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जहानाबाद : चुनाव में गरीबों-महिलाओं की बुलंद आवाज़ के मायने

 आठवें और नवें दशक में कभी अरवल, लक्ष्मणपुर बाथे और शंकर बिगहा जैसे नररसंहारों के लिए चर्चित जहानाबाद उसके जबरदस्त प्रतिरोध के लिए भी जाना गया। बिहार के उस वक्त के मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के मुंह पर कालिख भी प्रतिवाद में शहीद वीरेंद्र विद्रोही द्वारा पोती गई तो जहानाबाद जिला मुख्यालय पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस अधीक्षक द्वारा एक महिला से बदसलूकी पर उसे झापड़ भी खाना पड़ा। इस दौर में गरीबों की आईपीएफ के बैनर तले सामंती धाक के खिलाफ लड़ी गई लड़ाईयों की अनगिनत कहानियां बिखरी पड़ी हैं। इन्हीं संघर्षों में तप कर निकली कुंती देवी जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र से भाकपा-माले की उम्मीदवार हैं।

इस लोकसभा क्षेत्र की 6 विधानसभा सीटों में से दो अरवल और कुर्था जिला अरवल की, एक विधानसभा सीट अतरी गया जिले में तो बाकी 3 जहानाबाद, मखदुमपुर और घोसी जहानाबाद जिले में पड़ती हैं । यहां के निवर्तमान सांसद अरुण कुमार इस बार रालोसपा से अलग हुए गुट से तो जदयू-भाजपा की ओर से चंद्रशेखर चंद्रवंशी और महागठबंधन से सुरेंद्र यादव तो वहीं लालू – राबड़ी मोर्चा बनाए तेज प्रताप ने चंद्र प्रकाश को लड़ाया है।

इस मायने में यहां चुनाव दिलचस्प है कि दोनों गठबंधनों से बागी यहां अलग से लड़ रहे हैं । हालांकि तेज प्रताप के फिर से तेजस्वी यादव के साथ चुनाव प्रचार शुरू करने से यह कोई महत्वपूर्ण अंतर्विरोध वहां नहीं रह गया है। लेकिन भूमिहार समुदाय जो यहां लगातार राजनीतिक रूप से प्रतिनिधित्व करता रहा है उसे अपने समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व टूटता लग रहा है। यहां तक कि इस समुदाय के भाजपा से लेकर कांग्रेस तक के नेता खुलेआम सार्वजनिक बयान जारी कर इस बात को कह रहे हैं । ऐसे में इस समुदाय के मतों में कुछ विभाजन संभव है जो भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है।

कांग्रेस का बिहार में वर्चस्व टूटने के बाद से सामाजिक न्याय की सरकारों और हाल के वर्षों में भाजपा के साथ मिलकर बनी जदयू सरकारों और बड़े-बड़े वादों के बावजूद आर्थिक रूप से जहानाबाद भारी विषमताओं वाला पिछड़ा जिला ही है। कस्बेनुमा शहर जिला मुख्यालय जहानाबाद में अभी भी तमाम मोहल्लों में पक्की नाली और गली कम ही दिखती है। जगह जगह इस भारी गर्मी में भी जलभराव दिखता है। शहर के गरीब मोहल्लों से लेकर मध्यमवर्ग के इलाकों तक बुनियादी विकास का अभाव दिखता है।

विभिन्न विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में घूमते हुए खासकर गरीबों के बीच वर्तमान सरकार से गहरी नाराजगी देखने को मिलती है । लड़कियों को पढ़ने के लिए साइकिल देने का प्रचार खूब सुनने को मिला था लेकिन ग्रामीण इलाकों में गांव के आसपास सरकारी स्कूल कम ही दिखते हैं । इधर कई कई स्कूलों को मर्ज कर देने पर यह समस्या और बढ़ी है । दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड से लेकर जहानाबाद की खुशबू कुमारी की हत्या तक की खबर लोगों में है। इन सब को लेकर महिलाएं अपनी लड़कियों को कहीं दूर स्कूल में भेजना सुरक्षित नहीं समझती हैं।

लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं का जीवन तो कठिन है ही। लेकिन मखदुमपुर बाजार से बमुश्किल 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव सोलहंडा आबादी के लिहाज से बड़ा गांव है। विभिन्न जातियों के 15 सौ से अधिक घर हैं इस गांव में। डेढ़ सौ से ऊपर मुसहर जाति या मांझी समुदाय की बस्ती है। पूछने पर पता चलता है कि केवल एक नवयुवक हाई स्कूल पास है और मजदूरी करता है। जबकि जहानाबाद जिले की साक्षरता दर बिहार की औसत दर से ज्यादा है। इस राजपूत बहुल गांव में मान सम्मान मजदूरी और वोट देने के अधिकार के लिए जबरदस्त प्रतिरोध आंदोलन हुए हैं और गरीबों की निचले स्तर पर दावेदारी भी मजबूत हुई है।

तीन वार्ड में से एक वार्ड पर गरीबों की जीत भी हुई और मुखिया का पद भी उनके समर्थन से ही जीता गया। लेकिन वंचित समुदाय पिछले कई वर्षों में और भी गरीब ,सामान्य जीवन की सुविधाओं के लिहाज से और भी वंचित हुए हैं । भाकपा माले प्रत्याशी कुंती देवी कहती हैं कि गरीबों की लड़ाई कभी खत्म नहीं होती । उसे एक के बाद दूसरी लड़ाई में लगातार लड़ते रहना पड़ता है।

भाकपा माले की प्रत्याशी कुंती देवी का जीवन अपने आप में काफी नाटकीय घटनाक्रमों से भरा पड़ा है । बिंद समुदाय के गरीब घर में पैदा हुई कुंती देवी का विवाह 12 वर्ष की छोटी उम्र में कर दिया गया था। भोजपुर ,पटना ,जहानाबाद के इलाके में भाकपा माले और उसके खुले संगठन आईपीएफ की ओर से गरीबों के मान-सम्मान और वाजिब मजदूरी की लड़ाई लहर दर लहर बढ़ रही थी और सामंती धाक से लोहा ले रही थी। इस संघर्ष का आकर्षण उन्हें आंदोलन की तरफ खींच लाया । उन्होंने घर-परिवार छोड़कर गरीबों के इस संघर्ष को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया । पहली नजर में उन्हें देखकर यदि आपके मन में नेता की कोई अभिजात, कुलीन छवि है तो भरभरा कर टूट जाती है।

सामान्य सूती साड़ी में, माथे पर छोटी गोल बिंदी,गले में प्लास्टिक की मोतियों की सस्ती सी माला, संघर्ष से तपा सांवला चेहरा लेकिन साफ पानीदार आंखें और चेहरे पर छाई दृढ़ता उनके व्यक्तित्व का पता देती हैं । स्कूली शिक्षा मिली नहीं लेकिन संघर्ष और राजनीति की पाठशाला की वह अव्वल दर्जे की छात्र हैं। भूमिगत जीवन से लेकर खुली और चुनावी राजनीति का सफर तय करते, जहानाबाद ब्लॉक से जिला पार्षद रहते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ और सामंती धाक,रणवीरों के आतंक का मुकाबला करते,जेल का सफर तय करते,कुंती देवी पर उनके विरोधियों से लेकर प्रशासन तक कोई उंगली उठाने की हिम्मत नहीं करता।

इस नए दौर में संविधान बचाने की लड़ाई के नारे को जब वह गरीबों दलितों के जीवन के प्रश्न से जोड़ती हैं तो उसे सुनना सचमुच विस्मयकारी होता है । वह कहती हैं जब अंग्रेज थे और राजा महाराजाओं का शासन था तब हमारी राय का कोई मतलब नहीं था। लेकिन हमने, हिंदू मुसलमान दोनों ने लड़कर आजादी पाई और संविधान बनाया। तब इसी संविधान से हमें भोजन आवास ,शिक्षा ,समाज में समानता , अपनी राय , अपना वोट देने का हक मिला। हम किसी भी सरकार से इसी संविधान के तहत लड़कर अपना अधिकार मांग सकते हैं । जिसे चाहे अपना वोट देकर इस अधिकार को पा सकते हैं। वह न पूरा करें तो उसे हटा सकते हैं । हम खुद पंचायत से लेकर दिल्ली की संसद तक अपनी दावेदारी कर सकते हैं । आज जब उसी संविधान को जलाया और बदला जा रहा है तो हमें पीडीएस,शिक्षा से लेकर वोट के अधिकार तक के लिए संविधान को बचाने की लड़ाई लड़नी होगी। संविधान में मिले आरक्षण पर हमले के सवाल को जब उठाती हैं तो एक लाइन में उसे लोकप्रिय तरीके से नारे की तरह लोगों के भीतर तक बैठा देती हैं ।

वह कहती हैं कि संविधान में मिले गरीबों, दलितों , पिछड़ों के आरक्षण पर हमला इसलिए किया जा रहा है कि आगे इस समुदाय में कोई अंबेडकर पैदा ना हो सके।

जहानाबाद में कुंती देवी का चुनाव अभियान जन सहयोग से ही चल रहा है । महिलाओं की जबरदस्त भागीदारी उनकी सभाओं और बैठकों में देखने को मिलती है। उनकी स्थानीय साथी मुन्ना देवी हों या बिहार राज्य की एपवा की शीर्ष नेता शशि यादव, पटना से आई नाट्य टीम कोरस की सचिव समता राय हों या जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी इन सब लोगों ने उनके प्रचार की कमान थाम रखी है। यहां इन लोगों ने उनके चुनाव प्रचार के दौरान एक वोट एक नोट के नारे के अनुरूप स्थानीय स्तर पर कहा कि हमें हर घर से प्रति वोट के साथ कोईंछा (महिलाओं को घर से विदा करते हुए उनके आंचल में कुछ रुपया और अनाज देने की परंपरा उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक प्रचलित है जिसे कोईंछा कहते हैं) भी दीजिए। सभाओं और गांव की बैठकों में महिलाएं ऐसे ही पैसा इकट्ठा कर इस चुनाव अभियान को सहयोग कर रही हैं.

महिला सशक्तिकरण के तमाम सरकारी, गैर सरकारी दावों के बीच यदि सचमुच में महिला सशक्तिकरण की जीती जागतीमिसाल देखनी हो तो जहानाबाद आइए। महिलाओं के मुक्ति की लड़ाई,वर्ग संघर्ष के साथ एकाकार हो कर कैसे समाज की मुक्ति की लड़ाई में तब्दील होती है, इसे समझना हो तो जहानाबाद आइए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा की कविता पंक्तियां – रानियां मिट गईं / जंग लगे टिन जितनी कीमत भी नहीं /रह गई उनकी याद / रानियां मिट गईं/लेकिन क्षितिज तक फसल काट रहीं/ औरतें / फसल काट रही हैं। इसका सचमुच मर्म समझना हो तो जहानाबाद आइए।

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