समकालीन जनमत
जनमत

बरुईपुर ‘‘मुठभेड़’’ के आइने में योगी-प्रदेश के मुखर आँकड़े

9 साल में 289 मौतेंः बरुईपुर ‘‘मुठभेड़’’ के आइने में योगी-प्रदेश के मुखर आँकड़े

आलोचकों का कहना है कि 2017 से 2025 के बीच 42 गैर-यादव पिछड़े, 20 ब्राह्ममण, 18 ठाकुर, 16 यादव और 14 अनुसूचित जातियों के लोग आदित्यनाथ के उत्तर-प्रदेश में अपनी जानें गँवा बैठे

पीयूष श्रीवास्तव

 

अपराधी को लेकर जा रहा पुलिस-वाहन पलट जाता है, आरोपी पुलिस का रिवाल्वर छीनकर गोली चला देता है। आत्मरक्षा मंे पुलिस द्वारा चलायी गयी गोली से आरोपी की मौत हो जाती है।
बरुईपुर? नहीं, कानपुर, 2020। आरोपी है विकास दूबे, एक अपराधी जिसके गिरोह के लोगों ने कुछ दिन पहले गिरफ्तारी की कार्रवाई के दौरान 8 पुलिसवालों की हत्या कर दी थी।

चोरी का एक अभियुक्त एक दर्जन पुलिस-बल पर गोली चलाता है। पुलिस द्वारा जवाबी गोलीबारी की जाती है और अभियुक्त के बाँयें पाँव में गोली लग जाती है।
बरुईपुर? नहीं, फतेहपुर, बुधवार को। अभियुक्त है धर्मेन्द्र कुमार।
हत्या का एक अभियुक्त गिरफ्तारी की मुहिम के दौरान गोली चलाता है, पुलिस जवाबी फायरिंग करती है, अभियुक्त मारा जाता है, उसके साथी भाग निकलते हैं।
बरुईपुर? नहीं, अम्बेडकर नगर, मंगलवार को। मृत आरोपी है आसिफ अली।
जब बरुईपुर बलात्कार और हत्या के आरोपी प्रवास मोन्डल को कथित रूप से एक अधिकारी की रिवाल्वर छीनकर गोली चला देने पर बंगाल पुलिस ने ‘‘आत्म-रक्षा’’ में मार गिराया, तो साफ दिखाई पड़ा कि यह तो उत्तर-प्रदेश के योगी आदित्यनाथ माॅडल की हूबहू नकल है।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार उत्तर-प्रदेश में पिछले नौ सालों में 17,043 मुठभेड़ें हुयी हैं। कुल मिलाकर 289 ‘‘अपराधी’’ मौत के घाट उतार दिये गये हैं, 11,834 आरोपियों को ज़ख़्मी कर दिया गया है और इन झड़पों में 34,253 गिरफ्तारियाँ भी हुयी हैं। आमने-सामने की गोलीबारियों में अठारह पुलिसवाले मारे भी गये हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार इस प्रदेश में अपराधों में राष्ट्रीय-औसत के मुकाबले उल्लेखनीय गिरावट आयी है। 2024 में उत्तर-प्रदेश में हत्या के 3,218 मामले दर्ज किये गये (राष्ट्रीय-दर 1.9 के मुकाबले राज्य की दर 1.3 प्रति लाख आबादी), बलात्कार के दर्ज मामले 3,209 (राष्ट्रीय-दर 4.3 के मुकाबले राज्य की दर 2.8 प्रति लाख आबादी), महिला-उत्पीड़न के दर्ज मामले 4,4018 (राष्ट्रीय-दर 7.1 के मुकाबले राज्य की दर 3.9 प्रति लाख आबादी), दंगों के दर्ज मामले 2,610 (राष्ट्रीय-दर 2.2 के मुकाबले राज्य की दर 1.1 प्रति लाख आबादी) और फिरौती के लिये दर्ज मामले 26 (राष्ट्रीय-दर 0.1 के मुकाबले राज्य की दर 0.0 प्रति लाख आबादी) थे।
उत्तर-प्रदेश में मुठभेड़ों में हत्या और अपंग बना दिये जाने की घटनाओं की गति में असाधारण तेजी आयी है, एक ही कहानी बार-बार दुहरायी जाती है। वारदात- हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, डकैती, चोरी, गो-हत्या कुछ भी हो- कहानी आश्चर्यजनक रूप से एक ही होती है। आरोपी छापामार दस्तों पर या तो अपने या पुलिस से छीने गये हथियारों से गोली चलाता है और कानून आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करता है।
अपराधी या तो मार डाला जाता है या उसके घुटने के ठीक ऊपर या नीचे गोली लगती है। कानून लागू करनेवाले तबकों में टाँगों पर निशाना बना कर गोली चलाने को नाम दिया गया है- आॅपरेशन लँगड़ा, जिसमें गोली सिर्फ अपंग बनाती है, जान से नहीं मारती।
13 जून को इटावा जिले में जब एक गोली ने शफीक खान की हड्डियों के परखचे उड़ा दिये तो पुलिस अधीक्षक श्रीश चन्द्रा को त्वरित न्याय का जश्न मनाते हुये देखा गया था।
इस अधिकारी का बयान था, ‘‘आरोपी ने नौ साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार का प्रयास किया था। चार घंटे के अन्दर उसे नसीरपुर बोझा-घुघसीना मार्ग पर पकड़ा गया। मोटरसाइकिल पर सवार आरोपी ने एक अवैध पिस्तौल से पुलिस-बल पर गोली चलाई। पुलिस ने जब आत्मरक्षा में गोली चलाई तो वह उसकी दाँयी टाँग में जा लगी।
इन बयानों का लहज़ा ठीक वैसा ही समझ में आता है जैसा कि आदित्यनाथ बार-बार सार्वजनिक मंचांे से दुहराते रहते हैं- अपराधों पर ‘‘जीरो टाॅलरेंस’’ नीति। मुख्यमंत्री ने बारहा कहा है, ‘‘अब उत्तर-प्रदेश में कोई भी बहनों-बेटियों का उत्पीड़न करने की हिम्मत नहीं करता। अगर कोई एक चैराहे पर ऐसा करने की कोशिश करता है तो अगले चैराहे तक पहुँचने से पहले वह चल बसेगा या सड़क पर कहीं (घायल) पड़ा मिलेगा।’’ इसके अलावा लगता है कि मुठभेड़ में एक जाति और धर्म का भी कोण होता है, क्योंकि आलोचक इस बात की ओर भी संकेत करते हैं कि 2017 से 2025 के बीच ऐसी कार्रवाइयो मे 62 मुसलमान, 42 गैर-यादव पिछड़ी जातियों के लोग, 20 ब्राह्मण, 18 ठाकुर, 16 यादव और अनुसूचित जातियों के 14 लोग मारे गये हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का कहना है कि ‘‘सरकार मुसलमानों और पिछड़ी जातियों के लोगों के प्रति ईष्र्यालु है।’’ माना जाता है कि इन दो समुदायों के लोग परम्परागत रूप से समाजवादी पार्टी के पक्षधर हैं।
अखिलेश का दावा है कि मासूम लोगों को फ़र्ज़ी मामलों में फँसा दिया जाता है और ‘‘असली अपराधियों’’ को बचा लिया जाता है। उरई जिले में उत्पीड़न की एक पीड़िता का बयान इस दिशा में काफी कुछ कह देता है। उस महिला के तथाकथित उत्पीड़न और उसके द्वारा शोर मचाने पर उसे मार डालने की कोशिश के मामले में घटना के पाँच माह बाद पुलिस ने एक भाजपा नेता पंकज पांडेय, पुलिस के एक दरोगा और तीन दूसरे सिपाहियों के ख़िलाफ़ बुधवार को मुकदमा दर्ज किया। कहा जाता है कि स्थानीय पत्रकारों के साथ बातचीत में उसने बताया था कि ‘‘एक स्थानीय अदालत के निर्देश पर यह मुकदमा दर्ज किया गया था।’’ एक गिरोही सरगना और पूर्व-सांसद अतीक अहमद और उसके पूर्व-विधायक छोटे भाई अशरफ की 15 अप्रैल 2023 को जब लाइव टीवी पर गोली से उड़ा दिया गया था उस समय भी पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान खड़ा हो गया था। अतीक और अशरफ पुलिस की हिरासत में थे और उन्हें नियमित स्वास्थ्य-परीक्षण के लिये अस्पताल लाया गया था, और उसी समय तीन छुटभैये अपराधियों ने उन्हें बिना किसी पुलिस-प्रतिरोध के गोली मार दी जबकि उन भाइयों की सुरक्षा के लिये दर्जनों पुलिसवाले तैनात किये गये थे।
उत्तर-प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने राज्य में अपराध-दर राष्ट्रीय अपराध-दर से कम होने का दावा करते हुये एनसीआरबी की रिपोर्ट का हवाला दिया है। उनका कहना है कि ‘‘एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर-प्रदेश में प्रति-लाख आबादी पर अपराध-दर 180.2 है जबकि राष्ट्रीय अपराध-दर 250.3 है।’’ परन्तु उत्तर-प्रदेश में 2024 में 4.30 लाख संज्ञेय अपराध पंजीकृत किये गये थे जो कि देश में सबसे अधिक है। 2023 में इसकी संख्या 7.93 लाख थी।
विपक्षी दलों का कहना है कि थानों को ‘‘स्थायी निर्देश’’ दिये गये हैं कि जबतक बच निकलने का कोई रास्ता बाकी रहे, तबतक कोइ शिकायत दर्ज ही न की जाय।

‘द टेलीग्राफ’ दिनांक 09.07.2026 से साभार

अनुवादः दिनेश अस्थाना

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion