अफीम सागर के विरोध में उठा एक मजबूत स्त्री का हाथ

जनमत शख्सियत

डा. शिवप्रिय

 हिंदी सूचना संसार अपनी खुद (हिंदी क्षेत्र) की स्मस्याओं से अटा-पटा रहता है। यह आलेख इस हिंदी बौद्धिक समाज की तंद्रा तोड़ने के आशय से प्रस्तुत किया जा रहा है। पुर्वोत्तर राज्य, जिन्हें आमतौर पर सप्त भगिनी प्रदेश ( सेवेन सिस्टर स्टेट) कहा जाता है। इन सात राज्यों में एक राज्य है मणिपुर। इन राज्यों की गंभीरतम स्मस्याओं में एक बड़ी समस्या है, युवा पीढी के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाला “नशा”। कम से कम मणिपुर में आँखों देखा है कि शायद ही कोई परिवार हो, जिसने अपनी पीढ़ियों को नशे के शिकार होने के कारण मरते न देखा हो, पूरी पारिवारिक संरचना को बरवाद होने का दंश न झेला हो।

इस कारण इन राज्यों मे बड़े पैमाने पर लैंगिक असमानता और सामाजिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न है। असंख्य परिवारों को दोहरा आघात, एक तो पारिवारिक स्तर पर व्यक्ति का नुकसान और यदि वह व्यक्ति उस परिवार के आर्थिक उपार्जन का कारण है तो उस परिवार की आर्थिक स्थिति का ध्वस्त हो जाना लाजिम ही है। जिसका सीधा असर परिवार की अगली पीढी बच्चों और पिछली पीढ़ी बुजूर्गों  को ताउम्र भुगतना पडता है। लब्बोलुआव यह कि नशाखोरी इन राज्यों के लिए एक अभिशाप के मानिंद पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक संरचनाओं को खोखला कर रहा है।

इस भीषण आपदा की स्थिति में एक नाम हम सबके सामने आता है  एडिशनल सुप्रिडेंट आफ पुलिस, नार्कोटिक्स एवं सीमा मामले, मणिपुर थौनओजम बृंदा का जिन्होंने मणिपुर के सबसे बडे ड्र्ग माफिया लेत्खोसेइ ज़ौ की गिरफ्तारी और उसके आवास से जून 19, 2018 से बरामद किए गए बड़े पैमाने पर ड्रग्स यथा 4.595 किलोग्राम हेरोइन, 2,80,200 की संख्या में ’ वर्ल्ड इज योर्स ’ टैबल्ट्स, रु57.18 लाख नगद, रु 95,000 के चलन से बाहर के नोटों के अतिरिक्त आपत्तिजनक सामान जिसकी कीमत कई करोड़ रू आंकी गई थी, बरामद किया। इस गिरफ्तारी और बरामदगी के बाद मणिपुर के राजनैतिक हल्के में भूचाल आ गया।

थौनओजम बृंदा कौन है ? जाहिर है इस प्रकरण से वह सुपरकाप के रूप में उभरती है, लेकिन थौनओजम बृंदा के यहाँ तक पहुँचने से पहले उसकी पृष्ठ्भूमि के बारे में जान लेना जरूरी है। बृंदा की माँ अपनी बच्ची को जन्म देने के साथ ही दुनिया को अलविदा होती हैं, बच्ची अपने जन्म के समय से हीं काफी कमजोर और बीमार होती है। इसके लालन-पालन का जिम्मा मणिपुर विश्वविद्द्यालय में कार्यरत लाईफ सांईस के अध्ययनशील पिता के जिम्मे आता है। योग्य पिता और सास के सहयोग से जब बृंदा जब मणिपुर राज्य सेवा आयोग द्वारा चयनित होती है तो ससुराल की पृष्ठ्भूमि के कारण आयोग इनकी नियुक्ति अड़ंगा लगाता है तो मणिपुर स्टेट बनाम सुप्रीम कोर्ट केस के बजरिए बृंदा अपनी आजीविका प्राप्त कर पाती हैं।

अपने जन्म से हीं सतत संघर्षो और मणिपुरी अस्तित्व के संकटों को जानती समझती हुई थौनओजम बृंदा एक बेहतर मणिपुर के हक में नशे के इस दरिया को नेस्तानाबूत करने का जोखिम उठाती है। बृंदा के  लिए यह बहुत हीं आसान था कि वह इन नशे के सौदागरों के साथ हाथ मिलाती और ताउम्र शानो शौकत की जिंदगी का लाभ उठाती, इस भ्रष्ट व्यवस्था का खामोशी से अंग बन जाती लेकिन नहीं, उसने इस दलदल में रहना नहीं स्वीकार किया और अपने चट्टानी निर्णय के साथ इसके विरोध में खड़ी हो गई। थौनओजम बृंदा मध्यमवर्गीय संघर्षों से तपी-तपाई वह युवा पीढी है जो अपने समाज के कमजोरियों को दूर कर एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण करने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है।

थौनओजम बृंदा पर क्या आरोप है ? नशा माफिया लेत्खोसेइ ज़ौ की गिरफ्तारी और नशीले वस्तुओं की बरामदगी के उपरांत बृंदा पर राजनैतिक और विभागीय शिकंजा कसना शुरू हो जाता है। वर्तमान में बृंदा न्यायालय की अवमानना के केस से जूझ रही है। वाकया यह है कि नारकोटिक ड्रग्स एण्ड साइकोट्रोफिक सब्स्टेंसेज एक्ट ( NDPS) के कोर्ट के द्वारा बृंदा के द्वारा गिरफ्तार नशा माफिया लेत्खोसेइ ज़ौ को जमानत दे दी जाती है। कथित कोर्ट के निर्णय की आलोचना बृंदा फेसबुक पर करती हैं और कोर्ट इसे अपनी अवमानना मानता है और उनकी आलोचना को आक्रामक । इसके उत्तर में बृंदा का कहना है कि उसका कोई भी बयान और लेखन न्यायालय के निर्णय की अवधि में नहीं दिया गया है, न ही उसका बयान न्यायालय के कार्य में हस्तक्षेप है बल्कि मेरा बयान एक स्वस्थ्य आलोचना है, उस निर्णयकर्ता के आचरण और चरित्र के लिए है, जिन्हें अपनी कुर्सी और अपनी गरिमा के लिए कोई सम्मान नहीं है।

थौनओजम बृंदा का हाईकोर्ट में दिया गया शपथपत्र बनाम खेल का खुलकर सामने आ जाना ! इंडियन एक्सप्रेस न्युज सर्विस से 14 जुलाई 2020 को प्रशांत मजूमदार की एक खबर छपती है – “ नशे के सौदागर को मुक्त करने हेतु मुख्यमंत्री का दबाव : हाईकोर्ट में मणिपुर के महिला पुलिस अधिकारी।“ थौनओजम बृंदा जो कि मणिपुर पुलिस की अवार्ड प्राप्त अधिकारी के द्वारा आरोप लगाया गया कि मुख्यमंत्री एन. वीरेन और महकमे के आला अधिकारियों के द्वारा नशे के सौदागर को मुक्त करने के लिए मुझ पर दबाव बनाया गया है।

अपने शपथपत्र में घटना को विस्तार से बताती हुई कहती है कि कैसे नशा माफिया लेत्खोसेइ ज़ौ को जो कि औटोनोमस डिस्ट्रिक काउंसिल,(ADC) चंदेल के चेयरमैन पद पर भी काबिज है, को मुक्त करने के लिए आला- अधिकारियों के द्वारा मुझ पर दवाव बनाया गया, साथ ही साथ उसके खिलाफ दायर चार्जशीट को वापस लेने का दबाव बनाया गया। संदिग्ध वस्तुओं की बरामदगी और गिरफ्तारी के तुरंत बाद बृंदा को एक व्हाट्स अप काल आता है जो कि मोइरंगथेम असनीकुमार जो कि मणिपुर बीजेपी क्व वाइस प्रसीडेंट भी है उन्होंने उस काल पर मुख्यमंत्री से बात कराई।

बृंदा कहतीं है कि मैंने मुख्यमंत्री को अवगत कराया कि हमलोग औटोनोमस डिस्ट्रिक काउंसिल,(ADC) चंदेल के क्वाटर को संदेह के आधार पर तालाशी लेने वाले हैं, हमें शक है इसके क्वाटर में ड्र्ग्स है। मुख्यमंत्री ने उत्साहित होकर कहा कि हाँ, जरूर आगे बढो और यदि उस औटोनोमस डिस्ट्रिक काउंसिल,(ADC) चंदेल के पास ड्र्ग्स मिलता है तो उसे गिरफ्तार करो। बृंदा बताती है की आपरेशन के दौरान लगातार बार बार नशा माफिया लेत्खोसेइ ज़ौ समझौते और मामले को आपस में सेटेल करने की बात करता रहा, लेकिन ब्रुंदा ने इससे इंकार करते अपना फर्ज निभाती रही। ड्र्ग्स की बरामदगी के बाद नशा माफिया मुझसे डाइरेक्टर जनरल आफ पुलिस (DGP) और मुख्यमंत्री से बात करने की इजाजत माँगता रहा लेकिन मैंने इसकी इजाजत नहीं दी।

इसके बाद असनीकुमार मेरे आवास पर गंभीर मुद्रा में आए और उन्होंने मुझे कहा कि गिरफ्तार नशे का माफिया ज़ौ मुख्यमंत्री की पत्नी ओलिश का कामकाजी दाहिना हाथ है, चंदेल में और ओलिश उसकी गिरफ्तारी को लेकर चिंतित है। ओलिश ने मुझे ( असनीकुमार) कहा है कि मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है कि ज़ौ के बदले उसकी पत्नी या बेटे को गिरफ्तार किया जाय। बृंदा ने कहा- यह कैसे संभव है ? ड्र्ग्स ज़ौ के पास से बरामद हुआ है न की पत्नी और बेटे के पास।

बृंदा ने असनीकुमार को कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकती, इसके बाद असनीकुमार मेरे आवास से चले गए। यह बृंदा के शपथपत्र मे दर्ज है। बृंदा कहती हैं कि असनीकुमार काफिले के साथ पुन: उससे मिलते है और मुख्यमंत्री का संदेश देते हैं कि मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी बृंदा के ज़ौ को रिहा करने से इंकार से काफी चिंतित हैं और पुन: आदेश देते हैं कि ज़ौ को रिहा कर दिया जाय। इसके उत्तर में बृंदा ने कहा कि – मैं ज़ौ को रिहा नहीं कर सकती, इसका निर्णय जाँच की प्रक्रिया और कोर्ट के द्वारा उसकी दंण्ड्यता तय की जाएगी… बरामदी के आपरेशन में एक सौ पचास लोगों की टीम के साथ स्वतंत्र चश्मदीदों की उपस्थिति को मैं क्या जबाव दूँगी ?

असनीकुमार वहाँ से चले गए और पुन: तीसरी बार आए और उन्होंने मुझसे कहा कि मुख्यमंत्री और ओलिश ने दृढ़्तापूर्वक कहा है कि किसी भी परिस्थिति में ज़ौ को रिहा करो…..। बृंदा ने इसका उत्तर देते हुए कहा कि – मुझे  इस नौकरी की आवश्यकता नहीं है, मैं इस नौकरी में मैं नई दिल्ली से इस अनुरोध और वादे के साथ आई हूँ कि मेरे द्वारा किए गए कार्यों को सहयोग दिया जाएगा। मैं इस नौकरी को किसी भी समय छोड़ सकती हूँ। इसलिए मुख्यमंत्री का चुटकी बजाते ही मेरे कैरियर को बर्बाद का यह प्रयास मेरी विश्वशनीयता को समाप्त कर देगा, जोकि मुख्यमंत्री अपनी पत्नी की राजनैतिक हित को साधने के लिए कर रहे हैं। मैं उस आदमी को नहीं रिहा कर सकती हूँ । यह बृंदा के शपथ पत्र में दर्ज है।

इसके बाद शुरू होता है विभागीय अधकारियों और असनीकुमार के द्वारा बृंदा पर दबाव डालने का सिलसिला कि किसी भी तरह कोर्ट से चार्जशीट हटाया जाय। जिसके लिए बृंदा साफ तौर पर इंकार करती है। बढ़ते क्रम में जब बृंदा अपने निर्णय पर डटी रहती है तो एक दिन माननीय मुख्यमंत्री का फोन आता है – क्या इसी दिन के लिए मैंने तुम्हें गैलेंट्री अवार्ड दिया था ?

नेक इरादॊं से भरे युवा जब अपने कर्मक्षेत्र में ईमानदारी के साथ उतरते है तो सत्ता और शक्ति-संतुलन उसके कैरियर से खेल जाने पर आमादा हो उठता है, तो फिर वह युवा लोकतंत्र और व्यवस्था के लिए नासूर हो उठता है। अब सवाल यह है कि इन नेक इरादों की रक्षा किस तरह से की जाए ? मणिपुर में मुख्यमंत्री ने इस मामले पर फेसबुक,गूगल सहित ग्यारह अन्य लोगों पर मानहानि (इज्जतदावी) का न्यायालय केस दर्ज कराया है। इस आलेख के लिखने के दौरान भी बृंदा अपने नातेदारों को अधिकारियों के द्वारा धमकाने की जानकारी अपने फेसबुक अकाउंट से दे रहीं है।

आखिरकार बृंदा का कसूर क्या है ? बस, इतना ही न कि वह अपना कर्तव्य निर्वहन ईमानदारी और सम्मान के साथ करना चाहती है, वह अस्वस्थ्य राजनैतिक और अफसरशाही के सामने मुखर होकर अपना पक्ष रखने की कोशिश कर रही है। आज के समय में अपनी बात  किसी भी संचार माध्यम के द्वारा कहना किस तरह से अवमाना और आक्रामक हो सकता है ? बल्कि सोशल मीडिया का उपयोग एक रक्षात्मक और अपनी बात सबके समक्ष रखकर आम नागरिक सहयोग की अपेक्षा लाजिम है खासकर तब जब आप पूरी सड़ी हुई व्य्वस्था की आँखों की किरकिरी बन चुके हों । अब यह आम नागरिक का कर्तव्य है कि वह थौनओजम बृंदा के साथ खड़ी हो और एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के मान-सम्मान की रक्षा के लिए तैयार हो।