Wednesday, December 7, 2022
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अंबेडकर के बुद्ध

 अंबेडकर के बौद्ध बनने के बारे में अक्सर इस सोच के साथ बात होती है मानो अशोक के बौद्ध होने की घटना की पुनरावृत्ति हुई हो । स्वाभाविक बात तो यह थी कि इस घटना को अंबेडकर के समय संदर्भ में रखकर समझने की कोशिश की जाती लेकिन धर्मांतरण के विरोध में खड़ी ताकतें तो इसकी याद भी मिटा देना चाहती हैं । साफ है कि अंबेडकर यह काम अपने समय के हिसाब से कर रहे थे । इसके लिए उन्होंने बुद्ध को नए समय के मुताबिक प्रासंगिक बनाया । बुद्ध के इस नवीनीकरण को अंबेडकर की इस किताब के सहारे देखा जा सकता है । यह किताब 1956 में काठमांडू में बौद्धों के एक सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण है । 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद 20 नवंबर को उन्होंने यह भाषण दिया था । इस भाषण में जो बातें उन्होंने सूत्र रूप में कहीं उन्हें विस्तारित करके 2 दिसंबर को पुस्तिका का रूप दिया । यह उनका आखिरी लेखन साबित हुआ । 6 दिसंबर को उनका देहांत हो गया । आश्चर्य नहीं कि सवर्ण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकारों ने बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए यही तारीख तय की ।

बाबा साहब अंबेडकर के धर्मांतरण के तथ्य को उजागर करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उनके तईं धर्म बदलने का अधिकार सामाजिक लोकतंत्र का सबूत है । चाहे अंतर्जातीय विवाह का मामला हो या धर्मांतरण का, उनकी बातें और काम लोकतंत्र को महज औपचारिक बनाए रखने के विरुद्ध लक्षित हैं । लोकतंत्र को वे समता और स्वतंत्रता से अलग करके देखने के पक्ष में नहीं थे । पेशे के चुनाव में स्वतंत्रता के जरिए वे सामाजिक गतिशीलता हासिल करना चाहते थे तो अंतर्जातीय विवाह के जरिए स्त्री स्वाधीनता की गारंटी करना चाहते थे । धर्मांतरण का अधिकार मनुष्य के बालिग होने पर स्वतंत्र पहचान बनाने के उसके हक से जुड़ा हुआ है । बालिग व्यक्ति जिस तरह स्वतंत्र तरीके से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए आजाद होता है उसी तरह अपना जीवनसाथी और धर्म चुनने की आजादी भी उसका हक है । यह सवाल जातिप्रथा के उन्मूलन की उनकी कोशिश से भी सम्बद्ध है । व्यक्ति की जाति का निर्धारण जैसे जन्मना नहीं होना चाहिए उसी तरह उसके धर्म का निर्धारण भी उसके जन्म के आधार पर नहीं होना चाहिए । धार्मिक स्वतंत्रता के भीतर ही धर्मांतरण का अधिकार भी आता है । धर्मांतरण पर पाबंदी की कोशिश का मतलब धार्मिक स्वतंत्रता की समाप्ति है । इसलिए यह धार्मिक स्वतंत्रता मनुष्य की निजी अनुल्लंघनीय स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है । इन तमाम स्वाधीनताओं के आधार पर वे लोकतंत्र को राजनीतिक सीमा से मुक्त करके समाज में एक जीवन पद्धति के बतौर स्थापित करना चाहते थे ।

बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के उनके फैसले का भी सन्दर्भ व्यापक है । स्वाधीनता से पहले न केवल अंबेडकर बल्कि बहुतेरे बौद्धिक जन इस धर्म के बारे में लिख पढ़ रहे थे । हिंदी के विद्यार्थी राहुल सांकृत्यायन के नाम से भली भांति परिचित हैं । उन्होंने राहुल नाम ही बुद्ध के पुत्र से लिया था और बौद्ध भी बने थे । उनके ही साथी हिंदी के मशहूर कवि नागार्जुन का नाम भी प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक के नाम से लिया हुआ है । इन दोनों ने अपने मूल नाम छोड़कर न केवल बुद्ध से जुड़े नाम अपनाए बल्कि सामंती विरासत से प्राप्त जातिगत पहचान से भी मुक्ति पाने की कोशिश की । दोनों का संबंध कम्युनिस्ट आंदोलन से था । इस आंदोलन की प्रेरणा भी बुद्ध के साथ अपने को जोड़ने के उनके फैसले के पीछे जरूर रही होगी । अकारण नहीं था कि अंबेडकर ने बुद्ध को मार्क्स के साथ जोड़ा । इनके अतिरिक्त समाजवादियों में सबसे अधिक वामपंथी रुझान वाले आचार्य नरेन्द्र देव ने बुद्ध के धर्म दर्शन पर अत्यंत गम्भीर पुस्तक लिखी । इसी क्रम में दामोदर धर्मानन्द कोसाम्बी और देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय के भी लेखन की याद आना स्वाभाविक है ।

इस जुड़ाव का रिश्ता स्वाधीनता आंदोलन से भी था । हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन को पूरी दुनिया के उपनिवेशों में जारी मुक्ति आंदोलनों का अंग समझा जाता था । आजादी के आंदोलन के भीतर भी यह चेतना 1920 के बाद तेजी से बढ़ने लगी थी । गांधी से लेकर भगत सिंह तक लगभग प्रत्येक स्वाधीनता सेनानी ने विदेशों में चलने वाले लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ खुद को जोड़ा था । उपनिवेशवाद से पीड़ित पड़ोसियों में बौद्ध धर्म को मानने वालों की तादाद अधिक थी । उस समय चीन, जापान, बर्मा और श्रीलंका को ही हम अपना पड़ोसी मानते थे और जानते थे कि आजादी के बाद हमारी किस्मत इनके साथ नत्थी रहने वाली है । बुद्ध और बौद्ध धर्म में तत्कालीन व्यापक रुचि को इस सन्दर्भ में भी देखा जाना चाहिए । बुद्ध में व्यापक रुचि का सबूत उस जमाने में लिखी अनेकानेक हिंदी किताबें हैं । इन किताबों के लेखक परशुराम चतुर्वेदी से लेकर रामवृक्ष बेनीपुरी तक थे । बुद्ध के प्रति इस अनुराग का सीधा संबंध भारत के उपनिवेशोत्तर सपने से था । तब कौन सोच सकता था कि एक समय ऐसा आएगा जब साम्राज्यवादी अमेरिका की गैर बराबर दोस्ती से देश को आत्मविश्वास हासिल होगा । खास बात कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में वामपंथ की मजबूत उपस्थिति थी । सबको मालूम था कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध सबसे सुसंगत मोर्चा कोमिंटर्न (तीसरा इंटरनेशनल) के नेतृत्व में खुला हुआ था । इसका नेतृत्व रूस की कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी । स्वाधीनता के लिए संघर्षरत दुनिया की लगभग सभी उपनिवेशवाद विरोधी ताकतों के साथ लेनिन की पार्टी का सक्रिय संवाद था । इस विशेष स्थिति के चलते मार्क्स के चिंतन का गहरा प्रभाव हमारे देश के बौद्धिक समुदाय पर भी था । बुद्ध के साथ मार्क्सवाद के संवाद की यह परम्परा स्वाधीनता के बाद भी लम्बे समय तक बनी रही । अचरज की बात नहीं कि हिंदी साहित्य में नक्सल आंदोलन की सबसे सुसंगत साहित्यिक अभिव्यक्ति लेकर आने वाले गोरख पांडे ने भी एक लेख लिखा ‘बौद्ध दर्शन और धर्मनिरपेक्षता’ । सनद रहे कि यह लेख सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में आयोजित दर्शन की एक संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया था । जिस तरह मार्क्सवाद के साथ संवाद के लिए अंबेडकर ने बुद्ध के चिंतन को नया रूप दिया था उसी तरह गोरख पांडे ने धर्मनिरपेक्षता से उसके रिश्ते को व्याख्यायित करने के लिए बौद्ध धर्म और बौद्ध दर्शन को एक दूसरे से अलगाया और बौद्ध दर्शन में भावना की जगह बुद्धि की प्रबलता को माना ।

अंबेडकर की इस पुस्तिका पर देश के भीतर और दुनिया भर में व्याप्त मार्क्सवाद के तत्कालीन आकर्षण की छाया है । उस समय के बौद्धिकों में रूस की बोल्शेविक सत्ता का आकर्षण तो था ही, 1949 में चीन की क्रांति भी संपन्न हो चुकी थी । उसके ठीक पड़ोसी देश नेपाल में वह सम्मेलन चल रहा था जिसमें अंबेडकर भाषण दे रहे थे । चीन के बौद्धों में मार्क्सवाद का गहरा असर था शायद इसलिए भी वे इस पुस्तिका में मार्क्सवाद से संवाद करना जरूरी समझ रहे थे । इस अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति के साथ हमारे देश के वातावरण ने भी उन्हें मार्क्सवाद के साथ संवाद के लिए प्रेरित किया होगा । 1952 के पहले आम चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी संसद में दूसरा सबसे दल बनकर उभरी थी । उस पहले ही चुनाव में सबसे अधिक वोट एक कम्युनिस्ट प्रत्याशी को मिले थे । केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत कई विधानसभाओं में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी की मजबूत मौजूदगी थी । कुछ ही समय बाद दूसरे चुनाव में पहली विपक्षी सरकार का गठन कम्युनिस्टों के नेतृत्व में होना था । ‘ हिन्दी-चीनी भाई भाई ’ का जमाना था । इन सब चीजों का गहरा प्रभाव इस पुस्तिका पर दिखाई पड़ता है । खुद अंबेडकर के राजनीतिक मंचों के नाम इस धारा के साथ उनके लगाव का सबूत देते हैं । 1936 में स्थापित इंडिपन्डेन्ट लेबर पार्टी का मकसद ही पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद की जुड़वां चुनौतियों से लड़ना और मजदूर वर्ग का समर्थन करना था । इस लेबर पार्टी ने स्वाधीनता से पहले कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के साथ मिलकर बंबई इलाके में किसानों की सबसे बड़ी गोलबंदी की । न केवल इतना बल्कि मजदूरों की हड़तालों पर रोक लगाने वाले कानून के विरोध में कम्युनिस्टों के साथ मिलकर सूती मिल के मजदूरों के प्रदर्शन आयोजित किए । जिस साल यह पुस्तिका लिखी गई उसी साल उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी आफ़ इंडिया की स्थापना की । यह नाम उन्हें दास प्रथा की समाप्ति के लिए लड़ने वाले लिंकन की पार्टी से मिला था । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि दास प्रथा की समाप्ति की लिंकन की इस लड़ाई को मार्क्स का भी सक्रिय साथ मिला था ।

मार्क्सवाद के साथ संवाद बनाने की अंबेडकर की इसी प्रवृत्ति का परिणाम है कि एक पाश्चात्य मार्क्सवादी अंतोनियो ग्राम्शी के साथ उनकी तुलना करते हुए 2013 में रटलेज से कोसिमो ज़ीन के संपादन में ‘द पोलिटिकल फिलासफीज आफ़ अंतोनियो ग्राम्शी ऐंड बी आर अंबेडकर: इटिनेरेरीज आफ़ दलित्स ऐंड सबअल्टर्न्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब के शुरू में संपादक की लंबी भूमिका और अंत में उपसंहार के अलावा पांच भाग हैं । पहले भाग के तीन लेखों में निम्न वर्गों और दलितों को इतिहास के कर्ता के रूप में देखने और स्थापित करने की प्रक्रिया का विवरण है । दूसरे भाग के दो लेखों में बौद्धिकों के प्रकार्य का विश्लेषण किया गया है । तीसरे भाग के तीन लेखों में निम्नवर्गीयता और सहजबोध का संबंध समझाया गया है । चौथे भाग के दो लेखों में दलित साहित्य, निम्नवर्गीयता और चेतना के निर्माण को देखा गया है । अंतिम पांचवें भाग में तीन लेखों में निम्न वर्गों तथा दलितों के धर्म की चर्चा की गई है । कहने की जरूरत नहीं कि दलित समस्या पर विचार के मामले में एक मशहूर मार्क्सवादी विचार की सृजनात्मक विश्लेषण क्षमता का मेल अंबेडकर की पद्धति से नजर आता है जिसमें दलित प्रश्न पर एकांगी तरीके से नहीं बल्कि समग्रता के साथ सोचा गया है ।

अंबेडकर के साथ मार्क्सवाद के मिलाप की सम्भावना को ही ध्यान में रखकर भाकपा (माले) के महासचिव विनोद मिश्र ने उन्हें ‘क्रांतिकारी जनवादी’ कहा था । मार्क्सवादी लोग यह विशेषण आम तौर पर उन गैर मार्क्सवादियों को देते हैं जिनका चिंतन मार्क्स के चिंतन से सबसे अधिक निकट का होता है । यही नहीं जमीन पर सामंती स्वामित्व को तोड़ने के लिए अंबेडकर की ही तर्ज पर उन्होंने भूमि के राष्ट्रीकरण का प्रस्ताव किया था । वर्ग और जाति की पारस्परिकता का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा ‘ कतिपय ऐतिहासिक परिस्थितियों में यह (वर्ग) खुद को जातियों के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है, दूसरी स्थितियों में ये दोनों साथ-साथ गुंथे भी रह सकते हैं, एक दूसरे को ढंक ले सकते हैं और उसी समय एक दूसरे को काट भी सकते हैं । फिर एक भिन्न परिस्थिति में जातियां विखंडित होकर वर्गों का भी निर्माण करती हैं ।’ जाति और वर्ग के अंतर्संबंध की इस गतिशील समझ ने भाकपा (माले) को दलित महासभा के गठन की प्रेरणा भी दी थी । उन्होंने मार्क्सवाद और अंबेडकर के बीच व्यावहारिक सहकार की गुंजाइश का संकेत करते हुए बताया ‘बेशक, भारतीय जनवादी क्रांति के फौरी संदर्भ में कार्यवाहियों का मार्क्सवादी कार्यक्रम अंबेडकरवाद के रैडिकल पक्ष के साथ काफी कुछ साझेदारी कर सकता है—’। इसी बात को और भी अच्छी तरह से फिर बताते हैं ‘—मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि रैडिकल अंबेडकरपंथी शक्तियों के साथ किसी मंच में शामिल होना या अंबेडकर जयन्ती समारोह में हमारे लोगों का शरीक होना किसी भी तरह हमारी पार्टी की नीति के खिलाफ नहीं जाता है । हम अंबेडकर को एक रैडिकल जनवादी मानते ही हैं और अपने मुश्तरका जनवादी प्रयासों में हम रैडिकल अंबेडकरपंथी शक्तियों के साथ हाथ मिलाने के बिलकुल पक्षधर हैं ।’ उन्होंने पार्टी की नीति घोषित किया कि ‘जाति उत्पीड़न के खिलाफ और दलितों की सामाजिक समानता के लिए संघर्ष का बीड़ा उठाते समय वर्गसंघर्ष का दायरा बढ़ाना ही मार्क्सवादियों के लिए एकमात्र प्रस्थान बिन्दु हो सकता है ।’ अंबेडकर का समग्र मूल्यांकन करते हुए उन्होंने लिखा ‘सामाजिक-आर्थिक पहलू से अंबेडकर गांधी से, और यहां तक कि नेहरू से भी ज्यादा रैडिकल थे । राजनीतिक रूप से भी वे भारत में राष्ट्र निर्माण की जटिलताओं के बारे में ज्यादा वाकिफ थे । उन्होंने कभी भी तमाम चीजों से ऊपर एक राष्ट्रीय नेता होने का दिखावा नहीं किया, और दलित मुक्ति को स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न अंग बनाने की जोरदार पैरवी की’ । साथ ही ‘—यही वह सवाल है जिससे स्वतंत्रता के बाद भी भारत जूझ रहा है ।’ कहना न होगा कि मार्क्सवाद की ओर से अंबेडकर के मूल्यांकन के मामले में इस बेहद रचनात्मक रुख का आधार इस तथ्य में है कि भाकपा (माले) जिन खेत मजदूरों की लड़ाई लड़ रही थी उनकी भारी तादाद दलित जाति से जुड़ी हुई है । बिहार में इस संगठन की नींव रखने वाले जगदीश मास्टर के राजनीतिक जीवन का आरम्भ अछूतिस्तान के लिए आंदोलन से हुई थी ।

मार्क्सवाद के साथ अंबेडकर ने थोड़ी बहस इससे पहले ‘जाति भेद का उच्छेद’ में भी की है । उसके तीसरे अनुभाग में वे समाजवादियों के साथ बहस करते हुए कहते हैं ‘धर्म, सामाजिक स्तर तथा सम्पत्ति- यह सभी ताकत और सत्ता के साधन हैं, जिन्हें दूसरे की स्वतंत्रता नियंत्रित करने के लिए व्यक्ति अपने पास रखता है । इनमें कोई एक समय तो दूसरा दूसरे समय प्रभावकारी होता है ।’ कुल मिलाकर वे भी वर्गसंघर्ष का दायरा बढ़ाने की वकालत कर रहे थे । असल में वे मार्क्सवाद को आर्थिक संघर्ष तक सीमित करके देख रहे थे लेकिन जहां तक सामाजिक क्रांति का सवाल है मार्क्स खुद ही इसके पक्षधर थे । उत्पादन संबंधों को वे ‘सामाजिक अस्तित्व के उत्पादन की प्रक्रिया में बनाए गए अनिवार्य संबंध’ समझते थे । शायद इसीलिए इन उत्पादन संबंधों के जंजीर बन जाने के बाद वे सामाजिक क्रांति की शुरुआत की वकालत करते थे । अपने विश्लेषण में राजनीतिक तत्व के मुकाबले सामाजिक तत्व को उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी । यहां तक कि अर्थतंत्र को भी वे सामाजिक स्वामित्व के मातहत लाना चाहते थे ।

गोपाल प्रधान
प्रो. गोपाल  प्रधान अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्राध्यापक हैं. उन्होंने विश्व साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद , समसामयिक मुद्दों पर लेखन और उनका संपादन किया है
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