समकालीन जनमत
देसवा

गाँव की औरतों का कुबूलनामा-एक

कीर्ति 
(कीर्ति इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। गाँव की औरतों के जीवन को लेकर उन्होंने एक आलेख-श्रृंखला प्रारम्भ की है। इसमें वे अपना अनुभव समझने और उसे साझा करने की कोशिश कर रही हैं)

पढ़िए गीता

बनिए सीता

इन सब में लगा पलीता

किसी मूर्ख की हो परिणीता

निज घर बार बसाइए।

होय कटीली

आँखें गीली

लकड़ी सीली तबियत ढीली

घर की सबसे बड़ी पतीली

भर कर भात पसाइए।

रघुवीर सहाय की यथार्थ को उघाड़ती हुई यह कविता 1952 ई. में लिखी गयी, और आज इसको 68 साल होने को आए हैं, लेकिन अगर स्त्री की तत्कालीन स्थिति से आज की स्थिति की तुलना की जाए तो पता चलता है स्त्री विमर्शकारों की तमाम कोशिशों के बावजूद उस स्थिति में कितना परिवर्तन आया है। क्या देश की आधी आबादी आज 21वीं सदी में भी कह सकती है कि, “तू अपने घर का पर्दा करले मैं अबला बौराणी”?
महिला विमर्शकारों में आज बहुत खुलापन आ गया है, लेकिन इस वर्ग की संख्या कितनी है, क्या आम महिलाएं भी सशक्त रूप से अपनी अभिव्यक्ति कर पा रही हैं। हमारा सामाजिक ढाँचा आज भी महिलाओं को इतना अवकाश नहीं देता कि वह उन्मुक्त रूप से अपने फैसले खुद ले सकें। हालाँकि, आज महिलाएं आर्थिक रूप से कुछ सशक्त अवश्य हो गयी हैं, जिससे उनके सामाजिक स्थिति में भी सुधार आया है, लेकिन अगर बहुसंख्यक आबादी की बात की जाए; तो वर्ल्ड बैंक के अनुसार हमारे देश में 66% आबादी ग्रामीण है और गाँवों में शिक्षा का प्रकाश अभी भी हमारे देश की सरकारें नहीं पहुंचा पायी हैं। जिससे, वहाँ अभी भी पितृसत्ता अपनी जड़ें जमाये हुए है। सरकारें महिला साक्षरता के आंकड़े तो बहुत गर्व से जारी करती हैं, लेकिन पास से देखा जाए तो गाँवो में इन आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही नजर आती है। मैंने खुद देखा है, कि कैसे गाँवो की किशोरियाँ दस साल की उम्र से घर में चूल्हा फूँकने की ट्रेनिगं कर रही होती हैं और उनका नाम पास के प्राइमरी स्कूल में रजिस्टर पर साल दर साल आगे बढ़ता जाता है। और एक दिन, वे 18 साल की युवती के रूप में शादी के लिए योग्यता अर्जित कर लेती हैं और इस तरह बिना एक भी दिन स्कूल गए सरकार को शिक्षित महिला मिल जाती है और समाज को एक सुसंस्कृत स्त्री। हमारा समाज ही यही चाहता है, तो सरकार को तो अपने वोट से मतलब है।

गांवों में सामाजिक ढाँचा ऐसा है, जिसमें पुरुष ही घर का मुखिया होता है, और अगर किसी का पति नही है, तो उसके बेटे के नाम से उसे पुकारा जाता है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था हमें सबसे ज्यादा तथाकथित उच्च जातियों में दिखाई देती है, जबकि इनमें महिलाएं अधिक शिक्षित भी हैं। ऐसा अन्तर्विरोध क्यों है और इसका कारण क्या है, इसको भी समझने की आवश्यकता है!
हम देखते हैं, कि दलित और किसान परिवारों की महिलाएँ पुरुषों के साथ बराबरी में काम करती हैं जिससे उनकी पुरुष पर आर्थिक निर्भरता नहीं होती जिससे इनके यहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं होती और सदियों से यह वर्ग सामंतो के शोषण का शिकार रहा जिससे इस वर्ग में सामंती सोच का भी अभाव है अतः इस वर्ग में स्त्रियां अपेक्षाकृत कम शोषित हैं। इसके विपरीत तथाकथित उच्च जाति, कुल की महिलाएं, जिन्हें आर्थिक स्वतंत्रता कभी नहीं मिली, जिससे इनका शोषण भी अधिक हुआ। इन्हें शिक्षित तो किया गया लेकिन इनकी स्वतंत्रता को कम करने के लिए इन पर धर्म और संस्कार की बेड़ियाँ डाली गयी। इस वर्ग में पति ही एकमात्र अर्थ का स्रोत होता है इसलिए महिला का जीवन उसके बिना दूभर होता है अतः पति परमेश्वर माना जाता है। इस तरह पति के परमेश्वर होते ही उसे सारे के सारे अधिकार अपने आप मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस वर्ग की महिलाओं को बहुत पर्दे में रखा जाता है। गाँवों में अभी भी इनमें पर्दा प्रथा है। जबकि, समाज में निम्नवर्ग कहे जाने वाले दलित परिवारों में ऐसा नहीं है। जहाँ मीराबाई ने सामंती शासन में कह दिया था, “तू अपने घर का पर्दा करले”, वहाँ आज भी ये महिलाएं पर्दे में हैं! यह तो हमारे समाज की विडंबना ही है, कि सामंती सोच अभी भी हमारे समाज में अपनी कितनी गहरी जड़े जमाये हुए है।तथाकथित उच्चजाति की महिलाओं के कदम घर के चौखट को तभी लांघते है, जब उनके घर के पुरुषों की इच्छा हो और वो भी घूंघट के बिना नहीं, इस तरह से लोकलज्जा का झूठा आवरण तैयार करके इन्हें परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा जाता है। सुरक्षा के नाम पर भी ये महिलाएं बस ठगी ही जाती हैं, क्योंकि मैंने देखा है, कि घर की जिन चारदीवारी में इन्हें कैद कर दिया गया है, उसी में इनके रिश्तेदारों द्वारा ही सबसे ज्यादा शारीरिक शोषण भी किया जाता है और अंत में लोक-लज्जा के नाम पर वहां भी उनका मुँह बंद कर दिया जाता है। अगर ये बातें वे उस समाज को बताती भी हैं, तो उसका ही सामाजिक बहिष्कार हो जाता है और इनके शोषण का सिलसिला इसी तरह से चलता रहता है। गाँव के अपने अनुभव के आधार पर मैंने ये बातें कही हैं तथा इनकी स्थिति को और गहराई से जानने के लिए मैंने गाँव की महिलाओं से बात की। जिसके आधार पर हम उनकी वर्तमान स्थिति को समझ सकते हैं। चूँकि मैंने जिस गाँव का अध्ययन किया, वह थोड़ा बड़ा है। इस गाँव के ग्राम पंचायत के तहत कई छोटे छोटे पुरवे(गाँव) आते हैं। इसलिए यह अध्ययन एक साथ कई गाँवों का है।

उच्च जातियों की मानसिकता आज भी काफी हद तक मनु के सिद्धांतों पर ही संचालित हो रही है। सबसे पहले मैंने एक बुजुर्ग ब्राह्मण महिला से बात की। जो, कि सम्पन्न परिवार की हैं, ताकि इनकी स्वतन्त्रता से बाद की दो पीढ़ियों की तुलना कर सकें। बुजुर्ग महिला से बातचीत के अंश इस प्रकार हैं-

“आपने किस दर्जे तक पढ़ा है?”

“तुम्हारे दादा जी अध्यापक थे, तो उन्होंने पढ़ना सिखा दिया लेकिन लिखना नहीं जानती क्योंकि हमारे समय में महिलाएं स्कूल नहीं जाती थीं”

“आपकी शादी किस उम्र में हुई थी?”

“शादी तो पाँच साल की उम्र में हुई गवना दस साल की उम्र में”

“मतलब माहवारी के पहले ही? तो बच्चे किस उम्र में हुए?”

“तब सभी लड़कियों की ऐसे ही होती थी…15 साल की उम्र में पहला बच्चा हुआ जो अब नहीं है…मेरे दो नवजात बच्चे मर गए, कई औरतें तो बच्चे को जन्म देने के बाद मर जाती थीं।”

“जब आपकी शादी हुई तो क्या आप शादी का मतलब जानती थीं?”

“गुड़ियों से खेलते हुए उसकी शादी करते थे, तो उसे चमकीले कपड़े और गहने पहनाते थे। माँ ने भी कहा, तुम्हारी शादी हो रही है, तो खुश हुए कि हमें भी उसी तरह के कपड़े और गहने पहनने को मिलेंगे; लेकिन जब विदाई होने लगी तो जबरदस्ती विदा किया गया।”

“आपके ससुराल वालों का व्यवहार कैसा था?”

“यहाँ आने के बाद मुझे घर के अंदर रहना, घूँघट करना, धीरे बोलना आदि सिखाया जाने लगा। अगर किसी तरह से उनकी बात न मानती तो मेरी सास बहुत कड़ी सजा देती। जैसे किसी कोठरी में बंद करके मिर्च का धुआं सुलगा देना, मारना-पीटना आदि।

“दादा जी कुछ नहीं बोलते थे अपने घर वालों को?”

“मर्द ,औरतों के मामलों में नहीं बोल सकते थे। वे डरते रहते और अपने घर वालों के कहने पर ही चलते थे। साथ ही, हम दोनों में बात करने के अवसर भी नहीं आते थे, क्योंकि वो हमेशा मर्दों के बीच में रहते। इसीलिए जब मेरे पास आते भी तो मैं डरती रहती उनसे। सास -ससुर के मरने के बाद हम लोग आपस में सुख-दुःख बाँटने लगे।

मैंने पाया कि लगभग सभी बुजुर्ग महिलाएं पढ़ना-लिखना नहीं जानती हैं। इनका शोषण भी खूब हुआ है और कहीं न कहीं, इसी की प्रतिक्रिया में अगली पीढ़ी के लिए भी इनका शोषण होगा।हालाँकि महिलाएं ही महिलाओं का शोषण करती नजर आती हैं, लेकिन वो भी पितृसत्ता से ही संचालित हैं, इसलिए इसमें उनका दोष नहीं है।

इसके बाद मैंने 40-42 साल की उम्र की सवर्ण महिलाओं से बात किया, वे सब मेरी माँ के उम्र की हैं, तो मैंने पाया कि इनके विवाह की आयु अधिकतम 18 साल की उम्र है। इनकी शिक्षा भी अधिकतम इंटरमीडिएट तक हुई है। आधी महिलाएं अशिक्षित भी हैं। इनके शोषण का स्तर भी अलग अलग है। जो महिलाएं संयुक्त परिवार की हैं या जिनके सास-ससुर अभी हैं, वे घर की चौखट से बाहर कदम नहीं रखती हैं और आस-पड़ोस के समारोह में भी जल्दी शामिल नहीं होतीं। इनका खाना घर पर ही आ जाता है और अगर घर के ही किसी समारोह में शामिल होती हैं, जैसे जयमाल आदि में फोटो खिंचवाते समय भी घूँघट नहीं उठाती। हालाँकि, गरीब परिवार की महिलाओं के यहाँ इतनी बंदिश नहीं है। बल्कि, जो परिवार जितना प्रतिष्ठित है, उनके यहाँ बंदिशे उतनी अधिक हैं। वे किसी पुरुष से बात नहीं कर सकतीं। अगर बात भी करती हैं, तो जो उनसे पद में छोटे हों। इसके साथ ही घर के बाहर पति या घर के पुरुष के साथ ही जा सकती हैं। जबकि आर्थिक रूप से कमजोर घर की महिलाएँ खुद घर चलाती हैं और वे कहीं बाजार आदि भी अकेले जाती हैं, लेकिन उन्हें समाज उपेक्षा की निगाह से देखता है।

तथाकथित उच्चकुल की महिलाओं को अपने और अपने बच्चों के भविष्य के फैसले लेने का भी स्वतंत्र अधिकार नहीं मिला है। यहाँ तक कि बच्चों की संख्या कितनी हो, इसका भी अधिकार इनको नहीं मिला है। इसका फैसला या तो पुरुष करते हैं या उनकी सास। जो, कि खुद पितृसत्तात्मक मानसिकता से संचालित होती हैं। इसी वजह से कई बार लड़का न पैदा होने पर उसकी चाह में इन्हें अधिक बच्चे पैदा करने पड़ते हैं। जिसका इनके स्वास्थ्य तथा बच्चे के भविष्य पर गहरा असर होता है। और, अगर इनको लड़का नहीं होता, तो इन्हें मानसिक रूप से भी प्रताड़ित किया जाता है। मैंने खुद एक ऐसी महिला के जीवन को देखा है, जिनकी उम्र इस समय 50 साल की होगी। वे बाल-विवाह की प्रथा का भी शिकार रही और लड़के की चाह में उन्हें उनकी सास ने 8 बच्चे पैदा करने के लिए बाध्य किया। उनके दो नवजात बच्चे मर भी गए। लेकिन, अंततः घर में लड़के का जन्म हो गया और प्रताड़ना से उन्हें मुक्ति मिली। लेकिन, ये मुक्ति उन्हें जीवन की बाजी लगाकर मिली। क्योंकि, जब डॉक्टर ने जान का खतरा बताया, तब भी परिवार वालों ने बच्चे को बचाने की कवायद की। अंततः दोनों बच गए। इस तरह इसे लिखने के क्रम में इस छोटी सी उम्र में गाँव की पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिला शोषण की इस गवाह से भी मैंने उनके अतीत के साक्ष्य प्राप्त किए।

धर्म भी इन महिलाओं की स्वतंत्रता को कम करता हुआ तथा इनके शोषण की साजिश करता नजर आता है। इनके व्रत या तो पति के लिए होते हैं या तो पुत्र की दीर्घायु के लिए! अपने लिए या बेटी के लिए कोई व्रत इनके धर्मग्रंथों में नहीं बताया गया है। ये व्रत भी बहुत आडम्बरों पर आधारित होते हैं, जैसे वटसावित्री का व्रत, जो कि ज्येष्ठ(मई-जून) के महीने में ये रखतीं हैं। उसमें इन्हें तपती धरती पर दोपहर 12 बजे नंगे पाँव बरगद के पेड़ की परिक्रमा करनी होती है। इसी तरह इनका एक व्रत सोमवारी अमावस्या है , जिसमें इन्हें ठिठुरती ठंडी में नंगे पाँव वृक्ष की परिक्रमा करनी होती है। इसी तरह तीज, करवाचौथ आदि में निर्जल व्रत रहती हैं, जो इनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है। धर्म के साथ-साथ अंधविश्वासों ने भी इन्हें जकड़ रखा है। जैसे माहवारी के दिनों में इन्हें अपवित्र माना जाता है और उस दौरान ये मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकती हैं। यहाँ तक, कि इनका छुआ खाना भी उस दौरान अपने आपको पंडित कहने वाले लोग नहीं खाते हैं। उसी गर्भ से जन्मे और उसी रक्त-मांस से बने पंडित इन्हें अपवित्र कहते हैं।

इस तथाकथित सुसंस्कृत पारिवारिक ढाँचे के बीच इन्हें उपभोग की वस्तु के रूप में ही देखा जाता है। इसी के तहत इनके लिए कुछ ऐसे पद भी सृजित किये गए हैं, जिनमें इनका वाचिक उपभोग हमारा पितृसत्तात्मक समाज करता रहता है और ये समझ नहीं पाती हैं! जैसे देवर-भाभी , जीजा-साली आदि के रिश्ते में भद्दे मजाक की छूट इस समाज में इनके शोषण का ही एक दूसरा रूप है।

अब अगर बात की जाए, उस पीढ़ी की जो वर्तमान समय में युवा है, तो उसमें परिवर्तन तो आए हैं, लेकिन अभी भी गाँव महिलाओं की स्वतंत्रता के मामले में पिछड़ा ही नजर आता है। ये बदलाव उन्हीं लड़कियों तक सीमित है, जिनके माता-पिता शिक्षित और बहुत जागरूक हैं। इनकी संख्या बहुत कम है। इसलिए वे माँ-बाप जो अपनी लड़कियों को पढ़ाते हैं, उन्हें भी समाज में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। बहुत सी लड़कियों को बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। जो स्कूल जाती भी हैं, उन्हें घर में लड़की होने की वजह से पढ़ाई का समय नहीं मिलता। बल्कि, उन्हें लड़कियों के लिए समाज द्वारा पूर्वनिर्धारित कार्यों में लगाकर उनकी प्रतिभा को दबाया जाता है। स्कूल तथा कॉलेजों में भी इनके साथ भेदभाव होता है। जैसे, लड़के लड़कियों को अलग बैठाया जाता है। लड़के लड़कियां आपस में बात नहीं कर सकती और अगर करती हैं, तो पितृसत्तात्मक समाज उन्हें घृणा के भाव से देखता है।इस तरह, यहाँ जब लड़के लड़कियों से बात तक नहीं कर सकते, तो इनके बीच दोस्ती और प्रेम तो सजा के काबिल गुनाह ही माना जा सकता है! कोई लड़की अगर किसी लड़के से दोस्ती भी करती है, तो उसे प्रेम का नाम दिया जाता है और प्रेम करना यहाँ चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट पकड़ा देता है। इस तरह की लड़कियों को समाज बुरी निगाह से देखता है। शायद इसी डर से कई लड़कियों की शादी बालिग होने के पहले ही कर दी जाती है। ताकि, जब उनमें हार्मोनल परिवर्तन आये, तब तक वे यौनगत रिश्ते में बंध चुकी हों। सेक्स एजुकेशन देना भी इनके लिए पाप ही समझा जाता है, जिससे जागरूकता के अभाव में इनका भविष्य गर्त में चला जाता है। यहाँ भी हम देखते हैं गरीब सवर्णों की लड़कियां शिक्षा का अवसर बहुत कम पाती है, जबकि सम्पन्न घर की लड़कियां अधिक । चार-पाँच गरीब सवर्णों के घर को मैंने करीब से देखा है। उनके यहाँ लड़कियों का विवाह 16-18 साल की उम्र में हो गया है। इस वजह से शिक्षा का अवसर उन्हें बहुत कम मिला है।हालांकि, इनके यहाँ लड़कों को पढ़ाया गया और लड़कियों को बचपन से ही रसोईघर तक सीमित कर दिया गया।इसका एक बहुत बड़ा कारण सवर्णो में दहेज का अत्यधिक प्रचलन है। जिसके कारण बेटी के जन्म से ही माता-पिता के माथे पर चिंता की लकीर खिंच जाती है और बेटियां उन्हें भार नजर आती हैं। सम्पन्न घरों में तो दहेज की मात्रा और भी अधिक है। लगभग 10-20 लाख के आस-पास।

सामंती प्रवृत्ति इन्हें यहीं नहीं छोड़ती है, बल्कि यहाँ लड़कियों को आज भी अपनी मर्जी से कपड़े भी पहनने की आजादी नहीं है। पारम्परिक कपड़ों से इतर थोड़ा आधुनिक कपड़े पहनने में इन्हें चरित्रहीन तक घोषित कर दिया जाता है। वैसे भी स्त्रियों को दबाने का सबसे आसान यंत्र हमारे समाज ने उसके चरित्र पर उंगली उठाना ही बना लिया है।यहाँ तक, कि अगर इन लड़कियों के साथ छेड़खानी या किसी प्रकार का शारीरिक शोषण होता है, तो इन्हें ही दोषी ठहराया जाता है और इस तरह इन्हें घर मे कैद करने की कोशिश की जाती है। वहाँ भी इनके करीबी रिश्तेदार ही इनका शारीरिक शोषण करते हैं। समाज में अपनी झूठी इज्जत बरकरार रखने के लिए ऐसे मामलों में इन्ही का मुंह बंद किया जाता है। इसके अतिरिक्त धर्म द्वारा भी इनके शोषण का प्रयास किया जाता है जैसे इन्हें भी शादी से पूर्व भाई के लिए व्रत करने की शिक्षा दी जाती है और साथ ही साथ अच्छे पति की कामना में भी इन्हें पहले से ही कठिन व्रत रखने पड़ते हैं।जिस समय देश की अन्य लड़कियां अपने स्वर्णिम कैरियर का निर्माण कर रही होती हैं, उस समय ये अपने भाई और होने वाले पति की दीर्घायु की कामना में अपने शरीर और समय को नष्ट कर रही होती हैं।

इनकी इस स्थिति को देखती हूँ, तो मुझे सिमोन द बोउवा का कथन याद आता है, कि-
“लड़कियाँ पैदा नहीं होती, बना दी जाती हैं।”
गाँव की इन लड़कियों, औरतों का जीवन आज भी वही है, जिसे महादेवी वर्मा ने अपनी काव्य-पंक्तियों में 1935ई. में व्यक्त किया था-
“मैं नीर भरी दुःख की बदली
परिचय इतना इतिहास यही”
क्या आज भी हम महिलाएँ आजादी के मामले में वहीं हैं?

(फीचर्ड इमेज गूगल से साभार, पेण्टिंग-अजय परिपल्ली)

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