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भारतीय चित्रकला में स्त्री को उपेक्षित रखा गया है- अशोक भौमिक

पटना: 13 अगस्त 2018. ‘‘भारतीय चित्रकला में ज्यादातर पुरुषों और पितृसत्तात्मक समाज को महिमामंडित करने का कार्य ही किया गया है। स्त्रियों को दोयम दर्जे का स्थान दिया गया है और उन्हें पुरुषों पर आश्रित दिखाया गया है।’’ ये बातें प्रख्यात चित्रकार अशोक भौमिक ने जन संस्कृति मंच द्वारा स्थानीय छज्जूबाग में आयोजित व्याख्यान ‘भारतीय चित्रकला में स्त्री’ में कही। यह कार्यक्रम बिहार और पूरे देश में स्त्रियों के साथ हो रही यौन-हिंसा की नृशंस घटनाओं के खिलाफ आयोजित था।
अशोक भौमिक ने व्याख्यान-प्रदर्शन के दौरान यह बताया कि प्राचीन काल में गुफाओं में बने चित्रों में हम स्त्री और पुरुष दोनों के श्रम-सौंदर्य को देख सकते हैं। वहां दोनों को बराबर भागीदारी दी गई है। उन्होंने कहा कि विश्व चित्रकला में शुरू से ही महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं को चित्रण करते हुए उनके संघर्ष को प्रमुखता से दर्शाया गया, लेकिन उसके उलट भारतीय चित्रकला में स्त्रियों को पूरी तरह से उपेक्षित रखा गया। मंदिरों में जो मूर्तियां हैं उनमें ज्यादातर स्त्री को एक भोग्या और पथ-भ्रष्ट करने वाली चरित्र के रुप में उकेरा गया है। यद्यपि वार्ली जैसी लोककला में स्त्री का चित्रण पुरुष के साथ मेहनत करते हुए दिखाया गया है। दरबारी कला के समय भी स्त्रियों का चित्रण रिझाने वाली मुद्रा में ही मिलता है।
अशोक भौमिक ने जोर देकर कहा कि देश में निर्भया तथा मुजफ्फरपुर जैसी शर्मसार कर देने वाली घटनाओं का मूल प्राचीन धार्मिक ग्रंथों तथा प्राचीन भारतीय चित्रकला में छुपा हुआ है।

शुरू से ऐसे ही समाज का निर्माण किया गया है, जो स्त्रियों को उपभोग की वस्तु समझता रहा है। भारत में स्त्रियों पर आधारित ज्यादातर पेंटिंग्स पुरुष चित्रकारों द्वारा बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा के चित्र भी पुरुषवादी दृष्टिकोण से ही बनाए गए हैं।

अशोक भौमिक ने रवींद्रनाथ टैगोर और अमृता शेरगिल के चित्रों की प्रशंसा करते हुए कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर के चित्रों में हम आम स्त्रियों का चित्रण उनके पक्ष में देखते हैं या फिर अमृता शेरगिल ने अपने चित्रों में स्त्री के पक्ष को दर्शाया है। स्त्री को सबसे अधिक प्रतिष्ठित स्थान भारतीय चित्रकला में चित्तो प्रसाद ने अपने छापा चित्रों में दिया है। चित्तो प्रसाद के चित्रों में स्त्रियों का स्थान सबसे अगली कतार में है। चाहे वह किसी जुलूस का चित्रण हो या खेतों में काम करने का दृश्य चित्तो प्रसाद के चित्र बेमिसाल हैं। इसी तरह सदाकैन साहब के चित्रों में भी स्त्री की गरिमा को प्रमुखता से चित्रित किया गया है।

चित्तोप्रसाद की परंपरा को कई प्रगतिशील चित्रकारों ने आगे बढ़ाने का काम किया है। महिला श्रम तथा उनके जीवन की कठिनाइयों को दर्शाया है और महिलाओं को पुरुषों की बराबरी में खड़ा किया है। ये चित्र स्त्रियों के मुक्ति-संघर्ष में साझीदार हैं। हालांकि साजिश के साथ पुरुषवादी अकादमी और बाजार उनको दबाने और विस्मृत कर देने की हरसंभव कोशिश करते रहे है। जन संस्कृति-कर्म करने वाले कलाकारों का यह दायित्व है कि वे स्त्रियों के पक्ष में बनाए जा रहे चित्रों को जनता के बीच ले जाएं।
संचालन करते हुए चित्रकार राकेश दिवाकर ने साहित्य के साथ अशोक भौमिक के गहरे रिश्ते के बारे में बताया। उनके उपन्यास ‘मोनालिसा हंस रही थी’, कहानियों-कविताओं और एम.एफ. हुसैन और चित्तो प्रसाद पर लिखी गई उनकी पुस्तकों की भी उन्होंने चर्चा की। उन्होंने कहा कि अशोक भौमिक एक ऐसे चित्रकार हैं, जिन्होंने चित्रकला की आंदोलनात्मक संभावनाओं को परखा है। देश-दुनिया की चित्रकला में मौजूूूद प्रतिरोध की परंपरा से उन्होंने कलाप्रेमियों को अवगत कराने का उल्लेखनीय कार्य किया है।
धन्यवाद ज्ञापन जसम पटना के संयोजक युवा कवि राजेश कमल ने किया।

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