समकालीन जनमत
स्मृति

शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी की याद में

सिराज अजमली


शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ (अब मऊ) के कोईरिया पार गाँव में हुआ ।उनके पिता मौलवी ख़लीलुर्रहमान फ़ारूक़ी शिक्षा विभाग में (इंस्पेक्टर मदारिस) के पद पर आसीन थे। बहुत सारे भाई बहनों में फ़ारूक़ी का स्थान बहनों के बाद पहला था ।इनका बचपन आज़मगढ़ और गोरखपुर में गुज़रा ।गोरखपुर में फ़ारूक़ी साहब की दिनचर्या के बारे में उनके पिता ने अपनी जीवनी क़सससुल जमील फ़िस्सवानिहिल ख़लील में बहुत दिलचस्प बातें लिखी हैं। वो लिखते हैं कि शम्सुरर्हमान को पढ़ने की आदत इतनी थी कि वह जिस लिफ़ाफ़े में सामान लाते थे उस पर भी जो कुछ लिखा होता था (हमारे यहाँ लिफ़ाफ़े छपी हुई किताबों के बनते हैं) उसे पढ़ते ज़रूर थे।उसी जीवनी में लिखा है कि गोरखपुर में इनके घर के सामने एक कबाड़ी की दुकान थी जहाँ शाम को फ़ारूक़ी साहब अंधेरा होने तक रद्दी में आई किताबों को पढ़ा करते थे जिससे बहुत पहले ही उनकी आंखों पर मोटे शीशे का चश्मा चढ़ गया ।

फ़ारूक़ी साहब के पिता ने अपनी जीवनी जिस समय लिखी उस वक्त शम्सुरर्हमान की उम्र 30 साल से ज़्यादा थी और उनका नाम उर्दू के बड़े लेखकों में लिया जाने लगा और आधुनिकता (जदीदियत) का रूझान फ़ारूक़ी साहब के ज़रिए परवान चढ़ रहा था ।इलाहाबाद में न्याय मार्ग पर उनका घर बैतुश-शम्स बनकर तैयार हो गया था ।फ़ारूक़ी साहब की फिएट कार में बैठकर घूमते हुए उनके पिता उन दिनों को याद कर के भावुक हो जाते जब वह आज़मगढ़ से कोईरिया पार लगभग 22 किमी अपने बच्चे शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी को साइकिल पर बैठाकर ले जाते हुए सोचते थे कि कल ये मुझे अपनी मोटर पर घुमाएगाा और वह इस बात पर शुक्र अदा करते हैं कि उनका ख्व़ाब पूरा हुआ ।

शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी के भाई और आजकल उर्दू के भूतपूर्व संपादक महबूबउर्रहमान फ़ारूक़ी ने फ़ारूक़ी साहब के बारे में लिखते हुए जिन यादों को साझा किया है उनमें फ़ारूक़ी साहब की देर तक पढ़ने की आदत का ज़िक्र करते हुए एक बहुत दिलचस्प घटना का उल्लेख किया है ।

फ़ारूक़ी साहब जब दिल्ली में डाक विभाग में उच्च अधिकारी थे तो उनका निवास काका नगर में था जहाँ उनके पड़ोसी प्रथम तल पर ‘द स्टेट्स मैन’ के पत्रकार एक बंगाली दादा रहतेे थे । वह जब अपनी रात की ड्यूटी ख़त्म करके लौटते(रात के 1 से 2 के बीच) तो भूतल पर फ़ारूक़ी साहब की खिड़की खुली होती,लाइट जल रही होती और फ़ारूक़ी साहब सारी दुनिया और वक्त से बेखबर अध्ययन में डूबे रहते थे ।
दो चार दिन देखने के बाद बंगाली दादा ने फ़ारूक़ी साहब को न सिर्फ पागल घोषित कर दिया बल्कि उनकी खिड़की में मुँह डालकर एक बार ज़ोर से पागल कहते हुए ऊपर चले जाते थे । दादा को तअज्जुब होता था कि इतना बड़ा सरकारी अफ़सर और इतना व्यस्त रहने वाला अधिकारी अपनी नींद कब पूरी करता है ।

महबूबउर्रहमान फ़ारूक़ी ही बताते हैं कि शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी साहब किसी भी मौसम में रोज़ाना एक घंटे तक ठण्डे पानी से नहाते थे।फ़ारूक़ी साहब के एक और शौक़ के बारे में उनके भाई ने ही बताया, वह लिखते हैं कि फ़ारूक़ी साहब को *कोट-पीस* खेलना बहुत पसंद था और वह इस खेल में भूख और नींद को भी भूल जाते थे।ताश के खेल कोट-पीस से फ़ारूक़ी साहब के लगाव का ज़िक्र मशहूर उर्दू शायर और मुशायरों के विश्व विख्यात संचालक प्रोफ़ेसर मलिक ज़ादा मंजूर अहमद ने अपनी जीवनी ‘रक़्स -ए-शरर’ में उन दिनों को याद करते हुए लिखते हैं , जब फ़ारूक़ी साहब शिब्ली कालेज आज़मगढ़ में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक थे।

भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने से पहले फ़ारूक़ी साहब ने आज़मगढ़ और बलिया के सतीश चन्द्र कालेज में अंग्रेज़ी पढ़ाई । सतीश चन्द्र कालेज में उन दिनों मेरे पिता सैय्यद जमालुद्दीन अजमली मरहूम भी छात्र थे।उन्हें फ़ारूक़ी साहब से अंग्रेज़ी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त था जिस का ज़िक्र वह मुझसे बड़े ही आदर व प्रेम से करते थे ।मैंने फ़ारूक़ी साहब के सामने भी कई बार ये कहा कि फ़ारूक़ी साहब मुझ जैसों के और मेरे ही नहीं मेरे बाप के भी उस्ताद हैं ।

यह सब लिख कर अस्ल में मैं अपने पाठकों की सेवा में ये कहना चाहता हूँ कि बड़े लोग अपनी अलग जीवन शैली और ज़िदगी गुज़ारने के, जनता से बहुत अलग तरीक़ों की वजह से भी बड़े बनते हैं । इलाहाबाद में फ़ारूक़ी साहब का हमारे घराने से बहुत क़रीबी रिश्ता था ।जिसकी अस्ल वजह दायरा शाह अजमल का ज्ञान वर्धक और शैक्षिक माहौल और वहाँ की साहित्यिक व सांस्कृतिक सरगर्मियां थीं ।जिसके कर्ता-धर्ता बाद में दायरा शाह अजमल के सज्जादा नशीन बनने वाले साहित्यकार, लेखक और शायर सैय्यद अकमल अजमली थे।

जदीदियत के शुरू के ज़माने में दायरा शाह अजमल में *इदार-ए- फ़िक्रो फ़न* के तत्वावधान में गर्मा- गर्म बहसें होती थीं जिन में फ़ारूक़ी साहब की अध्यक्षता में ‘हामिद हुसैन हामिद,फर्रूख़ जाफ़री,रईस फ़राज़, इंतख़ाब सैय्यद, साहिल मानिकपुरी, नायाब आर्टिस्ट,और अकमल अजमली (मेज़बान ) शरीक रहते थे ।मज़े की बात ये है कि अकमल अजमली के बड़े भाई डाक्टर अजमल अजमली प्रगतिशील लेखक संघ में उतने ही सक्रिय थे जितने उनके छोटे भाई अकमल अजमली जदीदियत में ।अजमल साहब की वजह से पिछली सदी की छठी और सातवीं शताब्दी में प्रलेस और आधुनिकता से जुड़े सारे बड़े लेखक दायरा शाह अजमल में आते थे।

दृष्टिकोण का मतभेद होते हुए भी डाक्टर अजमल अजमली और फ़ारूक़ी साहब एक दूसरे से प्रेम और आदर का संबंध रखते थे। बड़े लेखकों और बड़ों के तरीक़ों के मुताबिक़ फ़ारूक़ी साहब दृष्टिकोण के मतभेद को उस समय बिल्कुल भूल जाते थे जब सामने कोई विद्वान या कोई बहुत बड़ी हस्ती हो।उर्दू के बड़े प्रगतिशील लेखक, साहित्यकार, चिन्तक और आलोचक प्रोफ़ेसर सैय्यद एहतेशाम हुसैन से फ़ारूक़ी साहब के संबंधों को इस बात की मिसाल में पेश किया जा सकता है ।

घोर अन्तर विरोध और सैद्धांतिक रूप से बिलकुल विपरीत विचार धारा रखने वाले प्रोफ़ेसर एहतेशाम हुसैन के नाम फ़ारूक़ी साहब ने अपनी मशहूर किताब *शेर ग़ैर शेर और नस्र* समर्पित की ।बड़े प्रगतिशील लेखक, चिन्तक और शायर अली सरदार जाफ़री का फ़ारूक़ी साहब बहुत आदर करते थे ।

कहने का तात्पर्य यह है कि फ़ारूक़ी साहब का सारा जीवन इल्म ,अदब ,तहज़ीब और ख़ास तौर से उर्दू तहज़ीब के प्रचार- प्रसार और साहित्य साधना में गुज़री।उर्दू साहित्य के तो वह सबसे बड़े नामों में से एक थे ही दूसरी भाषाओं के साहित्य के बारे में उनकी जानकारी बहुत ही ज़बरदस्त थी।ख़ास तौर पर अंग्रेज़ी, फ़ारसी, अरबी और फ़्रांसीसी के अलावा हिन्दी और संस्कृत साहित्य के भी वो बड़े ज्ञाता थे ।

उर्दू में शायरी, आलोचना, साहित्य का इतिहास, कथा साहित्य, उपन्यास में 40 चालीस से अधिक किताबें उनकी यादगार हैं । हिन्दी और अंग्रेज़ी में भी उनकी किताबें मौजूद हैं ।

अपने इस बड़े आलिम और अपनी तहज़ीब के बहुत बड़े और अहम् नुमाइंदे शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी के बिछड़ने पर हम सोगवार हैं ।फ़ारूक़ी साहब के ख़ानदान के लोगों, उनकी बेटियों और दुनिया भर के तमाम फ़ारूक़ी प्रेमियों की ख़िदमत में ताज़ियत पेश करते हैं और उनकी याद को सलाम करते हैं ।

 

 

(कवि और आलोचक प्रो. सिराज अजमली
8 नवंबर 1966 सिकंदरपुर बलिया उ.प्र
शिक्षा सिकंदरपुर इलाहाबाद और दिल्ली एमए एमफिल पीएचडी दिल्ली विश्वविद्यालय से 1989 1992 1998

ज़ाकिर हुसैन पीजी कॉलेज 1995-1997 में उर्दू के प्राध्यापक।
1997 से अब तक एएमयू में उर्दू के प्राध्यापक
पुस्तक “तरक्की पसन्द तहरीक और उर्दू ग़ज़ल” 1996

विभिन्न राष्ट्रीय / अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में कई शोध पत्र प्रकाशित)

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