मानविकी बनाम प्रकृति-विज्ञान

विज्ञान

(10 दिसंबर 1957 को कोलकाता में जन्मे लाल्टू विज्ञान, कविता, कहानी, पत्रकारिता, अनुवाद, नाटक, बाल साहित्य, नवसाक्षर साहित्य आदि विधाओं में समान गति से सक्रिय हैं।
उनके हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में कई अखबारों और पत्रिकाओं में समसामयिक विषयों और विज्ञान पर सौ से अधिक आलेख और पुस्तक समीक्षाएँ प्रकाशित हुए हैं और शिक्षा आदि विषयों पर कई शोध-आलेख पुस्तकों में शामिल किए गए हैं।

किसी भी गतिशील, आधुनिक और चेतनसम्पन्न समाज के निर्माण में वैज्ञानिक चेतना का विकास आवश्यक है। हमारे समाज में वैज्ञानिक चेतना का अभाव एक कटु यथार्थ है। समकालीन जनमत  ने अपने पाठकों के लिए ‘समाज , विज्ञान और टेक्नोलोजी ‘ विषय पर लाल्टू के लेखों की शृंखला  शुरू  की  है, जो प्रत्येक शुक्रवार को प्रकाशित हो  रही है । चार लेखों की  इस शृंखला में  ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलोजी और दर्शन के बारे में विस्तृत विमर्श होगा। प्रस्तुत है इस शृंखला की चौथी और अंतिम कड़ी जिसका शीर्षक है  “मानविकी बनाम प्रकृति-विज्ञान . सं.)

 

सुंदर है सुमन, विहग सुंदर / मानव तुम सबसे सुंदरतम। – सुमित्रानंदन पंत

सोबार ऊपरे मानुष सोत्यो, ताहार ऊपरे नाई – चंडीदास

एक पिता एकस के हम बारिक, तू मेरा गुरू हाई – गुरू ग्रंथ साहब

 

पिछले तीन लेखों में हमने ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलोजी और समाज पर बात रखी थी। विज्ञान ज्ञान पाने का एक खास तरीका है और इसका इस्तेमाल कर इकट्ठी की गई जानकारी भी विज्ञान है। कुदरत, हम, और कुदरत और हमारे बीच रिश्तों, को समझने का विज्ञान से बेहतर कोई तरीका नहीं है।  विज्ञान और टेक्नोलोजी में कोई सीधा रिश्ता नहीं है, पर दोनों का साथ रहना लाजिम है। टेक्नोलोजी के साथ समाज में ताकत के समीकरणों का रिश्ता साफ दिखता है, पर विज्ञान की मूल्य-निरपेक्षता पर भी शंकाएँ हैं। इस आखिरी लेख में हम समाज-विज्ञान और मानविकी पर बात रखेंगे। पिछले कुछ दशकों में समाज-विज्ञान की जगह मानव-विज्ञान (ह्यूमन साइंस) पद का इस्तेमाल बढ़ा है। यह पद अठारहवीं सदी में पहली बार उभरा था। जहाँ वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल हो, उसे विज्ञान कहा जाए, ऐसी आम राय  है। इंसान की ज़िंदगी के दार्शनिक, जैविक, सामाजिक और सास्कृतिक पहलुओं को मानव-विज्ञान कहा गया है। इंसान के तज़ुर्बे क्या है, वह क्या कुछ करता है, कैसे विचार उसके ज़हन में पनपते हैं, इन सब बातों का अध्ययन मानव-विज्ञान है। हिन्दी में मानव-शास्त्र अंग्रेज़ी के ऐंथ्रोपोलोजी का पर्याय है। मानव-विज्ञान कहने पर  ऐंथ्रोपोलोजी का भ्रम हो सकता है। इस उलझन से बचने के लिए पारंपरिक समाज विज्ञान, अर्थशास्त्र, भाषा, कला, साहित्य आदि तमाम विषयों के लिए हम ‘मानविकी’  लफ्ज़ का इस्तेमाल करेंगे। इस पर आपत्ति हो सकती है कि समाज-विज्ञान और मानविकी को साथ नहीं रखा जाता है, पर ह्यूमन साइंस और साहित्य, कला आदि को एक साथ कहने के लिए मानविकी से बेहतर कोई लफ्ज़ मेरे ध्यान में नहीं है। जब हम सिर्फ ‘विज्ञान’ लफ्ज़ का इस्तेमाल करेंगे तो उसका मतलब प्रकृति-विज्ञान (नैचरल साइंस) होगा।  इस लेख में हम मानविकी और विज्ञान में क्या फ़र्क हैं, क्या एक दूसरे से कम या ज्यादा महत्व रखता है, आदि सवालों पर बात रखेंगे।

मानविकी क्या है और इसके मकसद क्या हैं :

पहले हम यह समझने की कोशिश करें कि मानविकी क्या है और इसके मकसद क्या हैं। इस बारे में संक्षेप में हम विद्वानों की राय यहाँ पेश कर रहे हैं। क्या मानविकी इस वजह से अलग है कि इसमें प्रकृति विज्ञान जैसे निश्चित जवाब नहीं होते हैं? पिछले लेखों में हमने देखा था कि ऐसा नहीं है कि विज्ञान में अनिश्चितताएँ नहीं होती हैं, पर किसी मापन में कितनी अनिश्चितता है, यह पता होता है। मानविकी में इंसान से जुड़ी घटनाओं की जाँच होती है, और नतीजे कितने अनिश्चित होंगे, हमेशा यह जानकारी नहीं होती है; मसलन अर्थ-व्यवस्था में अनिश्चितता हमेशा बनी रहती है। प्रकृति-विज्ञान में कुदरत को समझने की कोशिश होती है, जबकि अर्थशास्त्र को दार्शनिकों ने बुनियादी तौर पर एक इंसानी कसरत की तरह ही देखा है। इस वजह से उसे विज्ञान कहा जाए या नहीं, इस पर हमेशा विवाद रहा है। जबकि मनोविज्ञान जैसा विषय, जिसमें गणनाएँ कम हैं, यानी मनोविज्ञान में हो रही खोजों को हमेशा गणित की भाषा के जरिए समझाया नहीं जा सकता, इसके बावजूद इसे विज्ञान माना जाता है, क्योंकि कुदरती तौर पर जो ज़हन हमें मिला है, वैज्ञानिक पद्धति के जरिए उसका अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान हमें अपनी आम समझ से दूर ले जाता है और हमें ऐसी दृष्टि देता है जो अपने आप हमारे पास नहीं आती। कुछ हद तक मनोविज्ञान में भी अब गणित का इस्तेमाल होने लगा है। समाजशास्त्र या सोश्योलोजी में भी ऐसी बातें जो अमूमन उजागर नहीं होती हैं, उनको वैज्ञानिक पद्धति के जरिए जानने की कोशिश की जाती है। इसलिए कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र एक तरह का विज्ञान है। पर विज्ञान की एक व्यावहारिक खासियत है कि वह कुदरत के बारे में ज्ञान पाने का एक तरीका है। समाजशास्त्र में ऐसी गतिविधियों को, जहां इंसान का हस्तक्षेप हुआ है, समझने की कोशिश होती है। अर्थशास्त्र में ऐसा लगता है जैसे वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल हो रहा है, पर कहीं ना कहीं उम्मीद और आस्था जैसी भावनाओं का हस्तक्षेप भारी पड़ता है। दर्शन में चिंतन पर काफी ज्यादा जोर है। दर्शन और कला कल्पना के जरिए अनदिखे को सामने ला देते हैं। प्रकृति-विज्ञान में प्रायोगिक तौर पर तर्क का जैसा इस्तेमाल है, दर्शन उसे समझने की कोशिश करता है। लुडविख़ व्हिटगेनश्टाइन के मुताबिक दर्शन केवल एक सैद्धांतिक कसरत नहीं है, यह एक गतिविधि है। आधुनिक दर्शन में आस्था की कोई जगह नहीं है, आस्था की चीर फाड़ जरूर है। किसी भी तरह की आस्था के हस्तक्षेप को दर्शन नकारता है। इस मायने में काफी हद तक दर्शन सामान्य विज्ञान-कर्म से भी ज्यादा तर्क-आधारित है। दर्शन जिज्ञासा और उत्कंठा का विषय है और इस की शुरुआत ही जिज्ञासा से होती है, पर अपने आप में दार्शनिक अध्ययन वह नहीं है जो विज्ञान या वैज्ञानिक पद्धति है। व्हिटगेनश्टाइन ने कहा है कि दर्शन में बुनियादी समस्या भाषा की है। हमारे ज़हन में बहुत सारी अन-सुलझी बातें ज़ुबान की जद्दोजहद की वजह से हैं। मानव-शास्त्र या एंथ्रोपॉलजी में खुलेपन और तर्क की जरूरत है, उस हद तक यह एक वैज्ञानिक विषय है। पर जब हम लोक-कथाओं, लोक-कलाओं या लोक-संगीत आदि में आध्यात्मिक स्तर पर मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं, तो वह प्रकृति-विज्ञान से अलग हो जाता है। सूफी या बाउल गीतों को हम विज्ञान के उदासीन तरीकों से नहीं समझ सकते, इसके लिए भावनात्मक गहराई चाहिए, हालाँकि मानव-शास्त्र में संगीत और लय में डूबते हुए भी उनके दीगर पहलुओं को संजीदा होकर समझा जाता है।

अनपढ़ लोगों से लेकर नीति बनाने वाले समझदार लोगों तक, समाज के हर स्तर पर, यह समझ हावी होती है कि हमें निजी फैसलों के लिए ज़रूरी मनोविज्ञान और सामाजिक फैसलों के लिए समाजशास्त्र की पूरी समझ है। मानविकी का महत्व इस बात में है कि यह हमें इस भ्रम से निकालती है। जहाँ समाज-शास्त्र और अर्थशास्त्र जैसे विषयों में डीडक्शन और इंडक्शन के ढाँचों का भरपूर इस्तेमाल होता है, वहीं साहित्य और कलाओं में अनौपचारिक युक्ति हमेशा काम करती रहती है, जिससे सिद्धांतों के इस्तेमाल की काबिलियत बढ़ती है, ताकि हम तयशुदा नतीजों से बचें।

साहित्य और कलाओं की कुछ आम खासियतें हैं। मसलन 19वीं सदी के महानतम पश्चिमी संगीतकारों में गिने जाते बेठोफेन का कहना था कि संगीत से मिला ज्ञान किसी और तरह की समझदारी या फलसफे से ज्यादा ऊँचे स्तर का होता है। हैरोल्ड ब्लूम का मानना है कि ‘फ्रॉयड का मनोविज्ञान भले ही बीसवीं सदी में उजागर हुआ, पर शेक्सपीअर के लेखन में यह पहले से ही मौजूद है। शेक्सपीअर हमें ज़हन का एक नक्शा बना कर देता है। ज़हनी सोच के विश्लेषण के लिए जो शब्दावली चाहिए वह पहले से ही शेक्सपियर ने इस्तेमाल की है। फ्रॉयड ने महज उसका अनुवाद किया है।’ इसी तरह अगर हम ग़ालिब की शायरी देखें तो हम पाएंगे कि अस्तित्व के संकटों पर सबसे पहली गहरी सोच आधुनिक साहित्य में यहीं मिलती है। ‘वो ख़लिश कहाँ से होती’ – इस बात को मनोविज्ञानी किताबें लिख कर समझते रह जाएँगे, जबकि ग़ालिब को पढ़ते हुए हम सब अपने-अपने ढंग से इसे समझ लेते हैं। सौ साल पहले जाने माने चितेरे पॉल गॉगुवाँ ने कहा कि कला को दर्शन की जरूरत है, इसके ठीक उलट दर्शन को कलाओं की जरूरत है। ऐसा न हो तो

सौंदर्य का क्या होगा? संस्कृति की जड़ें बचाए रखने के लिए समाज को चाहिए कि वह कलाकार को अपनी ख़्वाहिशों के मुताबिक आगे बढ़ने के सारे मौके दे। प्रसिद्ध गायक जॉन लेनन ने, जो बीटल्स संगीत ग्रुप के सदस्य थे, कहा था कि “समाज में किसी गायक, कलाकार या कवि की भूमिका इतनी ही है कि हम अपने एहसासों का बयान करें। हम लोगों से यह नहीं कह सकते कि उनके एहसास कैसे हों। हम प्रचारक या नेता नहीं हैं। हम अपने आप को लोगों के सामने खुला रख सकते हैं।” इसी तरह कोई भी अदब या कला की कृति दरअसल एक फलसफे को शब्द-चित्रों या तस्वीरों के जरिए पेश करती है।

समाजशास्त्र इंसान की मदद के लिए बना है। अक्सर इस बुनियादी बात को हम भूल जाते हैं कि हमें हर किसी की स्वच्छंदता के लिए काम करना चाहिए। इसी तरह मानव -शास्त्र का मकसद यह है कि हम इंसानों के जो अलग रंग-फ़र्क मौजूद हैं, उनको कायम रखा जा सके। इतिहास हमें यह समझाता है कि ज़बरन विविधता को खत्म किए जाने के खिलाफ लोगों ने हमेशा बगावत की है। दमन के बावजूद वे बार-बार उठ खड़े हुए हैं और अपनी पहचान बना रखने के लिए लड़ते रहे हैं। मानव-अधिकारों का भी एक फलसफा है और उसका सारांश यह है कि वह भय से हमें आज़ाद करता है। प्रकृति-विज्ञान में नैतिकता के सवाल नहीं होते। इसीलिए आम लोगों की कल्पना में या कई लोकप्रिय कहानी-उपन्यासों में वैज्ञानिकों की तस्वीर खलनायक जैसी होती है। जबकि मानविकी में नैतिकता के सरोकार हर विषय में होते हैं। स्टीफन पिंकर के मुताबिक मनोविज्ञान में नैतिकता महज एक विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी ज़िंदगी के मायने बनाती है। अपने आप को बेहतर इंसान समझने के लिए नैतिकता और विवेक की जरूरत पड़ती है। अगर हम समाज में लोगों को सिर्फ ज़हनी तौर पर ही काबिल बनाएँ और उनको नैतिकता का पाठ न दें तो वे समाज के लिए खतरा हो सकते हैं। दूसरी ओर किसी ने यह भी कहा है कि अगर राजनीति या अर्थशास्त्र हावी हो, तो नैतिकता कमजोर पड़ जाती है।

अंग्रेज़ी के कवि ऑडेन ने कहा था कि इतिहास सवालों का अध्ययन है, जबकि जवाब के लिए हमें मानव-शास्त्र और समाजशास्त्र की तरफ जाना पड़ता है। मैनेजर पांडे ने अपनी किताब ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ में इसी बुनियाद को पुख्ता किया है। मनोविज्ञान इंसानी फितरत को समझने की कोशिश करता है और इतिहास का ग़लत पाठ इस कोशिश के उलट काम करता है। इंसान की निजी ज़िंदगी और समाज के इतिहास को अलग कर के नहीं समझा जा सकता है।

 

मानविकी और  प्रकृतिविज्ञान

कुछ बातें जो पिछले लेखों में लिखी थीं, उन्हें दुबारा देखें। विज्ञान की भाषा में कम से कम अस्पष्टता होनी चाहिए, जबकि मानविकी की भाषा में ज़रूरी अनेकार्थी बातें होती हैं। पहले लेख में हमने इस पर विस्तार से बात की थी। कविता और कला के संदर्भ में इसे अक्सर लोकतांत्रिक संभावनाएँ कहा जाता है (हर पाठक या नाज़िर अपने ढंग से कृति से जुड़ सके)। प्रकृति विज्ञान और मानविकी में युक्ति के प्रकार अलग होते हैं। जहाँ वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल होता है, इंडक्शन अधिक और अन्यथा डिडक्शन ज्यादा काम में आता है, पर बात सिर्फ इतनी नहीं है। मानविकी में प्रस्तावनाओं के मतलब और मकसद मुख्य होते हैं, जबकि प्रकृति विज्ञान में अवलोकन और कार्य-कारण अनुमानों के बिना सिद्धांत तक पहुँचने की यात्रा शुरु ही नहीं होती। प्रकृति-विज्ञान में स्वच्छंद सोच भी रासायनिक-भौतिक प्रक्रियाओं का समूह है। इससे कई दार्शनिक समस्याएँ पैदा होती हैं। अगर सब कुछ कुदरती नियमों से ही हो रहा हो तो सही-ग़लत का हिसाब कैसे रखें। कोई अपराध करता है तो इसके लिए हम उसे जिम्मेदार कैसे ठहराएं? ज़हन और जिस्म के बाक़ी हिस्सों में चल रही जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं के लिए किसी को दोषी कैसे मान लिया जाए? मानविकी में यह मान कर चलते हैं कि नैतिकता और मूल्य-बोध के मुताबिक हम सचेत रूप से अपनी सोच बनाते या बदलते हैं। जो ग़लत है, वह नहीं करना है, हम यह समझते हैं और फिर भी हम करते हैं, तो हमें दोषी माना जाएगा। विज्ञान में सृजन के कई पक्ष हैं। किसी नई खोज के स्रोत अराजक हो सकते हैं। खोज होने पर उसे प्रमाणित करना लंबी प्रक्रिया है। इसमें भी प्रयोगों के चयन और डिज़ाइन में सृजन के कई पहलू हैं। पर मानविकी में सृजन का स्वरूप इससे बहुत अलग है। चूँकि नतीजों को दुहरा पाना विज्ञान की एक अहम खासियत है, इसलिए पुरानी वैज्ञानिक खोजों को बचाए रखना एक ऐतिहासिक शोध और परिप्रेक्ष्य का मुद्दा है; पर कला और साहित्य आदि में पुनरावृत्ति हमेशा संभव नहीं है, खास तौर पर अगर काम बेहतरीन और उम्दा हो। इसलिए पुरानी कृतियों को बचाए रखना बहुत ज़रूरी है। विज्ञान में संख्याएँ तक़रीबन अनंत तक चली जाती हैं, इसलिए गुणधर्मों पर औसत निष्कर्ष पाए जाते हैं, जैसे किसी बर्तन में किसी भी कोने में पानी का तापमान एक ही नियत मान का होता है, क्योंकि वह आवोगाद्रो संख्या (1024) के बराबर अणुओं की संख्या का औसत गुण है। पर मानव-विज्ञान में गिनती लाख-करोड़ से ज्यादा नहीं होती। इसलिए नतीजे

हमेशा औसत नहीं होते हैं। किसी एक वक्त में कोई एक गोर्वाचेव इतिहास में बड़े बदलाव की वजह बन जाता है। जब कुछ ही अणुओं-परमाणुओं पर अध्ययन होते हैं (जैसे नैनो-साइंस में), तो सामान्य गुणधर्मों में अक्सर बड़े बदलाव पाए जाते हैं। इसी तरह मानविकी में कुछेक लोगों पर अध्ययन कर पूरे समाज के लिए लागू हो सकने वाले नियम बनाना ग़लत है। अक्सर इस सामान्य वैज्ञानिक समझ के न होने की वजह से कई समाज-विज्ञानी वैज्ञानिक पद्धति की ग़लत आलोचना करते हैं।

विल डुरांट ने कहा था कि विज्ञान हमें ज्ञान तो देता है पर समझ के लिए हमें दर्शन की ज़रूरत पड़ती है। स्टीफन हॉकिंग के मुताबिक हम यहां क्यों हैं, कहां से आए हैं, ये दर्शन के सवाल हैं, पर अब दार्शनिक अध्ययन या दर्शनशास्त्र खत्म हो गया है। दार्शनिक इसे दूसरे ढंग से कहते हैं कि आज दर्शनशास्त्र जिस तरह तर्क के आधार पर काम करता है वह विज्ञान से भी अधिक वैज्ञानिक हो चुका है। स्टीवन पिंकर का मानना है कि हमें अपने मनोविज्ञान को समझने के लिए जैविक विकास की गहरी समझ होना जरूरी है। जाहिर है कि सर्वांगीण ज्ञान पाने के लिए हमें मानविकी और  प्रकृति-विज्ञान को अलग या परस्पर विरोध में रखते हुए नहीं, बल्कि साथ रख कर देखने की ज़रूरत है। पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था ने तालीम का जो हश्र किया है, उस वजह से विज्ञान और इंजीनियरिंग-मेडिकल पढ़ने-पढ़ाने वाले अक्सर इस बात को समझते नहीं हैं। इससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी तकनीकी ज्ञान में माहिर ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है, जिनमें सामाजिक स्तर पर मानवीय संवेदनाएँ खत्म हो चुकी हैं और इस वजह से तानाशाही और फासीवाद जैसी विचारधाराएँ पनपती जा रही हैं। जो लोग सचेत रूप से राजनैतिक ढंग से नहीं भी सोचते हैं, अगर वे ज्ञान पाने को लेकर सचेत और ईमानदार हैं, तो उन्हें यह फिक्र होनी लाजिम है कि मानविकी में बुनियादी समझ बगैर विज्ञान की पढ़ाई भी अधूरी रह जाती है। बीसेक साल पहले से पश्चिमी मुल्कों में ‘स्टेम’ (STEM – साइंस, टेकनोलोजी,  इंजीनियरिंग और मैथ) का जुम्ला चला है, पर शिक्षाविदों ने इस पर गहरी चिंता जताई है कि कला, साहित्य और आम तौर पर मानविकी की पढ़ाई को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। इनका मानना है कि कल्पनाशीलता और सृजन के लिए ऐसी सर्वांगीण तालीम ज़रूरी है, जिसमें मानविकी का काफी हिस्सा हो। इसलिए आज सारी दुनिया में  इंजीनियरिंग के बेहतरीन कॉलेजों में हर छात्र को अनिवार्य रूप से मानविकी के कुछ कोर्स पढ़ने पड़ते हैं, हालाँकि अभी भी ज्यादातर विज्ञान और इंजीनियरिंग के अध्यापक खुद इस बात को अच्छी तरह नहीं समझते हैं।

 

मानविकी, परंपरा और धार्मिकआस्थाएँ

क्या आधुनिक दर्शन इस कदर ‘वैज्ञानिक’ हो चुका है कि उसमें आस्था की कोई जगह नहीं रह गई है? फ्रांसिस बेकन का कहना था कि थोड़ा सा फलसफा हमें नास्तिक बनाता है, पर जब हम और गहराई तक जाते हैं, तो वापस ईश्वर के पास आ जाते हैं। फॉयरबाख़ का कहना है कि धर्म-शास्त्र असल में मानव-शास्त्र है। दूसरी ओर डेविड ह्यूम ने यह कहा था कि जब मजहबी फैसलों में ग़लती होती है तो वह ख़तरनाक होता है, जबकि दार्शनिक विमर्श में अगर कोई ग़लती हो तो वह ज्यादा से ज्यादा नाकाम कहा जा सकता है। यह ज़रूरी है कि समाज में विज्ञान पर जागरुकता और वैज्ञानिक चेतना फैलाई जाए, पर इसके लिए विज्ञान को श्रेष्ठ साबित करना ज़रूरी नहीं है।  ऐसे समाज में जहाँ धर्म की बड़ी भूमिका है, यह ज़रूरी नहीं कि हम लोगों से यह कहें कि ईश्वर में उनकी आस्था छोड़ दें। भिन्न धर्मों में आस्था रखते हुए या नास्तिक होते हुए भी शांति के साथ रहा जा सकता है, इस बात को बढ़ावा दें। ज़रूरत इस बात की है कि जिन गैरवैज्ञानिक बातों से हमें नुकसान पहुँचता है, उनके बारे में लोगों को समझाया जाए। मसलन सुबह या देर रात को धर्मस्थानों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से शोर का प्रदूषण बढ़ने से हमें जो जिस्मानी और रूहानी नुकसान होता है, धार्मिक आस्था का इस्तेमाल कर सांप्रदायिक सियासत और नफ़रत को कैसे बढ़ाया जाता है, इन बातों को समझाएँ।

परंपरा, धर्म-शास्त्र और धार्मिक आस्थाओं पर ज्ञान-मीमांसा मानविकी का अहम हिस्सा है। धर्म और परंपरा मानव की निर्मिति है और हर इंसानी हरकत की तरह इनको जानना, समझना मानविकी का कार्यक्षेत्र है। आम विज्ञान-कर्म (कुन के शब्दों में ‘नॉर्मल साइंस’) ज्यादातर बुनियादी सिद्धांतों पर सवाल उठाए बिना ही चलता रहता है, पर सवाल उठाना विज्ञान की बुनियाद है, और जब बहुत सारी बेमेल बातें सामने आ जाती हैं, तो लाजिम तौर पर ढाँचे में बड़े बदलाव  (पैराडाइम शिफ्ट) आते हैं। मानविकी में अक्सर आस्थाओं पर सवाल उठाने से बचने की कोशिश दिखती है। इसकी एक मिसाल धार्मिक या राष्ट्रवादी आस्थाओं से जुड़े साहित्य पर आलोचना का अभाव है। चूँकि समाज पर धर्म के ठेकेदारों का वर्चस्व है और अक्सर बेईमान और सुविधापरस्त राजनैतिक नेता उनके साथ साँठ-गाँठ बनाकर रखते हैं, इसलिए ऐसी आलोचना करने वाले पर हमेशा जान का खतरा रहता है। इन सीमाओं में रहने की वजह से मानविकी के विकास में अवरोध आते हैं और कुल मिलाकर सारी इंसानियत को नुकसान पहुँचता है। दूसरी ओर यह बात भी सही है कि व्यावहारिक स्तर पर विज्ञान में जिन सवालों पर शोध होते हैं, वे भी अक्सर सियासी प्रभावों से तय होते हैं। पर सैद्धांतिक स्तर पर सवाल उठाना विज्ञान का बुनियादी पहलू है।

 

मानविकी में ज्ञान का ढांचा

तो आखिर मानविकी में ज्ञान का ढांचा कैसा है? इसके लिए हमें कुछ सवालों के जवाब ढूँढने होंगे।

पहली बात तो यह है कि इसमें कैसी संभावनाएं हैं और इसके कैसे इस्तेमाल हो सकते हैं। मसलन हमें इससे सामाजिक रस्मों के बारे में जानकारी मिलती है। हम इसे अलग-अलग रूपों या विषयों में देखते हैं,  जैसे समाजशास्त्र, मानव-शास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि। इन सब के अलग-अलग मकसद माने जाते हैं। बुनियादी सवाल यह है कि जिस समाज और संस्कृति में मानविकी के अलग-अलग विषय गुँथे हुए हैं, उनसे वे कितने प्रभावित है। आखिर में यह भी एक सवाल है कि मानविकी का महत्व क्या है।

दूसरी बात यह कि जो धारणाएं मानविकी में महत्वपूर्ण हैं, उनकी भाषा कैसी है या भाषा के साथ उनका संबंध क्या है। मानविकी में जो ज्ञान हमें मिलता है उसको कह पाने के लिए हमें खास किस्म की भाषा का इस्तेमाल करना पड़ता है ।अलग-अलग विषयों में बुनियादी धारणाओं के लिए हमें खास अलग भाषा का इस्तेमाल करना पड़ता है।

तीसरी बात – मानविकी को समझने का तरीका कैसा होगा और हम इससे कैसे जुड़ें। जो मानविकी में माहिर हैं वह किस तरह के ज्ञान पाने के साधनों का इस्तेमाल मानविकी के अध्ययन के लिए या अपनी समझ को दूसरों तक पहुंचाने के लिए करते हैं। मसलन कला और साहित्य में आलोचना के विभिन्न प्रकार, समाजशास्त्र में सर्वेक्षण आदि, और तक़रीबन हर विषय में गणनाओं और गणितीय मॉडलों का बढ़ता इस्तेमाल, इन सब के लिए खास किस्म की ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ती है।

चौथी बात यह कि मानविकी का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य क्या है। वक्त के साथ मानविकी के बारे में हमारी समझ में कैसे  बदलाव आए हैं। समाज में मानविकी की भूमिका का क्या विकास हुआ है। मानविकी के स्वरूप में किस हद तक बदलाव हुए हैं, मसलन प्रकृति विज्ञान में जिस तरह तीन सौ साल पहले भौतिकी, रसायन, जीव-विज्ञान आदि अलग विषय बन कर विकसित हुए, उसी तरह मानविकी में अलग-अलग विषय उभर कर आए। अतीत में मानविकी के जो अध्ययन होते थे और आज जो होते हैं, उनमें आपस में क्या रिश्ता है। प्रकृति-विज्ञान में न्यूटन का एक प्रसिद्ध कथन है कि मैं ‘अतीत के भीमकाय शख्सियतों के कंधों पर खड़ा होकर’ दुनिया को देख पाया हूं। क्या ऐसा ही मानविकी में भी सही है।

पांचवी बात यह है कि निजी तौर पर मानविकी  के साथ क्या संबंध बनते हैं। कोई शख्स निजी तौर पर दुनिया को कैसे समझता है, इस पर मानविकी का क्या असर पड़ा है। इसमें हमारी कोई जगह है या नहीं।

इन सभी सवालों पर पूरी चर्चा कर पाना यहाँ मुमकिन नहीं है, पर कुछेक बातों पर हम गौर करेंगे।

 

मकसद

अपनी अलग पहचान रखते हुए भी सैद्धांतिक रूप से मानविकी के सभी विषयों के कुछ मकसद तक़रीबन एक ही जैसे हैं –  इंसान की फितरत को समझना-समझाना, आने वाले वक्त में उसकी निशानदेही के लिए सिद्धांत गढ़ना और उस मुताबिक समस्याओं के हल ढूंढना।

एक और नज़रिया यह है कि मानविकी के माहिर अपने फायदे के लिए दूसरों के स्वभाव को समझना और उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं। कई लोगों ने तो बड़े भयानक मंज़र पेश किए हैं, जैसे ऐल्डस हक्सले का उपन्यास ‘ब्रेव्ह न्यू वर्ल्ड’ और जॉर्ज ऑरवेल का उपन्यास’1984’ –   इनमें यह दिखलाया गया था कि जो कुछ भी हम हैं, मानव-विज्ञानी उसे बदलने की, और अपने बस में रखने की कोशिश करते हैं। यह बातें सच्चाई से बहुत दूर भी नहीं है।  कई समाज-विज्ञानी हुकूमत के इस तरह गुलाम हो चुके हैं, जिससे लगता है कि यह बात काफी हद तक सच है। जैसे आज के माहौल में पत्रकारिता का जो हश्र है, उसे ही देखें। आज पत्रकारिता सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि हुकूमत का भोंपू बन चुका है। जब अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव होते हैं या हिंदुस्तान में चुनाव के दौरान, नेताओं के लिए श्रोताओं पर प्रभाव डालने के लिए जिस तरह से भाषण लिखे जाते हैं, उससे भी यही पता चलता है। इतिहास में ऐसी बहुत मिसालें हैं, जब हाकिमों ने ऐसे कानून बनाए, जिससे कि वह यह तय कर सकें कि लोग कैसे अपनी ज़िंदगी गुजारें, यहां तक कि वह क्या कुछ सोचें, वह भी नियंत्रण में हो। वैसे इतना भी डरने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे लोग बहुत कम ही होते हैं

जो दुनिया पर कब्जा जमाने के लिए ही समाजशास्त्र का अध्ययन करते हैं। यह सही है कि मानविकी का पहला बुनियादी मकसद मानव इंसान की फितरत को समझने का ही है। जैसे प्रकृति-विज्ञान में होता है उसी तरह मानविकी में भी यह सवाल पूछा जाना लाजिम है कि ऐसा क्यों करना है। हमारी फितरत जैसी है वह वैसी क्यों है और इंसानी दुनिया में जो वारदातें होती हैं, वह क्यों होती हैं।

 

सहसंबंध और कारण

प्रकृति-विज्ञान और मानविकी दोनों में ही किसी घटना की वजह ढूँढ पाना मुश्किल काम है। साथ हो रही घटनाओं में आपस में संबंध ढूंढ कर इनमें से किसी एक या कुछेक को दूसरी किसी और घटना की वजह समझ लेना जटिल है।  किसी घटना के साथ जुड़ी अलग-अलग बातें एक साथ या एक-के-बाद-एक हो रही हों, तो अक्सर आदतन हम उनमें संबंध ढूंढने लगते हैं। पर यह बौद्धिक भ्रम भी हो सकते हैं,  जिन्हें लातिन भाषा में ‘कम हॉक एर्गो प्रॉप्टर हॉक’ (यह घटना इस दूसरी घटना के साथ हुई, इसलिए यह उसकी वजह है)  या ‘पोस्ट हॉक एर्गो प्रॉप्टर हॉक’ (यह घटना बाद में हुई इसलिए इसकी वजह पहले वाली घटना है)  कहा जाता है। यानी सिर्फ इस वजह से कि कोई दो घटनाएँ एक साथ हुईं या एक के बाद एक हुईं, यह मान लेना कि उनमें से एक की वजह दूसरी है, ग़लत हो सकता है। मानविकी के विषय जटिल हैं और प्रकृति-विज्ञान की तुलना में यहाँ अलग-अलग घटनाओं में आपस में संबंध देख कर कार्य-कारण संबंध ढूंढ पाना और भी ज्यादा कठिन है, क्योंकि यहां लगातार बदल रही बातें बड़ी तादाद में हैं। अमूमन शोधकर्ता और पत्रकार बेचैनी से ऐसी घटनाओं में आपस में संबंध ढूँढकर मानो लंबे अरसे से लोगों से छिपा कोई रहस्य उजागर करने की कोशिश करते हैं। फान दे लागेमाट की किताब में दिए इन आम उदाहरणों से यह बात और साफ होगी – नीचे दी गई घटनाओं में अगर आँकड़ों का हिसाब रखा जाए, तो उनमें संबंध दिखता है –

– किशोरों और युवाओं में धूम्रपान और स्कूल में इम्तहानों में कम नंबर पाना

–  बिना जूते कपड़े उतारे लोगों की तादाद और सुबह सिर दर्द के आँकड़े

– दुनिया भर में औसत तापमान में बढ़त और समुद्री डाकुओं के हमले- हार्मोन बदलने की थेरेपी और दिल की बीमारी के रोगियों की तादाद

– बचपन में लाइट जला कर सोने वाले और मायोपिया (दूर देख न पाने की नज़र की बीमरी) के रोगियों की तादाद।

ये दो अलग बातें, जिनकी तादाद में संबंध दिखता है, इनमें असल में कोई कार्य-कारण संबंध नहीं है। हम इसे कैसे समझें? कुछ तो बड़ी आसानी से समझे जा सकते हैं और कुछ को समझ पाना बड़ा मुश्किल है। आमतौर से सिगरेट पीने की लत ऐसे किशोरों में ज्यादा पाई जाती है, जिनके मां-बाप बच्चों की पढ़ाई में ज्यादा ध्यान नहीं देते या ऐसे छात्र जो वैसे ही पढ़ाई-लिखाई में ध्यान नहीं देते। जूते-कपड़े उतारे बिना सोने वाले लोग ज्यादातर ऐसे ही होंगे, जिन्होंने देर रात तक थकाऊ काम किया होगा या जिनको नशे की लत हो; इसकी वजह से दूसरे दिन खुमारी की परेशानी से सिर दर्द ज्यादा होते हैं। वक्त के साथ औसत तापमान बढ़ा है, इसी तरह समुद्री डाकुओं की संख्या और उनके हमले भी बढ़े हैं। हॉरमोन बदलने वाला इलाज काफी महंगा होता है। यह आमतौर से पैसे वाले लोग ही करवा सकते हैं और ऐसे लोगों को सेहत सुविधाएं भी बड़ी आसानी से मिलती हैं। इसलिए दिल की बीमारी के केस कम तादाद में दर्ज हुए हैं। जिन बच्चों को बचपन में लाइट जलाकर सुलाया गया, ऐसा मुमकिन है कि उनके माता-पिता को पहले से ही दूर न देख पाने की नज़र की बीमारी है। इसलिए वे लाइट जलाकर रखते हैं। आनुवंशिक रूप से उनके जीन्-स उनके बच्चों को मिले, इसलिए बच्चों में भी यह बीमारी है। हम यह देख सकते हैं कि दो अलग-अलग चीजों की तादाद में संबंध बनाकर कार्य-कारण ढूंढने में भारी ग़लतियां हो सकती हैं। मसलन यह पाया गया है कि हॉरमोन बदलने वाले इलाज से असल में दिल की बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है, इसलिए पहले से ऐसी बीमारी वाले लोगों को इस तरह के इलाज का सुझाव देना खतरनाक हो सकता है।

इसके अलावा और भी जटिलताएं हैं:

जब किसी घटना और उसके कारण को एक दूसरे से अलग कर पाना कठिन हो, तो मुश्किल और बढ़ जाती है । इसे अंग्रेज़ी में मुर्गी और अंडा की पहेली कहते हैं। यानी पहले क्या आया – मुर्गी या अंडा?

मसलन क्या कोई इसलिए धनी होता है कि उसके पास बहुत सारी संपत्ति है या किसी के पास संपत्ति इसलिए ज्यादा होती है कि वह धनी है? कई सामाजिक मुद्दों पर भी इस तरह की दिक्कतें देखी जाती हैं। जैसे एक ग़रीब आदमी मुफलिसी की वजह से नशे की लत में फंस जाता है या नशे की लत में होने की वजह से वह ग़रीब होता है? क्या अपराध का हल लोगों को जेल में डालना है या जेल में डालते रहने की वजह से अपराध बढ़ते हैं? ये बातें ऐसी हैं जो अपने-आप बढ़ती रहती हैं और हमें गहराई तक जा कर यह वजह ढूंढनी पड़ेगी कि ये होती क्यों हैं। कुछ बातें संजोग से हो जाती हैं और उनको समझने की कोई वजह नहीं दिखती है। प्रकृति-विज्ञान के बनिस्बत मानविकी में यह बात

ज्यादा दिखती है, क्योंकि इंसान क्यों कुछ करता है यह समझ पाना इतना आसान नहीं है, जितना कि कुदरत में चीजें क्यों होती हैं। कई बार बिल्कुल बेतरतीब ढंग से घटनाएं होती हैं। मसलन आज आपने लाल रंग की बजाय नीले रंग का कपड़ा क्यों पहना –  हो सकता है कि कोई वजह रही हो। हो सकता है कि आपको अपनी शक्ल के साथ एक खास रंग  ज्यादा भाता है, या हो सकता है कि आप दफ्तर में किसी बंदे को इंप्रेस करना चाहते हों, या यह भी हो सकता है कि आप शाम को फुटबॉल का खेल देखने जा रहे हैं, जहां की टीम नीली जर्सी पहनकर उतरती है। पर ज्यादा संभावना इस बात की है कि आपने बिना किसी वजह के ‘बस पहन लिया’।  यहीं मानविकी प्रकृति-विज्ञान से बहुत अलग हो जाती है, क्योंकि हमारी फितरत के बारे में अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है।

 

मानविकी और विज्ञान में फ़र्क

इंसान में चेतना का होना मानविकी और विज्ञान में पहला महत्वपूर्ण फ़र्क है। विज्ञान में वस्तुओं और प्राणियों का ऐसे अध्ययन किया जाता है जैसे कि उनमें अपने अस्तित्व के बारे में कोई चेतना नहीं हो। मानविकी में प्राणियों को इस तरह से देखा जाता है कि वह चेतन प्राणी हैं। इंसान बड़ा ही आत्म-सचेत जानवर है। दूसरे जानवरों में भी आत्म-चेतना कुछ हद तक होती है, जैसे कुत्ते आईने में अपना अक्स देखकर भौंकने लगते हैं; चिंपांजी कुछ हद तक समझ लेते हैं कि वे खुद को देख रहे हैं; नर-पक्षी शीशे में अपना अक्स देखकर उसे रकीब मानकर हमला करते हुए चोंच मारते रहते हैं। पर कोई भी जानवर इंसान जैसी आत्म-चेतना से लैस नहीं होता है। इस वजह से इंसान के रिश्तों और उसके निजी या सामाजिक मामलों का अध्ययन बहुत जटिल हो जाता है। हम कोई भी फैसला, किसी मकसद के साथ सचेत होकर करते हैं। पर किसी दूसरे इंसान के बारे में यह जान पाना मुश्किल है कि उसके किसी फैसले के पीछे का मकसद क्या है। अगर वह मकसद हम नहीं जानते तो जो भी फैसला लिया गया, उसको समझाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। इसीलिए तो इंसानी रिश्तों में तमाम किस्म के दाँव-पेंच चलते रहते हैं। प्रकृति-विज्ञान में यह समस्या नहींं आती है, क्योंकि वैज्ञानिक पद्धति में द्रष्टा के प्रभाव से बचने की अधिकतम कोशिश होती है। विज्ञान में किसी घटना के खास मकसद के पेंच और उसके पीछे के कारणों की बात नहीं आती (यानी जो कुछ हो रहा है वह कुदरती है)। इसलिए ऐसे नियम बना पाना मुमकिन है जो भौतिक जगत यानी पदार्थों या प्राणियों के बारे में समझ दे सकें। जबकि इंसान की फितरत के बारे में नियम बना पाना ज्यादातर नामुमकिन होता है। हम सब अलग-अलग वजहों से अलग-अलग तरह से पेश आते हैं। ब्रिटिश दार्शनिक ए जे आयर ने एक बहुत रोचक मिसाल दी है। किसी शख्स के हाथ शराब का जाम है –  कल्पना करें कि वह जाम उठाता है और पीता है। वह क्यों ऐसा करता है? इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती हैं। हो सकता है कि वह महज सामाजिक कारणों से शराब पी रहा है। या हो सकता है कि वह ईसाई हो या किसी ऐसे मजहब का हो जो धार्मिक रस्मों में शराब पीते हैं या कि वह बस अपनी खुशी के लिए पी रहा है, या वह किसी को फँसाने की कोशिश कर रहा है, या शराब पीकर उसका आत्मविश्वास बढ़ जाता हो, शायद वह जश्न मना रहा हो, या हो सकता है कि उसे प्यास लगी हो, या वह किसी के प्रति अपनी वफादारी दिखा रहा हो। यह भी हो सकता है उसे कोई परेशानी हो या वह बस शराब का स्वाद चख कर देख रहा हो या किसी और को शराबखोरी में डाल रहा हो। हो सकता है उसे कोई बीमारी हो या उसे उसके आशिक या माशूक ने उससे नाता तोड़ लिया हो। यहां कई तरह की बातें हैं और पहली नज़र में यह कहना बड़ा मुश्किल है कि आखिर माजरा क्या है। आयर कहता है कि मुमकिन है कि किसी के इरादों के बारे में पता हो तभी हम उसके उठाए कदम को समझ सकते हैं। या हम सामाजिक तौर-तरीकों या परंपराओं आदि की समझ के बाद इसे समझ सकते हैं। या फिर इन दोनों को मिलाकर हमारी कोई समझ बन सकती है। दूसरी ओर कल्पना करें कि किसी नदी में कोई हिरणी पानी पी रही है। वह अपनी गर्दन झुकाती है और पानी पीती है। वह ऐसा क्यों कर रही है? इसलिए कि उसे प्यास लगी है। यानी कि वह जानवर सचेत निर्णय लेते हुए पानी पी रहा है। यह जिस्मानी जरूरत है। कई लोगों ने कहा है कि मानविकी को विज्ञान बनाने के लिए लोग जो कुछ भी हरकत करते हैं उनमें से सारे सामाजिक पहलुओं को निकाल बाहर करना जरूरी है। तभी हम इंसान की फितरत के नियमों को समझ सकते हैं। ऐसा कैसे करें? फान दे लागेमाट की किताब से कुछ और मिसालें लें जहां सामाजिक पहलुओं को निकाल बाहर करने की कोशिश की गई है। इन पर गौर करें और सोचें कि इनमें हम जो कुछ भी हो रहा है क्या उसका सही वर्णन दिया जा रहा है?

– बाईस स्त्री या पुरुष एक आयताकार घास के टुकड़े के ऊपर तक़रीबन गोलाकार एक चीज़ को लातों से पीट कर इधर से उधर भगा रहे हैं। वह बड़ी तेजी से दौड़ रहे हैं, एक दूसरे से टकरा रहे हैं और उस गोले को घास के दोनों ओर बने लकड़ियों के खंभों के बीच में से निकालने की कोशिश कर रहे हैं। उनको देखते हुए हजारों लोग चीख-चिल्ला रहे हैंऔर अपने दोनों हाथ इकट्ठे कर तालियां बजा रहे हैं। और मस्ती से लेकर गुस्से तक की तरह-तरह की भावनाएँ दिखला रहे हैं।

– एक और मिसाल यह कि बहुत सारे लोग एक बड़े कमरे में इकट्ठे हुए हैं और कहीं रखे बड़े काले बक्सों से बहुत जोर से आवाज़ें आ रही हैं। आवाज़ें इतनी ऊँची हैं कि वे एक दूसरे को ढंग से सुन भी नहीं पा रहे हैं। बीच-बीच में उनमें से कोई एक आदमी उठकर एक लंबी मेज की तरफ जाता है। वहां वह एक कागज़ पेश करता है और उसके लिए ग्लास में किसी रंग का तरल डाला जाता है। इस तरह अलग-अलग समूहों में लोग वह तरल लाकर पी रहे हैं और धीरे-धीरे उनका संतुलन बिगड़ने लगता है। उनकी तर्कशीलता बिगड़ जाती है। उनकी भावनात्मक स्थिति बिगड़ जाती है। यहां तक कि उनकी आत्म-चेतना नहीं रहती।

– तीसरी मिसाल – एक बड़े से कमरे में बहुत सारी कुर्सियां लगी हुई हैं। लोग उन पर पीछे को ऊंची होती जाती ढलान पर बैठे हुए हैं। तक़रीबन दो घंटों तक वह बैठ कर पर्दे पर चल रही तस्वीरों को देख रहे हैं। कभी-कभी एक दूसरे को देखे बिना, वे डरने, झटका खाने और खुश होने की भावनाएं व्यक्त करते हैं।

क्या इन विवरणों से हमें यह सही-सही पता चलता है कि क्या कुछ वहां हो रहा है या कि हमें हर दृश्य के बारे में कुछ और संदर्भों की जरूरत है? क्या हमें अलग किस्म के लफ्ज़ों की ज़रूरत है या हम इन लफ्ज़ों के जो मायने हैं उनको अपने आप समझ जाते हैं?

 

दृश्य पर द्रष्टा का प्रभाव : प्रकृति-विज्ञान में यह कोशिश होती है कि दृश्य और द्रष्टा यानी परखी जा रही चीज़ और उसे जो देख रहा है, उनमें फ़र्क होना चाहिए। मानविकी में लोग ही लोगों को देखते हैं। इस फ़र्क का बहुत बड़ा महत्व है। मानविकी में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ अध्ययन किए जा रहे गुणधर्म अध्येता और उसके अध्ययन के साथ बदलते रहते हैं। हम तीन ऐसे उदाहरणों का जिक्र करेंगे।

मनोविज्ञान : अक्सर छात्रों को मेधावी और कम मेधावी श्रेणियों में बाँटकर अलग वर्गों में पढ़ाया जाता है। खास तौर पर इंजीनियरिंग आदि के कंपीटिशन के लिए तैयार कर रहे छात्रों के साथ कोचिंग इंस्टीटिउट्स में ऐसा होता है। ऐसे वर्गीकरण पर मनोवैज्ञानिकों ने शोध किया है और पाया है कि अक्सर कई मेधावी छात्र ग़लती से कम मेधावी श्रेणी में डाल दिए जाने पर पहले से बदतर प्रदर्शन करने लगते हैं। इसके उलट यह भी देखा गया है कि जिसे कमज़ोर माना जाता रहा, उसे मेधावी वर्ग में डालने पर प्रदर्शन बेहतर हुआ है।

अर्थशास्त्र:  शेयर-बाज़ार में पैसा लगाने में जो ज्यादा आक्रामक रुख रखते हैं, उनको बुल या साँड़ कहा जाता है, और सावधानी बरतते हुए कम निवेश करने वालों के बेयर या भालू कहा जता है। अगर साँड़ ज्यादा तादाद में हों तो शेयर्स की कीमत बढ़ती चली जाती है, और भालुओं की तादाद ज्यादा हो तो कीमतें गिरती रहती हैं। यानी हस्तक्षेप होते ही सच्चाई बदलती रहती है।

मानव-शास्त्र : कई पिछड़े इलाकों में अक्सर गुन चलाना, देवी चढ़ना जैसी जादू-टोना की घटनाओं का जिक्र होता है। वैसे तो यह ज़हनी-सेहत की समस्या है, पर रोचक बात है कि जिसे लोग देवी के प्रकोप या आशीर्वाद से ग्रस्त कहने लगते हैं, कई बार वह इंसान (ज्यादातर महिलाएँ) यह मानने लगता है कि सचमुच उसके साथ ऐसा हो रहा है।

प्रकृति-विज्ञान में माना जाता है कि अणु-परमाणुओं जैसे सूक्ष्म पैमाने पर मापन करने पर पदार्थ की दशा बदल जाती है। पिछले सौ सालों से यह शोध का विषय रहा है और खास कर क्वांटम कंप्यूटिंग में यह बात बहुत महत्व रखती है।

 

मानविकी में ज्ञान कैसे पाते हैं? – नैचरलिस्ट (यक़ीनी) और इंटरप्रिटिविस्ट (तफतीशी) तरीके

हर कोई इस बात से सहमत नहीं है कि हम निरपेक्ष हो सकते हैं यानी कि मूल्य-निरपेक्ष फैसलों तक पहुंच सकते हैं –  यानी जाँच करने वाला और जिस की जाँच हो रही है, वे अपनी शख्सियत, आस्थाएँ और भावनाओं को बीच में न लाएँ। बहुत सारे लोग मानते हैं कि हम प्रकृति-विज्ञान के तरीकों को सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं और कुदरत में बाक़ी पदार्थ या प्राणियों को जिस तरह से देखा जाता है वैसा ही इंसानों को भी देखा जा सकता है। ऐसी पद्धति को यक़ीनी कहा जा सकता है। दूसरा विचार विवेचन या तफतीश करने वालों का है – ये लोग यह मानते हैं कि मानविकी में मूल्य निरपेक्ष नतीजों पर पहुंचना न केवल असंभव है बल्कि ऐसा करना भी नहीं चाहिए। इसलिए न केवल इन दोनों पद्धतियों में फ़र्क है, उनके मकसद में भी फ़र्क है। इसलिए मानविकी में किसी एक राय पर पहुंचना बहुत मुश्किल होता है।

 

परिमाणात्मक और गुणात्मक आंकड़े

जब हम प्राप्त जानकारियोें पर ध्यान डालते हैं, पद्धति और मकसद के फ़र्क वहां भी दिखते हैं।  जो मानविकी के यक़ीनी तरीके में यकीन रखते हैं, वे आमतौर से परिमाणात्मक आंकड़ों से ही अपने नतीजों पर पहुँचते हैं, जबकि जो  तफतीश पर यकीन रखते हैं, वह गुणात्मक समझ पर ज्यादा जोर देते हैं। सर्वेक्षणों, प्रश्नोत्तरी सांख्यिकी और इस तरह के दूसरे तरीकों में जिनमें गणित के मापन के तरीकों का इस्तेमाल हो सकता है, उनसे परिमाणात्मक आंकड़े इकट्ठा करते हैं। आंकड़ों का महत्व इस बात में है कि इससे किसी भी चीज के बारे में एक ठोस ज्ञान मिलता है। इसे नकारना आसान नहीं होता। यानी यक़ीनी तरीके का मतलब परिमाणात्मक और तफतीशी  तरीके का मतलब गुणात्मक समझ से है। जैसे किसी मुल्क में कितने लोग बेरोज़गार हैं, इस गिनती को जल्दी नकारा नहीं जा सकता। हालांकि यह किस तरह कहा जा रहा है, इसमें फ़र्क हो सकते हैं। जैसे, हम किस को बेरोज़गार कहते हैं – जो काम नहीं कर रहे हैं, या जिनको सरकार से सहयोग मिल रहा है पर उसके बावजूद वह अपने आप को बेरोज़गार मानते हैं, या जो जानबूझकर काम नहीं कर रहे हैं – ऐसे किसी भी तरह के लोग हो सकते हैं। गुणात्मक आंकड़ों के लिए निजी सूचनाएं इकट्ठी की जाती हैं और उनसे फिर ऐसे प्रमाण निकलते हैं, जो संख्याओं पर आधारित या तुरंत मापने लायक नहीं होते, बल्कि एक विस्तृत विवरण पेश करते हैं, जैसे अलग-अलग लोग या जगहों के अध्ययन या मानव-शास्त्रीय विवरण या गवाहों के बयान आदि। अगर बेरोज़गारों की संख्या एक परिमाणात्मक साक्ष्य है तो उनके बयान गुणात्मक साक्ष्य माने जाएंगे।

 

एमिल दुर्खाइम (1858-1917) और माक्स व्हेबर (1864-1920)

उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं की शुरूआत में समाजशास्त्र के इन दो विद्वानों ने समाज को समझने के बिल्कुल ही अलग किस्म के तरीके अपनाए। दुर्खाइम यक़ीनी तरीके में यक़ीन रखता था और वह चाहता था कि पूरी तरह से निरपेक्ष प्रमाण इकट्ठे किए जाएँ। बेशक वह कुछ हद तक कामयाब हुआ और उसके इस ‘वैज्ञानिक’ तरीके की वजह से समाजशास्त्र को उसके जीते जी काफी ऊंचा दर्जा मिला। कभी-कभी उसे इस विषय का संस्थापक भी कहा जाता है। ‘समाजशास्त्रीय तरीकों के नियम’ शीर्षक किताब में उसने समाज-शास्त्रियों के लिए अपनी पद्धति को बखाना है। उसका कहना था कि अवलोकन हमेशा  ही निरपेक्ष होना चाहिए और वह किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं होना चाहिए। किसी एक सामाजिक तथ्य को  (इस पद का इस्तेमाल उसने ही पहली बार किया) और दीगर प्रमाणित सामाजिक तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। यानी अनुकूलता या सुसंगति (coherence) पर जोर हो न कि सतही संगति (correspondence) पर। दुर्खाइम के मुताबिक सामाजिक तथ्य समाज के लोगों से स्वतंत्र हैं, यानी कि

वह लोगों के द्वारा निजी स्तर पर तैयार नहीं किए गए, बल्कि पूरा समाज उनको बनाता है। किसी निजी कदम या नतीजे के बनिस्बत सामाजिक तथ्य कहीं ज्यादा ताकतवर होते हैं। वह समाज में रहते लोगों को बस में रखने के काम भी आते हैं। हम निरपेक्ष हो कर उनका अध्ययन कर सकते हैं यानी कि वह निजी सनक या शख्सियतों पर निर्भर नहीं करते। मिसाल के लिए हम दुर्खाइम द्वारा खुदकुशी पर अध्ययन को देख सकते हैं। आम तौर पर हम खुदकुशी को निजी तौर पर होती घटना मानते हैं। कोई आदमी किसी वजह से बहुत उदास है या अपने मन पर पूरी तरह से सचेत नियंत्रण नहीं रख पा रहा है, और इसलिए वह अपने आप को खत्म कर रहा है। दुर्खाइम के अनुसार खुदकुशी एक सामाजिक घटना है और वह निजी ज़िंदगी से स्वतंत्र होती है। किसी इंसान द्वारा अपनी जान लेने के बाद भी समाज में खुदकुशी कायम रहती है। यह एक निरपेक्ष सामाजिक तथ्य है। खुदकुशी के अध्ययन के लिए दुर्खाइम ने मर चुके लोगों के मौत के सनदी कागज़ात का अध्ययन किया। उसने इन आँकड़ों पर गौर किया कि खुदकुशी कब हुई – दिन, महीना, मौसम आदि, शख्स की उम्र क्या थी, जेंडर क्या था, शादीशुदा था या कुंवारा, कितने बच्चे थे, धर्म क्या था, किस जगह खुदकुशी हुई, शख्स किस तरह का काम करता था, आदि।  खुदकुशी करने वाले इंसान ने अपनी ज़िंदगी लेने के पहले क्या सोचा होगा, इस बारे में उसने किसी का साक्षात्कार नहीं लिया। उसने खुदकुशी की निजी वजह नहीं ढूँढी। उसका शोध पूरी तरह से परिमाणात्मक और निरपेक्ष था। एक खोज यह थी कि गांव से शहर की ओर आने पर जिस तरह के बदलाव ज़िंदगी में आते हैं, उनसे इंसान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। गाँव के सर्वांगीण समाज को छोड़कर ऐसी जगह जाना, जहां आप अंजान-सा शख्स होकर रह जाते हैं, इससे एक तरह का विराग (एनोमी) पैदा होता है जिससे कि काफी ग़फ़लत और मनोवैज्ञानिक हताशा उपजती है। अक्सर इसका नतीजा खुदकुशी होता है।

दूसरी ओर व्हेबर का कहना था कि समाज को समझने के लिए लोगों को निजी तौर पर जानना ज़रूरी है। उनके अपने नज़रिए से वे जो कुछ भी करते हैं, उसको समझना ज़रूरी है। यानी कि निरपेक्ष हो कर दूरी से चीजों को देख कर लोगों का अध्ययन कर सकने के दुर्खाइम के विचार से अलग व्हेबर ने कहा कि इसके लिए एक परानुभूति (इम्पेथी) का होना ज़रूरी है। इस तरह के व्यक्ति-सापेक्ष अध्ययन को फेर्सटेहेन (verstehen) पोज़ीशन कहा जाता है। यह जर्मन भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है समझना या समझ बनाना। मानव और मानव-समाज को समझने के लिए

हमें इंसान के अंदर प्रवेश कर उसके कार्यों के अर्थ और निहित मकसद समझने पड़ते हैं, महज आँकड़े हमें सच नहीं बतलाते। व्हेबर का सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन उसके ‘प्रोटेस्टेंट एथिक एंड स्पिरिट ऑफ़ कैपिटलिज़म (प्रोटेस्टेंट मूल्य-बोध और पूंजीवाद की बुनियाद)’ शीर्षक लेख में है। इसमें उसने यह तर्क दिया है कि उस वक्त की सबसे कामयाब अर्थव्यवस्था प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के उभार की वजह से है। खासतौर से उसे लगा कि इस संप्रदाय में मेहनत पर काफी जोर दिया गया है। और साथ ही माली फायदे और दुनियादारी पर जोर दिया गया है। यह कैथोलिसिज़म के उलट था, जिसमें हमेशा ही पैसा कमाने को अच्छा ईसाई जीवन नहीं माना गया था। हालांकि उसने प्रोटेस्टेंट विचारों को पूंजीवाद की वजह नहीं माना, पर उसने कहा कि उन विचारों से पूंजीवाद की ज़मीन तैयार हुई है। यानी अगर आप मेहनत कर अच्छी माली हालत नहीं बनाते तो आप अच्छे प्रोटेस्टेंट नहीं हैं। ये दोनों चीजें एक दूसरे के साथ गड्डमड्ड थीं।

 

भीतरी और बाहरी तरीके

दुर्खाइम और व्हेबर के द्वारा इंसानी गतिविधियों को समझने के दो बिल्कुल अलग तरीके थे। दुर्खाइम के मुताबिक पूरे समाज को समझकर ही निजी व्यवहार को समझा जा सकता है। इसे हम टॉप डाउन या ऊपर से देखने का तरीका कह सकते हैं। यह एक तरह का सर्वांगीण तरीका है। व्हेबर का तरीका यह था कि एक-एक इंसान से ही पूरे समाज का ढांचा बनता है। इसे हम बॉटम अप या नीचे से ऊपर की ओर जाना कह सकते हैं। यह व्यक्ति-सापेक्षता की पद्धति है। दुर्खाइम समूचे तथ्यों को और आंकड़ों का विश्लेषण कर अपने नतीजों पर पहुंचना चाहता था, जबकि व्हेबर का कहना था कि अगर आप आस्थाओं और लोगों की भावनाओं को न समझें, तो आप बात समझ ही नहीं सकते। एक और तरीके से कहें तो दुर्खाइम ने बाहर से देखने की पैरवी की यानी आप जिसका अध्ययन कर रहे हैं उससे दूर रहें और उसने इसी को एक निरपेक्ष तरीका माना। व्हेबर ने कहा कि आपको भीतर जाना पड़ेगा और कुछ हद तक समाज के साथ जुड़कर या जो कुछ भी आप अध्ययन कर रहे हैं उसके साथ गड्डमड्ड होकर चीजों को समझना पड़ेगा।

मानविकी पर चर्चा को हम यहीं रोकेंगे। जैसा हमने शुरू में ही कहा है, हमने प्रकृति-विज्ञान से इतर इंसानी दुनिया को समझने के जितने भी तरीके हैं, वे इंसान, समाज या उसकी कल्पनाओं से जैसे भी जुड़े हों, इन सबको एक साथ ‘मानविकी’ की छतरी के नीचे रखा है। बेशक इस व्यापक परिभाषा पर सवाल उठ सकते हैं, पर हमने सुविधा के लिए ऐसा किया है। विज्ञान, टेक्नोलोजी और समाज पर बात करते हुए मानविकी पर अलग से बतचीत ज़रूरी है। आखिर विज्ञान और टेक्नोलोजी मानवीय सरोकारों से अलग तो नहीं हैं और साथ ही जैसे ही ‘समाज’ लफ्ज़ आता है,  मानविकी का आ जाना लाजिम है।

इन लेखों की शृंखला में हम ज्ञान की जटिलता पर बार-बार आते रहे हैं। इतना तो स्पष्ट हो गया होगा कि जो बातें सतही तौर पर आसान-सी और समान्य वैज्ञानिक जाँच-परख लायक लगती हैं, वे कहीं ज्यादा जटिल होती हैं। विज्ञान कायनात की विशालता और हमारे अपने अंदर की जिस्मानी और रूहानी ख़ला के प्रति सचेत करता है, इसलिए हमें हर समस्या या संकट को संजीदा और विनम्र होकर देखना चाहिए। अब हम आखिरी मुद्दे पर आएँ: जिस अँधेरे दौर से हम गुजर रहे हैं, इसमें रहते हुए हम रोशनी की तलाश कैसे करें। मानव दूसरे जानवरों से इसी बात में अलग है कि उसे कुदरती तौर पर ज्ञान-मीमांसा की काबिलियत मिली है। वह सवाल कर सकता है। वह तर्क और भावनात्मकता के साथ भाषा और एहसासों के अर्थ ढूँढ सकता है। इसे बचाए रखना इस वक्त की सबसे बड़ी लड़ाई है। फासीवाद हर स्तर पर ज्ञान पर हमला बोलता है। किताबें जलाई जाती हैं, इंसान और इंसान में भावनात्मक दरार पैदा की जाती है। हमारे एहसासों को कुंद और युक्ति का कत्ल किया जाता है। इसलिए ज्ञान और सच पर बुनियादी तरीके से सोचना और इस बारे में हर किसी को सचेत करना किसी भी तरक्की पसंद इंसान का सबसे बड़ा धर्म है।

पर जो अँधेरा ज्ञान से ही उपजता है, वह अहंकार जो हर ज्ञानी में दिखलाई पड़ता है, उससे हम कैसे बचें। हम वैचारिक मतभेद की वजह से अलग रास्तों पर चल रहे होते हैं, पर गौर करें तो पाएँगे कि अक्सर वैचारिक मतभेद सचमुच इतने गहरे होते नहीं हैं या वे हमें साथ काम करते रहने से विमुख करें। जिन कारणों से हम साथ काम नहीं कर पाते, वे अक्सर वैचारिक मतभेदों से ज्यादा निजी अहं या रिश्तों की जटिलताओं से उपजे होते हैं। जो ज्ञान हमें बेहतर इंसान न बनाए, जो अपने और दूसरों के जीवन में बेहतरी न लाए, उसका फायदा क्या! इसलिए लड़ाई सिर्फ औरों से नहीं, खुद से भी लड़नी है। इसीलिए तो कबीर कह गए हैं कि ‘ढाई आखर प्रेम का…’। इस ढाई आखर को पाने का कोई स्रोत नहीं है, इसे हमें खुद ही अपने अंदर से ही प्राप्त करना होता है।

 

इस शृंखला  में प्रकाशित पिछले तीन लेखों के लिंक इस तरह हैं :

  1. ज्ञान की ज़मीन
  2. विज्ञान : कुदरत के रंग-ढंग पर इंसान की पकड़
  3. विज्ञान और टेक्नोलोजी ; दो हमसाए और समाज

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