बिहार की प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत और आज की चुनौतियाँ’ विषय पर केन्द्रित संगोष्ठी- सह काव्य पाठ का आयोजन
बेगूसराय । जन संस्कृति मंच (जसम) और जनवादी लेखक संघ (जलेस) के संयुक्त तत्वावधान में बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के सभागार में ‘बिहार की प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत और आज की चुनौतियाँ’ विषय पर रविवार को संगोष्ठी – सह काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इसके मुख्य अतिथि लखनऊ से पधारे लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार व जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जलेस बेगूसराय के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र साह ने की तथा संचालन डॉ० निरंजन कुमार ने किया। सभी का स्वागत जसम के जिला अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने अदम गोंडवी की एक ग़ज़ल से किया।
विषय पर मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए कौशल किशोर ने कहा कि यह दौर है जब इतिहास और हमारी विरासत पर हमले हो रहे हैं। हमलावर चाहते हैं कि हम उन्हें भूल जाएं और याद रखें कि भारत के बारह सौ साल का इतिहास हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का है। ऐसे में अपनी स्मृतियों को बचाना वर्तमान के संघर्ष का हिस्सा है। बिहार की संस्कृति वर्चस्ववाद व प्रतिगामी धारा के विरुद्ध संघर्ष से निर्मित हुई। यह बुद्ध, बाबू कुंवर सिंह, सहजानंद सरस्वती के साथ दिनकर, रेणु, नागार्जुन आदि की भूमि है जो आज की चुनौतियों के समक्ष डट जाने की प्रेरणा देती है।

आगे कौशल किशोर ने कहा कि तानाशाही, पूंजीवादी लूट और सरकारों का दमन पहले भी था परन्तु यह तो हत्या कर जश्न मनाने का दौर है। अपराधियों -बलात्कारियों को प्रतिष्ठा मिल रही है। डॉ० अम्बेडकर ने आजादी के समय मनु के शासन की समाप्ति की बात कही थी। आज उसकी वापसी हो गयी है। दकियानूसी विचारों अर्थात अवैज्ञानिक विचारों को प्रचारित करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। कारपोरेट लूट से आर्थिक असमानता व लोगों की दिक्कतें बढ़ी हैं।
कौशल किशोर का कहना था कि बहुमत की सरकार का होना लोकतंत्र के लिए अभिशाप हो गया है। मुक्तिबोध ने साठ के दशक में कहा था ‘सारे वस्त्र उतार रीछ नग्न हुआ ‘। सारी लोकतांत्रिक मर्यादा नष्ट हो चुकी है। यह फासीवाद का लक्षण है। भारतीय राज्य ऐसे ही राज्य में बदल चुका है। कहने के लिए भाजपा की सरकार है लेकिन वास्तव में यह आर०एस०एस० की सरकार है। इसका हमला राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इसलिए हमारे समक्ष मुख्य चुनौती सांस्कृतिक पर्यावरण को बचाने तथा उसे प्रगतिशील और जनवादी संस्कृति की दिशा में आगे बढ़ाने की है।
जलेस बिहार के सचिव, कवि कुमार विनीताभ ने विषय पर कहा कि बिहार की साहित्यिक व सांस्कृतिक विरासत काफी समृद्ध रही है। इस राज्य का ‘बिहार’ नामकरण ही अपने आप में प्रगतिशीलता का प्रतीक है। यहाँ धार्मिक संकीर्णता के विरुद्ध संघर्ष की गौरवशाली परंपरा है। गौतमबुद्ध, महावीर की यह कर्मभूमि रही है। उन्होंने अपने समय में वर्चस्ववाद के विरुद्ध संघर्ष किया। शिक्षा, समाज, राजनीति के क्षेत्र में किए उनके काम के तौर पर हम उस दौर में नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय को देखते हैं।

कुमार विनीताभ ने आगे कहा कि कबीर, विद्यापति के बाद आधुनिक युग में शिवपूजन सहाय, दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, रेणु, नागार्जुन, भिखारी ठाकुर आदि अनगिनत साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों ने प्रगतिशील धारा को समृद्ध किया। दुखद है कि बिहार की इस गौरवशाली परंपरा को सांप्रदायिक शक्तियाँ चुनौती दे रही हैं। पूॅंजीवादी राजनीति बिहार की सामासिक संस्कृति को विघटित करने की साज़िश कर रही है। ऐसे में प्रगतिशील – जनवादी साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों व बुद्धिजीवियों की भूमिका बढ़ जाती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ० राजेन्द्र साह ने कहा कि संस्कृति मनुष्यता को पुष्ट करती है और समाज की सृजनशीलता को आगे बढ़ाती है। आज मनुष्य विरोधी वातावरण तैयार किया जा रहा है। बहुसंख्यक आबादी को दिग्भ्रमित कर उन्हें हिंसक बनाया जा रहा है जो किसी भी देश और समाज के हित में नहीं है। आज जरूरत है कि लोगों को वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न किया जाए । इसमें साहित्यकारों की प्रमुख भूमिका है।
विषय पर अनिल पतंग, डॉ० चन्द्रशेखर चौरसिया, गुंजन कुमार और अभिनन्दन झा ने भी अपने विचार व्यक्त किए और आज की व्यवस्था की विसंगतियों के विरुद्ध सांस्कृतिक हस्तक्षेप की जरूरत को रेखांकित किया।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य- पाठ किया गया जिसमें रंजू ज्योति, शगुफ्ता ताज़वर, उपेन्द्र राम, उमेश कुंवर ‘कवि’, अवध बिहारी, अनिल पतंग, मनोरंजन विप्लवी, मुकेश कुमार, कुमार विनीताभ, डॉ० निरंजन कुमार, देवेन्द्र कुॅंवर, कौशल किशोर और डॉ० राजेन्द्र साह ने अपनी कविताओं से उपस्थित श्रोताओं को आस्वादन कराया। प्रो० जिक्रुउल्लाह खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस मौके पर राजेश श्रीवास्तव, नवल किशोर, चंद्रदेव वर्मा, विवेकानन्द सिंह, भूषण भारती, पंकज कुमार सिन्हा, सचिन कुमार, अरविन्द कुमार सिन्हा, प्रभा कुमारी आदि साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

