समकालीन जनमत
विज्ञान

विज्ञान और टेक्नोलोजी – दो हमसाए और समाज

(10 दिसंबर 1957 को कोलकाता में जन्मे लाल्टू विज्ञान, कविता, कहानी, पत्रकारिता, अनुवाद, नाटक, बाल साहित्य, नवसाक्षर साहित्य आदि विधाओं में समान गति से सक्रिय हैं।
उनके हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में कई अखबारों और पत्रिकाओं में समसामयिक विषयों और विज्ञान पर सौ से अधिक आलेख और पुस्तक समीक्षाएँ प्रकाशित हुए हैं और शिक्षा आदि विषयों पर कई शोध-आलेख पुस्तकों में शामिल किए गए हैं।

किसी भी गतिशील, आधुनिक और चेतनसम्पन्न समाज के निर्माण में वैज्ञानिक चेतना का विकास आवश्यक है। हमारे समाज में वैज्ञानिक चेतना का अभाव एक कटु यथार्थ है। समकालीन जनमत  ने अपने पाठकों के लिए ‘समाज , विज्ञान और टेक्नोलोजी ‘ विषय पर लाल्टू के लेखों की शृंखला  शुरू  की  है, जो प्रत्येक शुक्रवार को प्रकाशित हो  रही है । चार लेखों की  इस शृंखला में  ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलोजी और दर्शन के बारे में विस्तृत विमर्श होगा। प्रस्तुत है इस शृंखला की   तीसरी  कड़ी जिसका शीर्षक है  “विज्ञान और टेक्नोलोजी – दो हमसाए और समाज . सं.)

 

पिछले लेखों में हमने  ज्ञान, ज्ञान पाना और विज्ञान पर बात की थी। हमने देखा कि ज्ञान अपने आप में कई संकटों के बीच फँसी धारणा है। सच क्या है, इससे ज्यादा ज़रूरी यह जानना है कि जिसे हम सच  मानते हैं, उसे अच्छी तरह परखा जाए कि कहीं वह भ्रम न हो। विज्ञान ज्ञान पाने का एक खास तरीका है और इसका इस्तेमाल कर इकट्ठी की गई जानकारी भी है। विज्ञान की मूल्य-निरपेक्षता पर शंका करते रहना लाजिम है। साथ ही कुदरत, हम, और कुदरत और हमारे बीच रिश्ते, को समझने का विज्ञान से बेहतर कोई तरीका नहीं है।

इस लेख में हम टेक्नोलोजी के बारे में जानेंगे।[1] आज का युग विज्ञान का युग है या नहीं, कहना मुश्किल है, पर यह टेक्नोलोजी का युग ज़रूर है। आधुनिक टेक्नोलोजी की पहुँच धरती के हर कोने पर है। पर क्या हर किसी की पहुँच टेक्नोलोजी तक एक जैसी है?  विज्ञान और टेक्नोलोजी के बीच कैसे संबंध होते हैं? क्या टेक्नोलोजी हमेरी ज़िंदगी में सुकून लाती है या इससे हमारी तकलीफें बढ़ी हैं? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब हमें ढूँढना है।

 

चमत्कार बनाम नुक्सान : टेक्नोलोजी सोचते ही अचंभा और ख़ौफ़ दोनों एक साथ होते हैं। स्कूली उम्र के किसी बच्चे को टेक्नोलोजी के चमत्कार और नुक्सान की तालिका बनाने को कहें तो वह नीचे जैसी दिखेगी –

  चमत्कार नुक्सान
सौर्यमंडल छोड़ कर आगे जाता महाकाशयान

 

एक पल में करोड़ों वेब-पेज खोल पाना

 

जीन थीरेपी से रोगों का निदान, आदि

प्रदूषण से बर्बाद होता धरती का परिवेश

 

आधुनिक दवाओं की वजह से जनसंख्या में बेरोक बढ़त

 

कृत्रिम मेधा (एआई) और मशीनों की वजह से बढ़ती बेरोजगारी, आदि

 

कौन सी बात ज्यादा असर डालती है, चमत्कार या नुक्सान? जब टेक्नोलोजी से नुक्सान होते हैं, तो वे अक्सर भयंकर होते हैं। कुछ मिसालें :

  • भोपाल गैस-कांड
  • चेरनोबिल और फुकुशिमा न्यूक्लीअर ऊर्जा प्लांट में भयंकर हादसे
  • हाल में अंफान तूफान के बाद बंगाल में बिजली गुल होना
  • कोयला खदानों में धसान, आदि

इसके बावजूद ज्यादातर लोग कहेंगे कि टेक्नोलोजी हमारे भले के लिए है। यानी न्यूक्लीअर ऊर्जा और जीन्-स बदल कर फसल उगाने जैसी टेक्नोलोजी के खतरों के बावजूद, नुक्सान के बरक्स फायदों का पलड़ा ज्यादा भारी दिखता है। हम कैसे ऐसा सोचते हैं? क्या हमें टेक्नोलोजी की समझ है? क्या यह महज आस्था है कि यह हमारे भले के लिए है? सचमुच समझ से ज्यादा आस्था ही यहाँ काम कर रही है। अपने इर्द-गिर्द मौजूद जंतर-मशीनों को देखें। इनमें से किसी एक के बारे में भी पूरी समझ हमें नहीं होती। छत से लटका पंखा, या बिजली का लट्टू, या दीवार पर रंग, फ़ोन का स्क्रीन से लेकर प्रोसेसर, किसी भी चीज़ के बारे में हमें पूरी समझ नहीं है। आप वैज्ञानिक, इंजीनियर या डॉक्टर हों तो अपने खित्ते में कुछ बातों में महारत रखते होंगे, पर किसी एक चीज़ के बारे में पूरी जानकारी होनी मुश्किल है। यह बड़ी समस्या है कि हम तरह-तरह की टेक्नोलोजी से घिरे हुए हैं और इनके या इनके असर के बारे में हमारी समझ बहुत कम है। यह सही है कि किसी भी ज़रूरी टेक्नोलोजी के सभी कल-पुर्जों और उनकी बुनियाद में काम कर रहे हर सिद्धांत को समझ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है, पर टेक्नोलोजी से आए बदलावों की वजहें और उसके परिणामों पर समझ बना पाना मुमकिन है। चाहे एल-ई-डी स्क्रीन वाला और एच-डी-एम-आई टेलीविज़न हो या कई किलोमीटर लंबे फ्लाई-ओवर, हर तरह की टेक्नोलोजी में कुछ आम खासियत साझा होती हैं।

 

टेक्नोलोजी क्या है?

इंडो-यूरोपी ज़ुबानों में इसकी जड़ ‘तख़्न’ में है, जिसका मतलब बढ़ई का काम था। आज भी पंजाबी में बढ़ई को तिरखाण कहते हैं। ग्रीक भाषा में यह ‘तेक्ने’ है, जिसका मतलब कलाकारी और कौशल होता है। लातिन में ‘तेख़ेरे’ शब्द है, जिसका अर्थ बुनकरी या ढाँचे बनाना है। अरस्तू के लिए टेक्नोलोजिस्ट का मतलब था जो व्याकरण और प्रखर बातें करने में कुशल हो। अंग्रेज़ी में 18 वीं सदी में शब्दकोश में इस शब्द को डाला गया और इसका अर्थ “कलाएँ, खास तौर पर जंतरों के साथ जुड़ी कलाकारी’ लिखा गया। 1831 में जेकब बिगेलो ने अपने व्याख्यान ‘एलिमेंट्स ऑफ टेक्नोलोजी (टेक्नोलोजी के तत्व या अनसर)’ में और साफ कहा कि “कुछ खास कलाओं के, खास तौर पर विज्ञान के इस्तेमाल के साथ जुड़ी कलाओं के, सिद्धांत, प्रक्रियाएँ और (परिभाषित) नाम” टेक्नोलोजी है।

 

पहले दो आधार औजार और तकनीकें

जो काम हम सामान्य तौर पर नहीं कर पाते, उन्हें कम लागत और कम वक्त में, आसानी से कर पाने के लिए अलग-अलग टेक्नोलोजी बनाई और इस्तेमाल की जाती हैं।  ऐसा कर पाने से और जानवरों से अलग हमारी पहचान बनती है। ऊदबिलाव पानी में बाँध बनाते हैं,  बड़े ऊद पत्थरों से सीप और घोंघे का कवच तोड़ते हैं, चिंपाजी दीमक के टीले से काठी की मदद से उनको निकाल खाते हैं। तक़रीबन सभी जानवरों में कोई महारत होती है, पर कोई भी जानवर टेक्नोलोजी के पहले दो आधार – औजार और तकनीकें – गढ़ने में हमारे करीब नहीं आता है। कई जानवरों में जन्म से ही खास गुण होते हैं, वे हमारे पास नहीं हैं; यह टेक्नोलोजी के विकास का पहला बड़ा कारण है, क्योंकि हमारी प्रजाति के फलने-फूलने के लिए इसकी ज़रूरत है। इंसान चीता की तरह तेज़ दौड़ नहीं सकता, हाथी जैसी ताकत उसमें नहीं है, कंगारू की तरह छलांग नहीं लगा सकता, चील जैसी पैनी नज़र उसके पास नहीं है, बचाव के लिए साही जैसे काँटे नहीं हैं, और हमारी प्रजाति जानवरों के उन चौथाई में से है, जो उड़ नहीं सकते हैं। इस जिस्मानी कमज़ोरी के मुआवज़े में हमें अक्ल मिली है, जो टेक्नोलोजी बनाती है। इंसान बाक़ी सभी जानवरों से अलग है कि वह ज्ञान संचित कर और बाँट कर इसका फायदा उठा सकता है और इसकी मदद से औजार और तकनीकें गढ़ लेता है। तरह-तरह की टेक्नोलोजी का विकास करने की काबिलियत न होती तो इंसान धरती के हर कोने में खुद को बसा न पाता। जब से इंसान धरती पर आया है, तब से वह किसी न किसी न किसी टेक्नोलोजी पर निर्भर रहा है। इसलिए किसी खास टेक्नोलोजी के जो भी नुक्सान हों, आम तौर पर इसे हम गैर-कुदरती नहीं कह सकते। जिस्मानी कमज़ोरियों से जूझने के लिए हम औजार और तकनीकें खोजते रहेंगे और उनको काम में लाते रहेंगे। जेकब ब्रोनोव्स्की ने लिखा है – “टेक्नोलोजी के साथ झगड़ना इंसान की फितरत के साथ लड़ना है – मानो उसके सीधे जिस्म की चाल, अमूर्त कल्पनाओं, ज़ुबान के कौशल, भूख, और अलग तरह की यौनिक मुद्रा से लड़ रहे हों।”एक तरह से औजार और तकनीकें क्रमश: टेक्नोलोजी के हार्डवेयर (भौतिक सामग्री) और उनसे खेलने के तरीके हैं, इससे आगे और भी पहलू हैं।

संगठन :

किसी भी टेक्नोलोजी के उत्पादन, विकास और इस्तेमाल में सामूहिक कोशिशें जुड़ी होती हैं। माटी के बर्तन बनाने जैसी आम सनअत में भी सामग्री सप्लाई करने वाले, कुम्हार, औजार बनाने वाले, बेचने वाले और बर्तनों का सही इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता सभी शामिल होते हैं। एक अकेला आदमी यह सब कुछ एक हद तक सीख सकता है, पर प्रभावी तरीके से हर कुछ कर पाने के लिए एक दिन का वक्त काफी नहीं है। अगर कंप्यूटरों की मदद से फैक्ट्री में माल का उत्पादन जैसी जटिल टेक्नोलोजी को देखें, जहाँ कई लोगों का काम और काबिलियत चाहिए हो तो इसके लिए संगठन की ज़रूरत है। संगठन को हम एक सॉफ्टवेयर की तरह देख सकते हैं, जो किसी मकसद को पूरा करने के लिए जुटे बिखरे हुए लोगों और भौतिक सामग्री को नियंत्रित ढंग से गाइड करते हुए जोड़ता है। लुइस मम्फोर्ड ने लिखा है कि पहली ‘मशीन’ कोई भौतिक चीज़ नहीं थी, बल्कि वे सांगठनिक ढाँचे थे, जिनके जरिए मिश्र के फेरो राजाओं ने पिरामिड बनवाए। यानी टेक्नोलोजी = जंतर + कौशल + संगठित ढाँचे।

मिसाल के तौर पर एडिसन और बिजली की रोशनी को लें।  एडिसन को समझ थी कि इस मकसद को पूरा करने के लिए उसे देर तक टिकने वाला लट्टू चाहिए, लोग जिसका इस्तेमाल कर सकें; इसमें ऐसा फिलामेंट होना चाहिए, जिसकी मरम्मत हो सके; साथ ही लट्टू के अंदर कम दाब रखने के लिए वैक्यूम पंप चाहिए, ताकि फिलामेंट गर्म होकर रोशनी दे, पर खुद जल न जाए। अपने आप में रोशनी का लट्टू नाकाफी था। एक बिजली पैदा करने वाला जेनरेटर चाहिए था, और उसे लोगों के घरों/दफ्तरों/फैक्ट्रियों से जोड़ने के लिए बिजली की तारें चाहिए; कौन कितनी बिजली खर्च कर रहा है, इसका हिसाब लगाने के लिए मीटर चाहिए।  एडिसन और उसके सहयोगियों ने इन सब पहलुओं पर काम किया और इस तरह बड़े पैमाने में बिजली से रोशनी मुमकिन हुई। यह ज़रूरी नहीं कि टेक्नो-सिस्टम के अलग-अलग टुकड़ों में एक जैसी तरक्की हो, और जब कोई एक पक्ष बदलता है तो जो तनाव पैदा होते हैं, उनको हल करना ही टेक्नोलोजिकल तरक्की है। मसलन पहले हवाई जहाज में तारों के जाल और छड़ों की भरमार होती थी, जिसकी वजह से वे इंजिन का पूरा फायदा नहीं उठा पाते थे और उनकी रफ्तार कम होती थी। नए इंजिनों की ईजाद के साथ हवा में बेहतर गतिकी के तरीके ढूँढने पर तारों-छड़ों के जंजाल की सफाई हुई और बाद के हवाई जहाजों की रफ्तार तेज़ हुई। पर अब एक नई मुश्किल आ खड़ी हुई। जहाज बड़ी तेज़ी से लैंड करने लगे। चालीस के दशक में और ज्यादा ताकत वाले इंजिन बने और रफ्तार में तेज़ी के साथ टर्बो-जेट ईजाद हुए।

लुइस मम्फोर्ड ने हाथ से लिखने की मिसाल से बात को रखा है। दो सौ साल पहले पंछी के पंखों से कलम बनती थी।  यह पूरी तरह कुदरती (ऑर्गेनिक) था और इस्तेमाल करने वाला शख्स खुद इसकी छोर को तराशता था। इसकी कीमत कम थी और इससे लिखने के लिए काबिलियत चाहिए होती थी। उन्नीसवीं सदी में स्टील के निब वाली पेन बनी। औद्योगिक युग के और सामान की तरह, इसको बनाना जटिल था। पंख वाली कलम की तरह इसे मनमर्जी तराशना मुमकिन न था। खास ज़रूरतों के मुताबिक बड़ी तादाद में इसका उत्पादन होता रहा। बीसवीं सदी में जब बॉल-प्वाइंट पेन ईजाद हुई तो इसमें तरह-तरह के गैर-कुदरती हिस्से थे (जैसे प्लास्टिक) और जटिल औद्योगिक तंत्र के बिना इसका उत्पादन मुमकिन न था। मजे की बात यह कि पेन की  टेक्नोलोजी भले ही उम्दा हो, पर लिखने वाले की लिखाई का खूबसूरत होना कोई ज़रूरी नहीं।

यह ज़रूरी नहीं कि मौजूदा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए  ही नई टेक्नोलोजी आती है। इसके उलट ऐसा भी होता है कि नई टेक्नोलोजी खुद नई ज़रूरतें पैदा करती है। इसे ‘लॉ ऑफ द हैमर (हथौड़ा नियम)’ कहा जाता है- छोटे बच्चे के हाथ हथौड़ा पकड़ा दो, उसे हर चीज़ कील नज़र आने लगेगी। इतिहास में मिसालें भरी हुई हैं, जब किसी चीज़ के ईजाद के बाद उसके इस्तेमाल के लिए प्रॉब्लेम निकल आए। जैसे सरदर्द की दवा ऐस्पिरिन को लें।आज हम जानते हैं कि जब जिस्म में किसी बीमारी का संक्रमण होता है तो कुदरती तौर पर शरीर उसे ठीक करने की कोशिश करता है और इसलिए बुखार और दर्द होता है।  पर बीसवीं सदी की शुरूआत में ऐस्पिरिन ईजाद होने के बाद से लोग बुखार को समस्या मान कर इलाज़ के लिए ज़रूरी हस्तक्षेप ढूँढने लगे। नई टेक्नोलोजी अपनी ज़रूरतें पैदा करती है।

किसी टेक्नोलोजी का मकसद अधिक फसलें पैदा करना तो किसी का आरामदेह इमारतें बनाना  होता है, पर  कभी-कभी कोई टेक्नोलोजी बिना किसी व्यावहारिक मकसद के भी उभरती है। इसकी एक मिसाल एम आई टी का डीडेलस प्रोजेक्ट है, जिसमें इंसानी जिस्म की ताकत के जरिए हवाई जहाज बनाया गया था। जाहिर है कि यह किसी ऐसे मकसद के लिए नहीं था, जिसका आज के जमाने में इस्तेमाल हो सके। यह महज इसे बना कर उड़ान भरने वालों के उत्साह और इसे मुमकिन कर पाने की चुनौती का नतीजा है। आवाज़ से भी ज्यादा तेज़ रफ्तार की उड़ान वाली कॉंकोर्ड जैसी कई टेक्नोलोजी बहुत महँगी होती हैं और महज सनक के अलावा इनका कोई और औचित्य नहीं होता। कई टेक्नोलोजी महज राष्ट्रीय गौरव के लिए होती हैं, जैसे हमारे यहाँ बने चंद्रयान और मंगलयान हैं। ऐसा भी होता है कि कोई व्यावहारिक फायदा भी हो और साथ में सनक या सामाजिक रुतबा भी जुड़ा हो, जैसे निजी कार को लें। अगर यातायात ही वजह होती, तो बसें कहीं सस्ती पड़ती हैं। पर निजी गाड़ी की मिल्कियत रुतबा भी दिखलाती है। हाथ में मशीन होने की सनक भी है।

 

टेक्नोलोजी में बढ़त और तरक्की की तस्वीर :

टेक्नोलोजी का विकास अपने आप में गतिशील है और इसमें लगातार बढ़त होती है।  गतिशीलता का मतलब है कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। बढ़त का मतलब है कि आगे का एक कदम दूसरे की राह बनाता है। हेनरी फोर्ड ने अपनी कंपनी के बारे में कहा था कि हमारी एक ही परंपरा है : हर चीज़ पहले से बेहतर और ज्यादा तेज़ी से की जा सकती है। किसी एक टेक्नोलोजी पर काम करते हुए सामग्री, औजार आदि के अलावा विकास के अगले चरण पर जानकारी इकट्ठी होती रहती है। कभी-कभी टेक्नोलोजी एक तरह का मोक्ष बन कर आती है। टेक्नोलोजी में बदलाव दरअसल तंत्र में लागातार हो रहे सुधार से होता है। वक्त के साथ इंजिन और ताकतवर और दक्ष हो जाते हैं, इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रॉनिक सर्किट के चिप में और टुकड़े जुड़ते हैं (जैसे कंप्यूटर में), हवाई जहाज और ऊँचाई तक और ज्यादा तेज़ उड़ान भरते हैं आदि।

शुरूआत में टेक्नोलोजी धीमी गति से आगे बढ़ती है, फिर तेज़ी से बढ़ती है और एक वक्त के बाद बढ़त की दर में कमी आने लगती है, हालाँकि तब भी बढ़त तेजी से ही होती रहती है। बढ़त को हम कई तरीकों से माप सकते हैं, जैसे हवाई जहाज के लिए व्यवसायिक जहाजों की बढ़ती तादाद, इंजिन के लिए बढ़ती ताकत और दक्षता, कंप्यूटर हार्डवेयर में  चिप में और टुकड़े बढ़ना, या आम तौर पर शोध-पत्रिकाओं में परचों की बढ़ती तादाद। आम इंसानी हलचल में हम ऐसी बढ़त नहीं देखते हैं। जैसे साहित्य या कला में नए आयाम सामने आते हैं, पर हम यह नहीं कह सकते कि सौंदर्य में या किसी और पैमाने में आज के रचनाकार ने अतीत के कवियों, लेखकों की तुलना में बढ़त हासिल की है। अजीब बात है कि पुरानी टेक्नोलोजी से हमें संतोष नहीं होता, पर हम यह नहीं कह सकते कि टेक्नोलोजी की बढ़त के साथ हम बेहतर इंसान बन पाए हैं। उलटे आज के जमाने की बेतहाशा इंसानी वहशत अक्सर टेक्नोलोजी की मदद से ही मुमकिन हो पाई है। फिर भी, कहीं लगातार आगे बढ़ने का सपना है, जो हमें इसमें पूरा होते दिखता है।

यह समझना ज़रूरी है कि टेक्नोलोजी में तरक्की का आम ज़िंदगी में तरक्की से कोई रिश्ता नहीं है। नात्सी जर्मनी अपने वक्त टेक्नोलोजी में दुनिया का सबसे अग्रणी मुल्क था। तीस के दशक में वहां बनी मर्सीडीज़ और ग्रां-प्री रेसिंग गाड़ियों और व्ही-2 रॉकेटों की दुनिया भर में धाक थी, पर उनकी विचारधारा बर्बर और हिंसक थी।  दूसरी ओर, टेक्नोलोजी में कमज़ोर कई आदिवासी समुदायों में कला, प्रकृति के साथ संबंध और सामाजिक रिश्तों में अनोखी जहानत पाई जाती है। अगर तकनीकी पैमानों और आँकड़ों से भी सोचें तो भी तरक्की पर सवाल रह जाते हैं। जैसे, आधुनिक चिकित्सा के जरिए कोमा में पड़े इंसान को सालों तक ज़िंदा रखा जा सकता है, इसके लिए बहुत महँगी मशीनों और दवाओं का इस्तेमाल होता है, पर क्या इसे तरक्की कहा जा सकता है? उसी खर्च पर अनगिनत ग़रीबों को ज़रूरी सेहत सुविधाएँ मिल सकती हैं, जो आज नहीं मिल रही हैं।

 

टेक्नोलोजी और आम ज़ुबान में मेटाफर (रूपक) :

टेक्नोलोजी ने हमारी बातचीत में नए रूपक जोड़े हैं। जैसे वह गाना याद कीजिए – बिजली हूँ मैं तो बिजली, बल खाके जब भी निकली। जाहिर है, यहाँ बिजली महज नाम नहीं, बल्कि तेज़ रफ्तार से नाच रही स्त्री है। यह लफ्ज़ बादलों वाली बिजली का है, पर इसे हम इलेक्ट्रिसिटी के अर्थ में इस्तेमाल करते हैं। ठीक ऐसे ही टेक्नोलोजी से लिए गए लफ्ज़ दूसरे प्रसंगों में काम आते हैं, जैसे अक्सर हम ज़हन को कंप्यूटर कह देते हैं। इसकी सबसे बढ़िया मिसाल ‘फीडबैक’ लफ्ज़ है। 18 वीं सदी में हवाई (पवन) चक्कियों और भाप के इंजिन के लिए फीडबैक लफ्ज़ ईजाद हुआ। जब इंजिन धीमा पड़ता तो एक वाल्व खुल जाता और भाप अंदर आ जाती, इसी तरह रफ्तार एक सीमा से ज्यादा हो जाती तो वाल्व बंद हो जाता था। इसे फीडबैक कहा जाता था। बाद में इस लफ्ज़ का इस्तेमाल अर्थशास्त्र में होने लगा और ऐडम स्मिथ ने बाज़ार में माल की आमद के साथ खरीद-फरोख्त में कीमतों के कम-ज्यादा होने को समझाने के लिए इसका इस्तेमाल किया। किसी माल की खरीद में बढ़त होने पर उसकी कीमत बढ़ जाती है और उत्पादन बढ़ जाता है और खरीद कम होने पर कीमत कम हो जाती है, जिससे उत्पादन कम हो जाता है और ज्यादा लोग खरीदी करने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे कीमतें बढ़ जाती हैं। आज फीडबैक लफ्ज़ कई विषयों में इस्तेमाल होता है, जैसे इस लेख को पढ़ कर आप सब फीडबैक भेज सकते हैं कि यह आपको कितना कम या ज्यादा पसंद आया है।

रूपक ज़ुबान की कारीगरी होते हैं। यह ध्यान में रखना चाहिए कि मेटाफर वास्तविकता की सही तस्वीर नहीं हैं। जैसे नाच रही स्त्री गीत में बिजली है, पर वह सचमुच बिजली नहीं है। इसी तरह दुनिया कोई स्टीम इंजिन नहीं है, इसलिए यह मानना ग़लत होगा कि सब कुछ आमद और खपत और फीडबैक के मुताबिक चलता है।

 

टेक्नोलोजी और तर्कशीलता :

टेक्नोलोजी के साथ यह खयाल जुड़ा हुआ है कि तरक्की इंसानी ज़िंदगी का कुदरती पहलू है। साथ ही यह देखा गया है कि टेक्नोलॉजी में होती लगातार तरक्की ऐसी विश्व दृष्टि से मुमकिन होती है, जो तर्कशील सांस्कृतिक मूल्यों और मानसिक प्रक्रियाओं के साथ जुड़ी होती है। औजार, तकनीकें और सांगठनिक ढांचे से अलग या इनको बेतरतीब जोड़ देने से अलग कुछ और भी है, जो टेक्नोलॉजी में तरक्की मुमकिन करता है। इस के पीछे कुछ ऐसी प्रवृत्तियां और  दृष्टिकोण जुड़े हुए हैं, जिनको हम तर्कशील कह सकते हैं; यानी कि कोई भी काम जिसे करना है उसके बारे में क्रमबद्ध ढंग से और प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर तरीके ढूँढने और संभावित तरीकों में से किसी एक या दो को चुनना – यह भी टेक्नोलॉजी के साथ जुड़ा है। इसके अलावा और भी सांस्कृतिक मूल्य जुड़े हैं , जैसे यह यकीन रखना कि हल संभव हैं और उनको पाने के लिए लगातार बदलाव की जरूरत है। जिस समाज में तर्कशील मूल्य मौजूद हैं और उनमें गतिशीलता और आशावाद है, वहां टेक्नोलॉजी बेहतर जड़ जमाती है। जहाँ खास मकसद के लिए मौजूदा मूल्यों से कुछ अलग हटकर चीजें करने की दृढ़ता हो।

मिसाल के तौर पर किसी भी समाज में मौसम की अनिश्चितता से बेचैनी रहती है। बारिश कब होगी, कब नहीं होगी, इसकी वजह से इंसान को अक्सर तकलीफ उठानी पड़ी है। सूखे की समस्या के हल के लिए अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। सबसे आसान तरीका यह कि छोड़ दो, भगवान जो चाहे वैसा ही होगा। एक तरीका होगा कि हम प्रार्थना करें, कुछ रस्में पूरी करें या किसी अपने समुदाय के सदस्य को बलि चढ़ा दें। पर इन सभी चीजों के साथ अकाल के कारणों का कोई संबंध नहीं है। दुआओं, रस्मों के साथ लगातार मौसम की प्रत्यक्ष जांच करने पर यह साफ हो जाएगा। तर्क और प्रत्यक्ष अवलोकन के जरिए सूखे से कैसे निपटा जाए, इसके प्रभावी और कुदरती व्यावहारिक हल ढूंढे जा सकते हैं। क्रमबद्ध तरीके से मौसम को देखा जाए और आंकड़े दर्ज कर विश्लेषण किया जाए तो अकाल के होने की पूर्व सूचना मिल सकती है और किसानों को इसके लिए तैयार किया जा सकता है। इसके अलावा ऐसी फसलें बोई जा सकती हैं जो अकाल के वक्त भी बोई और उगाई जा सकती हैं। पानी कैसे बचाया जाए इसके बेहतर तरीके सोचे जा सकते हैं। समंदर के पानी को साफ किया जा सकता है। कृत्रिम तरीके से बादलों में सीडिंग के जरिए बारिश करवाई जा सकती है। यानी मकसद पूरा करने के लिए ढंग से सही तरीके सोचे जा सकते हैं। यह नहीं कि ऐसे समाज या लोगों का मजाक उड़ाया जाए जो तर्कशील ढंग से समस्याओं का समाधान नहीं करते। ऐसा नहीं है कि तार्किक सोच किसी एक समुदाय के साथ ही जुड़ी हो। आधुनिक समाज में भी कई तरह की ऐसी बातें देखने की जाती हैं जो तर्क आधारित नहीं हैं, जैसे ज्योतिष-शास्त्र, संख्याओं के आधार पर भविष्यवाणी, बाबाओं के वचन आदि। तर्कशील सोच कोई नैतिक उत्थान नहीं लाती। उलटे बहुत विकसित और तर्कशील तरीकों के बाद भी नैतिकता के बड़े उल्लंघन देखे जाते हैं। कई बार तार्किक ढंग से सोचते हुए हम भूल जाते हैं कि आखिर में हम कहां पहुंच रहे हैं। हर्मन मेल्विल के उपन्यास मोबी डिक में कैप्टन अहाब की प्रसिद्ध उक्ति है – मेरे औजार सब सही हैं, पर जो कुछ मैं करता हूं उसके पीछे की वजह और जो मैं कर रहा हूं, यह उन्माद है। नात्सी जर्मनी एक बड़ी मिसाल है जहां तर्क और प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर टेक्नोलोजी का इस्तेमाल ऐसे मकसद के लिए गया जो तर्क या नैतिकता के मानदंड पर गलत थे। भयंकर तबाही हुई और बेइंतहा तकलीफें लोगों को झेलनी पड़ी। हिटलर के असलाह विभाग के मंत्री अल्बर्ट स्पीयर का कहना था कि जो कुछ हुआ वह केवल हिटलर की शख्सियत की वजह से नहीं था। बड़ी तादाद में ज़ुर्म हुए क्योंकि हिटलर वह पहला शख्स था जिसने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बड़ी गिनती में अपराध करने के लिए किया। जब तर्कशीलता से कोई अनैतिक काम होता न भी दिखे,  तब भी आध्यात्मिक स्तर पर कई सवाल खुले रह जाते हैं।  तर्कशील सोच की वजह से हम यह भूल जाते हैं कि कायनात में ऐसे नियम काम कर रहे हैं, जिन पर तर्क या प्रत्यक्ष अवलोकन से बनी सोच का कोई बस नहीं है। जर्मन समाज-विज्ञानी माक्स व्हेबर ने कहा था कि तर्कशील सोच की वजह से एक तरह की विरक्ति पैदा होती है। ऐसी सोच ईश्वर, दानव, या आध्यात्मिक शख्सियतें, जो गैर-तार्किक खयालों की दुनिया के चरित्र हैं, उनको हमारी सोच से गायब कर देती है। चमत्कार, प्रतिबद्धता, वफाई आदि लफ्ज़ों के मायने नहीं रहते। फ्रांसीसी समाज-विज्ञानी जूलियन फ्रॉएंड ने कहा कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी में तरक्की के बाद इंसान ने जादुई ताकतों पर यानी भूत-प्रेत, राक्षसों, पर यकीन करना बंद कर दिया है। उसमें भविष्य का कोई डर नहीं रहा और जो कुछ भी पवित्र है, उसे वह खो चुका है। वास्तविकता भयानक और सपाट हो गई है। हर चीज के फायदे सोचे जाते हैं। इसकी वजह से इंसान की रूह ख़ला में बदलती जा रही है और हर कोई लगातार काम करते हुए यंत्रों के जरिए और दूसरे तरीकों से ज़िंदगी के मायने ढूंढ रहा है।

तर्कशीलता के साथ निरपेक्षता को भी जोड़ा जाता है। उदासीन निरपेक्षता दुनिया को समझने और बदलने की सोच के साथ जुड़ी हुई है। तर्कशील सोच से लैस वैज्ञानिक जांच और टेक्नोलॉजी कुदरती दुनिया को अलग कर और उसे अमूर्त में बदलकर उसे बस में लाने की कोशिश करती है। यह हमेशा अच्छी बात नहीं होती, क्योंकि इससे व्यक्ति और बाक़ी दुनिया में खाई पैदा होती है। इसकी वजह से एक संकीर्ण दृष्टि बनती है, जो अक्सर ज्ञान पाने और उसका इस्तेमाल करने के दीर्घकालीन असर को नजरअंदाज करती है। जैसे किसी गंभीर बीमारी के जेनेटिक कारण को खोजते हुए शोध करना करने वाला कभी यह नहीं सोचता कि बीमा कंपनियां इस खोज के निष्कर्ष का इस्तेमाल कैसे करेंगी। जिन लोगों में इस तरह के जीन्-स पाए जाएंगे, कंपनी उनका बीमा देने से मना कर सकती है।

 

जेंडर और टेक्नोलॉजी

इंसान टेक्नोलॉजी के साथ कैसे जुड़ता है इसमें जेंडर की विचारधारा भी काम करती है। टेक्नोलॉजी के जरिए पुरुष और स्त्री की पहचान भी बनती है। जेंडर और टेक्नोलॉजी के रिश्ते पर अध्ययन सिर्फ गैर-मर्द इंजीनियरों के बारे में सोचना नहीं है। जेंडर एक ऐसा औजार है, जिसके जरिए संस्कृति, और संस्कृति और टेक्नोलॉजी के रिश्ते, के मायने ढूंढे जा सकते हैं। जेंडर रिश्तों से परिभाषित होता है। पुरुष और स्त्री की पहचान सामाजिक रिश्तों और एक दूसरे के साथ संबंधों के जरिए बनती रहती हैं। जेंडर सांकेतिक रुप से और रूपकों के जरिए काम करता है। अगर हम कहें कि कोई टेक्नोलॉजी का काम सांकेतिक रूप से स्त्री-जेंडर है, इसका मतलब यह नहीं है कि इसमें पुरुषों की हिस्सेदारी नहीं है। जेंडर के फ़र्क और विचारधाराएं अपने आप नहीं होतीं, वह खास ऐतिहासिक संदर्भों में आती हैं जो कि जानबूझकर या कभी बिना जाने लोगों के द्वारा बनाई जाती हैं।

आमतौर से टेक्नोलॉजी के बारे में यह समझ है कि यह औरतों का काम नहीं है; इस सोच पर सवाल किया जाना चाहिए। अगर हम पुरुषों और स्त्रियों के काम की तालिका बनाए तो देखेंगे जेंडर पहचान और विचारधारा टेक्नोलॉजी का स्वरूप तय करती हैं और इसके उलट टेक्नोलॉजी जेंडर के बारे में खयालात पैदा करती है। अक्सर दुनिया को तर्कशील उदासीन तरीकों से देखना एक पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण होता है।

कुछ टेक्नोलॉजी ऐसी है जिसमें मुख्यतः पुरुष काम कर रहे हैं, पर स्त्रियों ने भी टेक्नोलॉजी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी सबसे अच्छी मिसाल डिजिटल कंप्यूटर का इतिहास है। आमतौर पर यह सोचा जाता है कि  डिजिटल कंप्यूटर अति-तर्कशील पुरुष इंजीनियर, गणितज्ञ, वैज्ञानिक और टेक्नीशियन का खित्ता है। सच यह है कि जब कंप्यूटरों की पहली पीढ़ी आई, तो बहुत सारी प्रोग्रामर स्त्रियाँ थीं। हाल में कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के विकास में ऐसी सोच ज्यादा दिखती है जो निरपेक्ष तर्क आधारित समझ है, पर इसके साथ ही सहज-ज्ञान, विचारों के आदान-प्रदान और बिखरे हुए ख्यालों का भी इस्तेमाल हुआ है। कहने का मतलब यह नहीं कि इनमें से कोई भी प्रवृत्ति खासतौर पर पुरुषों की या स्त्रियों की प्रवृत्ति है। टेक्नोलॉजी की तरक्की के लिए दोनों किस्म की प्रवृत्तियों की ज़रूरत होती है। अक्सर सोचने के ऐसे तरीकों का वर्गीकरण जेंडर के आधार पर किया जाता है, पर सचमुच यह पुरुष या स्त्री के संज्ञान की पहचान नहीं है। शुरुआत में जब दफ्तरों में ऑटोमेशन शुरू हुआ तो वह स्त्रियों के बनिस्बत पुरुषों के लिए ज्यादा फायदेमंद था। बीमा उद्योग में वरिष्ठ पद पुरुषों को मिले और रूटीन दफ्तरी काम में स्त्रियों को रखा गया। आयकर विभाग में कंप्यूटरीकरण हुआ तो बीच के अधिकारियों  के पद हटा दिए गए। इसकी वजह से क्लर्कों का काम कर रही स्त्रियों की पदोन्नति रुक गई। जब श्रम का बाजार जेंडर या समुदायों के आधार पर बँटा हो तो नई टेक्नोलॉजी अक्सर पहले से मौजूद भेदभाव को और बढ़ा देती है। किसी एक समुदाय को नए तरीकों का फायदा होता है जबकि दूसरे की सत्ता कमज़ोर हो जाती है। अलग-अलग जेंडर पर टेक्नोलॉजी का क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी मिसाल के लिए टेलीविज़न, वीडियो गेम, फिल्में आदि को लें। वीडियो गेम में पुरुष न केवल ज्यादा रुचि लेते हैं, जिस तरह के खेल वे चुनते हैं वह स्त्री खिलाड़ियों के चयन से अलग होते हैं। पुरुष स्पोर्ट्स और ऐक्शन खेलों में ज्यादा रुचि लेते हैं और स्त्रियां ऐसे खेलों में ज्यादा रुचि लेती हैं जिसमें रणनीति और पहेलियां अहम हों। जो ऐडवेंचर के खेल होते हैं, उनमें स्त्री-पुरुषों में कोई फ़र्क नहीं पाया जाता। कई अध्ययनों में पाया गया है कि लड़कियां सामाजिक संबंध बनाने के लिए खेलती हैं, जबकि लड़के महज जीतने के लिए खेलते हैं।

सिर्फ तकनीकी पहलुओं के आधार पर टेक्नोलॉजी पर राय नहीं बनानी चाहिए। सामाजिक नतीजों के बारे में सोचना जरूरी है। जब हम इस बारे में सोचते हैं तो अक्सर हमारे मूल्य अवरोध बन जाते हैं। जन्म से पहले सोनोग्राम से भ्रूण के लिंग की जांच कर अगर ‘ग़लत’ जेंडर हो तो गर्भपात किया जा सकता है।क्या ऐसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होना चाहिए? इसकी वजह से भारत के कई राज्यों में लिंग अनुपात पर गहरा असर पड़ा है। हरियाणा जैसे राज्यों में लड़कों की शादियां मुश्किल में पड़ गई हैं और अक्सर आदिवासी इलाकों से औरतें लाई जाती हैं कि शादियां हो सके।

टेक्नोलॉजिकल जबरियत या नियति :

हर बढ़िया चीज के साथ कीमत जुड़ी होती है – कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता।  सनअत से इंसानी ताकत बढ़ी है, जिंदगी भौतिक रूप से समृद्ध हुई है, पर टेक्नोलोजी की बढ़त से कई समस्याएं पैदा हुई हैं। अक्सर लगता है कि यह हमारे नियंत्रण से बाहर जा रही है। जो इंसानी कारनामा थी, उसकी अपनी एक जीवनधारा बन चुकी है और अपनी अंदरूनी गतिशीलता के साथ बिना सामाजिक बंधन या शासन के, सिस्टम या संस्कृति और सोच के नियंत्रण के, वह बढ़ती जा रही है। जब हम टेक्नोलॉजी को आज़ाद ताकत की तरह सोचते हैं तो इसे अक्सर टेक्नोलॉजिकल डिटरमिनिज़्म यानी जबरियत या नियति कहा जाता है। हम इसके मालिक नहीं गुलाम होते जा रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं सामाजिक-राजनीतिक और माली रिश्तों पर टेक्नोलॉजी का जबरदस्त प्रभाव है । एंटीबायोटिक दवाओं से लेकर कपड़ों के ज़िपर तक ने हमारी जिंदगी पर असर डाला है।

इसके उलट एक और ख्याल है कि टेक्नोलॉजी आज़ाद ताकत नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे के मुताबिक इसकी बनावट होती है। ऐसा सोचने वालों को सोशल कंस्ट्रक्टिविस्ट या सामाजिक-रचना-वादी कहा जाता है। उनके मुताबिक  अलग-अलग विकल्पों में से चयन कर किसी खास टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल समाज में जड़ जमा चुकी ताकतों, जैसे राजनीतिक सत्ता सामाजिक वर्ग जेंडर और दूसरे संगठित ढांचों की, गति पर निर्भर करता है। भिएबे बियकर के मुताबिक टेक्नोलॉजी के विकास के एकाधिक विकल्प और उनमें से चयन की संभावना सामाजिक-रचनावाद का आधार है। टेक्नोलॉजिकल बदलाव एक राजनैतिक प्रक्रिया है। थॉमस ह्यूज़ का कहना है कि किसी टेक्नोलॉजी के शुरूआती दोर का समझ में सामाजिक रचनावाद मददगार है। जैसे बीसवीं सदी की शुरूआत में मोटरगाड़ी के इंजिन के तीन विकल्प थे – बिजली, भाप या इंटर्नल कंबस्चन (पेट्रोल के दहन और गैस के दाब से)।  इनमें से आखिरी विकल्प ही सफल रहा, इसी वजह तकनीकी श्रेष्ठता नहीं, बल्कि ऑटोमोबाइल के खरीदारों के हित थे। उन्हीं दिनों अमेरिका के टेक्सास प्रांत में और कुछ साल बाद अरब मुल्कों में खनिज तेल के बड़े भंडार पाए गए और जिन लोगों ने इस पर पैसे लगाए थे, यह उनके हित में था कि गाड़ी का इंजिन पेट्रोल के दहन से चले।

अक्सर हम खोज का सेहरा कुछ खास लोगों के सर पर डाल देते हैं। सामजिक रचनावाद इस खयाल को भी चुनौती देता है। असल में बड़े बदलाव सिर्फ दो-एक खोज करने वालों से नहीं, बल्कि कई छोटे-छोटे टुकड़े ढूँढ निकालने वालों की वजह से होते हैं। हम उनको याद रखते हैं, जो नई खोज को बड़े पैमाने पर फैलाने में सफल होते हैं, और असल खोजकर्ताओं को भूल जाते हैं। बिल गेट्स और स्टीव जॉब्स का नाम हर कोई जानता है, जिन्होंने बड़ी कंप्यूटर कंपनियाँ बनाईं, पर फॉन नॉयमान, ऐलन ट्यूरिंग जैसे महान खोजकर्ताओं के नाम शोधकर्ताओं के अलावा कोई नहीं जानता। इसी तरह सौ साल पहले इस्पात उद्योग को फैलाने के लिए ऐंड्रू कार्नेगी ख्यात हुआ, पर असल खोजकर्ता हेनरी बेसेमर किताबों में दर्ज़ रह गया। कई आम इंजीनियर, मेकानिक और टेकनीशियन किसी भी टेक्नोलोजी की सफलता के पीछे होते हैं, पर उनको हम नहीं जानते हैं। कंप्यूटर, पेनीसिलीन जैसे कई उदाहरण हैं, जिनका इतिहास कई स्त्री-पुरुषों की इकट्ठी कोशिशों की कहानी है, पर हमें अक्सर कोई एक नाम बतला दिया जाता है।

 

 टेक्नोलॉजी की सामाजिक बुनियाद :

किसी खास नई टेक्नोलॉजी का उभरना, मौजूदा अलग-अलग टेक्नोलॉजी के बीच स्पर्धा, और जिस तरह उनका इस्तेमाल होता है, यह समाज में जड़ बना चुकी ताकतें- जैसे राजनीतिक सत्ता, सामाजिक वर्ग, जेंडर और संगठन की गतिकी पर निर्भर करता है। इंसान सामाजिक प्राणी है। टेक्नोलॉजिकल बदलाव एक सामाजिक प्रक्रिया ही हो सकता है। टेक्नोलॉजिकल जबरियत या नियति और सामाजिक रचना में से किसी एक को ज्यादा महत्वपूर्ण मानना बेमानी है।टेक्नोलॉजिकल और सामाजिक बदलाव को हम संभावनाओं एक दूसरे पर प्रभाव और एक दूसरे से फीडबैक के चक्र के मुताबिक बेहतर समझ सकते हैं। समाज विज्ञानी विलियम ऑगबर्न, जिनको टेक्नोलॉजी-जबरियत का प्रवक्ता माना जाता है ने यह नुक्ता पेश किया है कि सामाजिक संस्थाएं, रस्मो रिवाज, टेक्नोलॉजी और विज्ञान सब कुछ एक साथ गड्डमड्ड होकर एक साथ गति में चलते हैं। जब इनमें से कोई एक गति में हो और दूसरे हिस्से के साथ टकरा रहा हो तो किस की शुरुआत कहां से हुई यह सवाल बेमानी हो जाते हैं। अगर हम इसको ज्यादा खींचे तो शुरुआत के सवाल कारण कारक पहेलियों में खो जाते हैं। नई टेक्नोलॉजी के आने से पहले कभी ना सोचे गए परिणाम सामने आते हैं।इसकी सबसे अच्छी मिसाल इंटरनेट के प्रसार के साथ फेक न्यूज़ और उसकी वजह से दंगे फसाद, तानाशाही का बढ़ना है। 1940 के दशक में जब डिजिटल कंप्यूटर बना, उस जमाने में इनके इस्तेमाल के बारे में बहुत कम ही जानकारी थी। किसी ने नहीं सोचा था कि कंप्यूटर जल्दी ही सारी दुनिया में छा जाएंगे और समकालीन जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएंगे। आज की दुनिया कंप्यूटरों के बगैर सोची नहीं जा सकती। हवाई उड़ानों से लेकर जीनोम की जानकारी इकट्ठे करने में, सूचना का संचय, उसको ढूंढ कर निकालना और उसका नियंत्रण करना यह सब कुछ शामिल है ।कंप्यूटरों के इतिहास को देखा जाए तो लगता है कि टेक्नोलॉजिकल जबरियत में कुछ तो बात है।

सामाजिक रचना के नज़रिए से देखें तो  50 और 60 के दशक में कंप्यूटरों के तकनीकी विकास में फौज-तंत्र के बजट से आई लागत बड़ी तादाद में थी। इंटरनेट के शुरुआती दौर में अमेरिकी सुरक्षा विभाग का बड़ा योगदान रहा। व्यवसायिक संस्थाओं ने कंप्यूटर के बाजार के फैलने में बड़ी मदद की। इनमें बैंक और बीमा कंपनियां शामिल हैं। इस बड़े बाजार को शोध और विकास की पूरी मदद मिली और इससे कंप्यूटर टेक्नोलॉजी बड़ी तेजी से आगे बढ़ी। नई टेक्नोलॉजी के आने से समाज के कई पहलू बदल जाते हैं और साथ ही सामाजिक ताकतें नई टेक्नोलॉजी और उनके स्वरूप पर प्रभाव डालती हैं। यह दोनों ही गतिशील प्रक्रियाएं हैं, जिसमें एक दूसरे पर कई कारणों के प्रभाव पर सोचना जरूरी है। समाज से आजाद होकर टेक्नोलॉजी ने कभी खुले एजेंट की तरह काम नहीं किया है। जबरियत के बनिस्बत सामाजिक रचना की धारणा से हम इंसानी एजेंसी की संभावना को बेहतर समझ सकते हैं। टेक्नोलॉजी से आते बदलावों को प्रभावित करने की काबिलियत समूची जनसंख्या में एक जैसी नहीं होती। समाज में अलग-अलग वर्गों का और संसाधनों में पहुंच से टेक्नोलॉजिकल बदलाव पर अलग किस्म का प्रभाव पड़ता है। कुछ खास वर्गों के हितों में या कुछ खास वर्ग के खिलाफ खास किस्म की टेक्नोलॉजी बनती है। टेक्नोलॉजी से ताकत मिलती है पर यह ताकत सिर्फ गैर इंसानी कायनात पर ही नहीं लागू होती। सी एस लुइस का कहना था कि कुदरत पर इंसानी ताकत दरअसल कुछ इंसानों का बाकी इंसानों पर कुदरत की मदद से कब्जा करना है। टेक्नोलॉजी के विकास और इस्तेमाल को अपनी ज़रूरतों के मुताबिक ढालने में अलग-अलग खित्तों के लोगों की, और माहिर लोगों की, हिस्सेदारी जरूरी होती है। पर आधुनिक टेक्नोलॉजी का स्वरूप ही ऐसा है कि उस पर आम समझ बना पाना मुश्किल है। वही लोग महारत रखते हैं, इसकी जटिलता को समझ सकते हैं। बाकी लोग महज उपभोक्ता हैं और इसमें जो तर्कशील ज्ञान जमा है, उसका फायदा उठा रहे हैं। यह आधुनिक समाज की एक बुनियादी पहेली है कि इसके जरिए मानव समाज को बहुत ताकत मिली है, पर निजी तौर पर हम उस ताकत का बहुत ही कम इस्तेमाल कर सकते हैं। जब कोई कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन काम करना बंद कर दे, पंगु होने का एहसास और हताशा हमें घेर लेती है। इंसानी समस्याओं के हल के लिए जो समझ काम कर सकती है, उसके लिए लगातार बदलाव को मान सकना और उम्मीद बनाए रखना जरूरी है। जहां ज्यादातर इंसान भागीदारी न कर सकें और अपने आप को सत्ता से अलग समझते हों, ऐसे समाज में इस तरह की बातें मुमकिन नहीं हैं।

जब टेक्नोलॉजी में बहुत ज्यादा यकीन रखते हुए लोगों में असहायता का बोध भी साथ-साथ बन रहा हो तो उसके अजीब नतीजे सामने आते हैं, जैसे यू एफ ओ (अनजान उड़ती चीजें) में लोगों का विश्वास। ऐसे लोग पागल नहीं हैं। कई बार छद्म-विज्ञान में आस्था रखते हुए लोग देवी देवताओं को टेक्नोलॉजी में ज्यादा काबिल मानते हैं और इसकी वजह से वह किसी धर्म गुरु के प्रपंच में फस जाते हैं। ऐसी घटनाएं हुई हैं जैसे एक जिम जोन्स के कहने पर यह मानकर कि मृत्यु के बाद हुए किसी स्वर्गीय ग्रह में जा रहे हैं,  918 लोगों ने सामूहिक आत्महत्या की थी।

उन्नत टेक्नोलॉजी में आस्था सत्ता पर ना-यकीनी के साथ घुल मिल जाती है जैसे कि यू एफ ओ  को मानने वाले कई  यह मानते रहे कि यह सरकार का षड़यंत्र है कि वह आम लोगों को इसके बारे में सच्चाई नहीं बताएगी। सरकारें आमतौर पर नागरिकों को झूठ कहती रहती हैं, पर इस पैमाने का षड़यंत्र करने में बड़ी से बड़ी सरकारें मात खा जाएंगी। इस तरह की ना-यकीनी इसलिए पैदा होती है कि लोग अपनी जिंदगी पर असर कर रहे निर्णयों में भागीदारी नहीं ले पाते। किसी भी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए यह जरूरी है कि उसे टेक्नोलॉजी के नियंत्रण में भागीदारी मिले। लोकतंत्र के भलाई के लिए यह जरूरी है कि टेक्नोलॉजी कैसी हो इसको तय करने में सबकी भागीदारी हो। जो फायदे हैं, और उनको पाने के लिए जो कीमत चुकानी है, इनको हम अलग नहीं कर सकते। इसलिए यह जरूरी है कि हम इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि क्या टेक्नोलॉजी के फायदे चुकाई गए कीमत के अनुसार सही है।

 

 टेक्नोलॉजी से आए बदलाव के समाज के विभिन्न तबकों पर अलग प्रभाव :

टेक्नोलोजी-सिस्टम को टिकाए रखने के लिए जंतर, कौशल, और संगठित ढाँचे के अलावा कई तरह के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और राजनैतिक मेल की ज़रूरत होती है। टेक्नोलोजी से होने वाले बदलाव अक्सर तकलीफें और उथलपुथल के साथ ही आते हैं। यह ज़रूरी है कि हम इसे ऐसे सिस्टम की तरह देखें, जिसके साथ कई बदलाव जुड़े होते हैं, और जब भी कोई नया सिस्टम उभरता है तो साथ में कई तनाव और तकलीफें आती हैं।

अगर ज्ञान और संगठित ढाँचों के जरिए खास मकसद पूरे करने के लिए सामान बनाने और तकनीकें गढ़ने के सिस्टम को टेक्नोलोजी कहें तो भी परिभाषा अधूरी रह जाती है और एक बड़ी गफ़लत भी इसमें है। खास मकसद की बात से लगता है कि ज़रूरतें पूरी करने के लिए ही टेक्नोलोजी है, तो सवाल उठता है कि किसके मकसद पूरे करने की बात है?

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास ‘घरे-बाइरे (घर और बाहर)’ पर सत्यजित राय की बनाई फिल्म का एक दृश्य है, जिसमें मैन्चेस्टर की मिलों में बने सस्ते कपड़े बेचते ग़रीब छोटे व्यापारी स्वदेशी आंदोलन में हिस्सा नहीं लेना चाहते, क्योंकि उनके खरीदार महँगा खादी का कपड़ा नहीं खरीद सकते। इस वजह से आखिर में दंगे छिड़ जाते हैं, क्योंकि उन दिनों पूर्वी बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के नेता हिन्दू और ग़रीब छोटे व्यापारी ज्यादातर मुसलमान थे। यानी टेक्नोलोजी की वजह से समाज में पहले से मौजूद सांप्रदायिक तनाव बढ़ गए।

और पास के दशकों में नर्मदा नदी पर बने बाँधों की मिसाल है। गुजरात और महाराष्ट्र के धनी किसानों तक पानी पहुँचाने वाला सरदार सरोवर बाँध आदिवासियों के लिए अपने कुदरती रिहाइश के इलाकों से विस्थापन की वजह बन जाता है। इसलिए यह सोचना कि टेक्नोलॉजी का सामाजिक रिश्तों के साथ कोई लेना-देना नहीं है, ग़लत है।

टेक्नोलॉजी में बढ़त माली तरक्की का एक बड़ा कारण रहा है। इसकी वजह से सामान और सेवाओं में बढ़त हुई है। सामान के उत्पादन में और बिल्कुल नए किस्म के उत्पाद सामने आए हैं, जिससे पहले की तुलना में गुणात्मक सुधार हुए। 1950 में अमेरिका में जब आर्थिक वृद्धि तेज रफ्तार से हो रही थी यह देखा गया कि ज़मीन और कुदरती संसाधन, श्रम और पूंजी जैसे पारंपरिक उत्पादन के अनसरों के जरिए इसे समझ पाना संभव नहीं है। ज़मीन पहले जितनी थी, पूंजी इकट्ठा हो रही थी, श्रम का बाजार भी बढ़ रहा था, पर इससे माली बढ़त का केवल 10-20% ही हुआ था। मुख्य भूमिका टेक्नोलॉजी मे बढ़त, कामगारों की महारत में बेहतरी और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था के संगठन की थी। इस प्रक्रिया में सामाजिक उथलपुथल से बचा नहीं जा सकता। चाहे भले मकसद के साथ ही कोई टेक्नोलॉजी आई हो, सामाजिक ढाँचों और रिश्तों में तोड़फोड़ होनी ही है। कभी समाज के छोटे हिस्से पर ही असर दिखते हैं तो कभी बड़े पैमाने पर असर दिखता है। नई सनअत आती है तो अक्सर पुरानी फैक्ट्रियाँ बंद होने के कगार पर आ जाती हैं। जब नई इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी के जरिए निजी कंप्यूटर और इसके साथ जुड़े और दीगर सामान बनने शुरू हुए तो  रेडियो में लगने वाले वैक्यूम ट्यूब वाले पुराने धंधे खत्म हो गए। उन्नीसवीं सदी में रेलगाड़ी आई तो इसका काफी विरोध हुआ, क्योंकि दूर तक यातायात की आसानी से व्यापारिक नियम जल्दी से बदलने लगे। जाहिर है कि रेलगाड़ी का आना एक इंकलाबी बात थी, पर हमें यह समझना होगा कि कई तबकों को किसी भी नई सनअत से बहुत नुक्सान होता है। डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से आज किताबों की दूकानें संकट में पड़ गई हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि टेक्नोलॉजी से आए बदलावों से समाज में सत्ता-समीकरण बदलते हैं। संपदा और आय का वितरण पहले से अलग हो जाता है। इन सब का इंसानी रिश्तों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

एक अद्भुत कहानी ऑस्ट्रेलिया के यिर योरोंट आदिवासियों की है। फिछली सदी की शुरूआत तक ये लोग शिकारी मानव की तरह रहते थे। उनकी सबसे बड़ी सनअत पत्थर से बनी कुल्हाड़ी थी, जिसे खास किस्म की लकड़ी से जोड़ा जाता था। इसका इस्तेमाल मर्दाना काम था। औरत और बच्चे परिवार के लोगों से कभी-कभार ले लेते थे। इसे पवित्र रस्मों में भी इस्तेमाल किया जाता था। जब यूरोपी मिशनरी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने भले मकसद से कई मर्दों, औरतों को इस्पात से बनी कुल्हाड़ियाँ दीं। इसका गहरा असर उन पर पड़ा। मर्दों की सत्ता पर चोट पहुँची। कुनबों के बीच व्यापार के रिश्ते बिगड़ गए। कुछ मर्दों ने अपनी औरतों से जिस्म का धंधा शुरू करवा दिया कि एवज में उन्हें नई कुल्हाड़ियाँ मिलें। समाज में असुरक्षा बढ़ गई।

आधुनिक समाजों में भी नई टेक्नोलॉजी के आने से हुई गड़बड़ की कई मिसालें हैं। जब रेलगाड़ियों के लिए डीज़ल इंजन का इस्तेमाल होने लगा तो जहां पहले भाप के इंजन वाले गाड़ियां रुकती थीं और उनकी मरम्मत आदि का काम होता था, वे  सारे धीरे-धीरे बंद होने लगे। जो लोग वहां काम करते थे उनकी नौकरियां चली गईं। एक जमाने में कई शहर ऐसे थे जहां वयस्कों का बड़ा हिस्सा इसी काम में लगा होता था और तमाम सुविधाएं रेल की आय से ही चलती थीं। डीजल इंजन के आने से यह सब कुछ तबाह हो गया। नर्मदा पर बांध बनने के बाद हरसूद जैसे कई शहर हमेशा के लिए विलुप्त हो गए। हरसूद मध्य प्रदेश के खंडवा जिले का एक छोटा शहर था, जहां तक़रीबन 16000 लोग रहते थे और इनमें से अच्छी तादाद में साक्षर थे। वहां के सभी लोगों को शहर छोड़कर जाना पड़ा। ऐसा भी होता है कि कभी-कभी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल धोखाधड़ी के जरिए यथास्थिति को बनाए रखने के लिए किया जाता है। जब कामगारों की यूनियन प्रबंधन के साथ मिलकर काम ना करें तो कंपनियां नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरु कर देती हैं और जब यूनियन हाथ में आ जाए तो फिर वह वापस पुरानी टेक्नोलॉजी में चली जाती है, अगर वही फायदेमंद हो।

इस वजह से दुनिया भर में अक्सर टेक्नोलॉजी का भयंकर विरोध हुआ है। कहीं लोगों ने नई टेक्नोलॉजी को तबाह करने की कोशिश की है, कहीं बस उसके खिलाफ संघर्ष जारी रखा है। कोलकाता विश्वविद्यालय में एक वक्त दुनिया में सबसे ज्यादा छात्र पढ़ा करते थे, इसके बावजूद अस्सी के दशक तक प्रशासनिक काम में कंप्यूटरों का इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि कर्मचारी संगठन इसके खिलाफ थे। इसका नुकसान छात्रों को उठाना पड़ रहा था –  3 साल के प्रोग्राम देर से चलते हुए 4 साल में जाकर खत्म होते थे। पर कर्मचारी संगठन अड़े हुए थे। 19वीं सदी में चीन में रेशम के कीड़ों से रेशम का धागा बनता था। 1859 में अंग्रेज़ी जार्डीन कंपनी वहां आई और उन्होंने आधुनिक फैक्ट्री खोली, जिसमें भाप की ताकत से मशीनें चलती थी और रेशम को रील में लपेटा जाता था। इससे पुरानी रेशम के कारीगरों को खतरा महसूस हुआ तो उन्होंने चालाकी से मिलकर नई टेक्नोलॉजी के साथ इस तरह काम किया कि हर चीज की कीमत बढ़ गई। हालांकि उत्पादन काफी ज्यादा हो रहा था पर कंपनी को फायदा नहीं हो रहा था। दस साल में ही कंपनी बंद हो गई।

 

19वीं सदी में इंग्लैंड में कई ऐसी घटनाएं हुई, जहां कामगारों ने मशीनें तोड़ डालीं। नेड लुडलम नाम के एक विक्षिप्त आदमी से शुरू हुए इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन को लुडाइट्स  का आंदोलन कहा जाता है। इनकी प्रशंसा में प्रसिद्ध कवि बायरन ने एक नज़्म लिखी है। कई आर्थिक वजहों से धीरे-धीरे यह आंदोलन खत्म हो गया। जब आंदोलन शुरू हुआ था तो इंग्लैंड और फ्रांस के बीच में जंग चल रही थीं, जिसकी वजह से भारी आर्थिक तनाव थे। वक्त के साथ जंग खत्म होने से आर्थिक स्थिति सुधरी और बाद में धीरे-धीरे जब कर्मचारियों के संगठन बनने लगे और उन्होंने कामगारों के हक में लड़ाइयां लड़ीं तो धीरे-धीरे आंदोलन खत्म हो गया।  डेढ़ सौ साल बाद नई किस्म का लुडाइट आंदोलन अमेरिका में देखा गया। 1995 में न्यूयार्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट ने आधुनिक समाज और टेक्नोलॉजी की भूमिका पर गंभीर आलोचनात्मक लेख छापे। लेखक के मुताबिक आधुनिक टेक्नोलॉजी ने कुछ भौतिक सुख दिए हैं, पर इंसान की किस्मत उसके हाथों से निकल कर राजनीतिक नेताओं और कॉरपोरेट अफसरों और दूर बैठे अनजान टेक्नीशियन और अफसरों के हाथ चली गई है; इसलिए अपनी आजादी को वापस लाने के लिए सनअती समाज को पूरी तरह तबाह करना जरूरी है। लेख में यह बताया गया कि यह शांतिपूर्वक ढंग से नहीं होगा। इसके लिए फैक्ट्रियां तबाह करनी पड़ेंगी, तकनीकी किताबें जला देनी होंगी और जो कुछ भी सनअती सभ्यता का हिस्सा है, उसको धीरे-धीरे मिटाना होगा। इन लेखों का लेखक आधुनिक समाज का विक्षिप्त आलोचक मात्र नहीं था। उसका नाम थियोडोर काच्तिंस्की था। उसे बाद में ऊना-बॉंबर के नाम से जाना गया। उसने 1978 से 1995 के बीच 16 जगह बम विस्फोट किए, जिसमें 3 लोग मारे गए और 23 घायल हुए।

किसी भी टेक्नोलॉजी के बारे में यह पूछना जरूरी हो जाता है कि किसके मकसद और किन हितों के लिए वह काम कर रही है। जो पैसा इसमें लग रहा है और जिस तरह के शोध प्रोजेक्ट को पैसा दिया जाता है, ये तमाम चीजें सामाजिक और राजनीतिक ढांचे द्वारा प्रभावित होती हैं। कॉरपोरेशन और सरकारी एजेंसी जैसी बड़ी संस्थाएं टेक्नोलॉजी से आने वाले बदलावों पर बहुत ज्यादा असर डालती हैं। इसके मिसाल हमारे यहां 2G स्कैंडल या बाद में मोदी का मेनिफेस्टो और उसके साथ अदानी अंबानी के संबंधों में देखा जा सकता है। अक्सर शोध और विकास के लिए सरकारी संस्थाएं काफी पैसा देती हैं, जैसे अमेरिका में सुरक्षा विभाग या नासा या ऊर्जा का विभाग (नाभिकीय शोध और विकास के लिए) पैसे देते हैं। इसी तरह हिंदुस्तान में भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, जिसमें यूजीसी वगैरह आते हैं, सुरक्षा विभाग, एटॉमिक एनर्जी विभाग, आदि सरकारी संस्थाएं हैं, जो शोध के लिए नियमित अनुदान देती हैं। अगर आर्थिक संसाधनों का वितरण अलग हुआ होता तो टेक्नोलॉजी का इतिहास भी अलग होता। यह मुमकिन है कि सही ढंग से निवेश होने पर ग़रीबी और अपराध कम करने जैसी सामाजिक समस्याओं का हल ढूंढती टेक्नोलॉजी पर ज्यादा पैसा लगा होता।

 

टेक्नोलॉजी क्या करती है और क्या नहीं कर सकती है

कुछ सामाजिक समस्याओं के हल में टेक्नोलॉजी काम आई है। मेथडॉन ड्रग्स का इस्तेमाल नशेड़िओं को ठीक करने के लिए किया गया है। हाईवे पर जो दुर्घटनाएं होती हैं उससे हजारों मौतें होती हैं इसके लिए गाड़ियों में ऐसे इंतजाम किए जा रहे हैं कि दुर्घटना होने पर लोग बच सकें। शहरों में दीवारों पर अवांछित तस्वीरें रोकने के लिए नई किस्म के पेंट और सफाई के घोल बनाए जा रहे हैं। पश्चिमी मुल्कों में और हमारे यहां भी मोटापे से बचने के लिए नई किस्म की दवाएं या डाइटिंग पर किताबें या कसरत की मशीनें बनाई जा रही हैं। ग़रीब बच्चों को लैपटॉप बांटकर साक्षरता और संपन्नता की कोशिश की जा रही है। ये टेक्नोलॉजिकल हल  हैं। बहुत सारी समस्याओं को टेक्नोलॉजी से हल नहीं किया जा सकता है।

मेथडॉन उन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का हल नहीं देता जो नशे की जड़ हैं। दीवारों की तस्वीरों को मिटाने से युवाओं का वह गुस्सा खत्म नहीं होता जिसकी वजह से यह तस्वीरें आती है। बच्चों को लैपटॉप देकर समाज में गैर-बराबरी और फौज पर बहुत ज्यादा खर्च करने वाली अर्थव्यवस्थाओं की समस्या खत्म नहीं होती। यह सही है कि टेक्नोलॉजी द्वारा बहुत सारी समस्याएं कम की जा सकती हैं, हालांकि उन्हें पूरी तरह हटाना हो सकता है मुमकिन न हो। शहरों में बढ़ते प्रदूषण से राहत के लिए अगर आम यातायात में बसों और ट्रेन की तादाद बढ़ाई जाए जिससे कि लोग अपनी गाड़ियां कम चलाएं तो यह एक हल हो सकता है। हर समस्या का हल टेक्नोलॉजी से ढूंढना ठीक नहीं है। अक्सर हमें पहले से सामाजिक समस्याओं का पता नहीं होता कि कैसा हल ढूंढना है। एयर कंडीशनिंग की मशीन हो तो हमें पता है कि हम कमरा ठंडा करने के लिए मशीन चाहते हैं। कुछ हद तक यही बात बड़े मकसदों के लिए भी लागू होती है, जैसे चांद पर जाना है तो यह हमें पता है कि कैसा वाहन चाहिए और उसमें कैसे सावधानियां चाहिए। पर समाज में बढ़ रहे अपराध को कम करना चाहते हैं तो वह तापमान जैसी बात नहीं है कि जिसके बारे में हमें सफाई से सब कुछ पता हो। अपराध बढ़ने के कई कारण होते हैं और वह किसी एक टेक्नोलॉजी से हल नहीं होते। इंसान की फितरत को मशीनों से बदला नहीं जा सकता। ऐसी कोशिश की जाए तो इंसान उस की मुखालफत करता है। आजकल अक्सर बच्चों को दवाएँ दी जाती हैं कि वह पढ़ाई लिखाई पर ध्यान लगाएं। ध्यान न लगा पाने को एक बीमारी का नाम भी दिया गया है जिसे ए डी एच डी या अटेंशन डिफिशिएंसी हाइपरटेंशन की बीमारी कहा जाता है। पर दवाओं से ऐसी बीमारी का समाधान नहीं होता। बच्चे पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहे हैं तो उसके पीछे परिवार में हो रही अवांछित घटनाएं होती हैं। इसलिए पूरे परिवार को मानसिक सेहत के सुधार की जरूरत होती है। टेक्नोलॉजी से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती, चाहे वह तकनीकी हो या सामाजिक हो, और अगर कुछ हद तक हल हो भी जाए तो बाकी जो बच जाता है वह अक्सर मूल समस्या से भी ज्यादा जटिल हो सकता है। इन सबके बावजूद कई लोगों ने संस्थाओं और संगठनों ने टेक्नोक्रेसी (टेक्नोलॉजिकल प्रबंधन) को बड़ी गंभीरता से लिया है। एकबारगी यह हमें आकर्षित करता है। वैज्ञानिक प्रबंधन के नाम से कुछ लोगों ने मशीनी ढंग से सोचने की कोशिश की है। इसके साथ जो बड़ा नाम एफ डब्ल्यू टेलर का जुड़ा है। टेलर ने मिलों में काम कर रहे कामगार वक्त के साथ क्या कुछ कर रहे हैं, ध्यान से देखते हुए आंकड़े दर्ज किए। इन आंकड़ों का विश्लेषण कर टेलर ने सुझाव दिया कि किस तरह वक्त की बर्बादी रोक कर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। इस तथाकथित ‘वैज्ञानिक प्रबंधन’ का आधार यह था कि काम करना कैसे है – इससे प्रबंधन और संयोजन को अलग किया जाए। खासतौर से प्रशिक्षित मैनेजरों को ही उत्पादन के सही तरीके चुनने के काबिल माना गया और कामगारों से कहा गया कि जो कुछ कहा जा रहा है, उन निर्देशों का पालन करें। काम के प्रबंधन में कामगारों की अब कोई भूमिका नहीं रही, पर चूँकि अब काम सही तरीके से संयोजित होगा, तो उत्पादन बढ़ेगा और इससे कामगारों को ज्यादा पैसे मिलेंगे। जाहिर है कि प्रबंधकों की तकनीकी काबिलियत को मानते हुए यह तथाकथित वैज्ञानिक प्रबंधन तय किया गया और टेलर का कहना था कि यह केवल फैक्ट्रियों में ही नहीं बल्कि सभी सामाजिक गतिविधियों में, जैसे घर, खेत खलिहान, बड़े-छोटे उद्योगों, धर्म-स्थानों, समाज-सेवक संगठनों, विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों आदि में हर जगह लागू किया जा सकता है।

चित्र : टेलर के ‘वैज्ञानिक प्रबंधन’ का मजाक उड़ाता कार्टून

 

यह केवल यूएसए तक ही सीमित नहीं था। लेनिन ने यह कहते हुए कि यह  ‘बुर्जुआ शोषण की परिष्कृत क्रूरता है’, माना कि सोवियत आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए इसके बुनियादी सिद्धांत और तरीकों को अपनाना चाहिए। यूएसए या कहीं भी पूरी तरह से टेक्नोक्रेट प्रबंधन कभी भी लागू नहीं हुआ। प्रबंधकों को और कामगारों को भी लगा कि यह उनके हितों के खिलाफ है। ज्यादातर मैनेजर अपना रुतबा छोड़कर ‘वैज्ञानिक तरीकों’ को अपनाने में परहेज कर रहे थे। कामगारों को यह तकलीफ थी कि पहले उनको जो भी छूट मिलती थी वह अब नहीं मिलेगी। जब उत्पादन बढ़ा तो कीमतें कम कर दी गईं और इससे उनकी आय पहले की तुलना में नहीं बढ़ी। किसी भी टेक्नोक्रेसी-प्रेरित सिस्टम की तरह वैज्ञानिक प्रबंधन में गड़बड़ यह थी कि तकनीकी और सामाजिक- राजनीतिक समस्याओं में जो फ़र्क है, उसे नज़रअंदाज किया गया था। अगर वैज्ञानिक प्रबंधन से उत्पादन बढ़ता भी है पर जिन पर यह लागू किया जाएगा वह हमेशा इसका विरोध करेंगे। बुनियादी खामी यह थी कि मान लिया गया था कि राजनीतिक सवालों को प्रशासन से दरकिनार किया जा सकता है। टेक्नोलॉजी का चयन अक्सर इस पर निर्भर करता है कि इससे किसको फायदा किसे नुकसान होता है। इसलिए ज़रूरी है कि इस प्रक्रिया में वे लोग शामिल हों जो इससे प्रभावित होते हैं। टेक्नोलॉजी के पीछे की प्रक्रियाओं के दायरे में आने वालों को इसके विकास से फायदा ज़रूर हुआ है, पर जो इसके दायरे से बाहर हैं उन पर प्रभाव कम होता है। टेक्नोलॉजी के विकास में जो तरीके कामयाब हुए हैं उनको समाज के प्रशासन के लिए लागू नहीं किया जा सकता। न्याय संगत और प्रभावी राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था का विकल्प टेक्नोलॉजी कभी नहीं हो सकती।

 

टेक्नोलॉजी और रोज़गार

2016 में अमेरिकी प्रेसिडेंट के चुनाव में यह मुद्दा काफी चर्चा में था कि ऑटोमेशन की वजह से नौकरियाँ जा रही हैं। कामगारों को हमेशा ही यह डर रहता है कि टेक्नोलॉजी से आए बदलाव की वजह से वे बेरोजगार हो सकते हैं। यह डर बेबुनियाद नहीं है। अतीत में और खास तौर से हाल की सदियों में फैक्ट्रियों में उत्पादन के लिए बेहतर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हमेशा उत्पादन की बढ़त के लिए हुआ है। इसे प्रति कामगार कुल उत्पादन से मापा जाता है। इसका परिणाम यह है कि हमेशा कामगारों की तादाद में कमी लाई गई है। अगर उत्पादन प्रति वर्ष 2% की दर से बढ़ता है तो 35 साल में अर्थव्यवस्था दुगनी हो सकती है। इसका मतलब यह है कि आज सामान तैयार करने में जितने कामगारों की जरूरत है, 35 साल के बाद उससे आधे की ही जरूरत पड़ेगी। उत्पादन बढ़ने से हमारा भौतिक जीवन समृद्ध होता है, पर इससे बेरोजगारी के बढ़ने का खतरा रहता है। पर असल में यह बात इतनी सरल नहीं है। टेक्नोलॉजी और बेरोजगारी में जटिल संबंध है। ऐतिहासिक शोध से हम देख सकते हैं की उत्पादन में सुधार से जो टेक्नोलॉजी के बदलाव आए हैं वह हमें कहां ले जा रहे हैं और इससे आय के वितरण में क्या फ़र्क पड़ रहा है। वैश्वीकरण की वजह से भी रोजगार और कामगार की पगार पर असर पड़ा है। अमेरिका के ऐतिहासिक आंकड़ों को देखें तो1920 में 113000 लोकोमोटिव इंजीनियर थे और 91000 कामगार थे जो इंजन कई भट्ठी में कोयले से आग जलाने का काम करते थे। 2002 में हालांकि ढोए माल में बहुत ज्यादा बढ़त आई है, पर महज 40,000 इंजीनियर ही रेल यातायात में काम कर रहे हैं और  चूँकि भट्ठी है ही नहीं, इसलिए वह काम रहा नहीं है । इसी तरह 1980 की शुरुआत में जब पहले-पहल म्यूज़िक सिंथेसाइज़र आए, रिकॉर्डिंग का काम करने वालों की तादाद एक तिहाई कम हो गई। 1972 से 77 तक अमेरिकी कंपनियों में 21% फोन-कॉल बेल टेलीफोन कंपनी के जरिए होते थे और इसी दौरान ऑपरेटर्स की तादाद में 32% गिरावट आई। 2002 से 2007 तक इस्पात का उत्पादन 5% बढ़ा, पर रोजगार में 10% की गिरावट आई। इसी दौरान मकई का उत्पादन 30% बढ़ा पर खेतों में काम कर रहे कामगारों की तादाद इसी प्रतिशत से कम हो गई। हमारे अपने यहां कई बड़े संकट कामगारों पर आए हैं, जिसका एक बड़ा उदाहरण मानेसर में मारुति-सुज़ुकी फैक्ट्री का है।

चित्र : मानेसर में मारुति-सुज़ुकी फैक्ट्री के गिरफ्तार कामगारों के परिवारों का विरोध-प्रदर्शन

 

इतिहास में देखें तो हाथ के करघों की जगह पावर-लूम बने, तो कई बुनकरों को अपना काम छोड़ना पड़ा। जो काम करते रहे उनको बहुत ही कम पैसे मिलते थे। बनारस के बुनकरों पर अब्दुल बिस्मिल्लाह के प्रसिद्ध उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में इस संकट को गहराई से बखाना गया है।

यह भी सही है कि टेक्नोलॉजी की बढ़त से सारे काम मशीनों से ही नहीं होंगे।  दुनिया भर में बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अभी भी बहुत सारे रोजगार की गुंजाइश है। कीन्स ने पूंजीवाद में आर्थिक सुधारों की बात करते हुए सरकार द्वारा लोगों को रोजगार देने पर जोर दिया था। साथ ही जैसे-जैसे भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं, और बेहतर सुविधाओं के लिए चाहत बढ़ती है। अगर किसी एक प्रोडक्ट के लिए हम कम पैसे खर्च करते हैं, तो बचे हुए पैसों को दूसरे सामान पर खर्च करते हैं। इसलिए रोज़गार के लिए काम कभी भी खत्म नहीं हो सकता। टेक्नोलॉजी की बढ़त से अर्थव्यवस्था में संकट आना मुमकिन नहीं दिखता। कई खित्तों में रोजगार कभी कम नहीं हुआ। इनमें से दवाओं के उत्पादन का खित्ता महत्वपूर्ण है। हालांकि मेडिकल टेक्नोलॉजी में बहुत तरक्की हुई है, पर सेहत सुविधाओं पर अर्थ निवेश और रोजगार बढ़ता ही रहा है। नई मेडिकल टेक्नोलॉजी से उम्मीदें बढ़ी हैं और किस्मत पर सब कुछ छोड़ देने की बजाय सेहत-कर्मियों पर यकीन बढ़ा है। कभी-कभी ऐसा होता है कि लोग पैसों को खर्च न कर बचाने लगते हैं। इससे आर्थिक मंदी का दौर आता है। 1930 के दशक में ऐसा ही एक मंदी का दौर आया था। ऐसे हाल में सरकारों को बाजार में पैसा लगाकर रोजगार बढ़ाना पड़ता है। टेक्नोलॉजी से रोजगार की बढ़ोतरी के कई मिसाल हैं। रेलगाड़ी आने के पहले लोकोमोटिव इंजीनियर का काम ही नहीं था। बीसवीं सदी के पहले एक्सरे की मशीनें चलाने वाले कोई नहीं होते थे। आज जेनेटिक इंजीनियर, जीपीएस टेक्निशियन, वेब डिजाइनर, सोशल मीडिया कर्मी, जैसी कई नौकरियां हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह पहले से अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि किस टेक्नोलॉजी से रोजगार में कमी या बढ़त हो सकती है। कई बार नई टेक्नोलॉजी से अप्रत्यक्ष रूप से भी रोजगार पर फर्क पड़ता है। पिछली सदियों में कोई एक नई टेक्नोलॉजी बड़ी तादाद में नए रोजगार पैदा करती थी। आज अर्थव्यवस्था काफी जटिल है, इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कौन सी सनअत कितना रोजगार बढ़ा सकती है। जैसे 100 साल पहले ऑटोमोबाइल के आने पर पश्चिमी मुल्कों में बड़ी तादाद में रोजगार बढ़ा, पर आज किसी एक टेक्नोलॉजी के बारे में ऐसा कहना ठीक नहीं होगा। जैसे हवाई उड़ान की वजह से कई तरह के नए उद्योग बढ़े हैं, जिनमें टूरिज्म, होटल उद्योग आदि हैं। इसी तरह कंप्यूटर के आने पर लगभग हर नई टेक्नोलॉजी का विकास हुआ है और उत्पादन पश्चिमी मुल्कों से हट कर कम विकसित गरीब मुल्कों में आ गया है, जिससे वहां रोजगार बढ़ा है। इसलिए यह खतरा सही नहीं है कि इंसानों की जगह मशीनें ही सारा काम करने लग जाएंगी। यह ज़रूर है कि टेक्नोलॉजी की वजह से रोजगार के खित्ते बदल गए हैं, जैसे मैन्युफैक्चरिंग, कच्चा माल खनन आदि से हटकर सर्विस यानी सेवा के खित्ते में रोजगार शिफ्ट होते जा रहे हैं। अमेरिका में 1950 में एक करोड़ इक्यासी लाख कामगार मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में थे और केवल 2 करोड़ 60 लाख लोग सेवा के खित्ते में थे। साठ साल बाद 2012 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सिर्फ 640000 की बढ़त हुई जबकि सेवा के खित्ते में 8 करोड़ 83 लाख की बढ़त है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी सलाहकार इंजीनियर जैसे कई काम दरअसल सेवा के ही काम हैं। इनकी गिनती भी बढ़त में शामिल है। सेवा खित्ते में बहुत सारे काम अवांछित हैं। जैसे घरेलू नौकर, सड़क पर जूते पॉलिश का काम आदि कोई अच्छे काम नहीं हैं। सेवा खित्ते में बढ़त होते रहना और मैन्युफैक्चरिंग में रोज़गार काम होना अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं है।

पूँजीवादी विकास के साथ खेतीबाड़ी की जगह शहरी उद्योगों ने ले ली है। अक्सर जब कोई फैक्ट्री बंद होती है, तो वहाँ काम कर रहे युवा अपने आप को नई टेक्नोलॉजी के मुताबिक ढाल लेते हैं। कंप्यूटर पर काम करना सीख कर वे नई नौकरी ढूँढ लेते हैं। पर जो चालीस से ज्यादा की उम्र के हैं, उनके लिए नए किस्म के काम में खुद को ढालना आसान नहीं होता। निजी सेक्टर में अक्सर ऐसे लोग नौकरी खोकर विपन्न हो जाते हैं, क्योंकि न तो उनको नौकरी छोड़ने के लिए पर्याप्त मुआवज़ा मिलता है और न ही नए काम का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह एक बड़ा सामाजिक-राजनैतिक सवाल है। साक्षरता और बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के क्या हाल होता है यह हम हाल में कोवड लॉक-डाउन के बाद प्रवासी लाखों मजदूरों के हश्र से देख सकते हैं।

नई टेक्नोलॉजी से समाज के विभिन्न वर्गों में आय की खाई भी बढ़ती है। यह बात हाल के समय में साफ दिखती है। मैन्युफैक्चरिंग से सेवा खित्ते में शिफ्ट होने से आय में फ़र्क का यह नया सामाजिक-आर्थिक मसला बढ़ता जा रहा है। भारत में पिछले 20 सालों में ऊपर के 20% लोगों की आय समाज के कुल आय का 65.9% से बढ़कर क़रीब 80% हो चुकी है। इसी दौरान संपन्न 1% तबके की आय 36.8% से बढ़कर 50% हो चुकी है। मैन्युफैक्चरिंग से सेवा खित्ते में जाने के अलावा इसके और कई कारण हैं, जैसे – परिवार के ढाँचे में बदलाव, आर्थिक वैश्वीकरण, ग़रीबों के लिए सरकारी राहत में कमी, न्यूनतम आय में बढ़ोतरी न होना, यूनियन की ताकत में कमी आदि।

बेरोज़गारी से मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। सही रोज़गार न मिलने पर लोग असहिष्णु और अक्सर हिंसक भी हो जाते हैं। हमारे मुल्क के मौजूदा हालात में यह बात देखीाजै सकती है।  टेक्नोलॉजी की वजह से अक्सर विकास में भौगोलिक असंतुलन भी दिखता है। सूचना टेक्नोलॉजी की वजह से पिछले पच्चीस सालों में बेंगलूरु, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई, गुड़गाँव में दूसरे इलाकों के बनिस्बत कहीं ज्यादा पूँजी लगी है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि टेक्नोलॉजी से आए बदलाव सामाजिक उथलपुथल की वजह होते हैं।

विज्ञान और टेक्नोलॉजी :

अक्सर हम टेक्नोलॉजी को विज्ञान से निकली फायदेमंद बात मान लेते हैं।  ऐसी कई मिसालें हें जहाँ यह बात सच है, जैसे डी एन ए इंजीनियरिंग, रेडिओ, टीवी, परमाणु ऊर्जा, लेज़र, अर्द्धचालकों (सेमीकंडक्टर) से क्ंप्यूटर, दवाएँ आदि के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांतों की समझ ही थी। दरअसल विज्ञान और टेक्नोलॉजी में ऐसा सीधा रिश्ता नहीं है। शिकारी मानव ने जब पहली बार पत्थरों से या पेड़ों की डालियों से असलाह बनाए होंगे, या जब पहले पहले इंसान ने चक्का चलाया होगा, उन्हें इसके विज्ञान की समझ नहीं रही होगी। असलाह या चक्का टेक्नोलॉजी हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ टेक्नोलॉजी की वजह से वैज्ञानिक खोजें मुमकिन हुईं, जैसे गैलीलियो ने दूरबीन के जरिए ग्रहों की गति के आँकड़े दर्ज़ किए, जिससे केप्लर को ग्रहों की गति के नियम बनाने में आसानी हुई और अंतत: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण  के सिद्धांत की मदद से सौरमंडल की समझ पक्की हुई। पास्तू, लिस्टर और कोश ने बीमारियों पर प्रयोग किए, जिनसे जीव-विज्ञान और रसायन में तरक्की हुई। मेल्विन क्रांत्सेनबर्ग ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी को एक दंपति की तरह देखा है, जो लंबे अरसे तक इश्क करने के बाद साथ रहने लगे हैं, पर उन्हें अक्सर एक दूसरे से चिढ़ होती है। साथ रहना उनकी मजबूरी है। फौज-तंत्र उन्हें साथ जोड़े रखता है, पर वे अक्सर तलाक लेने की सोचते हैं। आखिर आपसी स्वार्थ उन्हें अलग नहीं होने देते। इतिहास में हम देखते हैं, कि ग्रीक सभ्यता में विज्ञान में बड़ी तरक्की हुई – (ज्योतिर्विज्ञान, प्रकाश और ध्वनि की भौतिकी, गणित आदि) पर टेक्नोलॉजी में कोई खास कुछ नहीं। इसके उलट रोमन सभ्यता में बड़ी टेक्नोलॉजिकल बढ़त हुई (नहरें, इमारतें आदि), पर वैज्ञानिक खोज कम हुईंं। भारत में सैद्धांतिक विज्ञान का काम ब्राह्मणों के हाथ था, प्रायोगिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी का काम गैर-ब्राह्मण जातियों के पास था। मध्य-युग में तमिलनाड के तंजवुर इलाके के इस्पात से बनी प्रसिद्ध तलवार सीरिया के दमस्कस के नाम से जानी गई। थॉमस कुन ने लिखा है कि जिन समाजों में विज्ञान विकसित नहीं हो पाया वहाँ टेक्नोलॉजी फली-फूली और इसके उलट जहाँ विज्ञान की तरक्की हुई, वहाँ टेक्नोलॉजी का विकास नहीं हुआ। बीसवीं सदीं में भी कई अध्ययनों में पाया गया कि कई टेक्नोलॉजी के विकास में विज्ञान की कोई खास भूमिका नहीं रही है। आज के हालात ऐसे हैं कि अक्सर पहले कंप्यूटर पर प्रयोग होते हैं यानी कि अस्लियत का नक्शा कंप्यूटर पर बनया जाता है (सिम्युलेशन), और यह देखा जाता है कि कैसे बदलाव आ सकते हैं। इस तरह एक सैद्धांतिक समझ बनाकर फिर प्रयोगशाला (वेट लैब) में काम किया जाता है। इसकी वजह से दवाओं आदि के शोध में बहुत सारे रसायन बर्बाद होने से बच जाते हैं। पैसे बचने के अलावा इसका एक बड़ा फायदा यह है कि उस प्रदूषण से हम बच जाते हैं, जो रसायनों के इस्तेमाल और फेंकने से होने थे।

सारांश यह है कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों एक दूसरे के पूरक रहे हैं। आम लोग जब विज्ञान के बारे में सोचते हैं तो उनके ज़हन में टेक्नोलॉजी ही होती है। पर दोनों में बुनियादी फ़र्क हैं। विज्ञान को ऊँचा रुतबा मिला है, क्योंकि यह सही-ग़लत मान्यता है कि विज्ञान राजनैतिक या आर्थिक दबावों से आज़ाद है, वैज्ञानिक  आज़ादी के साथ काम करते हैं, विज्ञान ही उनका मजहब है। पिछले लेख में हमने देखा कि ये सारी बातें विवादास्पद हैं। सामजिक रचना के नज़रिए से हम जानते हैं कि  विज्ञान और वैज्ञानिक खोज सामाजिक लेन-देन, सत्ता के समीकरणों और मौजूदा सैद्धांतिक  मान्यताओं (पैराडाइम) से आज़ाद नहीं हो सकते। फिर भी यह बात कुछ हद तक सही है कि  वैज्ञानिक पर यह दबाव नहीं होता कि उसे कोई निश्चित जवाब ढूँढने ही हैं। किसी भी वक्त एक वैज्ञानिक किसी शोध के सवाल से हट कर दूसरे सवाल पर काम शुरू कर सकता है। ज्ञान या सत्य की तलाश ही विज्ञान का आखिरी मकसद है। टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे इंजीनियरों को इतनी आज़ादी नहीं मिलती है। अगर एक पुल बनना है तो वह बनना है, आप इसे बीच में रोक कर कुछ और नहीं कर सकते।  विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों के लिए गणित में महारत होनी ज़रूरी है, पर सैद्धांतिक प्रशिक्षण में दोनों में फ़र्क है। टेक्नोलॉजी में मकसद साफ होते हैं, पर  विज्ञान में अनिश्चितता के साथ ही काम करना पड़ता है। टेक्नोलॉजी में आखिरी सवाल सत्य की तलाश नहीं, बल्कि यह होता है कि प्रोजेक्ट काम करेगा या नहीं।  विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों का ही राज्य सत्ता और पूँजी से गहरा रिश्ता है। ज्ञान पाने के दूसरे तरीकों में सौंदर्य, अध्यात्म आदि की भूमिका होती है, पर  विज्ञान और टेक्नोलॉजी के सामाजिक किरदार में मुख्य बात यह होती है कि तरक्की के लिए आप क्या कर रहे हैं। यही बात दोनों में एक जैसी है कि इनसे तरक्की की सही-ग़लत तस्वीर बनती है। इस वजह से अक्सर दोनों को जोड़कर ‘टेक्नो-साइंस’ भी कहा जाता है। पर ज़बरन जोड़ना दोनों के विकास में अवरोध बन जाता है।

जाहिर है कि ‘टेक्नो-साइंस’ के इस जमाने में विज्ञान और टेक्नोलॉजी पर बातें खत्म नहीं होंगी। हम इस लेख को यहीं समाप्त कर रहे हैं।  अगले लेख में हम प्रकृति-विज्ञान (नैचरल साइंस) और मानविकी (ह्यूमन साइंस और ह्यूमानिटीज़ ) में फ़र्क को समझने की कोशिश करेंगे।

 

पहले दो लेखों के लिए यहाँ  चटका लगायें  ज्ञान की ज़मीन  और विज्ञान : कुदरत के रंग-ढंग पर इंसान की पकड़. 

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[1]          इस लेख में बहुत सारी बातें रूडी वोल्टी की किताब ‘सोसायटी ऐंड टेक्नोलोजिकल चेंज’ से ली गई हैं। कुछ सीधा अनुवाद है।

 

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