समकालीन जनमत
देसवा

गाँव की औरतों का कुबूलनामा- तीन

कीर्ति

 

कत्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद है

इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद।”

ये वही हुसैन हैं, जिनके लिए उनकी माँ फातिमा ने शहादत दे दी थी। इस्लाम को ज़िंदा रखने में इनका अमर योगदान रहा, तो इस्लाम कैसे महिलाओं के साथ भेदभाव कर सकता है!

असल में, इस्लाम के नियमों की दुहाई देने वाला पितृसत्तात्मक समाज, महिलाओं को परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े रखने के लिए, उन पर खुद के बनाये नियम- कानून; धर्म की आड़ में थोपता है। और, जहाँ महिलाएं जागरूक नहीं हैं, वहाँ तो इनके लिए सोने पर सुहागा ही है।

स्कूल के दिनों से ही मेरे मन में ये प्रश्न उठते रहते थे, कि हमारी पूरी क्लास में केवल एक ही मुस्लिम लड़की क्यों है? यहाँ तक कि इंटरमीडिएट तक आते-आते वो भी नहीं बची, क्योंकि उसका निकाह हो गया।

मेरे स्कूल की सभी कक्षाओं में किसी-किसी में एक मुस्लिम लड़की थी, किसी में एक भी नहीं और अध्यापक और अध्यापिकाएं तो एक भी नहीं।

मुस्लिम महिलाओं के पर्दानशीं होने का प्रमाण ही है, कि उनके घर-गाँव की सबसे तंग गली में और सबसे भीतरी हिस्से में होना है। गाँव में इनकी दुकान, जिसमें पुरुष काम करते हैं, वह तो मेन रोड पर हैं; लेकिन एक भी घर रोड के आस-पास नहीं है।

इस मुहल्ले में अभी भी महिलाएं कुओं में पानी भरती देखी जा सकती हैं, क्योंकि हैंडपंप इस मुहल्ले में नहीं हैं।

इस मुहल्ले में पहुंचते ही एक तरफ बड़ा सा मजार दिखेगा, जो इनके संकरे हुए चार घरों के बराबर है। और,  मस्जिद भी इतना बड़ा है, कि मधुमक्खी के छत्ते की तरह गुंथे हुए इनके कई घर इसमें समा सकते हैं।

इस मुहल्ले में पहुंचते हुए मैंने देखा मजार और मस्जिद के आस-पास कई बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन बच्चियां नहीं।

पुरुष गुटबंदी करके ठहाके लगा रहे हैं।  महिलाएं एक भी नहीं हैं, इसलिए मैंने उनके घर की ओर रुख किया।

घरों के बरामदे में ही महिलाएँ दिखने लगीं। मैंने ठिठोली करते हुए एक महिला से पूछा- क्यूँ चच्ची ईद का चाँद कहाँ से दिख गया आज?

उन्होंने कहा- बिटिया चच्चा लोग घर में नाही अहैं तो सोचे तनी के हवा में बइठ लेई।

बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने उनसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि वे अपने जेठ, ससुर के सामने नहीं निकलती। मैंने उनसे बातचीत की, जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं-

“आपके घर में कोई पुरुष मेहमान आता है, तब आप निकलती हैं?”

“नाहीं, चच्चा ना रहेंन तौ दरवाजा के ओट से बतावै के पड़ाथा कि नाही अहैं।”

“चच्ची आपकी मर्जी से ही हुई होगी शादी, क्योंकि बिना आपके क़ुबूल किये तो होगी नहीं?”

“अम्मी-अब्बू जैसे रिश्ता पक्का कइ दिहेन तो कइ दिहेन, अपने मर्जी से नाही करित हम लोग। निकाह के बखत जे ना क़ुबूल करी ओसे निकाह के करी फिर?”

“आपकी शादी तो आपके रिश्तेदारी में ही हुई है, तो बात तो करती रही होंगी शादी के पहले?”

“देखे रहे लेकिन बात नहीं करे रहे और रिश्ता पक्का होय के बाद सास ,ननद तौ बात करत रहिन मुला तोहरे चच्चा से तौ निकाह होय बादै बतियाय दीन गा।”

“किसी काम से बाजार जाती हैं आप?”

“हम सब नाही जाइत , चिकवा हरेन के औरतन रोजै बाज़ार पहुँची रहाथिन।”

“चच्ची यहाँ बगल में एक दादी रहती थीं,  वो नहीं दिखाई दे रहीं?”

“ओनका तो भूखन मार डालेन बेटवन उनके। एक साल पहिले। शौहर के इंतकाल के बाद अपने माइके चली गय रहिन, जायदाद के ख़ातिर ओनका जबरन लायेन अउर अँगूठा लगवाय लिहेन बस…।”

इसी क्रम में मैंने एक विधवा मुस्लिम से बात की, जो कि अपनी जीविका चलाने के लिये चूड़ी बेचती हैं। उन्होंने बताया कि सास-ननद उन्हें इसके लिए ताना सुनाती हैं और बदचलन होने के इल्जाम लगाती हैं।

देवर भी उनसे मारपीट करता है। इसी क्रम में मैंने एक लड़की से बात की जिससे बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं-

“तुमने हाईस्कूल के आगे क्यूँ नहीं पढ़ा?”

“घर वाले पढ़उबै नहीं भैन, कहाथेन ज्यादा पढ़ लेबू तौ निकाह कहाँ करब?”

” कब से पहनने लगती हो बुर्का, तुम्हें बुर्के के अलावा कुछ आधुनिक कपड़े पहनने का मन नहीं होता है?”

“नौ -दस साल से पहिनै लागे हे। दरासल हम लोगन में नियम बा औरतन का पर्दे में रहै के चाही, इही ख़ातिर हमरे ज़ेहन में कउनो दूसर कपड़ा पहिनै के खयाल अउबै नहीं करत।”

“मस्जिद जाती हो नमाज पढ़ने?”

“औरतन के नमाज घर पे होथा, मज्जिद में नाहीं। मौलवी से उर्दू पढ़ै दस साल तक के बच्चियन मज्जिद जाय सकाथिन।”

“उर्दू महिला भी पढ़ाती हैं?”

“नाही औरतन नाही पढ़ाय सक्तिन।”

“लड़कों से बात करने पर तुम्हारे भाई रोकते हैं?”

“पहली बात तो हम बातै नहीं करे कभौ लड़कन से, खुद का अज़ीब लगाथे, अउर अगर गलत काम करबै तो रोकिहैं तो हइये। कुछ लड़कियन अहैं जेके घर वाले नही रोकतेन तो जाहिर सी बाति अहै आदत तो खराब होबय करी। इही वज़ह से तौ भाग जाथिन आशिकन के साथ।”

“जो ऐसा करती हैं उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं सब?”

“घर वाले तब नही रखतेन अउर रखिहैं तौ पूरे घर का बिरादरी से बाहर कइ दीन जाई।”

इसी दौरान मैंने एक महिला से बात की उन्होंने बताया उनके बारह बच्चे हैं, मैंने पूछा क्या आप चाहती थी इतने बच्चे? तो उन्होंने कहा-

“अपने शरीर के गत के करावै चाही! आपरेशन कराउब गुनाह अहै हम लोगन में तभौ हमका बच्चेदानी म सड़न पैदा होय के वज़ह से करवइन के पड़ा।”

अपनी एक मुस्लिम मित्र से बात करते हुए मैंने शमरीन के बारे में पूछा, जो कि स्कूल में हमसे एक क्लास पीछे थी, तो उसने बताया शमरीन अब नहीं रही। मेरा दिल दहल गया।

मैंने कहा उसकी तो शादी हुई थी अभी! उसने कहा -ओनके शौहर ओनका सीढ़ी से धक्का दइ दिहेन , ओन पेट रहिन ही, एके पहिले एक बच्चा अउर मर गा रहन इही तरह। उनके सास बासी खाना देत रहिन, एक दिन तौ एक गिलास दूध का पी लिहिन ,बहुत मारा गा उनका।

“उसके माता-पिता ने साथ नहीं दिया?”

“साथ के दे कहै उल्टा कहत रहिन निकाह के बादौ हमरै खर्चा बढ़ावत अहै, एक्कौ दिन घर में नहीं रक्खिन।”

बेटी-बेटे में इतना फर्क करते हैं?

“अरे एतना तो कम बा ,परवीन चच्ची तौ अउर भी जालिम अहैं अपने छे महीना के लड़की का ठंढी में बिना कपड़ा पहिनाए बाहर लेटाय देत रहिन ताकि मर जाय, लेकिन उहू बिचारी मरी नाही।”

इन महिलाओं से बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि इनमें भी जाति के आधार पर पर्दे की सख्ती है। जैसे चिकवा, मनिहार आदि जाति की महिलाएं अपेक्षाकृत कम पर्दा करती हैं।

लेकिन, संभ्रांत परिवार की महिलाओं का तो कोई हाथ भी नहीं देख सकता। यहाँ तक, कि आठ साल की बच्ची भी अगर सिर पर दुपट्टा रखना भूल जाए तो उसकी खैर नहीं।

इस तरह हम देखते हैं, यहाँ महिलाओं की गुलामी की जंजीरे बहुत सख्त हैं। किसी तरह से इस वर्ग की कुछ लड़कियाँ थोड़ा बहुत पढ़ भी लेती हैं, तो नौकरी करने का सपना भी ये नहीं देखती ।

बात करते हुए मुझे मालूम हुआ कि कई महिलाओं को ये भी नहीं पता कि तीन तलाक़ कानूनन जुर्म है। इसी का फायदा पुरुष वर्ग उठा रहे हैं और महिलाओं ने ये भी बताया कि तीन तलाक़ अभी भी हो रहा है, क्योंकि जिन्हें पता भी है वे महिलाएं समाज के भय से इसके खिलाफ कोई कदम नही उठाएंगी।

चूंकि महिलाओं के पास आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का कोई अपना आधार नहीं होता। इसलिए, वे शोषण सह कर भी तलाक़ नहीं चाहती हैं। अगर पुरुष तलाक़ भी दे देता है तो भी वे हलाला के द्वारा पुनः उस पुरूष से निकाह करना चाहती हैं।

इस तरह पुरुष इन्हें वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है और जब जी भर गया फेंक देता है। इन महिलाओं को प्रेरित करने के लिए मेरे मन में कैफ़ी आज़मी की नज़्म याद आती है-

“उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

जिंदगी ज़ोहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं

नब्ज- ए -हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं

उड़ने खुलने में है निकहत खम- ए- गेसू में नहीं

जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

उसकी आज़ाद रविश में भी मचलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे।”

(कीर्ति इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं और महादेवी वर्मा स्मृति महिला पुस्तकालय से जुड़ी हैं।) 

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