चित्रकला

चित्रकला अन्य सभी कलाओं से अपने स्वरुप, शक्ति और सीमाओं में, न केवल भिन्न ही है ; यह एक ‘ संग्रहणीय ‘ कला भी है . अर्थात चित्रकला में रसास्वादन से साथ साथ, आर्थिक रूप से संपन्न कलाप्रेमी , पैसों के विनिमय से इसे खरीद और संग्रह भी कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में कला का ‘ मालिकाना ‘ हस्तांतरित होकर कलाकार से चित्र के क्रयकर्ता के पास पहुँच जाता है, जो अपने इच्छानुसार इसे ऊँचे दाम पर बेच कर ‘ मुनाफा ‘ कमा सकता है. यहीं नहीं, धनिकों के बीच की आपसी प्रतिस्पर्धा का लाभ उठा कर चित्रों को नीलाम कर ऊँची से ऊँची कीमत पर उसे पहुँचाया जा सकता है.

ऐसे में, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या चित्रकला को अन्य कलाओं के समकक्ष रखना तर्क संगत है ? क्योंकि उपरोक्त विवरणों से यदि हम सहमत होते है तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि चित्र और वाणिज्यिक माल या पण्य में कोई अंतर नहीं है. साथ ही यह एक ऐसा पण्य है , जिसका उपयोग केवल धनी और धनी बनने की जुगत में लगे क्षमता सम्पन्न वर्ग तक ही सीमित है.

आधुनिक काल में, विपणन (मार्केटिंग) , प्रबंधन (मैनेजमेंट) और संचार माध्यमों को पैसे देकर (पेड मीडिया) इस माल की कीमत मनमाने ढंग से बढ़ायी जा सकती है. इस लोभ और लाभ के सम्मिलित प्रयास से एक ‘चित्र’ (चित्रकार की रचना !) इस सट्टे बाज़ार का महज़ एक ‘माल’ बन कर रह जाता है।

इस सन्दर्भ में विलियम हेनरी ब्रूक (1772-1860) का बनाया हुआ चित्र ‘ रोटुंडा, न्यू  ओरलिअंस में जायदादों , गुलामों  और चित्रों की बिक्री ‘ चित्रकला के साथ जुड़े तमाम रोमानी धुंध को हटा कर हमें एक ऐसे हक़ीक़त के सामने खड़ा कर देता है जिसे चित्रकार विलियम हेनरी ब्रूक ने 200 सालों पहले शायद किसी और सन्दर्भ में चित्रित किया था.

इस चित्र का समय अमरीका में गुलामों की व्यापक बिक्री-खरीद का था और इस चित्र को लन्दन के फिशर एंड संस द्वारा प्रकाशित ‘द स्लेव स्टेट्स ऑफ अमेरिका’ में 1842 में शामिल किया गया था. यहाँ यह जानना जरूरी है कि  22 सितम्बर 1862 को अमरीका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा के अंत का ऐलान किया था.

इस चित्र के मध्य भाग में , रोटुंडा के एक होटल के हॉल में शराब के बैरलों के साथ साथ दासों की नीलामी होते देखा जा सकता है (चित्र-1) जबकि चित्र के बाँयी ओर जमीन जायदादों की (चित्र-2) नीलामी हो रही है. चित्रकार विलियम हेनरी ब्रूक ने इन दोनों नीलामी के समान ही चित्रों को (चित्र-3) भी नीलाम होते दिखाया है.

यह चित्र हालाँकि अपने ऐतिहासिकता के लिए चर्चित रहा है और अमरीका में दासप्रथा का दस्तावज है , पर साथ ही यह बिना किसी लाग लपेट के,  ‘चित्र’ को एक विपणन योग्य पण्य ( मार्केटेबल कमोडिटी) के रूप में स्थापित भी करता है ( हालाँकि यह इस चित्र का प्राथमिक उद्देश्य नहीं है ) , और इसी कारण  से यह चित्र एक नए अर्थ के साथ चित्रकला के इतिहास में अपने को एक महत्व दस्तावेजी चित्र होने का दावा पेश करता है.

यहाँ यह जोड़ना आवश्यक है कि चित्रकार विलियम हेनरी ब्रूक के इस चित्र के बाद एक लम्बा समय बीत चुका है और इस दौरान चित्रकला के बाज़ार ने छद्म , नीचता और जनविरोधी कार्यकलापों को एक ऐसा कुत्सित चेहरा अख्तियार किया है जहाँ कई चित्रकारों को अन्य कला विधाओं के रचनाकारों के साथ पंगत में साथ बैठने में शर्म का अनुभव होता है.

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