इलाहाबाद। बाल भारती स्कूल सिविल लाइन में 11 जुलाई को कोरस इलाहाबाद द्वारा युवा चर्चित कवि शिवांगी गोयल का काव्य संग्रह ” हजारो निशान ” पर एकल काव्य पाठ तथा परिचर्चा का आयोजन किया गया। हाल ही में यह संग्रह वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
काव्य संग्रह ” हजारों निशान ” पर बातचीत शुरू करते हुए रूपम मिश्र ने कहा कि शिवांगी की कविताएं स्त्री की आत्मा पर पड़ी खरोचों की कविताएं हैं। शिवांगी ने प्रचलित कविताओं के प्रतिबिम्ब के बांध को तोड़ दिया है। यह आने वाले समय में इतिहास में दर्ज होंगीं। शिवांगी की कविताएं गद्यात्मक शैली में हैं लेकिन सच को उजागर करती हैं। रूपम मिश्र ने उनकी काव्य भाषा और सपाट बयानी की विस्तार से चर्चा की।
प्रो. बसंत त्रिपाठी ने कहा कि शिवांगी के लिए उन कविताओं को लिखना आसान नहीं था। ये यातनायें थीं। उसे कविता में उतारना आसान नहीं था। समाज से ऐसी घटनायें खत्म होनी चाहिए जिससे ऐसी कविताएं लिखने की जरूरत न पड़े। कलात्मकता और सपाट बयानी पर उन्होंने रघुवीर सहाय को याद किया। सपाट बयानी की कविताएं लिखी जानी चाहिए। शिवांगी गोयल के पहले काव्य संग्रह ‘ हजारों निशान ‘ में प्रवेश करने के कई रास्ते हैं। नरेटर और क्रिएटर को एक नहीं मानना चाहिए। कई जगह क्रिएटर अलग होता है। ” पितृसत्ता में स्त्री देह को केंद्र में रख दिया जाता है। शिवांगी उस पर कई सवाल उठाती हैं। इतिहास से न सीख कर उसे दोहराना सबसे बड़ी भूल है।

सुप्रिया पाठक ने कहा कि ‘ घर कितना बड़ा ‘ कविता को पढ़ कर वर्जिनिया वॉल्फ वुल्फ़ याद आती हैं कि घर इतना बड़ा होना चाहिए कि रोने के लिए एक कोना होना चाहिए। यह स्त्री विमर्श की सबसे सुंदर कविता है। यह इस काव्य संग्रह की सबसे सुंदर कविता है। सपाट बयानी स्त्री विमर्श के लिए सबसे अच्छी शैली है क्योंकि स्त्रियों के हिस्से कभी रेशम नहीं आया। इसे जानने के लिए इतिहास में जाना होगा। शिवांगी की कविताएं आने वाले समय का दस्तावेज हैं। “माँ से झगड़ा “कविता में एक बेटी अपनी माँ से संवाद करती हैं। इस धरती पर सबसे सुंदर है संघर्ष। एक उम्मीद बनी रहनी चाहिए। न उम्मीद होना स्त्री आंदोलनों के लिए खतरा बन जायेगा। ‘ तुम क्या हो ‘ यह किसी एक के लिए नहीं है यह पूरी स्त्री समुदाय के लिए हैं जिनके साथ घटनाएं होती हैं। इन कविताओं में रंग रोगन नहीं किया गया हैं। चढ़ा बढ़ा कर नहीं लिखा गया हैं।
आलोचना पत्रिका के संपादक आशुतोष कुमार ने कहा कि ‘हज़ारों निशान’ की कविताओं के बारे में एक वाक्य कहना हो तो मैं कहूंगा- यह संग्रह प्रेम के लिए लिखा गया एक प्रेम- पत्र है। बेशक इन कविताओं पर हमारे पौरुषपूर्ण हिंसक समाज में स्त्री होने की यंत्रणाओं के हजारों निशान मौजूद हैं, लेकिन इनका असली महत्व इस बात में है कि ये प्रेम को रिक्लेम करती स्त्री की कविताएं हैं। यह महत्वपूर्ण है कि नई पीढ़ी की हिंदी कवियों ने प्रेम और प्रणय को रिक्लेम किया है, हत्याओं के समय में भी। हत्या की संस्कृति प्रेम के तिरस्कार और अवमूल्यन पर खड़ी होती है। वह पितृसत्ता, धर्म तंत्र और पूंजीवाद द्वारा पोषित विद्वेष और घृणा को मजबूत बनाती है। वह प्रेम से भयभीत होती है। वह जीवन में प्रेम का निषेध करती है और साहित्य में एक ऐसी फैंटेसी में बदल देती है, जिसका इस्तेमाल वास्तविक अभाव को ढकने के लिए किया जा सके।

प्रो सदानंद शाही ने कहा कि शिवांगी गोयल के लिए कविता एक सर्वोत्तम मूल्य है। वे मानती हैं कि इंसान की मौत तो एक सानिहा (त्रासदी) है ही, पर कविता की मौत भी उतना ही बड़ा सानिहा है। उनकी यह दृष्टि हमें मीर तक़ी मीर की याद दिलाती है, जिन्होंने कहा था— “ मसाइब और थे पर दिल का जाना, अजब एक सानेहा सा हो गया है।”
उन्होंने कहा कि हमारे समय में, जहाँ प्रेम को सबसे लांछित शब्द बना दिया गया है और हर तरफ नफ़रत व हिंसा का दौर है। मैं शिवांगी की कविताओं को हमेशा प्रेम के पक्ष में खड़ा पाता हूँ। उनकी कविता ‘अनचाहे निशान’ आज की स्त्री की मूक पीड़ा और सामाजिक बर्बरता को उजागर करती है।
प्रो शाही ने कहा कि कविताओं में ‘प्रेमी में माँ को देखना दरअसल एक नये तरह के पुरुष की कामना है। यह आज के समाज के ‘अतिरिक्त मर्दवाद’ का जवाब वे ‘अतिरिक्त स्त्रीवाद’ से देने के प्रयास के रूप में बुनती हैं। ये उन सवालों के जवाब हैं, जो सवाल अमूमन पूछे ही नहीं जाते, या जिनके जवाब हमारे समाज के पास हैं ही नहीं। शिवांगी की कविताओं में हमें सादगी का एक नया सौंदर्यशास्त्र दिखाई पड़ता है।

उन्होंने “बनो तथागत, वापस आओ ” को संग्रह की एक बेहद मर्मस्पर्शी और आज के समय की सबसे ज़रूरी कविता बताते हुए कहा कि यह कविता आज की व्यवस्था, हमारे समाज के मूक देवताओं और बुद्ध की करुणा की याद ही नहीं दिलाती, बल्कि हमें भीतर तक झकझोरती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि हरीशचंद्र पाण्डेय ने कहा कि किसी कवि का पहला संग्रह अंतर्वस्तु के लिहाज से बहुत बेजोड़ होता है। शिवांगी की कविता में सादगी भले हो, पर अर्थ के कई गहरे स्तर दिखते हैं। ‘ रोटियां ‘ कविता का विशेष तौर पर उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अपने कलेवर में छोटी होते भी यह कविता अपने प्रभाव में बहुत मारक है –
दहेज में ‘कार’ लिए बिना/ ससुराल आई लड़की/ किचन में रोटियां बना रही है
सास अपने बेटे से/ कुछ बुदबुदा रही है
रोटियाँ चिल्ला रही हैं
“जलना मत!”
कार्यक्रम की शुरुआत में शिवांगी गोयल ने अपनी कविताओं का पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन जसम इलाहाबाद के सचिव कवि धुरिया ने किया।
कार्यक्रम में विवेक तिवारी, प्रियदर्शन मालवीय , सीमा आजाद, विश्वविजय, विवेक निराला, सूर्य नारायण, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता, केके पाण्डेय , अशोक पाण्डेय, सोनाली, ज्योति शुक्ला , प्रतिमा रानी, गोविंद निषाद, सचिन गुप्ता सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

