में सफलता दिलाई. मुक्ति और मोक्ष की अवधारणा पर गोरख ने मार्क्स और बौद्ध धर्म की भिन्नता को सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत किया.

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय

अध्यक्षीय उद्बोधन में रामजी राय ने कहा कि गोरख के जीवन पर किसी उपहास का असर नहीं था. गोरख का प्राण अपने आदर्शों पर क्रियाशील रहा. गोरख ने प्रेम को दया भाव के रूप में स्वीकार नहीं किया. गोरख का कहना था कि जब मैं अपने से प्रेम करूँगा तो शादी करूँगा. गोरख की कविता गहरी प्रेमानुभूति का परिणाम है. गोरख के गीत छपे जाने से पहले गाये जाने लगे थे.
लक्ष्मण गुप्ता ने आत्मा, रात के दस बजे, यमुना शीर्षक से कवितायें पढ़ीं जो स्त्रियों की श्रम चेतना पर केन्द्रित थीं.

विहाग वैभव ने लगभग फूलन देवी, बेहया के फूल, तपा हुआ मन, मृत्यु और सृजन के बीच एक प्रेमकथा शीर्षक से कवितायें पढ़ीं जिसमें  प्रेम और करुणा के साम्राज्यवाद से टकराहट की गूँज सुनाई देती है.

युवा कवि विहाग वैभव

पंकज चतुर्वेदी ने इमरजेंसी, काजू की रोटी, आक्सीजन के अभाव में, हवन के लिए शीर्षक कविताएँ  पढ़ीं जो वर्तमान राजनीति की कारगुजारियों पर एक सार्थक व्यंग है.

युवा कवि पंकज चतुर्वेदी

बसंत त्रिपाठी ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया, तालाब, मेट्रो रेल की तैयारी के बीच की कविता विकास और विनाश के तांडव के बीच की कविता है.
वरिष्ठ कवि हरिश्चंद पाण्डेय ने यमुना इलाहाबाद में संगम होती हुई मर्मस्पर्शी कविता पढ़ी. कवि मदन कश्यप ने काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता की.
कार्यक्रम में राम प्यारे राय, नीलम शंकर, अविनाश मिश्र, अनिल रंजन भौमिक, प्रो. अनीता गोपेश, प्रणय कृष्ण, विवेक निराला, संध्या नवोदिता, डॉ. सूर्य नारायण, मीना राय, अरिंदम, डॉ. आशुतोष पार्थेश्वर, डॉ. जनार्दन, डॉ. अमितेश, डॉ. अंशुमन इत्यादि लोग उपस्थित थे ।

कार्यक्रम का संचालन करते प्रो. प्रणय कृष्ण

व्याख्यान सत्र का संचालन प्रो. प्रणय कृष्ण ने किया तथा काव्य पाठ का संचालन जनमत के सम्पादक के. के. पाण्डेय ने किया. परिवेश के संयोजक विष्णु प्रभाकर ने धन्यवाद ज्ञापित किया.

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