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ज़ेर-ए-बहस

खौलता कश्मीर

जॉन सोनी चेरियन

2023 में ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी का गठन क्यों किया गया और उनकी मांगें क्या थीं? उस क्षेत्र की आर्थिक कठिनाइयाँ क्या हैं? उसके केंद्र में पीओके असेंबली में शरणार्थियों के लिए 12 सीटों को समाप्त करने की मांग क्यों है? इसपर भारत की क्या प्रतिक्रिया है?

ताजा घटनाक्रम:

पूरा-पूरा पाक-अधिकृत कश्मीर आर्थिक न्याय और निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दों को लेकर किए जा रहे प्रदर्शनों के चलते एक बार फिर आंतरिक विक्षोभ के झंझावात में घिर गया है। इन प्रदर्शनों का आह्वान करनेवाले ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) को ‘आतंकवाद में संलिप्तता’ का हवाला देकर प्रतिबंधित कर दिया गया है।

जेएएसी क्या है और इसने प्रदर्शनों का आह्वान क्यों किया है?

जेएएसी, पीओके के विभिन्न नागरिक-समूहों, श्रम-संगठनों, छात्र-संगठनों, एवं सामाजिक-धार्मिक समूहों का एक साझा संगठन है, जिसका जन्म 2023 में बिजली की बढ़ती दरों और मुद्रा-स्फीति विरोधी प्रदर्शनों से हुआ था। उन्होंने 38 विदुओं का एक मांग-पत्र जारी किया था जिसमें सस्ता आटा उपलब्ध कराने, स्थानीय मंगला-बांध द्वारा उत्पादित जलविद्युत की दरों के आधार पर उचित विद्युत-दरें निर्धारित करने और पीओके असेंबली में शरणार्थियों के लिए 12 सीटों के आरक्षण को समाप्त करने की मांग भी शामिल थी।

जेएएसी को विद्युत-दरों के संबंध में आश्वस्त किया गया था परंतु उसका पालन न किए जाने पर और अधिक व्यापक प्रदर्शन हुए। मई 2024 में जेएएसी ने अपनी मांगों को लेकर मुजफ्फराबाद मार्च का आह्वान किया जिसमें इस संगठन के लगभग 75 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। इन गिरफ्तारियों के चलते नागरिकों और पुलिस के बीच भिड़ंत हो गई और कम से कम चार मौतें हुईं और सैकड़ों लोग घायल हो गए। इस हिंसा के फलस्वरूप पाकिस्तानी प्रधान-मंत्री शाहबाज शरीफ ने 82.25 बिलियन डॉलर की सब्सिडी का अनुमोदन कर दिया।

अक्तूबर 2025 में सरकारी अधिकारियों और जेएएसी के बीच की वार्ता असफल हुई और प्रदर्शन एक बार फिर भड़क उठे। इनसे उत्पन्न हिंसा में कम से कम 10 लोग मारे गए। इसके बाद सरकार कुछ मांगों पर राजी हो गई जिनमें हिंसा में मृत लोगों के लिए मुआवज़े देना, स्वास्थ्य-कार्ड लागू करने के लिए धनराशि स्वीकृत करना और विद्युत व्यवस्था में सुधार के लिए 10 लाख रुपये का अनुदान दिया जाना शामिल था।

इसमें पीओके असेंबली में शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों के मुद्दे पर एक विधिक एवं संवैधानिक विशेषज्ञों की एक उच्चाधिकार-प्राप्त समिति के गठन का निर्णय भी लिया गया था पर यह केंद्रीय-विंदु अनुत्तरित ही रह गया।

मामला इतना कैसे बिगड़ गया?  

पीओके की क्षेत्रीय असेंबली के चुनाव के लिए 27 जुलाई की तिथि घोषित की गई है। जेएएसी ने शरणार्थियों के लिए सुरक्षित 12 सीटों की व्यवस्था को समाप्त करने के लिए 9 जून को मुजफ्फराबाद मार्च की घोषणा कर दी जबकि वही दिन आगामी चुनाओं के लिए नामांकन दाखिल करने का भी दिन था।

इस मार्च को शुरू होने से पहले ही कुचल डालने की नीयत से क्षेत्रीय अधिकारियों ने जेएएसी को 2014 के आतंकवाद-निरोधी कानून के अंतर्गत प्रतिबंधित कर दिया और उसके अधिकांश बड़े नेताओं के ऊपर ईनाम घोषित कर दिये गए। उनका कहना था कि “शांति एवं सुरक्षा के प्रति इस संगठन का व्यवहार पूर्वाग्रहग्रस्त है।“ परिणामस्वरूप अधिकांश शहरों, खासतौर पर मीरपुर, रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में व्यापक प्रदर्शन हुए और पुलिसवालों और नागरिकों के बीच झड़पें भी हुईं।

रावलाकोट में इसके पहले के प्रदर्शन में शहीद मजदूर-संगठन के एक स्थानीय नेता की शव-यात्रा में 8 जून को जमा हुए कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों पर क्षेत्रीय अधिकारियों ने गोलीबारी कर दी जिसमें चार पुलिसवालों समेत कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए।

एक तरफ तो जेएएसी की हड़ताल के चलते मुजफ्फराबाद की गलियों में जीवन पंगु हो गया है तो दूसरी ओर शहर के कई हिस्सों से हिंसक झड़पों की खबरें लगातार आ रही हैं और मौतों की संख्या 30 से ऊपर निकल गई है।

क्षेत्रीय अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वहाँ अर्ध-सैनिक बलों को लगा दिया है और आगंतुकों के लिए उस क्षेत्र की यात्रा न करने की सख्त हिदायत जारी कर दी है। यह भी बताया जा रहा है कि उस क्षेत्र में इंटरनेट को भी पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।

शरणार्थियों का आरक्षण इस विवाद का केंद्र-विंदु क्यों बन गया है? 

शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों का मुद्दा ही इन प्रदर्शनों का केंद्र-विंदु है। पीओके की क्षेत्रीय असेंबली में कुल 53 सीटें हैं। इनमें से 45 सीटें जनता के चुनाव द्वारा भरी जाती हैं (33 सीटें आम जनता द्वारा और 12 सीटें शरणार्थियों द्वारा)। बाकी 8 सीटों आरक्षित हैं (5 महिलाओं के लिए, 1 किसी तकनीकी विशेषज्ञ के लिए, 1 धार्मिक विद्वान के लिए और 1 प्रवासीके लिए) और ये आम चुनाव के पश्चात नामांकन द्वारा भरी जाती हैं।

12 आरक्षित सीटें विभाजन के समय जम्मू एवं कश्मीर से आए हुए शरणार्थियों के लिए हैं। विगत लम्बे अरसे में इस समूह के लोग विभिन्न पाकिस्तानी शहरों में और वहीं की राजनीतिक व्यवस्था में रच-बस गए हैं। वस्तुतः इन 12 सीटों में से अधिकतर पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी या पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के लोग ही जीतते हैं। पत्रकार लव पुरी लिखते हैं कि, “…………इन 12 सीटों के लिए केवल 4.36 लाख पंजीकृत मतदाता हैं जबकि पीओके की सीधे निर्वाचन वाली 33 सीटों के लिए मतदाताओं की संख्या लगभग 33 लाख है। नतीजतन पाकिस्तान के एक शरणार्थी मतदाता का मत पीओके में रहनेवाले एक मतदाता के मत के मुक़ाबले कहीं ज्यादा कीमती होता है।“

पाकिस्तान का दावा है कि पीओके, या पाकिस्तान में प्रचलित संज्ञा ‘आज़ाद जम्मू एवं कश्मीर’ एक स्वतंत्र क्षेत्र है, उसकी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक अवस्थिति है और पाकिस्तान उसके आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करता है। पर इसके साथ ही क्षेत्रीय असेंबली के लिए चुने गए प्रतिनिधियों को इस आशय का शपथ-पत्र भी देना पड़ता है कि वे “जम्मू एवं कश्मीर राज्य के पाकिस्तान में विलय की मुहिम” का समर्थन करते हैं।“ इसीसे पीओके की क्षेत्रीय राजनीति में इस्लामाबाद के अवांछित हस्तक्षेप का सवाल पैदा हो जाता है।

इस प्रकार की क्षेत्रीय मांग पर अगला झटका लगा पीओके-उच्चतम न्यायालय के 7 जून के आदेश से जिसमें कहा गया है कि क्षेत्रीय असेंबली में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं और उन्हें किसी प्रशासनिक या कार्यदायी आदेश से समाप्त नहीं किया जा सकता; शरणार्थियों के प्रतिनिधित्व को समाप्त किए जाने संबंधी कोई भी मांग केवल संविधान संशोधन से ही पूरी की जा सकती है।

इस पर भारतीय या पाकिस्तानी सरकार की क्या प्रतिक्रिया है?

9 जून को भारत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि अपने नागरिकों की हत्या और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जाय। विदेश विभाग के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पत्रकार-वार्ता में कहा है कि, “ऐसी सूचना है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पुलिस की भयानक नृशंसता में कई प्रदर्शनकारी मारे गए हैं और अनेक घायल भी हुए हैं। हम आशा करते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ऐसे दमन और नृशंस कृत्य के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराएगा।“ नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूख अब्दुल्ला ने इस हिंसा की निंदा की है और संयुक्त राष्ट्र-संघ से दमन की इन घटनाओं की जांच करवाने की मांग की है।

पाकिस्तान विदेश-मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अन्द्राबी ने भारत के बयान को “सिरे से ख़ारिज़ करते हुए” कहा कि भारत जैसे देश के लिए, “जिसने जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का निरंतर विरोध किया है, यह कतई जायज़ नहीं है कि वह कश्मीरियों के हक़ में बयान जारी करे।“

यह उथल-पुथल वैश्विक गुस्से का बायस भी बना है। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार समूह ने कहा है कि इस प्रतिरोध पर जारी व्यापक-दमन “क्षेत्र में मानवाधिकारों का भयानक-क्षरण है।“

6 जून को लगभग 30 ब्रिटिश सांसदों के समूह ने अपने विदेश विभाग को एक पत्र लिखकर पीओके में संचार बाधित किए जाने पर, गिरफ्तारियों पर और बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से इस मामले से सक्रिय रूप से जुड़कर कूटनीतिक राह से क्षेत्र में तनाव को कम किए जाने को प्रोत्साहित किए जाने की मांग की है।

द हिन्दू दिनांक 14.06.2026 से साभार अनुवाद: दिनेश अस्थाना 

 

 

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