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कोरोना डायरी : लॉकडाउन-1

: नीलिशा


[युवा पत्रकार नीलिशा दिल्ली में रहती हैं और इस भयावह वक़्त का दस्तावेज़ीकरण वे कोरोना डायरी नाम से कर रही हैं। समकालीन जनमत इस रोजनामचे को क्रमशः प्रकाशित करेगा। प्रस्तुत है पहली किस्त।]


सर्वव्यापी महामारी के रूप COVID-19 (कोरोना) मानव इतिहास की एक अनूठी घटना है। अनूठी इस लिहाज से कि इस महामारी के निपटने के लिए विश्व के तकरीबन सभी देशों ने एकजुटता के साथ एक जैसे प्रयास किए गए। विश्व के 172 से अधिक देशों में कोरोना से बचाव के लिए पूर्ण अथवा आंशिक रूप से क्वारेन्टाइन (संगरोध) और लॉकडाउन (पूर्णबंदी) की प्रक्रिया अपनाई गई। कोरोना के संबंध में विभिन्न आंकड़े रियल टाइम में जनसामान्य के लिए इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। ऐसा बताया जाता है कि कोरोना संक्रमण की शुरुआत चीन के हुबेई प्रांत की राजधानी वुहान से हुई। भारत में कोरोना का पहला मरीज 30 जनवरी को केरल में मिला तब तक चीन में शहरों और प्रांतो में क्वारेन्टाइन और लॉकडाउन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। इसी दिन इटली ने चीन से आने-जाने वाली सभी उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया था और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना को ‘इण्टरनेशनल पब्लिक हेल्थ इमर्जेन्सी’ घोषित कर दिया था। लेकिन भारत में कोरोना और उसकी संक्रमण क्षमता के संबंध में चेतना का प्रसार नहीं हुआ था। सरकारें पूरी बेफिक्री से बैठी थीं।

दिल्ली अभी व्यस्त थी। विधानसभा चुनाव, एनआरसी सीएए विरोध आन्दोलन और उसके दबाने के प्रयास, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सपरिवार दो दिवसीय भारत दौरा, ‘नमस्ते ट्रंप’। फरवरी में भी दिल्ली व्यस्त थी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने 12 फरवरी को एक ट्वीट के माध्यम से सरकार को चेताया था कि कोरोना महामारी देश की जनता और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है और सरकार इसकी ओर आपेक्षित रूप से गंभीर नहीं है। लेकिन राहुल गांधी की इस चेतावनी को सरकार ने गम्भीरता से नहीं लिया। अंतर्राष्ट्रीय उड़ाने अभी भी बदस्तूर जारी थीं। ब्यूरो ऑफ इमीग्रेशन के अनुसार, संचयी रूप से 23 मार्च तक 15 लाख अंतर्राष्ट्रीय यात्री भारत आ चुके थे। केन्द्र सरकार के अनुसार, 18 जनवरी से हवाई अड्डों पर थर्मल स्कैनिंग की व्यवस्था कर दी गई थी।

होली का त्योहार और मध्यप्रदेश में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच 11 मार्च को डब्ल्यूएचओ ने कोरोना को पेंडेमिक घोषित कर दिया। सरकार के लिए स्वभाविक रूप से ये चिंता का विषय था। अब केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक के बयान आने लगे कि कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए होली मिलन समारोहों का आयोजन नहीं किया जाएगा। होली से पहले दिल्ली में कोराना के 9 मरीज थे। होली से पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में मरीजों की संख्या और सावधानी बरतने की सलाहें देने लगे थे। कोरोना संक्रमण के भय के फैलने के साथ ही दिल्ली के बाजारों में सैनेटाइजर और मास्क की ब्लैक मार्केटिंग शुरू हो गई। दिल्ली में सैनेटाइजर और मास्क की ब्लैक मार्केटिंग को रोकने को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री से प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सबको मास्क लगाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ मरीज ही मास्क लगाएं या जिन्हें सर्दी-जुकाम है। इसके अलावा छापे मारकर ब्लैक मार्केटिंग करने वालों को रोका जाएगा। बहुत से लोगों ने इस दौरान मास्क और सैनेटाइजर का स्टॉक करना शुरू कर दिया था। एन-95 मास्क तो बाजार से ही गायब हो गए। होली की छुट्टियों के दौरान ही दिल्ली सरकार ने बड़े कार्यक्रमों पर रोक लगा दी। स्कूल-कॉलेज भी बंद करने का आदेश जारी कर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय भी बंद कर दिया गया। होली के बाद सरकारें और चिंतित दिखने लगीं। अधिक भीड़ वाले इलाकों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। कोरोना संक्रामित मरीजों की संख्या भी बढ़ने लगी। 10-15 दिन में ही मरीजों की संख्या इतनी बढ़ गई कि सरकार दबाव में आ गई।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू की घोषणा की। 24 मार्च तक देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 12 हो चुकी थी। 24 मार्च को ही प्रधानमंत्री ने रात 12 बजे से 21 दिन के देशव्यापी लॉकडाउन किए जाने की घोषणा की। प्रधानमंत्री ने लोगों से 21 दिनों तक घर से बाहर न निकलने की अपील की। उन्होने कहा कि ऐसा करने में असफल रहने से देश 21 साल पीछे चला जाएगा। इधर रात को प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन की घोषणा की और उधर लोग दुकानों की तरफ भागे। हालत यह हुई कि राशन की दुकानों पर मारा-मारी मच गई। नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली से कई ऐसे वीडियो आए, जिसमें लोग राशन की दुकानों पर टूट पड़ते हुए दिख रहे थे। जब मैं घर पहुंची तो देखा कि सोसाइटी के बाहर लगने वाले सब्जी के ठेले पर लोगों का हुजूम लगा हुआ है। कोई खूब सारा आलू ही खरीदे लिए जा रहा है, कोई टमाटर भर रहा है, कोई प्याज से झोला भर रहा है। कई जगहों पर तो हिंसा और लोगों के घायल होने की भी सूचना आई। इसकी वजह यह थी कि प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन की घोषणा तो कर दी थी, लेकिन यह नहीं बताया कि जरूरत की चीजें मिलेंगी या नहीं। खैर, उनके भाषण के आधे घंटे बाद सरकार की तरफ से ट्वीट पर ट्वीट किए गए कि क्या-क्या खुलेगा, लेकिन ये ट्वीट आम आदमी नहीं पढ़ सकता था। जब तक मीडिया में ठीक से ये खबर प्रसारित नहीं हुई कि क्या-क्या और कब-कब खुलेगा, तब तक लोगों की जान हलक में अटकी रही, लोग राशन की दुकानों पर लाइनों में लगे रहे। बहुत से लोगों ने इतना सामान खरीदा कि अपने घर को गोदाम बना लिया।

25 मार्च से सड़कों पर सन्नाटा पसर गया। महामारी अधिनियम लागू कर दिया गया। दिल्ली में तो चाय के खोमचे भी गायब हो गए। अगर खाना घर से लाना भूल गए तो पूरा दिन भूखा रहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। सड़कों पर सिर्फ मीडिया, सरकारी अफसर और जरूरी सेवाओं में लगे लोगों की गाड़िया ही नजर आ रही थीं। दिल्ली के ज्यादातर गोलचक्कर रेड लाइट फ्री कर दिए गए। लोगों ने अपने जीवन में शायद पहली बार दिल्ली में इतना सन्नाटा देखा होगा। सन्नाटे वाली सड़कों पर लोगों ने इतनी तेज गाड़ियां दौड़ाईं कि सड़क दुर्घटनाएं होने लगीं। ऐसी ही एक दुर्घटना का शिकार मैं भी हो गई। एक बुजुर्ग व्यक्ति इंडिया गेट के पास हुई सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवा बैठा। लॉकडाउन में जो जहां था, वह वहीं फंस गया। बहुत से लोगों ने अपनी समस्या बताते हुए कहा कि वह दिल्ली में इलाज के लिए आए थे, लेकिन अब यहीं फंस गए। कुछ ने बताया कि बच्चों की वार्षिक परीक्षा होने के बाद छुट्टी बिताने के लिए आए थे, लेकिन अब लॉकडाउन हो गया। दिल्ली में न जाने कितने लोग सड़कों पर सोकर अपनी जिंदगी काट देते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा मुश्किल सड़कों के किनारे रहने वाले इन्ही लोगों को हो रही थी। उनके पास कोई घर था नहीं और पुलिस उन्हें सड़कों से मारकर खदेड़ रही थी। लॉकडाउन में सबसे ज्यादा मुसीबत इन्हीं लोगों ने झेली। इस दौरान पुलिस की ज्यादतियों की खबरें भी खूब आईं। पुलिस ने कानून व्यवस्था को ठीक करने के लिए लगने वाला कर्फ्यू और कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए किए गए इस लॉकडाउन में कोई अंतर नहीं छोड़ा। महामारी अधिनियम की आड़ लोगों को खूब प्रताड़ित किया गया।

लॉकडाउन-1 से ही लोग घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) करने लगे। आईटी सेक्टर में काम करने वाले मेरे एक मित्र ने बताया कि ऑफिस में 8 घंटे काम करते थे, लेकिन घर में काम करते हुए वर्किंग ऑवर का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। पहले के मुकाबले दोगुना काम करते हैं। इसमें भी महिलाओं को ज्यादा मुश्किल हुई। उन्हें घर का काम भी करना था, बच्चे भी संभालने थे और ऑफिस का पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा काम करना था। मेरे एक मित्र ने कहा कि खाना बनाने का मौका ही नहीं मिल पाता है। ऑफिस जाते थे तो दो टाइम खाना बना ही लेते थे, लेकिन वर्क फ्रॉम होम में एक टाइम भी खाना बन जाए तो बड़ी बात है।

लॉकडाउन की घोषणा को एक हफ्ते भी नहीं हुए कि मजदूर छटपटा के निकल पड़े। दिल्ली की सड़कों पर मजदूरों का हुजूम उमड़ पड़ा। कुछ मजदूरों ने कहा कि उनके पास पैसे ही नहीं बचे हैं, खाएंगे क्या। कुछ ने कहा कि आनंद-विहार से बस जा रही हैं, वहां से वह अपने घर चले जाएंगे, यहां पर उनका गुजारा नहीं होने वाला है। दरअसल, वाट्सएप पर एक फर्जी सूचना वायरल कर दी गई कि यूपी सरकार मजदूरों को घर वापस लाने के लिए 1000 बसें चला रही है। यह खबर चली तो सरकार की वाहवाही के लिए होगी, लेकिन हो गया उल्टा। इस मुद्दे से पीछा छुड़ाने के लिए केन्द्र सरकार ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए कि दिल्ली सरकार ने मजदूरों के घर में बिजली-पानी काट दी है, तभी वो भाग रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मजदूर कहीं न जाएं, उनके खाने-पीने, रहने का इंतजाम हम करेंगे। लेकिन मजदूर वापस नहीं आए। दिल्ली में मजदूरों की इस भीड़ पर पुलिस की लाठियां भी चलीं। मजबूर होकर उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा, हम मजदूरों को वापस लाने के लिए बसें लगा रहे हैं, लेकिन मजदूरों ने बताया कि उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसों में दोगुने से चार-गुना कीमत पर टिकट देने के बाद वह इन बसों में बैठ पाए। ये मजदूर जब अपने-अपने इलाकों में पहुंचे तो उनके साथ सौतेला व्यवहार हुआ। जहां बिहार सरकार ने कहा कि हम घुसने नहीं देंगे। इससे संक्रमण गांवों में फैल जाएगा।
इसलिए, सरकार चाहती है कि जो जहां है, वह वहीं रहे। वहीं यूपी के बरेली में प्रवासी मजदूरों पर सैनिटाइज़ेशन के नाम पर हानिकारक केमिकल का छिड़काव कर दिया गया। कोरोना संक्रमण के साथ ही अब प्रवासी मज़दूरों की समस्या भी विकराल रूप लेती जा रही थी।

[क्रमशः]

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