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1857 की विरासत इस देश के गरीब, मजदूर, किसान और नौजवान के संघर्ष की सच्ची विरासत है : प्रो. चमन लाल

समकालीन जनमत के  फेसबुक पेज पर लाइव चल रहे कार्यक्रमों की श्रृंखला में 10 मई को प्रोफेसर चमनलाल ने हिंदुस्तान की पहली जंगे आजादी पर अपनी बातचीत रखी. गौरतलब है कि 10 मई के ही दिन मेरठ से सैनिकों का जत्था दिल्ली के लिए निकला था और इसी दिन को 1857 की भारत की पहली क्रांति के आगाज का दिन माना जाता है.

प्रो. चमन लाल ने अपने वक्तव्य में 1857 की क्रांति को विस्तार से समझाया और यह बताया कि अंग्रेजी सेना में शामिल भारतीय सैनिकों द्वारा किया गया यह विद्रोह मूलत: आम भारतीयों का विद्रोह ही था क्योंकि वे सैनिक कोई और नहीं बल्कि वर्दी पहने किसानों के ही बेटे थे.

उस समय की अंग्रेजी फौज में लगभग तीन लाख हिंदुस्तानी शामिल थे। हालांकि इस गदर में संख्या के मुकाबले बहुत कम सैनिकों ने भाग लिया. इस विद्रोह का सर्वाधिक असर बंगाल प्रेसिडेंसी की सेना में था, आंशिक असर मुंबई प्रेसिडेंसी की सेना में और मद्रास प्रेसीडेंसी तो इस विद्रोह से अछूता ही था. दक्षिण भारत में विद्रोह की दस्तक बहुत कम सुनाई देती है, बावजूद इसके 1857 का विद्रोह अपनी प्रकृति में अखिल भारतीय था

विद्रोह में मारे गए भारतीयों की संख्या 8 लाख से भी ऊपर बताई जाती है, इसमें सीधे-सीधे लड़ाई में तो लगभग डेढ़ लाख लोग मारे गए . बाकी विद्रोह के दमन और उसके बाद फैली अनेक महामारियों में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई. विद्रोह का दमन इतना क्रूर और भयानक था जिस की कहानियां सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. अंग्रेजों ने सार्वजनिक स्थानों पर पेड़ों की डालियों में लटका कर बड़ी संख्या में लोगों को फांसी दी.

प्रो. चमनलाल ने बताया कि वह खुद ऐसी जगहों पर जा चुके हैं और इस तरह की क्रूर हत्याओं के गवाह अवशेषों से रूबरू हो चुके हैं.

प्रोफेसर चमनलाल ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा करते हुए बताया यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें सिर्फ प्रजा या सेना ही नहीं मारी गई बल्कि इसमें राजा महाराजा और सामंत भी शहीद हुए.

अपने व्याख्यान के अंत में वर्तमान समय में जब एक महामारी पूरी दुनिया में छाई हुई है, उस वक्त भारतीय सरकार की संवेदनहीनता को उजागर करते हुए प्रो. चमनलाल ने कहा कि इस सरकार ने बिना किसी तैयारी के जिस तरह से लॉक डाउन किया, उससे सबसे ज्यादा तकलीफ मजदूरों को उठानी पड़ी. हजारों हजार किलोमीटर पैदल चलकर घर के लिए निकले मजदूर कहीं रेल की पटरियों पर कटकर मर रहे हैं, कहीं रोड एक्सीडेंट का शिकार हो रहे हैं. मुख्य सड़क से चल रहे हैं तो पुलिस का पहरा, खेतों और रेल की पटरियों से चल रहे हैं तो मौत उनका स्वागत करने के लिए बाहें फैलाए खड़ी है. ऐसे में मजदूर कहां जाएं, क्या करें. जिस मजदूर ने इस मुल्क को गढ़ा है, उसी मजदूर को नियति के भरोसे छोड़ दिया गया है.

इस महामारी के बीच जिस तरह से राज्य सरकारें श्रम कानूनों में बदलाव करके बड़े-बड़े पूंजी पतियों को श्रमिकों के शोषण की खुली छूट दे रही हैं उसकी आलोचना भी प्रोफेसर चमनलाल ने अपने बातचीत में की. एक और महत्वपूर्ण बिंदु जो इस व्याख्यान में उभर कर सामने आया वो यह कि हम आज भी अनेक कॉलोनियल कानून से शासित होते हैं. 124 A का जिक्र करते हुए प्रो. चमनलाल ने कहा कि ऐसे जनता विरोधी कानूनों के खिलाफ हमें लड़ना होगा. सरकारें ऐसे कानूनों का इस्तेमाल देश के मजदूर, किसान, बेरोजगार नौजवान और महिलाओं के अपने हक और आजादी के संघर्ष को दबाने और कुचलने के लिए करती हैं. खास बात यह है कि देशद्रोह के ऐसे कोलोनियल कानूनों के रहते हमें न्यायालय से भी कोई राहत नहीं मिल पाती.

अंत में प्रोफेसर चमनलाल ने कहा कि 1857 की क्रांति से जो सबक सीखना चाहिए वह यह कि हमें अपने हक के लिए लड़ना सीखना चाहिए, सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखना सीखना चाहिए. अट्ठारह सौ सत्तावन की विरासत इस देश के गरीब, मजदूर किसान और नौजवान के संघर्षों की सच्ची विरासत है और इसे बचाकर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है.

 

प्रस्तुति-डीपी सोनी

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