विभाजन की पीड़ा, त्रासदी और साम्प्रदायिक उभार का महाख्यान है गरम हवा

सिनेमा

(महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्मों पर  टिप्पणी के क्रम में आज प्रस्तुत है मशहूर निर्देशक एम.एस. सथ्यू की गरम हवा । समकालीन जनमत केेे लिए मुकेश आनंद द्वारा लिखी जा रही सिनेमा श्रृंखला की ग्यारहवीं क़िस्त ।-सं)


विभाजन की त्रासदी बहुआयामी थी। इसका सर्वाधिक विकराल और पीड़ादायक रूप दोनों तरफ से हुए बड़े स्तर पर पलायन, हत्या और बलात्कार में दिखा। लेकिन यह बस एक पहलू था। विभाजन ने हिंदुस्तान के भूगोल को बाँटने के साथ ही यहाँ के दोनों प्रमुख समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास की जो गहरी रेखा खींची वह आज तक इस देश को तक़लीफ़ देती आ रही है। गरम हवा बहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह तीव्रतर होता गया है। इस लिहाज से देखें तो 1973 में बनी एम. एस. सथ्यू की मशहूर फिल्म गरम हवा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। जैसे गाँधी की हत्या लगातार होती चली आ रही है; वैसे ही हिन्दू और मुसलमान का विभाजन लगातार होता आ रहा है। सियासत का नफरती खेल जारी है और गरम हवा बहती ही जा रही है।
‘गरम हवा’ आगरा में रह रहे एक सम्भ्रांत मुसलमान परिवार की कहानी है। फ़िल्म इस करुण सच को सामने लाती है कि विभाजन ने देश ही नहीं, अनगिन परिवारों को भी बांटा और प्रेम में डूबे दिलों को भी जुदा किया। इस सच को फ़िल्म में कैफ़ी आज़मी के शेरों के जरिये भी बयान किया गया है। नैरेटर के रूप आवाज भी उन्हीं की है-
हर घर में चिता जलती थी लहराते थे शोले
हर शहर में शमशान वहाँ भी था, यहाँ भी।
गीता की कोई सुनता न क़ुरान की सुनता
हैरान-सा ईमान वहाँ भी था, यहाँ भी।
फ़िल्म की कहानी कैफ़ी आज़मी और शमा ज़ैदी ने लिखी है जो उर्दू की सुप्रसिद्ध कहानीकार इस्मत चुग़ताई की एक अप्रकाशित रचना पर आधारित है। कहानी के केंद्र में सलीम मिर्जा (बलराज साहनी) हैं जो जूता कारखाने के मालिक हैं। इनके बड़े भाई हलीम मिर्जा (दीनानाथ जुत्शी) प्रान्त में मुसलमानों के बड़े नेता हैं। हलीम मिर्ज़ा के बेटे काज़िम मिर्ज़ा से सलीम मिर्ज़ा की बेटी अमीना (गीता सिद्धार्थ) का गहरा इश्क है और दोनों की शादी तय है। सलीम मिर्जा के बड़े बेटे वक़ार मिर्ज़ा व्यापार में अपने पिता के साथ लगे हैं जबकि छोटे बेटे सिकंदर (फ़ारुख शेख) छात्र हैं। सलीम मिर्जा की वृद्ध माँ की भूमिका बदर बेग़म ने निभाई है।
हलीम मिर्ज़ा मुलसमानों को खुला आश्वासन देते हैं कि वे भारत छोड़ के नहीं जायेंगे। उनका मानना है कि उनके देश छोड़ने से यहाँ के मुसलमानों का हौसला टूट जायेगा। इसके बावजूद वो चुपके से पाकिस्तान चले जाते हैं। इससे पहले सलीम मिर्जा की बड़ी बहन देश छोड़कर जा चुकी हैं। फ़िल्म की शुरुआत ही तांगे वाले के उस सवाल से होती है जो फ़िल्म की पंच लाइन है:“आज किसे छोड़ आये मियां?” जवाब में सलीम मिर्ज़ा कहते हैं : “बड़ी बहन को। बहनोई साहब तो पहले ही कराची जा चुके थे। आज उनके बाल बच्चे भी चले गये।”
यहाँ से जाने का एक सिलसिला शुरू होता है जो थमने का नाम नहीं लेता। फ़िल्म उन कारकों की एक-एक कर पहचान करती है जो इस पलायन के मूल में है। बड़ी बहन के बाद हलीम मिर्जा अपना राजनीतिक भविष्य संवारने के लिए गए। साथ में अमीना का मंगेतर भी चला गया।मजबूर हो अमीना ने सलीम मिर्जा की दूसरी बहन के बेटे शमशाद से दिल लगाया लेकिन उसके अवसरवादी माँ-बाप भी चले गए। दो बार धोखा खा चुकी अमीना ने आत्महत्या कर ली।
सलीम मिर्ज़ा अपने देश में टिके रहने की जी जान से कोशिश करते हैं किंतु हालात बदतर होते जा रहे थे। व्यापार के लिए बैंक उन्हें अविश्वास के चलते कर्ज नहीं देता। बैंक मैनेजर से सलीम मिर्जा कहते हैं:-“जो भागे हैं, उनकी सजा उन्हें क्यों दी जाय जो न भागे हैं, न भागना चाहते हैं।”  बैंक से निराश हो वे रतन लाल के पास जाते हैं जहाँ से हमेशा उन्हें कर्जा मिलता रहा है। किंतु यहाँ भी निराश होते हैं। रतनलाल जमानत चाहता है जबकि हवेली बड़े भाई हलीम मिर्ज़ा के नाम है जो पाकिस्तान जा चुके हैं। रतनलाल ही हवेली की मिल्कियत की जानकारी सरकार को दे देता है लिहाज़ा हवेली पर कस्टोडियन का कब्ज़ा हो जाता है। इस तरह सरकार और समाज दोनों तरफ से भारतीय मुसलमानों पर संदेह बढ़ता जा रहा था। किराये के मकान को खोजते सलीम मिर्जा एक जगह कहते हैं:-“मकान मुझे चाहिए। मेरा नाम सलीम मिर्जा है, मैं मुसलमान हूँ। क्या अब भी देख सकता हूँ।”
शू एसोसिएशन के विरोध के चलते सलीम मिर्जा को जूते के ऑर्डर मिलने पे रोक लग गई। अब वक़ार मिर्ज़ा का भी धीरज जवाब दे गया। आख़िर सलीम मिर्ज़ा अपने बड़े बेटे को भी स्टेशन छोड़ आये। सलीम मिर्जा की मुसीबतें बढ़ती ही गईं। दंगों में कारखाना जला दिया गया। छोटे बेटे सिकंदर मिर्ज़ा को नौकरी नहीं मिल पा रही थी। एक इंटरव्यू में अफ़सर सिकंदर से कहता है-“यू आर वेस्टिंग योर टाइम इन दिस कंट्री. आप पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते?”
एक खत, जिसमें सलीम मिर्जा ने अपने बड़े भाई हलीम मिर्जा को हवेली का नक्शा पकिस्तान भेजा था, को आधार बना सलीम मिर्ज़ा को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूल में मिल गई, भले ही वे रिहा हो गए। एक किरदार इस बारे में कहता  है:“मेरे भी रिश्तेदार कराची में है। पर मैं भूलकर भी कभी ख़त नहीं लिखता।”
इस तरह परिवार, समाज, व्यापार और सरकार हर तरफ से वह दबाव बना जिससे टूटकर सलीम मिर्जा वतन छोड़ने का फैसला करते हैं। एक बड़े परिवार में देश में बचे रह गए सिर्फ तीन लोग तांगे पे बैठ घर से निकलते हैं। रास्ते में बेरोजगार युवाओं का जुलूस मिलता है। इंक़लाब और हल्लाबोल के नारे लग रहे थे। सिकंदर अपने दोस्तों के साथ आंदोलन में भागीदारी चाहता है। सलीम मिर्जा उसे इजाजत दे देते हैं। सिकंदर के जाने के बाद वे तांगे को अपनी पत्नी के साथ घर वापस कर खुद भी आंदोलन में शिरकत करते हैं। नैरेटर दो शेर और पढ़ता है:-
जो दूर से तूफान का करते हैं नजारा
उनके लिए तूफान वहाँ भी है यहाँ भी।
धारे में जो मिल जाओगे बन जाओगे धारा
यह वक़्त का ऐलान वहाँ भी है यहाँ भी।
फ़िल्म की खास बात यही है। भारतीय मुसलमानों की समस्याओं की पहचान ही नहीं करती, समस्याओं से निपटने का रास्ता भी बतलाती है। वह रास्ता है एकाकी जीवन का त्याग और हक़ के लिए क्रांतिकारी संघर्ष में सक्रिय भागीदारी। निहायत नेक इंसान सलीम मिर्जा के किरदार में अगर कोई कमी थी तो यही कि वे जन संघर्ष से हमेशा बचते रहे। शू एसोसिएशन की हड़ताल में भागीदारी नहीं की। सिकन्दर पर आंदोलनों से दूर रहने का दबाव डाला। आखिर में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने पलायन का गलत रास्ता त्याग संघर्ष का सही रास्ता अख्तियार किया।
फ़िल्म का संगीत शास्त्रीय संगीतकार उस्ताद बहादुर खान ने तैयार किया है। गीत कैफ़ी आज़मी ने लिखे हैं। ‘मौला सलीम चिश्ती,आका सलीम चिश्ती’ क़व्वाली अज़ीज़ अहमद खान वारसी ने गाई है जो बहुत प्रसिद्ध है। यह सुप्रसिद्ध अभिनेता फ़ारुख शेख की पहली फ़िल्म थी। बलराज साहनी की यह आखिरी फ़िल्म साबित हुई। उनके पुत्र परीक्षित साहनी के अनुसार फ़िल्म में उनकी बेटी अमीना की आत्महत्या नें वास्तविक जीवन में उनकी बेटी के दुर्भाग्य की याद दिला दी। चंद दिनों में उनका निधन हो गया। बलराज साहनी ने जिस संजीदगी से फ़िल्म में भारतीय मुसलमानों का दर्द पर्दे पर उतारा है उसकी मिसाल मिल पाना कठिन है।हिंदी रंगमंच और साहित्य के चर्चित नाम जितेंद्र रघुवंशी ने तांगेवाले का किरदार निभाया है। यह भूमिका बेशक छोटी है किंतु पूरी फिल्म और एक पूरी क़ौम के दर्द को बयां करने वाला संवाद-‘आज किसे छोड़ आये मियाँ?’ उनके ही हिस्से आया है।

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