काव्य-संग्रह “ काँस के फूलों ने कहा जोहार ! ” का लोकार्पण , परिचर्चा
रांची। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के सभागार में 15 दिसंबर को स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के सहयोग से डॉ. प्रज्ञा गुप्ता के काव्य-संग्रह ‘ काँस के फूलों ने कहा, जोहार ! ’ का लोकार्पण और कृति-परिचर्चा का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा कि प्रज्ञा की कविताएँ आदिवासी गाँव के ठीक पड़ोस में बसे किसान गाँव की कविताएँ हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी में जो मौजूदा परिदृश्य है ,जो चीजें दरकिनार की जा रही हैं उनके बरक्स ये कविताएँ एक तरह से पारंपरिक कविता की तरफ वापसी की कविता है। लेकिन इन कविताओं में बहुत सारी बातें ऐसी हैं जो नयीं हैं। अनेक स्तरों पर यह बहुत पुरानी किस्म की कविता है; बहुत पुरानी यानि की संस्कृत के, अपभ्रंश के, प्राकृत के, ब्रज के अवधी के तमाम कवियों से लेकर खड़ी बोली हिंदी और उर्दू के बहुत सारे कवियों की झलक-मनक इसके अंदर है।
उन्होंने कहा कि ये कविताएँ एक कोमल मन की, कोमल भाव की कोमल चीजों को छूती हुई निकलने वाली ,कोमल चीजों को दृश्य पर रखने वाली कविताएँ हैं । इस अर्थ में यह जो पिछले तीन दशक का हमारा जो समकालीन परिदृश्य है उस परिदृश्य में यह थोड़ी भिन्न प्रकार की कविताएँ हैं । यह विमर्श का विषय है कि राँची में इतने वर्षों से रहने वाली एक युवती जब 2007-8 में कविता लिखना शुरु करती है; 40 साल उम्र बीतने के बाद अपना संग्रह लेकर आती है तो इस कोमल को क्यों खोज रही है ?क्या झारखंड से भी वह कोमल जा रहा है ? अलग स्वतंत्र राज्य बनने के बाद क्या कोमल के विलोपीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है ? यह एक विमर्श का विषय है। इन कविताओं में यह कोमलता प्रकृति संगी जीवन से बनी है जहाँ मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे के विरोधी नहीं है। प्रकृति को जीतने की अदम्य क्रूर कामना मनुष्य के भीतर नहीं है।
प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा कि ये किसान और आदिवासियों के बीच बनी हुए भावनाएँ हैं।यह कविताएँ दर्शन या राजनीति विशेष की कविताएँ नहीं बल्कि उस कवि की कविताएँ हैं जो अपने जीवन एवं आसपास में कोमलतम चीजों को बचाना चाहती हैं। यह कविताएँ दरकिनार किए जा रहे दृश्य एवं संवेदनाओं को बचाना चाहती हैं। समकालीन परिदृश्य में ये कविताएँ विमर्श की चेतना की नहीं बल्कि संवेदनाओं की कविताएँ हैं। उन्होंने कहा कि ये कविताएँ अपनी कविताई के लिए जो ‘पोएटिक सेंसिबिलिटी’ है उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन कविताओं में बहुत सारी ऐसी जगहें हैं जहाँ बहुत गहरा पोएटिक संस्पर्श भाषा में है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. रश्मि रावत ने कहा कि प्रज्ञा की कविताएँ परंपराओं से ताकत लेती भविष्य का सपना बुनती हैं। प्रज्ञा की कविताओं में उस गेहूँ के उस आस्वाद की चर्चा है जो जाति एवं धर्म से परे है। ये कविताएँ मात्र कागज पर नहीं आत्म -संघर्ष में लिखी गई हैं। प्रज्ञा गुप्ता अपनी कविताओं द्वारा उस घर को बनाने की बात कर रही हैं जहाँ पर गेहूँ का जो दाना आए वह जाति धर्म से परे हो। प्रज्ञा संग- साथ मिलकर एक नए बेहतर घर की कामना कर रही है जहाँ किसी प्रकार का भेदभाव ना हो। प्रज्ञा जी की कविताओं में बहुत सारे शब्द बहुत सारी भंगिमाएँ ऐसी हैं जो नयीं और प्रभावी हैं। उनकी कविताओं में परंपरा बोझ की तरह कहीं नहीं आती बल्कि परंपराओं से पूरी रोशनी लेते हुए वह समानता का सपना देखती हैं। जब प्रज्ञा बगिया की चिड़िया ना होकर पेड़ होना चाहती हैं तो वह आजादी की और समानता की मौलिक कल्पना करती नजर आती हैं-
मैं तुम्हारी बगिया की
सोन चिरैया नहीं;
तुम्हारे आँगन में,
नीम का पेड़
होना चाहती हूँ।
यह जो पेड़ है इसकी जड़ें भी गहरी हैं और उसे आसमान को भी छूना है। पारिवारिक हिंसा को बल ना मिले इसके लिए परिवार में समानता जरूरी है और परिवार का सुंदर होना भी जरूरी है यह सुंदरता आएगी स्त्री पुरुष समानता से। इस काव्य संग्रह ‘मैं अपनी बेटी से ककहरा सीख रही हूँ’ एक महत्वपूर्ण कविता है जो हमें परिवार में मनुष्यता की वर्णमाला को सही तरीके से सीखने की बात करती है। यह नए तरीके से ‘ककहरा सीखना’ इस पूरे काव्य-संग्रह का सुर है।
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर रविभूषण ने कहा कि प्रज्ञा की कविताएँ स्त्री भाव से अधिक मानव भाव की कविताएँ हैं। प्रज्ञा की कविताओं में स्मृति, संबंध एवं संवेदना बचाने की जद्दोजहद है ।उनकी कविताओं में समय का बोध एवं समाज बोध स्पष्ट रूप से झलकता है। उन्होंने कहा कि प्रज्ञा अपनी कविताओं में जिस कोमलता को बचाने की बात कर रही हैं उसे बचाना आत्मीयता, निश्छलता, मनुष्यता बचाना है। ये कविताएँ स्त्री भाव की है लेकिन उससे अधिक ये कविताएँ मानव भाव की हैं। इन कविताओं में स्थानिकता है और भौगोलिकता है। उनकी कविताओं का एक बड़ा पक्ष सांस्कृतिक पक्ष है। हिंदी एवं नागपुरी भाषा की कविताओं को जब हम एक साथ रखते हैं तो एक सह संबंध भाषाओं या एक भाषा और बोली के बीच स्थापित होता है। उनकी कविताओं में एक राजनीतिक समझ भी है।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ माया प्रसाद ने कहा कि प्रज्ञा की कविताओं में लोकबिम्ब संपूर्ण सुंदरता से चित्रित हैं। यह कविताएँ स्त्री-चेतना की जरूरी कविताएँ हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से कवयित्री ने गाँव घर के तमाम रिश्तों को सहेजा है। उसने ऋतुओं को सहेजा है, उसके यहां चैता है, बसंत है, भादो है और भी दूसरे महीने हैं। प्रज्ञा ने अपनी कविताओं के माध्यम से दांपत्य को बहुत अच्छे से परिभाषित किया है। इस संग्रह में प्रज्ञा एक मध्यवर्गीय स्त्री के संवेदनशील हृदय का प्रतिनिधित्व करती हैं।
कवयित्री के पिता कहानीकार दयाल राम ने वीडियो संदेश के माध्यम से काव्य -संग्रह पर वकतव्य देते हुए कहा कि इस संग्रह से अपनी माटी की गंध आती है। रचनाकार जिस मिट्टी में पनपी उसकी गंध इन कविताओं में समायी हुई है।
डॉ. अशोक प्रियदर्शी ने कहा की ये कविताएँ मन को सहज स्पर्श करती हैं एवं झंकृत करती हैं। यह कविता संग्रह कथा की तरह रोचक है। इन कविताओं में हृदय बोलता है और झारखंड की मिट्टी की खुशबू इनमें समाहित है ।
कहानीकार पंकज मित्र ने कहा कि किसी स्त्री का लिखना ही पितृसत्ता का प्रतिरोध है। प्रज्ञा की कविताओं में विभिन्न पारिवारिक रिश्ते आजी, माँ, बहनें, बेटी हैं जो हमारी संवेदना का विस्तार करते हैं। प्रकृति एवं पर्यावरण को देखने का जो नजरिया कवयित्री के पास है वह बहुत सुंदर है क्योंकि वहाँ झारखंड की सहिया दृष्टि है। पुरुषवाद एवं पितृसत्ता के प्रतिवाद का तरीका प्रज्ञा की कविताओं में अप्रतिम है। हजारों वर्षों से बने पितृ सत्तात्मक ढांचे को प्रज्ञा गुप्ता इस संग्रह की कविताओं में बारीकी से परत दर परत उसको छिलती हैं और सामने लाती हैं यह देखने वाली बात है।
प्रसिद्ध कथाकार रणेंद्र ने कहा कि प्रज्ञा अपनी कविताओं में गढ़े-गढ़ाये सौंदर्य शास्त्र के पार जाना चाहती हैं। इसलिए वह कभी नीम का पेड़ होना चाहती हैं, कभी सहजन का। उनकी कविताओं में लोक भाषा की उपस्थिति बरबस हमारा ध्यान खींचती है। एक तो इन कविताओं में देशज शब्दों की भरमार है दूसरे कि जब भी वह कथित पुरुष भाषा को अपने भाव और अभिव्यक्ति में बाधा पाती हैं तो सीधे लोकभाषा, लोकगीत ,लोककहावतों की शरण में चली जाती हैं। इसलिए कई कविताओं का उत्तरार्ध लोकगीतों की पंक्तियों से ही पूर्णता प्राप्त करता या अर्थगर्भित होता दिखता है, जैसे ‘करम के गीत’ शीर्षक कविता की आखिरी पंक्तियों को देखे-
“आए गेलैं भादो
अंगना में कादो
भाई रीझ लागे
झूमइर खेले में आगे
भाई रीझ लागे” ।
प्रो. मिथिलेश ने कहा कि प्रज्ञा की कविताओं में खत्म होती किसानी संस्कृति की व्यथा दर्ज है।कृषक चेतना के साथ स्त्री की चेतना का समन्वय उनकी कविताओं में है। उनकी कविताओं की चेतना वैश्विक है।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ जिंदर सिंह मुंडा ने कहा की प्रस्तुत कविताओं में देशज सौंदर्य के बहाने मनुष्यता, परिवार, समाज ,पशु -पक्षी लोक एवं प्रकृति के विविध आयामों का चित्रण है ।कवयित्री का जीवन किसानी जीवन से जुड़ा है अतः उनकी कविताओं में खेत ,खलिहान बैल, पगडंडियाँ चित्रित हैं और लोक-आस्था एवं संवेदनाएँ यहाँ खूबसूरती से अभिव्यक्त हैं। इस संग्रह की कविताएँ प्रकृति चित्रण के बहाने संपूर्ण लोक का भी परिभ्रमण करती हैं। पुरातन से नवीनतम की यात्रा में उनकी कविताएँ बारंबार संजोने, तराशने एवं सहेजने की चेष्टा में लगातार संघर्ष करती हैं ।
इस अवसर पर कवयित्री ने कहा कि स्मृतियाँ मेरे लिए जीवनी शक्ति है ।मेरी स्मृतियाँ और मेरा गाँव जब तक मुझे पकड़े रहेंगे, मेरी संवेदना बची रहेगी।
कार्यक्रम का संचालन मनीष कुमार मिश्रा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ जितेंद्र कुमार सिंह ने दिया।
इस अवसर पर डॉ किरण, प्रमोद झा, डॉ अर्चना दुबे, डॉ भारती द्विवेदी, सियाराम सरस, रश्मि शर्मा ,सत्या शर्मा कीर्ति,जयमाला, डॉ भारती, डॉ निशि ,वीणा श्रीवास्तव, डॉ नियति कल्प, डॉ किरण कुमारी, डॉ .शुचि संतोष, डॉ कुमुद कला मेहता , डॉ सुनीता कुमारी, डॉ पार्वती तिर्की ,सुरेंद्र कौर नीलम ,डॉ हीरानंदन प्रसाद , डा. सीमा चौधरी, डॉ मृत्युंजय कोईरी, डॉ विजय कुमार, श्वेता जायसवाल, डॉ अनिता कुमारी ,अमरदीप संजय कुमार साहु, श्वेता कुमारी, निक्की डिसूजा आदि मौजूद थे।

