कहानी जेरे बहस

‘नमक का दरोगा’ कहानी को कैसे पढ़ा जाये, यह प्रश्न यदा-कदा कौंध जाता है. पिछले दिनों कथाकार उमाशंकर चौधरी ने इस कहानी के अंत पर अपना संशय जाहिर किया था. अक्सर इस कहानी के आख़िरी हिस्से से लोगों को दुविधा होने लगती है. यह पाठ अक्सर सामने आ जाता है कि वंशीधर ने जिस आदमी को नमक की कालाबाजारी करते हुये गिरफ्तार किया, उसी अलोपीदीन की नौकरी स्वीकार कर लेना अनैतिक है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या यह प्रश्न नहीं उठता कि नमक की ही कालाबाजारी क्यों? आधुनिक हिन्दी सिनेमा की तरह किसी मामूली, ग़ैर-जरुरी चीज या किसी जहरीली वस्तु की तस्करी भी कहानी का विषय बन सकता था.

दूसरे, भारतीय जनमानस में वंशीधर का चरित्र आसानी से ‘कनेक्ट’ हो जाने जाने वाला चरित्र है. नौकरीपेशा होना हम भारतीयों का अब भी प्रथम उद्देश्य है. जैसी तैसी शिक्षा के बाद रोजगार के नाम पर नौकरियाँ ही उपलब्ध हैं. व्यापार पर कुछ ही वर्गों का सर्वाधिकार है. वह पुश्तैनी होता है और शायद यही उसका सबसे नकारात्मक पक्ष है. इसलिए वंशीधर के माध्यम से इस कहानी को पढने के क्रम में एक सुविधा हमें यह भी मिलती है कि व्यापार है तब गलत ही होगा. यह तोहमत वंशीधर को प्रिय चरित्र बना देती है. जिस तरह वंशीधर का सुख दुःख हमसे सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, अलोपीदीन का कारोबार यह मोहलत नहीं देता. व्यापार के प्रति हमारी नकारात्मकता इस हद तक है कि उसे करने वालों को हम तभी अच्छा मानते हैं जब वे हमारी जान पहचान में हों.

शुरु से शुरु करते हैं. इस कहानी में चार प्रमुख पात्र हैं. अलोपीदीन, मुंशी वंशीधर, बूढ़े मुंशीजी और नमक.

नमक का दरोगा कहानी की जैसी आलोचना दिख रही है, उसे पढ़ कर लगता है कि काश, प्रेमचंद ने भी वह शिल्प प्रयोग किया होता..यह उन दिनों की बात है…लेकिन प्रेमचंद ने कहानी की कालावधि दर्शाने के लिये एक बेहतरीन युक्ति का इस्तेमाल किया है. बहुत कम कहानियां प्रथम वाक्य के शुरुआती तीन चार शब्दों में खुद को स्थापित कर देती हैं: “जब नमक का नया विभाग बना…”

कहानी का सूत्र इसी अर्ध-वाक्य में है. समय को अतिक्रमित करने के क्रम में भी कोई रचना सबसे पहले अपने घटना-समय को उद्घाटित करती है. हममें से बहुत सारे लोग यह जानते होंगे कि नमक का नया विभाग भारत में क्यों बना? कब बना? और उसके परिणाम क्या हुये? उसे जाने बिना इस कहानी को ‘अप्रोच’ करना ही किसी ‘स्टीरियोटिपिकल’ नतीजे पर पहुंचाएगा. इसे जान लेने पर अलोपीदीन शायद उतना खराब चरित्र न लगे कि जिसकी नौकरी करना गुनाह हो. और न ही मुंशी वंशीधर धर्म(कर्तव्य)पारायण लगेंगे. इसे जान लेने के बाद पिता, बूढ़े मुंशी की चालाक नसीहतें भी शायद बुरी न लगें. तब शायद यह जानकर दुःख भी हो कि किन वजहों से अलोपीदीन और वंशीधर एक दूसरे के सामने खड़े हो गए.

एक कोशिश नमक के इस नए विभाग को समझने की करते हैं.

जिस नमक का व्यापार ‘बार्टर सिस्टम’ से हुआ करता था और फिर बाद में बेहद मामूली कीमतों पर लोगों को उपलब्ध हुआ करता था, वही नमक अंग्रेजों के लिये पारस पत्थर बन गया. 1757 में प्लासी और 1764 में बक्सर की लड़ाई के बाद 1765 में जब राबर्ट क्लाईव गवर्नर-जनरल बनकर लौटा तो आते ही उसने कसैली, तम्बाकू और नमक के व्यापार को ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन कर दिया. यह एक अतिरिक्त चरण तैयार करने जैसा था. मसलन नमक पैदा करने वालों को अब नमक कंपनी के हवाले करना था और व्यापारियों को कम्पनी से नमक लेकर व्यापार करना था.

यह एक नई व्यवस्था बन रही थी. उन व्यवस्थाओं में से एक, जो मानव-जीवन की कीमत पर बनी रहती है.

आप अगर नमक के कारोबार की मोनोपोली ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के पास होने का नुक्सान नहीं समझ पा रहे तो इसे यों समझे कि जब इंग्लैण्ड में बैठे अधिकारियों को इस हरकत का पता पड़ा तो उन्होंने क्लाईव की इस हरकत को ‘डिस्ग्रेसफुल’ और ‘बिलो दी डिग्निटी’ बताया. इसकी विस्तृत जानकारी के लिये देइतमार रडरमंड की ‘इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑव इंडिया’ देख सकते हैं लेकिन जो जरुरी है कि उस समय के विरोध ने कंपनी को मजबूर किया और 1768 में कंपनी ने मोनोपोली का यह नियम वापस ले लिया.

नमक कितना जरुरी है यह बताना भी हास्यास्पद हो जाएगा इसलिए यह जान लें कि वारेन हेस्टिंग्स ने नमक व्यापार के इस जिन्न को वापस बुलाया. 1772 और फिर 1780 में इन जनाब ने नमक को क्रमशः कंपनी और सरकार के कब्जे में ले लिया. और यह नियम थोड़े बहुत बदलावों के साथ 1947 तक चला. सरकार ने एजेंट आदि का नया सिस्टम खड़ा किया जिससे परतें बढ़ती गईं और कीमत भी. जिस नमक से 1780 में सरकार 80,000 रूपयों की आमदनी पा रही थी, वही नमक नए कानूनों की मदद से सरकार का करीबी और जनता से दूर होता गया. प्रति मन नमक की कीमत सरकार ने दो रूपये रखा और उस पर सवा रूपये प्रति मन का टैक्स ( कर ) लगाया. 62.5% का कर! कंपनी या सरकार की आमदनी 1784 में बासठ लाख रुपयों तक हो गई थी. महज चार वर्षो में अस्सी हजार से बढ़ कर बासठ लाख!

ईस्ट इंडिया कंपनी को नमक से मुनाफ़ा कितना अच्छा लग रहा था इसे इससे जानिये कि 1788 में सरकार ने प्रति मन नमक की कीमत, थोक में, चार रूपये किया और उस पर सवा तीन रूपये का कर लगाया. 83% का कर! नए नमक क़ानून का सहारा लेकर, कंपनी तिरासी प्रतिशत का कर वसूल रही थी.

और जैसे यह सब कम हो कि 1835 में उस महान सरकार ने नमक व्यवसाय पर लगे करों की समीक्षा के लिये आयोग का गठन किया ताकि भारत में उत्पन्न नमक पर करों को बढ़ाकर नमक इतना महंगा कर दिया जाये कि इंग्लैण्ड के ‘लिवरपूल’ और ‘चेसायर’ में पैदा हो रहे खराब गुणवत्ता वाले नमक को भारत में खपाया जा सके. और यही हुआ भी. 1851 में यह विदेश से आयातित नमक 82 लाख मेट्रिक टन तक पहुँच चुका था! एक टन में एक हजार किलो होते हैं.

यह तो रही भारतीय नमक उत्पादन से अंगरेजी सरकार के कमाने की बात. इसमें उड़ीसा पर 1804 में हुए कब्जे की बात नहीं बता रहा, वहाँ नमक बनाने वाले ‘मलंग’ लोगों पर जुल्म की बात नहीं कर रहा, बस नमक के क़ानून बना कर उससे मुनाफ़ा कमाने की बात कर रहा हूँ.

लेकिन एक बात बताना जरुरी है कि उस समय तस्करी का क्या आलम था? तस्करी क्यों हो रही थी, इस पर अलग अलग राय हो सकती है. लेकिन तस्करी रोकने के लिये सरकार क्या कर रही थी, अगर हम यह जान लें तो जान सकते हैं कि सरकार नमक क़ानून क्यों लेकर आई थी और ऐसा क्या दांव पर लगा था जिससे नमक क़ानून की रक्षा के नाम पर इतना कुछ हो रहा था?

‘स्ट्रासे एंड स्ट्रासे’ की 1882 में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ महानदी से सिन्धु नदी तक की तेइस सौ मील की दूरी के बीच नाके तैयार किये गए थे जिन पर बारह हजार के करीब सिपाही और अधिकारी तैनात किये गए थे. जगह जगह कांटेदार बाड़ तैयार की गई थी, कहीं कहीं तो पत्थर की दीवारें, खाईयां भी खोदी गई थी. आशय यह था कि नमक का एक धेला भी अंगरेजी हुकूमत को कर दिए बिना किसी जरुरतमंद की थाली में न चला जाये. ब्रितानी हुकूमत का वह पूरा कारोबार सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं बल्कि भारतीय जनता को नमक से दूर करने के लिये तथा व्यापारियों की कमर तोड़ने के लिये भी था.

दातागंज, जो आजकल बदायूं जिले में पड़ता है, के अलोपीदीन और यमुना पर लगे नाके को हमें इस कोण से देखना चाहिये.

हम इस कहानी के प्रथम वाक्य को समग्रता में देखते हैं: “जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे”. एक तरफ नमक इस तरह महंगा कर दिया गया था कि वह सरकार को अत्यधिक मुनाफ़ा दे और दूसरी तरफ अन्य तरीकों से लोगों की थाली तक नमक ले जाने का हर प्रयास कुचला जाये. इसकी खातिर नाके और बारह हजार सिपाहियों, अधिकारियों की फ़ौज खड़ी कर दी गई थी.

वंशीधर इनमें से ही एक है. वही मुन्शी वंशीधर जिनके परिचय में प्रेमचंद क्या खूब लिखते हैं,

‘मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके शीरीं और फ़रहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लड़ाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोज़गार की खोज में निकले.’ नैतिकता के जिस रूप से हमारा परिचय कहानी के अगले हिस्से में होने जा रहा है उसके बारे में, उसके उद्भव के बारे में, प्रेमचंद पहले ही बड़ी बारीकी से इशारा से करते हैं, ‘प्रेम की कथाएं और शृंगार रस के काव्य पढ़कर फ़ारसीदां लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे.’

अगर हम नमक का क़ानून बनाए जाने के पीछे की चालाकियां नहीं समझते तब हम हर-हमेशा अलोपीदीन के बरक्स वंशीधर को खड़ा करते रहेंगे लेकिन प्रेमचंद ऐसा नहीं करते. वह अलोपीदीन का पक्ष नहीं लेते. कहानी की शुरुआत में उसका भी परिचय दे दिया है कि
‘पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित ज़मींदार थे. लाखों रुपए का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बड़े कौन ऐसे थे जो उनके ऋणी न हों.’

यहाँ यह बताना जरुरी है कि बुद्धिजीविता भारत में नौकरीपेशा लोगों के हाथ में रही इसलिए, या जाने किसलिए, हम सबने औद्योगिक घराने, जगत सेठ-बड़े व्यापारी, मंझोले व्यापारी और खुदरा व्यापारी के बीच के अंतर को समझने, उनकी स्थितियों को अलग अलग समझने की जहमत नहीं उठाई. और शायद यही वजह है कि जब मार्ट्स, मेगामार्ट्स, ऑनलाइन डेलिवरी कम्पनियां छोटे और मंझोले स्तर के दुकानदारों को उखाड़ने पर आमादा हैं और उन दूकान मालिकों का रोजगार छीन कर उन्हें ‘सर्विस इंडस्ट्री’ में पहले से नौकरी खोज रहे लोगों की लम्बी कतारों में शामिल कर देने की तैयारी पूरी हो चुकी है तब भी सैद्धांतिक स्तर पर उनके पक्ष में कहने के लिये हमारे पास कुछ भी नहीं है. सिवाय कुछ राजनीतिक पार्टियों के, जो न जाने कब अपना पाला बदल दें.

बड़े मनीषियों ने इस विचारहीनता से टकराने की कोशिश की है. याद पड़ता है कि स्वदेशी आन्दोलन के वक्त, जैसे अभी चीन के सामान बहिष्कार करने की मांग चल रही है, जब विदेशी सामानों की होली जलाई जा रही थी तब भी सर्वाधिक नुक्सान में छोटे व्यापारी ही रहे थे क्योंकि विदेशी सामान उन दुकानों तक पहुँच चुके थे, वे उसकी कीमत दे चुके थे या बाद में दिया होगा. उनके पक्ष में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मुहिम चलाई थी.
दूसरी तरफ, हमें यह मान लेने में सहूलियत थी कि व्यवसायी सारे एक जैसे हुआ करते हैं. इस निष्कर्ष ने हमें दूसरी आसानी भी उपलब्ध कराई कि सारे सरकारी नौकर एक जैसे होते हैं और सरकार के गलत होने से उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता. दूसरी तरफ निजी संस्थानों में काम करने वाले, वह भले ही लिपिक क्यों न हो, चपरासी क्यों न हों, वह कोर्पोरेट चालाकियों का हिस्सा हो जाता है. यह सब सुविधाजनक तर्क हैं. यह एक क्षेपक के तौर वाली बात थी, इसे अलोपीदीन का डिफेन्स न माना जाये बल्कि छोटे, खुदरा व्यापारियों के व्यापक ‘इन्क्लूजन’ की बात हो, जैसे मध्यवर्ग या मंझोले किसानों की बात होती है.

कहानी में तनाव तब दिखता है जब अलोपीदीन नमक की गाड़ियों को छोड़ देने का आग्रह कर रहे हैं और वंशीधर रुखाई से मना करते हुए कहते हैं: ‘सरकारी हुक्म’.-इसके बाद जो अलोपीदीन कहते हैं वह अमूमन किसी भ्रष्ट आदमी का संवाद समझा जाता है, जो कि है भी, लेकिन यह कहानी हर वाक्य पर नैतिक और अनैतिक की हमारी अवधारणा पर चोट करती है. अलोपीदीन कहते हैं, ‘‘हम सरकारी हुक़्म को नहीं जानते और न सरकार को. हमारे सरकार तो आप ही हैं. हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं?’ इस वाक्य के बाद का हिस्सा सीधे सीधे रिश्वत की पेशकश पर आ जाता है और वह, संभव है, इसलिए भी हुआ हो क्योंकि ऐसी रिश्वतों की अति हो चुकी होगी. अलोपीदीन के इस संवाद को पढ़ते हुए एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि अलोपीदीन के पास और वंशीधर के पास यह सोचने-समझने की सहूलियत थी कि यह सरकार विदेशी है. जो नहीं समझ रहे थे वह इसलिए क्योंकि न समझने की उन्हें कीमत मिल रही थी. जगत सेठों से इन व्यपारियों की तुलना करना इसलिए भी गलत है. और दूसरे, यह अवधारणा कि सामान्य व्यापारियों को अगर मौक़ा मिले तो वे भी जगत सेठों की तरह इस देश से बर्ताव करेंगे, गलत है.

वह समय इस बात की पूरी गुंजाईश देता है कि जब अलोपीदीन कहते हैं, हमारा और आपका तो घर का मामला है, तब वे सिर्फ रिश्वत की पेशकश नहीं कर रहे बल्कि उसका आशय कुछ दूसरा भी होता है. और यह भी कि दांव पर नमक लगा था. अपने ही देश में नमक की तस्करी करनी पड़ रही थी. यह तस्करी क्रांतिकारी कदम नहीं था क्योंकि इससे वे लोग अपनी ही जेबें भर रहे थे. इस नमक तस्करी से हुई आमदनी शायद ही राष्ट्रवादी आन्दोलन में लगी हो, कम से कम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता. लेकिन एक तरफ सरकार जहां नमक को कैद कर चुकी हो और मनमाने दामों व्यापार कर रही हो, वहीं दूसरी तरफ अगर कोई चोरी छुपे जनता को, अपने मुनाफे के साथ भी, नमक उपलब्ध करा रहा हो तो उसे अपराधी बता देना, वह भी ब्रितानी हुकूमत के क़ानून के बतौर, ज्यादती होगी. आखिर लड़ाई भी तो उसी हुकूमत से आजादी लेने की थी और कम से कम आजादी के पहले तो बिरले लोग ही जानते थे कि बदलाव नहीं आयेगा, वरना बड़ी आबादी तो ईमानदारी और शिद्दत से इसी इन्तजार में लड़ रही थी कि आजाद भारत उनके अपने सपनों का भारत होगा.

इन तथ्यों से गुजरना इस कहानी को स्याह-सफेद में देखने की गुंजाईश नहीं देता. लेकिन एक तर्क है जो कहानी के बीच में पाठक वंशीधर के पक्ष में इस्तेमाल करते हैं और क्या आश्चर्य कि अंत आते आते वही तर्क लेखक के विरुद्ध इस्तेमाल करने लगते हैं. वह तर्क है, परिस्थितियों का शिकार होना या नियमों का बंधक होना. एक बार को मान लेते हैं कि की वंशीधर नियम क़ानून से बंधे थे लेकिन इससे भी कहानी के पाठ पर फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह समूचा दृश्य-विधान अलोपीदीन के लिये रचा गया है. जो लोग ब्रितानी उपस्थिति को अस्वीकार करते हैं और नमक का दरोगा को उस ब्रितानी हुकूमत के दुष्परिणामों की कहानी न मान कर नैतिक अनैतिक का कोरा पाठ मान लेते हैं, वह भूल जाते हैं कि तथाकथित अनैतिक के साथ जो समाज जैसा व्यवहार करता है वह आईना होता है. प्रेमचंद ने ऐसे लोगों की क्या खूब खबर ली है, देखें:
‘जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया. पानी को दूध के नाम से बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफ़र करने वाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज़ बनाने वाले सेठ और साहुकार यह सब के सब देवताओं की भांति गर्दनें चला रहे थे.’

इस पूरे खंड को पढ़ते हुए कहीं से नहीं लगता कि नमक क़ानून के जरिये हुई ब्रितानी ज्यादतियों से प्रेमचंद अनजान थे. नमक क़ानून बनाम नमक के उपभोक्ता के द्वन्द को लेखक भलीभांति समझ रहा है, वरना उन सबकी पहचान जारी नहीं करता जो अलोपीदीन की गिरफ्तारी पर कटाक्ष कर रहे हैं. और हुकूमत का कमाल देखिये कि कुछ ही समय के भीतर इस कहानी के दोनों पात्र अपमानित होते हैं. कचहरी से पहले अलोपीदीन गिरफ्तार होते हुए अपने ही शहर इलाके में अपमानित महसूस करते हैं और कचहरी समाप्त होने के बाद वंशीधर अपमानित होते हैं. हुकूमत बन्दर की तरह है जिसे किसी भी सूरत में रोटियाँ खा जानी है. हुकूमत चाहती तो अपने मातहत के लिये कुछ कर सकती थी, उसे मुअत्तल तो न ही होने देती लेकिन उसे नमक के ढेलों से मतलब था, उसे जब वंशीधर ने जब्त कर सौंप दिया तो जैसे वंशीधर हुकूमत के लिए अनुपयोगी हो गए!

इस कहानी के अंत पर बहुत सारा शोर मचा है. उस अंत को दो तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. हरोन अप्पेलफील्ड ( Aharon Appelfeld ) का एक उपन्यास है: बादेनहेम 1939. जब पोलैंड के एक शहर को नात्सी सैनिक घेरने लगते हैं तो सभी उस शहर के निवासी एक दूसरे पर आरोप लगाना शुरु करते हैं कि उन्हीं की वजह से सेना शहर में आ रही है. वे भोले भाले लोग नहीं जानते कि किसी न किसी बहाने नात्सियों को उन पर कब्जा करना ही था. ‘नमक का दरोगा’ पर बात करते हुए अक्सर हम इसी अंदाज में बात करते हैं कि जिस अलोपीदीन को कालाबाजारी के कारण गिरफ्तार किया, बाद में उसी की नौकरी कर ली. या यह कि एक भ्रष्ट सेठ के यहाँ वंशीधर ने नौकरी कर ली.

इधर एक पाठ यह भी उभरा है कि जो निजी कंपनियों या कोर्पोरेट्स में काम करते हैं, उनकी नियति वंशीधर वाली है. ऐसा कहने वाले नहीं जानते कि किसी भी सूरत में सरकारें सर्वाधिक अपराध करती हैं तो क्या हर सरकारी कर्मचारी को छ्त्तीसगढ़ में मची लूट का जिम्मेदार मान लिया जाये या नोटबंदी का जिम्मेदार मान लिया जाये?

यह अनुचित होगा. ठीक उसी तरह जैसे वंशीधर को इसलिए गलत मान लेना कि उसने अलोपीदीन की मैनेजरी स्वीकार कर ली. संस्थाएं और सरकार जितनी बड़ी होती जायेंगी हम बतौर मनुष्य उनके लिये उतने ही छोटे आंकडें होते जायेंगे लेकिन अपने लिये, अपने परिवार के लिये हम जीते जागते मनुष्य हैं. वंशीधर को भी अपना जीवन, अपना परिवार प्यारा होगा. जब सरकार ने, जिसके लिये उसने इतना बड़ा संकट मोल लिया और बदले में मुअत्तली मिली, उसकी फ़िक्र न की तब वंशीधर के पास रास्ते सीमित हो जाते हैं.

और अलोपीदीन?

आज की तारीख में भी यह सोचना मुश्किल है कि जो आपको अपमानित करवाए, आपको हथकड़ी डलवा दे, आपको सच्चे कटघरे में खड़ा करवा दे, आप उसमें गुणों की खान खोज लें. मनुष्यता को इसी रस्ते आगे बढना था लेकिन अफसोस इसके उदाहरण कम मिलते हैं. लेकिन अलोपीदीन का डिफेन्स कमजोर करते हुए हम यह कह सकते हैं, वह एक व्यापारी है और लाभ हानि में गले तक डूबा है इसलिए अपमान भूलकर एक ईमानदार आदमी के पास उसे खरीदने आया है.

और वंशीधर को अलोपीदीन की नौकरी स्वीकार कराते हुए लेखक ने यह दर्शाया है कि भारतीय समाज जो सामाजिक धरातल पर जातिवाद जैसे न जाने कितने भ्रष्टाचारों से घिरा है, उसमें कालाबाजारी को इकलौता भ्रष्टाचार मानना कितना सतही है. यह अन्ना आन्दोलन के समय भी स्पष्ट हुआ कि रिश्वतखोरी को दुनिया का सबसे बड़ा अपराध बताती जनता किस कदर चालाक या मासूम थी और उसके सहारे सत्ता में आई पार्टी, जो खुद गले तक करोपोरेट खुशामदी में डूबी थी, ने ऐसा तूमार बांधा कि अब लोग त्राहिमाम कर रहे हैं.

प्रत्यक्षतः यह कहानी रिश्वत और कालाबाजारी, नैतिक बनाम अनैतिक के आदिम द्वन्द्व की कहानी दिखती है लेकिन वास्तव में नमक जैसी अनिवार्य सामग्री पर किसी बड़ी हुकूमत का कब्जा हो जाने पर समाज के भीतर किस किस तरह की मुश्किलें उत्पन्न हो सकती हैं, वे मुश्किलें मनुष्य के व्यवहार जगत को किस कदर प्रभावित कर सकती हैं, इसकी भी कहानी है.

अंततः यह गुलाम भारत में नमक की कहानी है.

**