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फ़ील्ड रिपोर्टिंग

जिनके वीडियो वायरल नहीं हुए …

कोरोना डायरी : लॉकडाउन-2

नीलिशा


[युवा पत्रकार नीलिशा दिल्ली में रहती हैं और इस भयावह वक़्त का दस्तावेज़ीकरण वे कोरोना डायरी नाम से कर रही हैं। समकालीन जनमत पर इस रोजनामचे को आप क्रमशः पढ़ रहे हैं। प्रस्तुत है दूसरी किस्त।]

21 दिन की समय सीमा पूरी होने वाली थी, देश 21 साल पीछे जाने से तो बचा या नहीं, इस विषय में थोड़ा संशय था। इसलिए प्रधानमंत्री फिर लाइव हुए और हाथ जोड़कर कोरोना को आख़िरकार परास्त करने के लिए 14 दिन और मांगे। ‘बस 14 दिन और दीजिए। कोरोना का चक्र टूट जाएगा।’ कोरोना का चक्र तो नहीं टूटा, लेकिन लोगों के सब्र का बांध ज़रूर टूटने लगा। प्रवासी मजदूरों के घर जाने का जो सिलसिला लॉकडाउन-1 से शुरू हुआ था, वह थमने का नाम नहीं ले रहा था। बस अड्डे तो प्रवासियों से खाली हो गए, लेकिन सड़कें भर गई। घर सैकड़ों किलोमीटर दूर था, लेकिन मजदूर अपने कंधों पर अपनी गृहस्थी लादे पैदल अपने घरों की तरफ बढ़े जा रहे थे। नोटबंदी की तर्ज़ पर घोषित किए गए लॉकडाउन में उससे उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों और समस्याओ का आकलन नहीं किया गया था। इसलिए आदतन केन्द्र सरकार मज़दूरों के इस पलायन को कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से ही देख रही थी। इस कारण हर गुज़रते दिन के साथ प्रवासी मज़दूरों की समस्या विकराल होती जा रही थी।

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने मजदूरों को घर पहुंचाने की व्यवस्था तो नहीं की, लेकिन कूपन सिस्टम की व्यवस्था शुरू कर गरीबों को राशन जरूर बांटा। सरकारी स्कूलों में शिक्षक और स्टाफ मिलकर राशन बांटने के काम में लगे थे। फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान मैंने कई बार देखा कि स्कूलों के बाहर लंबी कतारें लगती थीं। पूछने पर पता चला कि लोगों को राशन बांटा जा रहा है। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के विधायक दिलीप पांडेय ने भी बहुत से लोगों के घरों में राशन पहुंचाया। कोई भी व्यक्ति सीधे उन्हें मैसेज करके या उनके स्टाफ को फोन करके कहता कि हमारे घर राशन नहीं है तो दिलीप पांडेय उनके घर राशन लेकर पहुंच जाते। उनके ट्विटर अकाउंट पर भी लोग मदद मांगते थे। ढेरों धन्यवाद संदेश दिलीप पांडेय के ट्वीटर हैंडल पर देखे जा सकते हैं। इस तरह लोगों की मदद करता कोई दूसरा निर्वाचित प्रतिनिधि मुझे नजर नहीं आया। दिल्ली सरकार की तरफ से खाने के पैकेट भी गरीबों में बांटे गए। दिल्ली के स्कूलों को शेल्टर होम में बदल दिया गया। यहीं पर खाना बनता और लोगों में वितरित किया जाता। अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि उनकी सरकार 10 लाखों को खाना खिला रही है, लेकिन प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए उनकी सरकार ने कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई।

लोगों की हालत इससे समझी जा सकती थी कि अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले में गोल्ड मेडल जीतने वाली खो-खो खिलाड़ी नसरीन शेख का एक वीडियो वायरल हुआ कि उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। पहले उनके पिता बाजार में बर्तन बेचकर कमा लेते थे, लेकिन लॉकडाउन में उनके पास कोई काम नहीं था। यह खबर वायरल होने के बाद कई नेता उनके घर राशन के साथ ही आर्थिक मदद करने पहुंचे। मैं जब नसरीन के पास पहुंची तो उनके पिता ने कहा कि अब कोई समस्या नहीं है। हमें मदद मिल गई है। नसरीन ने भी कहा कि उन्हें काफी मदद मिली है। इस महामारी से निपटने की जंग में ऐसे ही बहुत से लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए, लेकिन उनका कोई वीडियो वायरल नहीं हुआ, इसलिए उनकी तकलीफ कोई जान नहीं सका।

अगर राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों से मिलने वाली मदद की बात करें तो दिल्ली यूथ कांग्रेस कार्यालय इसमें काफी सक्रिय दिखा। यहां पर महिलाएं मास्क बनाती। ये मास्क लोगों में बंटते। इसके साथ ही बाहर से भी मास्क पैकेट के पैकेट और सैनेटाइजर आते। यहां के मास्क और सैनेटाइजर रिपोर्टर्स ने भी खूब इस्तेमाल किए। कोई भी रिपोर्टर जाता और एक पैकेट मास्क लेकर आ जाता। मेरे ही तमाम मित्रों ने यूथ कांग्रेस ऑफिस से मास्क लिए और मुझे भी दिए। मैंने कहा, ये तो बहुत अच्छा काम है, लेकिन बाकी मास्क इस्तेमाल करने वाले कुछ नहीं बोले, क्योंकि वो सब भाजपा के केंद्रीय दफ्तरों में बैठने वाले लोग थे। वो सामान का इस्तेमाल तो कर रहे थे, लेकिन एक बार शुक्रिया करने की जहमत भी नहीं उठा रहे थे। मीडिया संस्थानों ने अपने कर्मचारियों को मास्क दिए हों या नहीं, लेकिन यूथ कांग्रेस ने उन तक मास्क जरूर पहुंचा दिए। इसी तरह से यूथ कांग्रेस के ऑफिस में खाना भी बनता। ऑफिस के बाहर रोज सुबह-शाम खाना बंटता। एक बार मेरे एक साथी रिपोर्टर और ड्राइवर खाना नहीं लाए थे। उन्होंने सोचा कि कहीं न कहीं मिल ही जाएगा, लेकिन एक तो लॉकडाउन दूसरे संडे होने की वजह से काफी खाक छानने के बाद भी उन्हें कुछ खाने को नहीं मिला। इसके बाद वह यूथ कांग्रेस के दफ्तर के सामने से निकले तो वहां पर खाना बंट रहा था। थोड़ा सा संकोच करने के बाद उन्होंने खाना बांटने वालों से खाने के पैकेट देने को कहा तो उन्हे तुरंत ही दो पैकेट खाना और पानी के दो गिलास पकड़ा दिए। जब उन्होंने खाना खा लिया तो मैंने उनसे पूछा, ‘खाना कैसा था।‘ जवाब उनकी आंखों की चमक ने दे दिया। बोले, ‘बहुत टेस्टी था।‘ मैंने पूछा, ‘क्या था।‘ तो बोले, ‘बढ़िया-सी चने की दाल और रोटी।’ गरीब लोग खाने के इंतजार में यूथ कांग्रेस के ऑफिस के बाहर भीड़ लगाए खड़े रहते थे।

अरे हां, मैं देश की सबसे बड़ी पार्टी का योगदान बताना तो भूल ही गई। दिल्ली में भाजपा की तरफ से बाकायदा कुछ कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में मास्क और सैनेटाइजर बांटे गए। पूरा मीडिया इन कार्यक्रमों की कवरेज के लिए पहुंचा तो देखा कि कार्यकर्ताओं के हाथों में गिनती के ही मास्क थे। एक-दो लोगों को मास्क और सैनेटाइजर देखकर फोटो उतरवाए गए और वीडियो शूट कराया गया, बस काम हो गया। ऐसे कार्यक्रम सबसे ज्यादा दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी ने किए। बाकी 2016 में 600 करोड़ रुपये से बने बीजेपी मुख्यालय से लोगों के लिए कुछ भी नहीं निकला। न मास्क, न सैनेटाइजर, न खाना और न ही किसी तरह की अन्य कोई मदद। बीजेपी मुख्यालय में इतनी बड़ी कैंटीन होने के बावजूद किसी गरीब-मजदूर के लिए खाना नहीं बना।

मीडिया कवरेज के दौरान बहुत से पत्रकारों ने व्यक्तिगत तौर पर सड़क पर पैदल चल रहे मजदूरों की मदद की, लेकिन सरकारों से सवाल नहीं पूछे। मेरे सामने ही एएनआई के एक रिपोर्टर ने पैदल चल रहे मजदूरों की बातों को कैमरे से शूट करने के बाद उनके लिए काफी कुछ खाने-पीने को दिया। इसी तरह से बहुत से लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर पैसे से मजदूरों की मदद की। एक बार मैं भी प्रवासी मजदूरों को कवर करने पहुंची। तकरीबन 30 मजदूर थे, उन्हें यूपी के हरदोई जाना था। वो सब पैदल अपने घर जा रहे थे। तब तक सरकार की ओर से यह आदेश आ चुका था कि कोई भी मजदूर पैदल चलता हुआ दिखे तो उसे तुरंत नजदीकी स्कूल, जहां पर मजदूरों के ठहरने के लिए आश्रय स्थल बनाए गए थे, तक पहुंचा दिया जाए। यह आदेश आने के बाद जैसे ही ये प्रवासी मजदूर पैदल चलते हुए नोएडा के एंट्री गेट पर पहुंचे, यूपी पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद वे बेचारे सड़क के किनारे दो दिन तक ऐसे ही बैठे रहे। सड़क के किनारे बने पार्क में भी पुलिस ने नहीं बैठने दिया तो बेचारे सड़क के किनारे नाले के पास पड़े रहे। दो दिन तक ऐसे ही बैठे रहने के बाद भी उनकी कोई सुनने नहीं आया। इन मजदूरों के पास कुछ भी खाने-पीने को नहीं था। जहां पर ये बैठे थे, वहां से दुकानें भी काफी दूर थीं। मैं जब इन मजदूरों से बातचीत करने पहुंची तो मुझसे हाथ जोड़कर कहने लगे कि किसी तरह से घर पहुंचा दो। उस दौरान मेरे बस का सिर्फ इतना ही था कि इनके खाने पीने की व्यवस्था कर दूं। इसके बाद मैं कुछ चीजें खरीदकर इनके लिए लाई, लेकिन फिर ये हाथ जोड़कर कहने लगे कि हमें घर जाना है। घर जाने के लिए कोई इंतजाम कर दो। मैंने दिल्ली में, ये जहां से आए थे, उस जिले के डीएम ऑफिस में फोन करके कहा, ’30 मजदूर दो दिनों से सड़क के किनारे बैठे हैं, हरदोई जाना चाहते हैं और नोएडा के प्रवेश द्वार पर बैठे हुए हैं।‘ जवाब मिला, ‘उनकी तरफ से मेल करवा दीजिए। मैंने कहा, ‘अरे, मेल के चक्कर में बहुत टाइम बीत जाएगा। वह पहले से ही दो दिन से यहां पर बैठे हैं। इतनी तेज धूप में बैठे इन लोगों के पास पीने के लिए पानी भी नहीं है। अरे, कुछ तो इनकी मदद कर दीजिए। इसके बाद वहां से मुझे एक दूसरे सज्जन का नंबर दिया गया और कहा कि मजदूरों को पहुंचाने का काम वही देख रहे हैं। मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने कहा, ‘मजदूरों की लोकेशन जहां पर वह बैठे हैं, वह भेज दीजिए और उनमें से दो-चार लोगों के फोन नंबर भेज दीजिए। खैर, मैंने लोकेशन, नंबर और सबका एक ग्रुप फोटो भी उन्हें व्हाट्सएप पर भेज दिया।

कुछ देर के बाद मेरे पास एक कॉल आई। उन्होंने अपना नाम बताया और कहा, ‘मजदूर कहां पर बैठे हैं। बस उनको लेने जा रही है, लेकिन आज घर पहुंचाना मुश्किल होगा, क्योंकि अभी तो किसी ट्रेन में इनका टिकट नहीं हो सकता है। कल कोशिश करते हैं।’ मैंने उनसे कहा, ‘डीएम ऑफिस की तरफ कहा गया है कि उन्हें घर पहुंचा दिया जाएगा।’ इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘मैं डीएम ही बोल रही हूं।’ मैं सुनकर चौंक गई। हालांकि दिल्ली आए मुझे अब काफी समय हो गया, लेकिन मेरे दिमाग में तो वो यूपी के डीएम साहबों के रौब और जलवे अभी तक ताजा हैं। वे खुद शायद ही कभी ऐसे किसी मसले पर किसी मीडिया पर्सन को फोन करते होंगे। पहले उनका अर्दली करता है फिर वह बात करते हैं। वह भी अगर आप से रेगुलर मिलना-जुलना हो, तब। यह कैसी डीएम हैं, जो खुद ही फोन करके बता रही हैं। मैंने चौंकते  हुए कहा, ‘ओह! तब तो आपसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि उन्हें आज ही घर पहुंचाने का कुछ इंतजाम कर दीजिए। वह दो दिन से सड़क के किनारे बैठे हुए हैं। कब तक इसी तरह से भटकते रहेंगे।’ इस पर डीएम ने कहा, ‘मैं पूरी कोशिश कर रही हूं कि कोई भी ऐसे परेशान न हो और न ही पैदल चले। हम उन्हें घर तक पहुंचाने की पूरी कोशिश करेंगे, लेकिन लाखों लोग हैं, जो घर जाना चाहते हैं। हम सबके लिए इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं। हम लोग खुद चाहते हैं कि ये घर पहुंचें, लेकिन हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। मैंने कहा, ‘प्लीज, मैडम इनके लिए कुछ जरूर कर दीजिए। उन्होंने कहा, ‘मैं बिल्कुल करूंगी। आप निश्चिंत रहिए।’

सच कहूं तो उनसे बात करके मुझे बड़ी ही तसल्ली मिली। उसी दिन मेरे पास एक लड़का परेशान और रुंआसा आया और बोला, ‘मेरी कुछ मदद कर दीजिए।’ वह दिल्ली में पढ़ता था और वहीं रहता था। नोएडा के स्टेशन से उसकी ट्रेन थी, लेकिन नोएडा के प्रवेश द्वार से आगे पुलिस उसे जाने नहीं दे रही थी। मैंने पूछा, ‘उन्हें टिकट दिखाया।’ तो उसने कहा, ‘हां, टिकट दिखाया और सारी परेशानी बताई, लेकिन वो सुन ही नहीं रहे हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा, चलिए, देखते हैं।’ मैं वहां पर गई और पुलिसकर्मी से पूछा, ‘आप इन्हें क्यों रोक रहे हैं। इनके पास तो टिकट है। सरकार ने भी कहा है कि टिकट ही पास माना जाएगा, फिर आप इन्हें क्यों रोक रहे हैं।’ इस पर उन साहब ने जवाब दिया, ‘किसी राज्य की सीमा पार नहीं कर सकते हैं। ये दिल्ली में रहते हैं तो दिल्ली में किसी स्टेशन से टिकट लेना चाहिए था।’ मैंने कहा, ‘अरे जहां से टिकट मिलेगा, वहीं से तो लेंगे।’ बोले, ‘नहीं, ये नोएडा नहीं जा सकते हैं। देखिए ऐसे ही ये बहुत से और भी लोग खड़े हैं।’ इसके बाद मैंने पूछा, ‘आप किस थाने में तैनात हैं।’ उनका थाना जानने के बाद मैंने थानाध्यक्ष को फोन लगाया और उन्हे बताया कि यहां पर ऐसे बहुत से लोग खडे़ हैं, जिनका नोएडा से टिकट है, लेकिन यहां पर जो जनाब ड्यूटी पर तैनात हैं, वो जाने नहीं दे रहे हैं। जबकि इन्हें रोकने का कोई नियम नहीं है। उन्होंने कहा, ‘मेरी उनसे बात कराइए।’ मैंने थानाध्यक्ष से उन साहब की बता कराई। थानाध्यक्ष ने कहा, ‘अरे, जाने दो यार। उन लोगों को क्यों रोके हुए हो।’ इसके बाद उन साहब ने जाने की अनुमति दी। उस लड़के को जाने को मिला तो बाकी के लोगों को भी राहत मिली। वो भी टिकट दिखाकर जाने लगे। उन साहब के आसपास बैठे जूनियर पुलिसकर्मियों ने कहा, ‘अरे मैडम ये बहुत परेशान करते हैं। सबको रोक लेते हैं। अब सोचिए एक पुलिसकर्मी की मनमानी की वजह से कितने लोग परेशान हो रहे थे। एक तो बड़ी मुश्किल से लोगों को टिकट मिला होगा। उस पर उन साहब की मनमानी। जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि सरकार प्रवासी मज़दूरों की समस्या को कानून-व्यवस्था की नज़र से देख रही था और पुलिस का तो काम ही कानून-व्यवस्था को बनाए रखना है। मतलब सिर्फ मनमानी और कानून-व्यवस्था के नाम पर ज़ुल्म।

पहली किस्त यहाँ पढ़ें:

क़ैद ए हयात ओ बंद ए ग़म अस्ल में दोनों एक हैं …

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