Sunday, August 7, 2022
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वंचितों और पराधीन लोगों की ओर से बोलने वाले पहले दार्शनिक थे बुद्ध– प्रो. गोपाल प्रधान

” जिसे बौद्ध दर्शन का दुःखवाद कहा जाता है उसे अगर सामान्य जीवन के अर्थों में परिभाषित करें तो क्या परिभाषा निकलती है कि दुःख पैदा होता है अभाव से,वंचना से! इस तरह अभावग्रस्त,वंचित व पराजित लोगों की ओर से बोलने वाले बुद्ध पहले दार्शनिक थे।जो आनंदवादी दर्शन है जो खुद को दर्शन की मुख्यधारा में होने का दावा करता है जिसे ब्राह्मणवाद भी कहा जाता है,उसके विद्रोह के रूप में बौद्ध दर्शन सामने आया जो आनंद को नही बल्कि दुःख पर केंद्रित है।” ये बातें प्रो. गोपाल प्रधान ने 8 दिसम्बर को संजयनगर, गाजियाबाद स्थित मैत्रेयी बौद्ध विहार में आयोजित ‘ बौद्ध धम्म और डॉ. अम्बेडकर’ विषयक गोष्ठी में मुख्य वक्ता के बतौर बोलते हुए कहीं।


अनुसूचित जाति शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन व जसम के संयुक्त तत्वधान में यह गोष्ठी बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस (6 दिस.) के अवसर पर आयोजित की गई थी।

इस गोष्ठी में आगे बोलते हुए गोपाल प्रधान ने कहा कि इतिहास हमेशा वर्तमान को प्रभावित करे यह जरूरी नहीं कई बार वर्तमान इतिहास को पुनराविष्कृत करता है।इस लिहाज से जो आज भारत मे संकट है उसने बौद्ध दर्शन व धर्म को आज के जरूरतों के हिसाब से समझने और उसे जीवन मे उतारने की जरूरत है।उन्होंने कहा कि बौद्ध धम्म को अलग अलग समय मे अलग तरीके से खोजा गया है।भारत के स्वन्त्रता संग्राम में अहिंसा का सिद्धांत मूलतः बौद्ध दर्शन की देन है।हालांकि बौद्ध दर्शन व धर्म को मिटा देने उसपर पर्दा डालने की बहुत कोशिशें हुईं पर ऐसा हो नहीं पाया। बौद्ध धम्म हर संकट के समय पुनर्जीवित हो उठा।


उन्होंने बौद्ध दर्शन के प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म अनित्यता की बात करता है अर्थात कोई भी शासन, कोई भी शोषणकारी व्यवस्था स्थायी नहीं रह सकती,उसे बीतना ही है।संसार मे कुछ भी स्थिर व स्थायी नहीं है।इसी प्रकार अनात्म का सिद्धान्त यह बताता है कि इस शरीर के अलावा किसी आत्मा का अस्तित्व नहीं है।कुछ भी अगम व अगोचर नहीं है। प्रो प्रधान ने इस सिद्धांत की भौतिकतावाद के उत्स के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने बुद्ध के सिद्धांत को और अधिक क्रांतिकारी रूप में समझा और भारत की दलित उत्पीड़ित जनता के मुक्ति की लड़ाई में उसका प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने अपनी अंतिम पुस्तक ‘बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स’ में बुद्ध को मार्क्स के साथ समझा है क्योंकि उन्होंने उत्पीड़ित मानवता के मुक्ति के दर्शन के रूप में दोनों विचारों की तुलना की। संविधान सभा में भारत में लोकतंत्र के आधार को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था भारतीय लोकतंत्र की प्रेरणा बुद्ध के सिद्धांतों में समाहित है। उन्होंने आज की समस्याओं के संदर्भ में बुद्ध के दर्शन के मर्म को समझने और आम जनता तक ले जाने की जरूरत पर बल दिया।


गोष्ठी की अध्यक्षता पूर्व आईएएस व बौद्ध चिंतक श्री मामराज सिंह ने की। उन्होंने बौद्ध दर्शन के प्रतीत्ययसमुत्पाद को समझाया और बौद्ध धम्म के अनीश्वरवाद की व्याख्यायित किया । उन्होंने भारत से बौद्ध धर्म के पराभव की परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए श्रीलंका में सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा द्वारा बौद्ध धम्म के प्रचार व विकास की स्थितियों के बारे में बताया।
गोष्ठी में मैत्रेयी बौद्ध विहार के अध्यक्ष श्री बलबीर सिंह व जनार्दन राम ने भी अपने विचार रखे।कार्यक्रम का संचालन धर्मेंद्र कुमार ने किया आधार वक्तव्य रामायन राम तथा आथितियों व श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन सुलक्षणा जी ने किया।


इस गोष्ठी में मुख्य रूप से अनुसूचित जाति वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री ब्रह्मदत्त जी, वी एन सिंह,संजय कुमार, श्री ओ एस गौतम,डॉ अनिल लाल,मनीष यादव समेत अच्छी संख्या में अध्यापकों व बुद्धिजीवी श्रोताओं की उपस्थिति रही।

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