झारखंड जनाधिकार महासभा ने सीआरपीएफ द्वारा आदिवासियों की पिटाई की घटना पर जांच रिपोर्ट जारी की, न्यायिक जांच की मांग 

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झारखंड जनाधिकार महासभा ने सीआरपीएफ द्वारा 15 जून को चिरियाबेड़ा (झारखंड) के आदिवासियों की क्रूर पिटाई की घटना  पर रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि यह घटना सुरक्षा बलों के आदिवासी विरोधी चहरे का पर्दाफाश करती है। महासभा ने  इस घटना की न्यायिक जांच की मांग की है।

महासभा ने कहा कि 15 जून को सीआरपीएफ के जवानों ने चिरियाबेड़ा ग्राम (अंजेडबेड़ा राजस्व गाँव, खूंटपानी प्रखंड, पश्चिमी सिंहभूम) के 20 लोगों को पीटा था जिनमें से 11 को बुरी तरह से पीटा गया था एवं इनमें से तीन को गंभीर चोटें आईं।  झारखंड जनाधिकार महासभा की एक टीम ने मौके पर  जाकर तथ्य एकत्र किए और इस पर रिपोर्ट तैयार किया। जांच दल में आदिवासी महिला नेटवर्क, आदिवासी अधिकार मंच, बगईचा, भूमि बचाओ समंवय मंच, कोल्हान, मानवाधिकार कानून नेटवर्क, जोहार, कोल्हान आदिवासी युवा स्टार एकता, हमारी भूमि हमारा जीवन के प्रतिनिधि शामिल थे.

जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 जून 2020 को चिरियाबेड़ा में बोंज सुरिन की झोपड़ी की छत की मरम्मत में लगभग 20 व्यक्ति मदद कर रहे थे। लगभग दोपहर 12:30 बजे, सीआरपीएफ के एक दर्जन से अधिक सशस्त्र पुलिस जंगल से गांव में आए और बोंज के घर को घेर लिया। धीरे-धीरे, लगभग 150-200 सीआरपीएफ जवान और पुलिस गांव में पहुंच गये।

सीआरपीएफ कर्मियों ने छत पर काम कर रहे ग्रामीणों को नीचे आने के लिए हिंदी में कहा। चूंकि अधिकांश ग्रामीण हिंदी नहीं समझते या बोलते हैं, वे समझ नहीं पाए कि क्या कहा जा रहा था। सीआरपीएफकर्मियों के चिल्लाने और इशारों से उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें नीचे आना होगा। उनसे हिंदी में नक्सलियों के ठिकाने के बारे में पूछा गया। लोगों ने ‘हो’ भाषा में जवाब दिया कि वे हिंदी नहीं समझते हैं और नक्सलियों के ठिकाने को नहीं जानते हैं। ग्रामीणों द्वारा हिंदी में जवाब न देने के कारण सीआरपीएफ कर्मियों ने ग्रामीणों को गाली देना शुरू कर दिया। फिर उन्होंने एक-एक कर 20 लोगों को बेरहमी से पीटा। सीआरपीएफ के जवानों ने ग्रामीणों को पीटने के लिए डंडों, बैटन, राइफल के बट और बूटों का इस्तेमाल किया। कई पीड़ितों और ग्रामीणों ने तथ्यान्वेषण दल को बताया कि पूरा इलाका उनकी दर्दनाक चीखों से गूंज रहा था।

सीआरपीएफ ने एक पीड़ित, राम सुरीन, के घर के अन्दर के सामान को तहस-नहस कर दिया। घर में रखे बक्सों को तोड़ा गया और बैग को फाड़ा गया। घर में रखे राशन – धान, चावल, दालें, मटर – को चारों ओर फेंक दिया गया और नष्ट कर दिया गया। बक्से में रखे गए दस्तावेज – खतियान (जमीन का दस्तावेज), मालगुजारी रसीदऔर परिवार के सदस्यों का आधार – सीआरपीएफ द्वारा जला दिया गया। परिवार ने हाल ही में 35,000 रुपये में बकरियां बेची थीं और पैसे को बक्से में रखा था। सीआरपीएफ द्वारा छापेमारी के दौरान पैसे गायब हो गए. सीआरपीएफ को न इस घर व पीड़ितों के पास से माओवादी सम्बंधित दस्तावेज़ मिला और न ही वे अपने साथ किसी भी प्रकार का दस्तावेज़ वापिस ले गये।

हालाँकि पीड़ितों ने पुलिस को अपने बयान में स्पष्ट रूप से बताया था कि सीआरपीएफ ने उन्हें पीटा, लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी (20/2020 dtd 17 जून 2020, गोइलकेरा थाना) में कई तथ्यों को नज़रंदाज़ किया गया है और हिंसा में सीआरपीएफ की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं है. प्राथमिकी में उल्लेख किया गया है कि पीड़ितों को अज्ञात अपराध कर्मियों द्वारा पीटा गया और एक बार भी सीआरपीएफ का ज़िक्र नहीं है। पुलिस ने अस्पताल में पीड़ितों पर दबाव भी दिया कि वे सीआरपीएफ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज न करवाएं और हिंसा में उनकी भूमिका का उल्लेख न करें l

17 जून को कुछ स्थानीय समाचार पत्रों (जैसे यह रिपोर्ट) ने खबर छापी कि 50-60 हथियारबंद नक्सलियों ने 15 जून को चिरियाबेड़ा के लोगों को पीटा। रिपोर्टों ने नक्सलियों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया, न कि सीआरपीएफ को। इस तरह की मीडिया रिपोर्ट और पुलिस द्वारा दर्ज की गयी गलत प्राथमिकी (जिसमें सीआरपीएफ के बजाए हथियारबंद अपराधियों को दोषी ठहराया गया है) स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि इस घटना में नक्सली हिंसा का एक गलत व्याख्यान बनाने का और इसमें सीआरपीएफ दोषमुक्त करने का एक सक्रिय प्रयास किया जा रहा है।

इस घटना और पुलिस की अत्यधिक आपत्तिजनक प्रतिक्रिया फिर से झारखंड में सीआरपीएफ और पुलिस द्वारा आदिवासियों के मानवाधिकारों के लगातार हो रहे हनन को उजागर करती है। यह भी चिंताजनक है कि इस मामले में उचित कार्यवाई करने के मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देश (Twitter के माध्यम से) के बावज़ूद स्थानीय पुलिस ने ऐसी प्राथमिकी दर्ज की है जो जांच को गलत दिशा में ले जाएगी और जिससे हिंसा के लिए ज़िम्मेवार सीआरपीएफ दोषमुक्त हो जाएंगे.

जांच दल ने 28 जुलाई को पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त व पुलिस अधीक्षक के साथ इस मामले में मुलाकात की (मांग पत्र संलग्न). पुलिस अधीक्षक ने माना कि कुछ सी.आर.पी.एफ़. जवानों ने पीड़ितों को मारा, पर वे सी.आर.पी.एफ़. के बर्ताव को बार बार “mishandling” और “unprofessional” ही बोलते रहे. उपायुक्त ने स्पष्ट कहा कि हिंसा में सी.आर.पी.एफ़. की भूमिका पर कोई संदेह नहीं है। दोनों ने आश्वासन दिया कि प्राथमिकी में सुधार किया जाएगा और पीड़ितों के बयान दुबारा रिकॉर्ड किए जाएंगे। उपायुक्त ने कहा कि इस मामले में पीड़ितों को न्याय मिलेगा.

झारखंड जनाधिकार महासभा ने इस घटना में झारखंड सरकार से मांग की है कि पुलिस तुरंत दर्ज प्राथमिकी (20/2020 dtd 17 जून 2020, गोइलकेरा थाना) को सुधारे,  प्राथमिकी में दोषी के रूप में सीआरपीएफ कर्मियों का नाम दर्ज करें, बिना किसी बदलाव के पीड़ितों की गवाही को सही तरीके से दर्ज करें और प्राथमिकी में आईपीसी और एससी-एसटी अधिनियम के संबंधित धाराएं जोड़ें, जिनका रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है. पीड़ितों के बयान (जैसा पीड़ितों ने बोला था) को सही रूप दर्ज न करने और गलत बयान दर्ज करने के लिए सरकार स्थानीय पुलिस के खिलाफ भी कार्रवाई करे. साथ ही, तुरंत हिंसा के लिए जिम्मेदार सीआरपीएफ कर्मियों को गिरफ्तार करे.

महासभा ने  सरकार से न्यायिक जांच का गठन करने, इसकी रिपोर्ट को समयबद्ध जांच के बाद सार्वजनिक करने, हिंसा के लिए जिम्मेदार सभी प्रशासनिक, पुलिस और सीआरपीएफ कर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई  करने, सभी पीड़ितों को शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और संपत्ति के नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजा दिए जाने, चिरियाबेड़ा गाँव में लोगों के वनाधिकार के लंबित आवेदनों को तुरंत स्वीकृत करने, गाँव में सभी बुनियादी सुविधाएं (शिक्षा, पेय जल आदि) व सभी परिवारों के बुनियादी अधिकार (राशन, पेंशन, मनरेगा रोज़गार, आंगनवाड़ी सेवाएं आदि) सुनिश्चित करने की मांग की है। महासभा ने सरकार से स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों को स्पष्ट निर्देश देने को कहा है कि वे किसी भी तरह से लोगों, विशेष रूप से आदिवासियों, का शोषण न करें. मानव अधिकारों के उल्लंघन की सभी घटनाओं से सख्ती से निपटा जाए. नक्सल विरोधी अभियानों की आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा लोगों को परेशान न किया जाए।  स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों को आदिवासी भाषाओं, संस्कृति व आदिवासी दृष्टिकोण का प्रशिक्षण दिया जाए व इनके प्रति संवेदनशीलता सुनिश्चित की जाए.

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