कविता

उज्ज्वल भट्टाचार्य की कविताएँ जनविरोधी व्यवस्था में ख़ुद के होने की शिनाख़्त हैं

संजय कुंदन


हिंदी कविता की सुपरिचित मुख्यधारा के भीतर कई नियमित-अनियमित अंतर्धाराएं हैं, जो बिना मुखर हुए हिंदी कविता को विस्तृत कर रही हैं। उज्ज्वल भट्टाचार्य ऐसी ही एक अंतर्धारा के एक कवि हैं।

उनकी कविताएं सामाजिक-राजनीतिक हालात की टोह लेती हैं और उनमें निहित विडंबना को उजागर करती हैं। यह काम उज्ज्वल बड़े संयत ढंग से करते हैं लेकिन उनमें एक विट है,जो कई बार एकदम प्रत्यक्ष रहता है तो कई बार थोड़ा दूर पृष्ठभूमि में रहता है।

‘राजा का सपना’ उनकी एक अद्भुत कविता है, जो आज की राजनीतिक त्रासदी का एक अलग ही टोन में बयान करती है। इन पंक्तियों को देखिएः

राजा बहुत मायूस है.
कल रात सपने में उसने देखा –
वह बोल रहा है,
जैसा कि वह बोला करता है.
लेकिन उसे ख़ुद
अपनी बातों पर
यक़ीन नहीं आ रहा है.

राजा को खुद ही अपनी बातों पर यकीन नहीं आ रहा है। झूठ और फरेब पर टिकी आज की राजनीति को बेहतरीन तरीके से बेनकाब करती है यह कविता । लेकिन यहां जो तंज है, वह आक्रामक और रुखड़ा नहीं है, पर वह दबा हुआ भी नहीं है। राजा पर ही लिखी एक और कविता में वह कहते हैंः

कोई भी कुरता वो पहने
हमारा राजा
नंगा ही दिखता है।

ज़ाहिर है, अपने समय पर उनकी पैनी नज़र है। आज के समय को वे दशानन के सटीक रूपक से व्यक्त करते हैं। आज की जनविरोधी व्यवस्था कितने मुखौटे लगाकर अपना उल्लू सीधा करती है, यह इस कविता में बखूबी आया है। सच कहा जाए तो इस व्यवस्था के चरित्र को उद्घाटित करना और इस तंत्र से टकरा रहे व्यक्ति के संघर्षों को स्वर देना उनकी कविता का प्रमुख विषय है। ‘डर के साथ जीना’ कविता में वह कहते हैंः

तुम ख़ुश होते हो
कि मैं डर गया हूं.
हां, मुझे डर है.
लेकिन डर के बावजूद
जब तक जीना है
जीने की तरह जीना है
अपने ज़ेहन में
तुमसे बेहतर जीना है.

और हो सकता है
मेरा डर –
डर के साथ मेरा जीना –
एकदिन
तुम्हारे लिये ख़तरनाक़ साबित हो.

दरअसल यह एक आमआदमी का बयान है। यहाँ एक नागरिक के रूप में कवि भयग्रस्त होने की बात स्वीकार करता है पर यह पराजय बोध नहीं है। इसमें एक दृढ़ता है और यह विश्वास कि आततायी सत्ता का अंततः अंत होता है।

ज़ाहिर है यह सत्ता सिर्फ राजनीतिक सत्ता नहीं है यह समाज और परिवार में फैली सत्ता भी है। पुरुषवाद उसका ही एक रूप है। ‘एक ताकतवर महिला नेता की कविता’ में पितृसत्ता का विरोध थोड़े जटिल रूप में आया है। एक महिला नेता का कहना है कि उसे सफलता उन विकृत मूल्यों को अपनाने के बाद मिली। यह कैसी त्रासदी है कि एक स्त्री अपनी संवेदनशीलता और गरिमा को बनाए रखते हुए सफलता हासिल नहीं कर सकती।

‘अपनी लाश देखकर’ एक अलग तरह की कविता है, जिसके गहरे तल में एक कठोर व्यंग्य छिपा है। जिस व्यवस्था की बात ऊपर की गई उसमे एक व्यक्ति की नियति यही है कि वह एक अलगाव का शिकार हो जाता है। उसे लगता है कि वह इस सिस्टम का हिस्सा नहीं रह गया है यानी उसके होने का कोई मतलब नहीं रह गया है। यह स्थिति मृत्यु जैसी है। क्योंकि यह तंत्र उसकी परवाह नहीं करता। आज एक औसत आदमी आदमी के भीतर यह द्वंद्व् चलता रहता हैः
अपनी लाश को देखकर वह सोचने लगा : ‘लाश बनने का फ़ैसला उसने क्यों लिया था ?
क्या उसने वाकई कोई फ़ैसला लिया था ? क्या मरा हुआ आदमी कोई फ़ैसला ले सकता है ? लेकिन अगर उसने फ़ैसला लिया, फिर क्या वह सचमुच मरा नहीं था ? अगर वह मरा नहीं था, फिर उसने लाश बनने का फ़ैसला क्यों लिया ? क्या यह सिर्फ़ एक ग़लतफ़हमी थी ?’

निश्चित रूप से उज्ज्वल भट्टाचार्य की कविताएँ जहाँ एक ओर वर्तमान की विसंगतियों की पड़ताल करती हैं वहीं इस व्यवस्था में अपने होने की शिनाख़्त करते एक साधारण आदमी की कश्मकश को सामने लाती है।

 

 

उज्ज्वल भट्टाचार्य की कविताएँ

1. अपनी लाश देखकर

जब वह सुबह घर से बाहर निकला तो दरवाज़े के बाहर उसकी लाश पड़ी थी। पन्नी से ढकी लाश, पास में एक पुलिसवाला खड़ा था। बताया, तीसरी मंज़िल की खिड़की से उसकी लाश नीचे गिर पड़ी थी। क्यों, उसने पूछा। पता नहीं, कंधे उचकाकर पुलिसवाले ने जवाब दिया। सुबह 9 बजे, पुलिसवाले ने कहा, उस समय गिरजे का घंटा बज रहा था।

नीचे गिरने से पहले उसकी लाश ने विदा ली थी : सलमान रुषदी से, अमरीकी राष्ट्रपति से, किसी अफ़्रीकी देश में आई भुखमरी से, अपनी बीवी से। बच्ची का माथा सहलाते हुए उसकी आँखें छलछला आई थीं। ठिठककर एक लमहे के लिए उसने कुछ सोचा था।
पर पूरब की ओर खुली हुई खिड़की उसे न्योता दे रही थी।

बगल की दीवार पर उसकी किताबें लगी हुई थीं, कोने में म्युज़िक बाक्स था, मेज़ पर कविताएँ, संपूर्ण-असंपूर्ण, अधकचरे नोट। मेरे बाद सब कुछ ख़त्म हो जाएगा, ठहरकर उसने सोचा था। लेकिन जब वह खुद ही ख़त्म हो चुका है, फिर क्या सारी चीज़ें ख़त्म नहीं हो गई हैं ?

एक मरे हुए आदमी को लाश बनते कितनी देर लगती है ? चौंककर उसने सोचा था :
अब सब जान जाएँगे कि वह मर चुका है। दो दिन पहले मौसम के बारे में अपनी राय देनेवाला पड़ोसी अब क्या सोचेगा ? मौसम कैसा भी हो, क्या लाश के लिए कोई फ़र्क पड़ता है ? उसे थोड़ा नज़ला सा था और उसने सोचा था : क्या नज़ले के साथ नीचे कूद पड़ना ठीक रहेगा ?

उसने सोचा था, लोग सोचेंगे, इसीलिए वह मुस्कराया करता था, इसीलिए वह इतना बोलता था, इसीलिए वह चुप रहता था।

अपनी लाश को देखकर वह सोचने लगा : लाश बनने का फ़ैसला उसने क्यों लिया था ?
क्या उसने वाकई कोई फ़ैसला लिया था ? क्या मरा हुआ आदमी कोई फ़ैसला ले सकता है ? लेकिन अगर उसने फ़ैसला लिया, फिर क्या वह सचमुच मरा नहीं था ? अगर वह मरा नहीं था, फिर उसने लाश बनने का फ़ैसला क्यों लिया ? क्या यह सिर्फ़ एक ग़लतफ़हमी थी ?

उसने सोचा, पुलिसवाले से पूछा जाए। लेकिन पुलिसवाले के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।

 

2. इतिहास का पहिया

चुटकुला कुछ यूं था :
एक आदिम विज्ञानी ने
चौकोर पहिये का इजाद किया था
उसका कहना था
गोल पहिये पीछे भी सरक सकते हैं

बात में दम तो है

इतिहास का पहिया गोल है
हर पहिये की तरह
वह आगे सरकता है
जब जनता
उसे सामने की ओर धकेलती है
ख़ासकर जब रास्ता चढ़ाई का हो
वर्ना वह पीछे सरक सकती है

इतना तो खैर तय है

दिक्कत सिर्फ़ इतनी है
उसे धकेलने वालों की अगली पांतों में
कुछ ऐसे भी शख़्स हैं
जिनके दिमाग चौकोर हैं
और वे हमेशा इस फ़िराक़ में रहते हैं
गोल पहिये को चौकोर बना दिया जाय
ताकि वे पीछे की ओर न सरके

 

3. उसका जीवन

बचपन से ही मां-बाप कहते थे
बेटी को पढ़ाऊंगा
एक अच्छे घर में शादी होगी
और ऐसा ही हुआ
आनर्स में उसे फ़र्स्ट डिवीज़न मिला था
फिर शादी हो गई
ससुराल में उलाहने
लगभग नहीं के बराबर मिले
कभी पति कहता था :
वाह, क्या लजीज़ खाना बना है
कभी चुपचाप खा लेता था
पति के साथ
छुट्टी पर जाने का मौका मिला
एकबार जयपुर
एकबार तो दस दिनों के लिये साउथ की टूर
दो बच्चे हुए
नौकरी का इरादा छोड़कर
घर संभालना पड़ा
पति साहब हो गए
एकबार सेक्रेट्री से इश्क का लफ़ड़ा चला था
जल्द ही ठीक हो गया
बेटे को मैनेजमेंट में डिग्री के बाद
अच्छी नौकरी मिल गई
बेटी की भी शादी हो गई
जीवन भरा-पुरा था
शाम को वह सीरियल देखती थी
अचानक एक छोटी सी बीमारी के बाद
वह चल बसी.

अब वह लेटी हुई थी
पड़ोस की औरतें कह रही थीं
भागवंती है
सुहाग लेकर चली गई.

 

4. कुरता नया है

हमारे राजा का
कुरता नया है
कोई भी कुरता
वह दुबारा नहीं पहनता है
मगर
कोई भी कुरता वो पहने
हमारा राजा
नंगा ही दिखता है.

 

5. गूंगे बोलते नहीं हैं
(गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक को समर्पित)

गूंगों की बस्ती में
अचानक एक शख़्स को बोलना आ गया
और वह चीख उठा :
मैं गूंगा हूं.
मैं तुम्हारा हूं.
सारे गूंगों ने उसकी ओर देखा
सिर हिलाते हुए उन्होंने कहना चाहा :
नहीं, तुम बोलते हो.
तुम अब हमारे नहीं रह गये,
लेकिन उनके गले से आवाज़ नहीं निकली.
और उस शख़्स को कुछ भी सुनाई न दिया.

 

6. डर के साथ जीना

तुम ख़ुश होते हो
कि मैं डर गया हूं.
हां, मुझे डर है.
लेकिन डर के बावजूद
जब तक जीना है
जीने की तरह जीना है
अपने ज़ेहन में
तुमसे बेहतर जीना है.

और हो सकता है
मेरा डर –
डर के साथ मेरा जीना –
एकदिन
तुम्हारे लिये ख़तरनाक़ साबित हो.

 

7. ताकि सिलसिला जारी रहे 

धीरे-धीरे
बिना रुके
ऊपर से
खाली होती जाती है
रेतघड़ी.

सबकी नज़रों में
रहता है
उसका खाली होना
और वे नहीं देखते
नीचे से वह
भरती जा रही है.

देर या सबेर
आयेगा
वह लमहा
ऊपर जब
खाली होने को
कुछ भी न बचेगा
और इतिहास का कठोर हाथ
उसे पलट देगा
ताकि
सिलसिला जारी रहे.

 

8. दशानन

एक मुंह सिर्फ़ इशारा करता है
ख़ामोश रहते हुए
दूसरा मुंह बोलता है
तीसरा उसे दोहराता है
चौथा वाह-वाह करता है
पांचवा उसे फ़ुसफ़ुसाते हुए
छठे के कान में डाल देता है
छठा चीख उठता है
सातवां कहता है
मारो साले को
आठवां ठठाकर हंस उठता है
नौंवां दसवें से पूछता है
यह क्या हो रहा है
दसवां कहता है
मैं बड़ा दुखी हूं
बाकी नौ समझ जाते हैं
उन्हें अपना काम जारी रखना है.

 

9. राजा का सपना

राजा बहुत मायूस है.
कल रात सपने में उसने देखा –
वह बोल रहा है,
जैसा कि वह बोला करता है.
लेकिन उसे ख़ुद
अपनी बातों पर
यक़ीन नहीं आ रहा है.

 

10. हड़ताल

मालिक ने कहा :
हमारी उत्पादन प्रणाली जटिल है.
मुनाफ़े के बिना हमारी दुनिया नहीं चल सकती.
तुम काम करते हो.
अर्थजगत की बारीकियां नहीं समझते,
तुम्हें सिर्फ़ अपने पेट की फ़िक्र है.

कामगारों ने जवाब दिया :
तुम्हारी उत्पादन प्रणाली जटिल है.
मुनाफ़े के बिना तुम्हारी दुनिया नहीं चल सकती.
हम काम करते हैं.
अर्थजगत की बारीकियां नहीं समझते,
हमें सिर्फ़ अपने पेट की फ़िक्र है.

और चक्का जाम हो गया.

 

11. एक ताकतवर महिला नेता की कविता

मैं जान चुकी थी
औरत होना मेरी कमज़ोरी थी
और सारे मर्द इसका फ़ायदा उठाते थे
चुनांचे मैंने औरत होना छोड़ दिया
और मुझे सबकुछ मिलती गई –
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
सिर्फ़ कभी-कभी
रात को अकेले
सितारों से भरे आसमान की ओर
बांहे फैलाकर अरज करती हूं –
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
एकबार औरत बनकर इन्हें पा लेने दो !

 

12. पेरुमल मुरुगन

शहर के चौक के बीच खड़े होकर
उस शख़्स ने कहा :
मुझे पता है
धरती घूमती है
घूमती रहेगी.
मैं पेरुमल मुरुगन हूं.
और मैं ज़िंदा हूं
लेकिन मेरे अंदर का लेखक मर चुका है.
मैं कुछ नहीं लिखूंगा,
मैं कुछ नहीं बोलूंगा.

पास खड़े दोस्त से मैंने पूछा :
कौन है यह पेरुमल मुरुगन ?
उसने कहा : लेखक था,
अब पता नहीं.
क्या लिखता है, मैंने पूछा.
उसने जवाब दिया : पता नहीं,
फिर उसने पूछा : जानना चाहते हो ?
मैंने कहा : पता नहीं,
लेकिन इतना ज़रूर जानना चाहता हूं
कि इसकी अहमियत क्या है ?

उसने कहा :
अहमियत सिर्फ़ इतनी है
कि वह शख़्स चीखते हुए कहता है
कि वह अब नहीं बोलेगा
और सड़क के दोनों ओर सारे मकानों में
खिड़कियां बंद हो जाती हैं,
खिड़कियों के पीछे पर्दे खींच दिये जाते हैं,
पर्दों के पीछे बत्तियां बुझा दी जाती हैं,
तुम और मैं
हम दोनों सड़क के किनारे खड़े रहते हैं.

 

(कवि उज्ज्वल भट्टाचार्य समकालीन कविता का चर्चित नाम हैं इनके द्वारा किया गया कविता का अनुवाद कार्य भी ख़ासा लोकप्रिय रहा है।

संपर्क: [email protected]

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमंत स्मृति सम्मान , विद्यापति पुरस्कार , बनारसी प्रसाद भोजपुरी पुरस्कार से सम्मानित टिप्पणीकार संजय कुंदन मूलतः कवि और पत्रकार हैं।
जन्म: 7 दिसंबर, 1969, पटना में
पटना विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए।
संप्रति: हिंदी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’, नई दिल्ली में सहायक संपादक
प्रकाशित कृतियां:
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कहानियाँ और कविताएँ अंग्रेजी, मराठी और पंजाबी में अनूदित।
अनुवाद कार्य: एनिमल फार्म (जॉर्ज ऑरवेल) और पैशन इंडिया (जेवियर मोरो) का हिंदी में अनुवाद।
लघु फिल्म ‘इट्स डिवेलपमेंट स्टुपिड’ की पटकथा का लेखन
संपर्क: [email protected])

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