मोहम्मद के जन्मदिन का यह पखवाड़ा हर साल आता है और इसके साथ मोहम्मद की शख्सियत पर बातचीत भी शुरू होती है। आम तौर पर इस बातचीत का केंद्र उनकी पैगंबरी, उनका मज़हबी संदेश और तौहीद यानी एक ख़ुदा में यक़ीन पर होता है। यह सब मोहम्मद को समझने के लिए अपनी जगह बेहद अहम है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ मज़हबी और थियोलॉजिकल नजरिए से मोहम्मद को पूरी तरह समझा जा सकता है ? शायद नहीं।
मोहम्मद से पहले का अरब सिर्फ़ एक ऐसा समाज नहीं था जिसमें चारों तरफ मूर्तियां थीं और लोग अनेक बुतों की पूजा करते थे। दर-हक़ीक़त छठी और सातवीं सदी का अरब मज़हबी तौर से विविध था। अरब के अलग-अलग इलाकों में बहुदेववादी रवायतें थीं, लेकिन यहूदी और ईसाई समुदाय भी मौजूद थे। दक्षिणी अरब में यहूदी और ईसाई सियासी-सामाजी प्रभाव भी रखते थे और हिजाज़ में भी यहूदी समुदायों की मौजूदगी थी। ईसाई समुदाय अरब के उत्तर, दक्षिण और पूर्वी हिस्सों में मौजूद थे। इतना ही नहीं, पूर्व-इस्लामी अरब में एकेश्वरवादी झुकाव रखने वाले ऐसे लोग भी थे जिन्हें बाद की इस्लामी रवायत में हनीफ़ कहा गया। ज़ैद बिन अम्र बिन नुफैल जैसे व्यक्तियों की रवायतें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि मोहम्मद से पहले भी कुछ अरब लोग बहुदेववादी मज़हबी निज़ाम से असंतुष्ट थे और इब्राहीमी एकेश्वरवाद की तरफ झुकते थे। इसी तरह कुरआन खुद उन लोगों की एक धारणा का उल्लेख करता है जो कहते थे कि ज़िन्दगी सिर्फ़ इस दुनिया की ज़िन्दगी है और वक़्त ही इंसान को ख़त्म करता है। यानी मोहम्मद एक ऐसे अरब में आए जहाँ मज़हबी बहस के कई स्तर पहले से मौजूद थे। इनमें, विचारों का आवागमन, मज़हबी संपर्क और बहस के मौके अक्सर पैदा होते थे। व्यापारिक रास्ते, तीर्थ, कवि-सभाएँ, बाजार और अलग-अलग अरब समुदायों के संपर्क ने विचारों के आदान-प्रदान की जमीन बनाई हुई थी। इसलिए मोहम्मद के एक ईश्वरवाद का कुरैश ने जितना तीखा विरोध और दमन किया उसकी वजह सिर्फ़ दो आस्था का टकराव नहीं हो सकता।
मोहम्मद ने सिर्फ़ यह नहीं कहा कि एक ख़ुदा है। वह जिस तरह से तौहीद को पेश करते हैं, उसमें उनका सामाजी मतलब भी पैदा होता है। ला इलाहा इल्लल्लाह यानी अल्लाह के सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं, को अगर सिर्फ़ एक मज़हबी सूत्र की तरह पढ़ा जाए तो उसके मायने सीमित हो जाते हैं। लेकिन अगर इसे उस समाज की संरचना में पढ़ें जहाँ कबीले, नस्ल, संपत्ति और मज़हबी प्रतिष्ठा इंसान की हैसियत तय करते थे, तो यह एक बहुत गहरी सामाजी चुनौती भी बन जाता है। मोहम्मद की शुरुआती दावत का एक अहम पड़ाव वो है जब उन्हें अपने क़रीबी रिश्तेदारों को चेतावनी देने का हुक्म मिलता है। कुरआन के हुक्म के बाद मोहम्मद ने कुरैश के अलग-अलग कुनबों को संबोधित किया। सहीह बुखारी की रिवायत में सफा पहाड़ी पर उनके ज़रिये कुरैश को संबोधित करने का प्रसंग मिलता है। यहाँ मोहम्मद की दावत को एक अलग नज़रिये से देखना चाहिए। वह किसी ऐसी आबादी के सामने नहीं खड़े थे जो सिर्फ़ मूर्तिपूजक थी और जिसे एकेश्वरवाद का कोई इल्म ही नहीं था। वह एक ऐसे मज़हबी-सामाजी निज़ाम के सामने खड़े थे जिसमें बहुदेववाद, काबे की पवित्रता, कुरैश की प्रतिष्ठा और मक्का की आर्थिक गतिविधियाँ आपस में जुड़ी हुई थीं। मक्का कोई साधारण रेगिस्तानी बस्ती नहीं थी। पाँचवीं सदी के बाद कुरैश ने व्यापारिक रास्तों और कई कबीलों के साथ समझौतों के जरिए मक्का को एक अहम व्यापारिक केंद्र बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। उत्तर की तरफ शाम और दक्षिण की तरफ यमन तक जाने वाली व्यापारिक यात्राएँ कुरैश की आर्थिक ताकत का आधार थीं। काबे की मज़हबी प्रतिष्ठा ने मक्का को तीर्थ और बाजार दोनों का केंद्र बनाने में मदद की। अगर काबे की मज़हबी प्रतिष्ठा और कुरैश की सामाजी प्रतिष्ठा एक-दूसरे से जुड़ी हैं, तो काबे के मज़हबी निज़ाम को चुनौती सिर्फ़ पूजा-पद्धति में बदलाव नहीं है। उसका असर उस सामाजी निज़ाम पर भी पड़ता है जो उस पवित्रता से लाभ हासिल कर रही है। इसलिए मोहम्मद और कुरैश का टकराव सिर्फ़ एक ख़ुदा बनाम कई ख़ुदा का दार्शनिक मसला नहीं था। यह प्रतिष्ठा, नेतृत्व, कबीलाई वर्चस्व का सवाल था और इसके भीतर आर्थिक हित भी शामिल थे।
कुरआन बार-बार धन के संचय, गरीबों की उपेक्षा, अनाथों के साथ व्यवहार, नाप-तौल की बेईमानी और धन के अहंकार को निशाना बनाता है। सूरह अल-माऊन में अनाथ को धक्का देने और गरीब को खाना खिलाने के लिए प्रेरित न करने वाले इंसान को मज़हबी झूठ के साथ जोड़ा गया है। सूरह अल-हुमज़ा में धन जमा करने और उसे गिन-गिनकर रखने वाले इंसान की आलोचना है। सूरह अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन में व्यापारिक बेईमानी की निंदा है। इन आयतों को मक्का की व्यापारिक दुनिया से अलग करके पढ़ना मुश्किल है। मोहम्मद की नैतिक आलोचना ने उस तिजारती तहज़ीब को चुनौती दी जिसमें धन, प्रतिष्ठा और सामाजी प्रभुत्व आपस में जुड़ते थे। मक्का की अर्थव्यवस्था और कुरैश की सियासी ताक़त के बीच गहरा रिश्ता था। विरोध का एक बड़ा सवाल यह भी था कि अगर यह नया संदेश फैलता गया तो समाज की पुरानी नैतिक और सियासी संरचना का क्या होगा? अगर कबीला इंसान की आख़िरी पहचान नहीं है तो कुरैश की श्रेष्ठता कहाँ जाएगी? अगर धन सम्मान का प्रमाण नहीं है तो बड़े व्यापारियों की सामाजी हैसियत का क्या होगा? अगर गुलाम और मालिक ख़ुदा के सामने बराबर हैं तो सामाजी पदानुक्रम की वैधता क्या होगी? अगर अनाथ और गरीब की देखभाल मज़हबी जिम्मेदारी है तो धन का सिर्फ़ कुछ हाथों में जमा होना कैसे जायज़ ठहराया जाएगा? और अगर काबे की पवित्रता किसी खास सामाजी समूह के वर्चस्व का आधार नहीं रह जाती तो कुरैश की विशेष स्थिति का क्या होगा?
तौहीद का मतलब यह नहीं कि सिर्फ़ खुदाओं की तादाद घटाकर एक कर दी जाए। इसका सामाजी मतलब ये है कि ख़ुदा एक है, उस ख़ुदा ने ही सब इंसानों को पैदा किया है और इसलिए कोई इंसान दूसरे इंसान पर निरंकुश प्रभुता का दावा नहीं कर सकता।
अली शरियती ने इसी बिंदु को बहुत तीखे ढंग से पकड़ा। उनके यहाँ तौहीद और शिर्क सिर्फ़ दो मज़हबी मान्यताएँ नहीं हैं, बल्कि दो सामाजी निज़ामों के प्रतीक बन जाते हैं। शरियती के लिए संघर्ष सिर्फ धर्म और अधर्म के बीच नहीं था, वह उन सामाजी ताकतों के बीच भी था जो इंसान को बराबरी और आजादी की तरफ ले जाती हैं और वे ताकतें भी थीं जो सामाजी गैर-बराबरी और सत्ता-संबंधों को पवित्र बनाती हैं।
भारतीय मुस्लिम बौद्धिक परंपरा में मोहम्मद को तारीख़, समाज और सियासत के नज़रिये से समझने की कोशिश काफी पुरानी है। शाह वलीउल्लाह देहलवी के यहाँ मज़हबी आदेशों के पीछे मौजूद सामाजी और मानवीय मस्लहतों को समझने की कोशिश दिखाई देती है। उन्नीसवीं सदी में सर सैयद अहमद खान ने इस्लामी तारीख़ और पैगंबर की ज़िन्दगी को आधुनिक इतिहास-बोध और तर्क की कसौटी पर देखने की कोशिश की। हाली ने मोहम्मद के संदेश की नैतिक और सामाजी ताकत को रेखांकित किया। शिबली नोमानी ने सीरतुन्नबी के जरिए मोहम्मद को इतिहासकार, जीवनीकार और मुदब्बिर यानी राजनीतिक सूझ-बूझ रखने वाले नेता की तरह भी देखने की कोशिश की। इस पूरी रवायत में मोहम्मद सिर्फ़ मज़हबी उपदेश देने वाले इंसान नहीं, बल्कि एक समाज और सियासी समुदाय के निर्माण में सक्रिय तारीखी शख्सियत हैं। अबुल कलाम आजाद के यहाँ कुरआन का नैतिक और सामाजी संदेश केंद्रीय है।
इसी तरह अली शरियती की किताब अबूज़र में अबूज़र के लिए तौहीद एक निष्क्रिय आध्यात्मिक धारणा नहीं है, वह इंसान को इंसान के सामने झुकने से आज़ाद करने वाली चेतना है। शरियती की व्याख्या में अबूज़र एक ऐसे मॉडल की शक्ल में सामने आते हैं जिसके भीतर मोहम्मद के तौहीदी संदेश का सामाजी मतलब बाद की तारीख़ में पूरी ताकत से दिखाई देता है। मोहम्मद के शुरुआती अनुयायियों की सामाजी पृष्ठभूमि इस पूरे सवाल को समझने में बेहद अहम है। उनके साथ ऐसे लोग आए जो मक्का के पारंपरिक अभिजात वर्ग से नहीं थे। बिलाल जैसे गुलाम, अम्मार और सुमय्या जैसे कमजोर सामाजी स्थिति वाले लोग, खब्बाब जैसे श्रम करने वाले लोग और दूसरे ऐसे लोग जो कबीलाई ताक़त के बिना थे, इनकी मौजूदगी यह बताती है कि मोहम्मद की दावत समाज के उन लोगों के लिए ज़्यादा मायने रखती थी जिन्हें मौजूदा व्यवस्था में बराबर की हैसियत नहीं मिली थी। कुरैश के ज़रिये ऐसे कमजोर मुसलमानों को प्रताड़ित किए जाने का विवरण इस्लामी तारीखी रवायत में लगातार मिलता है, आधुनिक शोध भी शुरुआती मुसलमानों में बिलाल, अम्मार, सुमय्या और खब्बाब जैसे लोगों के उत्पीड़न को दर्ज करता है।
बिलाल का महत्व इसलिए सिर्फ़ इतना नहीं है कि वे एक मशहूर सहाबी थे। वे उस सामाजी उलटफेर का प्रतीक बन जाते हैं जिसमें एक अफ्रीकी मूल के गुलाम को नया मज़हबी समुदाय अपने नैतिक केंद्र में जगह देता है। यह उस समाज के लिए एक बड़ा सांस्कृतिक संदेश था जिसमें वंश, कबीला और सामाजी प्रतिष्ठा इंसान की हैसियत तय करते थे। मोहम्मद के यहाँ सम्मान का नया पैमाना बन रहा था। जिसमें गुलामी किसी इंसान की नैतिक कीमत तय नहीं करती। हाथ से काम करना अपमान नहीं। गरीबी अपने आप में गुनाह नहीं और ताकतवर होना अपने आप में सम्मान का प्रमाण नहीं। यहाँ तौहीद और इंसाफ अलग-अलग विषय नहीं हैं। ख़ुदा की वहदानियत और इंसान की बराबरी के बीच एक गहरा रिश्ता बनाया जा रहा है। यही वजह है कि मोहम्मद के साथ जुड़ने वाले लोगों की सामाजी पृष्ठभूमि को सिर्फ़ इस्लाम के पहले अनुयायियों की सूची की तरह पढ़ना काफ़ी नहीं है। यह भी देखना चाहिए कि नया संदेश किन लोगों को उम्मीद दे रहा था। अगर मोहम्मद का संदेश सिर्फ़ एक और मज़हबी विश्वास होता, तो मुमकिन था कि मक्का की मज़हबी विविधता के बीच वह भी एक और मत की तरह मौजूद रहता। लेकिन मोहम्मद का संदेश अपने साथ नैतिक पुनर्गठन की मांग लेकर आया। और यही बात उसे बहुत विस्फोटक बना गया। क्योंकि किसी समाज में खुदाओं की तादाद पर बहस उतनी खतरनाक नहीं होती जितनी सम्मान और सत्ता के पैमाने बदलने की मांग। यह मौजूदा सामाजी सत्ता चुनौती देने वाली सियासत थी। मक्का में वह सियासी प्रतिरोध और नैतिक पुनर्गठन की शक्ल में थी। मदीना में जाकर वही चेतना सामाजी और सियासी संस्थाओं के निर्माण की तरफ बढ़ी।
622 ईस्वी की हिजरत के बाद हालात बदल गए। अब मोहम्मद सिर्फ़ एक ऐसे इंसान नहीं थे जो एक मज़हबी संदेश दे रहे थे, वे एक नए समुदाय के संगठनकर्ता और सियासी रहनुमा भी बन गए। मक्का में जो बराबरी, नैतिक जिम्मेदारी और सामुदायिकता एक संदेश की शक्ल में सामने आई थी, मदीना में उसे सामाजी ढाँचा देने की कोशिश हुई। मक्का में कहा जा रहा था कि अनाथ को मत दबाओ। मदीना में उस नैतिकता को सामाजी निज़ाम में जगह देने की कोशिश होती है। मक्का में धन के अहंकार पर सवाल है। मदीना में समुदाय, दान, विरासत, संपत्ति और आर्थिक जिम्मेदारी के नियम विकसित होते हैं। मक्का में कबीलाई श्रेष्ठता पर चोट है। मदीना में अलग-अलग समूहों को एक सियासी समुदाय में संगठित करने की कोशिश है। और इस पूरी यात्रा में मोहम्मद को सिर्फ़ मज़हबी रहनुमा कहना उनकी तारीखी शख्सियत को छोटा कर देना है। ये भी समझना ज़रूरी है कि उन्होंने सिर्फ आर्थिक और मज़हबी रिश्तों को चुनौती नहीं दी, बल्कि प्रतिष्ठा के सांस्कृतिक प्रतीकों को भी बदलने की कोशिश की। हर समाज में यह तय करने वाली एक संस्कृति होती है कि कौन-सा काम ऊँचा है और कौन-सा नीचा, किस तरह का कपड़ा प्रतिष्ठा का प्रतीक है, किस तरह का शरीर मर्दानगी का प्रतीक है और कौन-सा इंसान समाज में बड़ा आदमी कहलाएगा। मोहम्मद के यहाँ इन पैमानों का एक बड़ा पुनर्गठन दिखाई देता है।
हाथ से काम करने के बारे में सहीह बुखारी में रिवायत है कि इंसान ने अपने हाथ की कमाई से बेहतर कोई खाना नहीं खाया और दाऊद अपने हाथ की मेहनत से कमाकर खाते थे। इस्लामी रवायत में दाऊद राजा भी हैं और पैगंबर भी। ऐसे इंसान को हाथ की कमाई से जोड़ना श्रम की प्रतिष्ठा का बहुत बड़ा सांस्कृतिक बयान है। सहीह बुखारी में आयशा से रिवायत है कि मोहम्मद के साथी अपने हाथ से काम किया करते थे, यहाँ तक कि उनके पसीने की गंध आती थी और उन्हें नहाने की सलाह दी जाती थी। मदीना पहुँचने के बाद मस्जिद के निर्माण का प्रसंग भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। सहीह बुखारी की रिवायत के मुताबिक मोहम्मद ने मस्जिद बनाने का हुक्म दिया, जमीन को तैयार कराया और उसकी शुरुआती संरचना कच्ची ईंटों, खजूर की पत्तियों और लकड़ी के खंभों से बनी। मस्जिद कोई राजा का महल नहीं थी। वह किसी शासक की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का स्मारक नहीं थी। वह नए समुदाय का साझा केंद्र थी। इस्लामी रवायत में मोहम्मद और उनके साथियों के सामूहिक श्रम से मस्जिद के निर्माण की जो तस्वीर मिलती है, वह नेतृत्व और श्रम के बीच मौजूद सामाजी दूरी को कम करने वाली तस्वीर है। कपड़े के मामले में भी एक सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या दिखाई देती है। कपड़ा सिर्फ़ बदन ढकने की चीज नहीं होता। वह वर्ग, प्रतिष्ठा, धन और सामाजी हैसियत का प्रतीक भी होता है।
सहीह बुखारी में रिवायत है कि जो इंसान घमंड के साथ अपना कपड़ा जमीन पर घसीटता है, उसके बारे में कड़ी चेतावनी दी गई है। दूसरी रिवायतों में टखने से नीचे लटकते कपड़े के बारे में चेतावनी आती है। यहाँ असली बात कपड़े की लंबाई से ज्यादा उसके पीछे मौजूद किब्र यानी घमंड है। कपड़ा अगर इस बात का प्रदर्शन बन जाए कि मैं तुमसे ऊँचा हूँ, तो समस्या कपड़े से ज्यादा उस सामाजी अहंकार की है जिसे कपड़ा व्यक्त कर रहा है। मूंछ जिसे अरब मर्दानगी और श्रेष्ठता का प्रतीक मानते थे उसके बारे में भी हदीसों में साफ़ निर्देश मिलते हैं। सहीह बुखारी में मोहम्मद से मूंछें छोटी करने और दाढ़ी रखने की हिदायत रिवायत हुई है। मोहम्मद के यहाँ शरीर, पहनावे और रूप-रंग से जुड़े कई सामाजी प्रतीकों को एक नई नैतिक व्यवस्था में रखा जा रहा था। यानी मोहम्मद सिर्फ़ यह नहीं बदल रहे थे कि लोग क्या मानें, बल्कि वो समाज का नया सौंदर्यशास्त्र भी गढ़ रहे थे, जिसके केंद्र में आम लोग थे न कि उच्च वर्ग का एक छोटा सा समूह।
लेकिन आज मोहम्मद की अहमियत क्या है? आज अरब दुनिया के सामने सबसे बड़े सवालों में फिलिस्तीन और गाज़ा का सवाल है। 2026 में भी गाज़ा में जनसंहार ख़त्म होता नहीं दिख रहा है। ऐसे वक़्त में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर मोहम्मद आज होते तो वे इस स्थिति को किस नजर से देखते? अगर मोहम्मद के सामने अपने वक़्त में कोई ऐसी व्यवस्था थी जिसमें पवित्रता, प्रतिष्ठा, व्यापार और सत्ता एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, तो आज की दुनिया में ऐसी कौन-सी व्यवस्थाएँ हैं जिनमें सत्ता, धन, साम्राज और पवित्रता एक-दूसरे को वैध बनाते हैं ? अगर उनके लिए अनाथ और गरीब की हालत दीन की सच्चाई की कसौटी थी, तो आज गाज़ा के बच्चे हमारे सामने क्या सवाल रखते हैं? अगर उनके लिए इंसाफ यह था कि दुश्मनी भी इंसाफ से न हटाए, तो जंग और कब्जे के सवाल पर हमारी नैतिकता की कसौटी क्या होगी? अगर तौहीद का एक सामाजी मतलब यह है कि इंसान किसी इंसान को ख़ुदा बनाकर उसके सामने न झुके, तो आज हम किन शक्तियों के सामने अपनी नैतिक स्वतंत्रता छोड़ देते हैं? मोहम्मद के वक़्त के अरब में लात, उज्ज़ा, मनात और हुबल जैसे बुतों की मज़हबी-तहज़ीबी भूमिका थी। लेकिन मोहम्मद की आलोचना को सिर्फ़ पत्थर की मूर्तियों के खिलाफ संघर्ष मानना उनके मिशन को बहुत छोटा कर देता है। सवाल यह भी था कि पवित्रता के नाम पर कौन सत्ता हासिल कर रहा है और उस सत्ता से किसे फ़ायदा मिल रहा है। इस मायने में आज के अरब शासकों से सवाल पूछा जा सकता है और यह सवाल किसी एक सरकार तक सीमित नहीं होना चाहिए कि अगर तौहीद सिर्फ़ मज़हबी नारा नहीं बल्कि हर निरंकुश मानवीय प्रभुता से मुक्ति की चेतना है, तो साम्राजी ताकतों के सामने अरब समाज की सियासी स्वायत्तता का सवाल कहाँ है? अगर फिलिस्तीनियों की जान और गरिमा भी उतनी ही पवित्र है जितनी किसी और इंसान की, तो गाज़ा में होने वाली जनसंहार पर अरब दुनिया की सियासी आवाज कितनी मजबूत होनी चाहिए? लेकिन हम देख रहे कि अरब कौम अपने दौरे जेहालत में दोबारा पहुँच चुकी है. इस बार इसका मज़हब साम्राजियत है और इस बार इसके ख़ुदा लात व हुबल की मूर्ती नहीं बल्कि ट्रँप और नितिन्याहु है.

