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जनमत शिक्षा

सावित्रीबाई फुले के जन्म दिन को मनाया जाए शिक्षक दिवस के रूप में

पिछले कुछ वर्षों से भारत के बहुजन समाज के प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की ओर से भारत की प्रथम स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के जन्म दिवस 3 जनवरी को शिक्षक दिवस के रूप में मनाए जाने की मांग उठ रही हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले ने भारत की स्त्रियों और अश्पृश्य तबके जिन्हें हिन्दू सनातन संस्कृति द्वारा सदियों तक शिक्षा और ज्ञानार्जन से वंचित रखा गया था, के बीच शिक्षा और ज्ञान की ज्योति जगाई थी।

हमारे देश मे 5 सितंबर,भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में सरकारी मान्यता दी गई है लेकिन भारत मे ज्ञान और शिक्षण के लिए उनके क्या युगान्तरकारी प्रयास हैं इस विषय मे सामान्य जन की बात दूर की है,भारत के शिक्षाविदों और विद्वानों की कोई स्पष्ट समझ नहीं है।कई बार उनके अकादमिक उपलब्धियों को संदेह से देखा जाता है।

जबकि सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिबा फुले का संघर्ष विराट ऐतिहासिक अग्रगति का वाहक रहा है।ज्योतिबा फुले भारत मे अंग्रेज़ी राज को दलितों वंचितों व शूद्रों के लिए एक अवसर की तरह देखते थे जिसका इस्तेमाल करके वे अज्ञान व अन्याय के अंधकार से बाहर निकल सकते थे।

इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि अंग्रेज़ी सरकार दलितों व स्त्रियों को शिक्षित कर उन्हें आगे बढ़ने का मौका देगी।वे खुद अंग्रेज़ मिशनरियों द्वारा संचालित एक स्कूल में पढ़ चुके थे।

उन्होंने ज्ञान की ज्योति फैलाने के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया था।इसी अभियान के तहत उन्होंने पुणे में बालिकाओं के लिए एक स्कूल खोलने का निर्णय लिया था,लेकिन रूढ़िवादी भारतीय समाज मे बालिकाओं को शिक्षा देने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी,ऐसा करना पाप से कम नही था.

फुले ने यह दुस्साहस किया,लेकिन एक बालिका विद्यालय में पढाने के लिए कोई भी शिक्षित महिला तैयार नहीं हुई, ऐसे में सावित्रीबाई फुले ने इस अभियान में ज्योतिबा की संगिनी होने का निर्णय लिया और खुद शिक्षा ग्रहण कर बालिका विद्यालय में लड़कियों को पढ़ाने लगीं।इस तरह सावित्रीबाई फुले को भारत मे पहली स्त्री शिक्षिका होने का गौरवशाली पद प्राप्त हुआ।

भारत मे स्त्रियों की शिक्षा एक ऐसा विषय रही है जिसमे अंग्रेज़ सरकार हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थी।पुरुष शिक्षा के मामले में वे औपनिवेशिक शासन के हितों के अनुरूप अंग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत वे कर चुके थे लेकिन स्त्री शिक्षा के विकास के लिए उनकी कोई मंशा नही थी।

ऐसा क्यों था इसकी वजह बताते हुए वीर भारत तलवार ने अपनी किताब ‘रस्साकशी’ में लिखा है-

“19वीं सदी में आखिर तक अंग्रेज़ सरकार ने स्त्री शिक्षा के मुद्दे पर कोई गंभीर दिलचस्पी नहीं दिखाई।इसका कारण राजनैतिक था।विदेशी सरकार को अच्छी तरह पता था कि ज्यादातर हिन्दू (और मुसलमान भी) अपनी लड़कियों को आधुनिक ढंग से शिक्षा दिए जाने के खिलाफ हैं।इसलिए सरकार ने 1857 के ग़दर के बाद से धार्मिक मामलों में अपनाई जाने वाली अपनी तटस्थता की नीति को इस मामले में भी अख्तियार करना वाजिब समझा।उसे डर था कि स्त्री शिक्षा के लिए जोर देने से हिन्दू लोग ब्रिटिश शासन के विरोधी न बन जायं।”

इस उद्धरण से यह स्पष्ट है कि बालिकाओं को शिक्षा देने की दिशा में सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले की राह बिल्कुल भी आसान नहीं थी, क्योंकि एक तरफ भारतीय समाज इसके प्रति असहिष्णु था और दूसरी तरफ अंग्रेज़ सरकार का रवैया भी नकारात्मक था। ऐसे में फुले दंपत्ति को अपनी राह खुद ही बनानी थी।

सन 1848 में सावित्रीबाई फुले ने पुणे के भिड़ेवाड़ी में पहले बालिका विद्यालय की स्थापना की।एक साल के भीतर उन्होंने पुणे शहर के अलग अलग इलाक़ों में 9 स्कूल खोले। लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं था।

सावित्रीबाई को रूढ़िवादी और जातिवादी हिन्दू समाज के पुरुषों और महिलाओं तक का मुखर विरोध झेलना पड़ा। उन लोगों को यह स्वीकार्य नहीं था कि कोई उनकी बच्चियों और स्त्रियों को शिक्षित करे क्योंकि अगर वे शिक्षित होंगी तो पुरुष वर्चस्व को चुनौती देंगी।

सावित्रीबाई को स्कूल जाने से रोकने उनके प्रति अपनी नफरत को प्रदर्शित करने के लिए हिन्दू स्त्रियां स्कूल जाते समय सावित्रीबाई फुले पर कीचड़ फेंकते थे और पत्थर से उन्हें घायल करने की कोशिश करते लेकिन इन सबका सामना करते हुए सावित्रीबाई अपने थैले में दूसरी साड़ी रखकर ले जातीं और विद्यालय पहुंच कर कपडे बदल कर पढ़ाने लगतीं।

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले के इस अभियान के अभिन्न सहयोगी थे उस्मान शेख,जिनके घर मे फुले दंपत्ति ने विद्यालय खोला था।उस्मान शेख की बेटी फातिमा शेख उनकी छात्रा थीं जो आगे चलकर सावित्रीबाई फुले की सहयोगी बनीं।

पुणे, जो उस समय ब्राह्मणवादी जीवन मूल्य का सबसे संकीर्ण और कट्टर केंद्र था, में सावित्रीबाई फुले का यह अभियान एक क्रांति की आहट से कम नहीं था।और सावित्रीबाई ने अपने शिक्षा के जरिये जो नवोन्मेष किया वह सिर्फ स्त्रियों और शूद्रों को अक्षर ज्ञान सिखाने तक सीमित नहीं था।बल्कि उन्होंने अपने व्यवहारिक सामाजिक शिक्षण के जरिये हिन्दू समाज की जड़ता और उसके अमानवीय आधार पर जबरदस्त प्रहार किया।

सावित्रीबाई फुले ने न सिर्फ स्त्रियों को पढ़ना सिखाया बल्कि उन्हें अपने नैसर्गिक अधिकारों के लिए संगठित होकर लड़ना भी सिखाया।इन लड़ाइयों के जरिये हिन्दू समाज के पाखण्ड को बेनकाब किया।

पुणे में हजारों विधवाओं को गर्भवती कर लोकलाज से आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया जाता था।सावित्रीबाई फुले ने 1853 में ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की जहां पर विधवा स्त्रियों को रहने व प्रसव की सुविधा थी,पैदा होने वाले बच्चों के पालन पोषण व शिक्षा की जिम्मेदारी वे खुद उठती थीं।विधवा स्त्रियों की पहचान के लिए हिन्दू समाज मे उनका सिर मुंडवा देने की प्रथा प्रचलित थी,सावित्रीबाई ने पुणे के नाईयों को संगठित कर विधवा स्त्रियों के मुंडन करने पर रोक लगवा दी।इस तरह उन्होंने हिन्दू धर्म के ठेकेदारों से खुली लड़ाई ली।

फुले दंपत्ति ने अपने ‘बाल प्रतिबंधक गृह’ के एक बच्चे को गोद लिया,जिसका नाम यशवंत रखा।आगे चलकर यशवंत पुणे शहर के पहके डॉक्टर बने।सावित्रीबाई फुले मराठी की पहली कवियत्री भी हैं।उनका पूरा जीवन स्त्रियों और शूद्रों को अंधकार से बाहर निकाल कर प्रकाश में ले आने में बीता।

हज़ारों साल से बेआवाज और बेजुबान रहे लोगों को उन्होंने आवाज दी। त्याग,समर्पण और सेवा की प्रतिमूर्ति सावित्रीबाई फुले की मृत्यु भी प्लेग के मरीजों की सेवा के दौरान ही हुआ।

1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली थी।सभी संभ्रांत लोग शहर छोड़ कर भाग चुके थे लेकिन 67 वर्षीय सावित्रीबाई और उनके पुत्र डॉ. यशवंत प्लेग के मरीजों के बीच उनके प्राणरक्षा की कोशिशों में लगे हुए थे।एक मरीज को उसके परिजन भी उठाकर अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं थे,तब सावित्रीबाई फुले ने उसे अपने कंधों पर उठाकर अस्पताल पहुंचाया।

इसी प्रक्रिया में वे प्लेग की चपेट में आईं और भारत मे शिक्षा की क्रांति की लौ जलाने वाली क्रान्तिज्योति हमेशा के लिए सो गई।

आज जब देश मे आधुनिक शिक्षा,वैज्ञानिक चिंतन,तर्क और ज्ञान के खिलाफ पुरातन गौरव,अतीतपूजा,पोंगापंथ और मनुवाद की विचारधारा को स्थापित करने की कोशिश हो रही है,तब हमें सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले के संघर्ष को याद करना चाहिए कि वंचितों और स्त्रियों को आधुनिक ज्ञान की धारा में शामिल कराने के लिए उन्हें रूढ़िवाद समाज से कितनी बड़ी और कठिन लड़ाई लड़नी पड़ी थी।

उनके संघर्ष की प्रेरणा और याद ही हमारी आज की लड़ाई का हथियार है।इसलिए सावित्रीबाई फुले,भारत की पहली शिक्षिका के जन्मदिवस को ही शिक्षक दिवस के रूप में मनाना चाहिए।शायद तभी शिक्षक दिवस का कोई मानी निकले!

 

(डॉ. रामायन राम, शामली जिले के कांधला में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी अध्यापन, जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के सचिव, समकालीन जनमत, हंस, कथा इत्यादि पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। ‘डॉ .अम्बेडकर: चिंतन के बुनियादी सरोकार’ पुस्तक प्रकाशित!)

फीचर्ड तस्वीर: साभार गूगल

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