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प्रगतिशील-वामपंथी आंदोलन की सक्रिय शख्सियत थे खगेंद्र ठाकुर : जन संस्कृति मंच

सुप्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक खगेंद्र ठाकुर को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

पटना. जन संस्कृति मंच ने सुप्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक, कवि, व्यंग्यकार, संगठक और वामपंथी नेता खगेंद्र ठाकुर के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है.

जन संस्कृति मंच ने कहा कि खगेंद्र ठाकुर पिछले पचास साल से अधिक समय से प्रगतिशील-वामपंथी आंदोलन की सक्रिय शख्सियत थे। नए रचनाकारों के प्रति वे हमेशा बेहद संवेदनशील रहे। एक ऐसे समय में जब फासिस्ट सत्ता के संरक्षण में प्रतिक्रियावादी, श्रमविरोधी और अवैज्ञानिक विचारों को मजबूूत किया जा रहा है, उस वक्त उसके खिलाफ प्रगति, समानता, न्याय की जो बेहद जरूरी लड़ाई लड़ी जा रही है, खगेंद्र जी उस लड़ाई में शामिल थे। हाल के दिनों में गौरी लंकेश, प्रो. कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे की हत्याओं के खिलाफ निकाले गए प्रतिवाद जुलूसों में उन्होंने शिरकत की थी। उनका निधन तमाम प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार-संस्कृृतिकर्मियों, लेखक-सांस्कृृृतिक संगठनों, वाम-लोकतांत्रिक राजनीति और समाज की बेहतरी के लिए संघर्ष करने वालों के लिए अपूरणीय क्षति है।

खगेंद्र ठाकुर का जन्म झारखंड के गोड्डा जिले के मालिनी नामक गांव में 9 सितंबर 1937 को हुआ था। वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उन्हें पटना एम्स में भर्ती कराया गया था। वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।

खगेंद्र ठाकुर स्कूली जीवन में ही निबंध और कविताएं लिखने लगे थे। पहली कविता उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या से आहत होकर लिखी थी। वे जीवन भर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ रहे। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को वे देश के लिए बेहद खतरनाक मानते थे।

1960 में उन्हें सुल्तानगंज के एक काॅलेज में प्राध्यापक की नौकरी मिली। 1967 में भागलपुर शिक्षक संघ के महासचिव बनाए गए। शिक्षक आंदोलनों के दौरान जेल भी गए। उसी दौरान उन्होंने छायावादी काव्य-भाषा पर पीएच.डी. किया, जो बाद में प्रकाशित भी हुआ। 1965 में उन्हें सीपीआई की सदस्यता मिली। वे एक साथ अध्यापन, शिक्षक आंदोलन, साहित्य और राजनीति के मोर्चे पर सक्रिय हो गए। 1968 में उनका पहला कविता संग्रह ‘धार एक व्याकुल’ प्रकाशित हुआ।

पिछले पांच दशक में उनकी लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविता संग्रह- ‘रक्त कमल धरती पर’, व्यंग्य संग्रह- देह धरे को दंड, ईश्वर से भेंटवार्ता, आलोचना-समीक्षा की पुस्तकें- दिव्या का सौंदर्य, रामधारी सिंह दिनकर: व्यक्तित्व और कृृतित्व, कहानी एक संक्रमणशील कला, कहानी: परंपरा और प्रगति, नागार्जुन का कवि-कर्म, कविता का वर्तमान, नाटककार लक्ष्मीनारायण लाल, उपन्यास की महान परंपरा और वैचारिक विमर्श की पुस्तकें- विकल्प की प्रक्रिया, आज का वैचारिक संघर्ष और माक्र्सवाद, नेतृत्व की पहचान, आलोचना के बहाने, समय, समाज और मनुष्य प्रमुख हैं। भगवतशरण उपाध्याय पर साहित्य अकादमी के लिए उनके द्वारा लिखा गया मोनोग्राफ भी एक उल्लेखनीय कृति है।

खगेंद्र ठाकुर 1973 से 1994 तक बिहार प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव रहे। 1994 से 1999 तक प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेवारी में रहे। उन्होंने ‘प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास पुरुष’ नामक किताब भी लिखी। प्रलेस की पत्रिका ‘उत्तर शती’ का उन्होंने 1981 से 1985 तक संपादन किया। निधन के समय वे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंडल के सदस्य थे।

खगेंद्र ठाकुर 1991 में शिक्षक के पद से इस्तीफा देकर सीपीआई की राजनीति से पूर्णकालिक तौर पर जुड़ गए थे। सीपीआई के झारखंड राज्य कार्यकारिणी और राज्य परिषद के वे सदस्य थे। सीपीआई के राष्ट्रीय परिषद के वे लंबे समय तक सदस्य रहे। वे सीपीआई, झारखंड के सहायक सचिव भी रहे। दो वर्ष वे सीपीआई के मुखपत्र ‘जनशक्ति’ के संपादक रहे और उसके लिए लोकप्रिय स्तंभ लिखे।

खगेंद्र जी प्रगतिशील संस्कृृतिकर्म और रचनाशीलता के प्रति बेहद प्रतिबद्ध थे। उन्हें कहीं किसी साहित्यिक आयोजन में बुलाया जाता था तो वे सफर की तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए वहां जरूर पहुंच जाते थे। खासकर पिछले तीस-पैंतीस वर्ष के प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन में उनकी भूमिका को हमेशा याद किया जाएगा। बिहार-झारखंड के साहित्यकारों की कई पीढ़ियों के वे प्रिय आलोचक थे।

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