समकालीन जनमत
शख्सियत

आम अवाम के शायर कैफ़ी आज़मी

कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि पर


14 जनवरी 1919. मिजवां, आजमगढ़ के जमींदार परिवार सैयद फतह हुसैन रिज़्वी और कनिज़ फातमा के घर अतहर हुसैन रिज़्वी की पैदाइश. 1932 में बारह साल की उम्र में जब अतहर हुसैन रिज़्वी को लखनऊ में शियाओं के सबसे बड़े मदरसे ‘सुल्तानुल मदारिस’ में दाखिल कराया गया तो किसी को गुमान भी नहीं होगा कि आगे चलकर अतहर हुसैन कम्युनिस्ट पार्टी का लीडर, ट्रेड यूनियन का नेता, मशहूर शायर-गीतकार, थिएटर एक्टिविस्ट बनेगा. चूंकि घर का माहौल शायराना था. महफ़िलें जमती थीं. इस माहौल का असर उसके दिलो-दिमाग पर पड़ा. मात्र ग्यारह साल की उम्र में अतहर हुसैन ने ग़ज़ल कही, किसी को ऐतबार ही नहीं हुआ. और एक दिन शे’री इम्तिहान से गुजरना पड़ा. मिसरा दिया गया था- ‘इतना हंसो कि आंख से आंसू निकल पड़े‘. अतहर ने फौरन ग़ज़ल पूरी कर दी. सब चौंक गए. ग़ज़ल कुछ यूं है-

इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े
हंसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े
जिस तरह हंस रहा हूं- मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म
यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े

इसी मुशायरे में अब्बा ने अतहर हुसैन को तखल्लुस दिया कैफ़ी. बकौल सज्जाद जहीर ज़दीद उर्दू शायरी के बाग़ में एक नया फूल खिला है, एक सुर्ख फूल. (झंकार 1944 में) यही सुर्ख फूल कैफ़ी आज़मी के नाम से जाना गया. पिता ने धार्मिक शिक्षा के लिए उनका दाखिला लखनऊ में मदरसा ‘सुल्तानुल मदारिस’ में करा दिया. वहां कैफ़ी ने छात्रों का अंजुमन बनाकर हड़ताल शुरू कर दी. मदरसे के गेट पर वो रोज एक नज़्म पढ़ते थे. यहीं जब वो एकदिन नज़्म पढ़ रहे थे तो उनपर अली अब्बास हुसैनी की नज़र पड़ी. अली अब्बास हुसैनी ने कैफ़ी की मुलाकात उस वक्त ‘सरफ़राज़’ के संपादक रहे एहतेशाम हुसैन से करायी. इसके बाद उस वक्त अंजुमन तरक़्क़ी पसंद मुसन्नफिन और कम्युनिस्ट पार्टी के कारकून अली सरदार जाफ़री के संपर्क में आये. मदरसे से निकाल बाहर हुए और सन 1942 में कानपुर चले गए और मजदूर सभा में काम करने लगे. यहीं रहते हुए कैफ़ी ने अपनी इंक़लाबी नज़्में कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ में शाया करवायी. 1943 में बंबई में जब कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर कायम हुआ तो कैफ़ी बंबई चले गए. कैफ़ी जब पैदा हुए तो रूस की क्रांति हो चुकी थी. दुनिया हैरत और मसर्रत के साथ रूस की तरफ देख रही थी. जगह-जगह सरमायेदाराना निजामों के खिलाफ आवाज़ें उठ रही थीं. कैफ़ी जब जवान हुए तो भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी हो चुकी थी. ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन जोड़ पकड़ रहा था. 1936 ई में कुल हिन्द अंजुमन तरक़्क़ीपसंद मुस्सनफिन की बुनियाद पड़ चुकी थी और अंजुमन लड़कपन से जवानी की तरफ बढ़ रही थी. हक़ीक़तनिगारी का बोलबाला था. लखनऊ में रहते हुए कैफी प्रभात फेरियों में शामिल होते रहे थे.

कैफ़ी 1942 के आस-पास आये हालांकि इससे पहले उनकी एक नज़्म ‘सरफ़राज़’ में शाया हो चुकी थी. 1944 में शायरी की उनकी पहली किताब ‘झंकार’ शाया हुई और बहुत मशहूर हुई. आज़ादी के बाद देश में अफरा-तफरी का माहौल था. दंगे फसाद हो रहे थे. उस वक्त के अदीबों पर साम्प्रदायिकता, मुल्क के बंटवारे का गहरा असर देखा जा सकता है जाहिर है कैफ़ी भी इससे अछूते नहीं रहे. उनकी शायरी में देश के बंटवारे के दर्द को ठीक वैसे ही महसूस किया जा सकता है जैसे अली सरदार जाफ़री की नज़्मों, नासिर काज़मी की ग़ज़लों और सआदत हसन मंटो, राजिंदर सिंह बेदी आदि के अफसानों में महसूस किया जाता है. कैफ़ी आज़मी सांप्रदायिकता रुपी ‘सांप’ का फ़न कुचलने का तरीका भी बताते हैं जिसे फिर मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों ने जिंदा किया है-

उसे मैंने ‘ज़हाक’ के भारी कांधे पे देखा था इक दिन
ये हिन्दू नहीं है मुसलमां नहीं
ये दोनों के मग्ज़ और खूं चाटता है
बने जब ये हिन्दू मुस्लमान इंसां
उसी दिन ये कमबख़्त मर जाएगा

लखनऊ में जब शिया-सुन्नी दंगा हुआ तो वो लखनऊ में ही थे. लखनऊ में दंगा, आरजू, मीर अनीस, आतिश, मजाज़ और खुद कैफ़ी के शहर में दंगा. कैफ़ी बहुत बहुत आहत हुए और कहा,

अज़ा में बहते थे आसूं यहां लहू तो नहीं,
ये कोई और जगह होगी लखनऊ तो नहीं
यहां तो चलती हैं छुरियां जबान से पहले
ये मीर ‘अनीस’ की, ‘आतश’ की गुफ़्तगू तो नहीं

सांप्रदायिकता उस समय की और हमारे समय की बड़ी और गंभीर समस्या है. प्रगतिशील शायरों ने इसके पीछे के राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझा, ये समझा कि अस्ल में इसके पीछे एक राजनीति काम कर रही है जो आज तक जारी है. जब छः दिसंबर 1992 में जब बाबरी मस्जिद को ढहाकर खंडहर में तब्दील कर दिया गया तो इस घटना पर उन्होंने एक नज़्म लिखी ‘दूसरा बनवास’. इस नज़्म में कैफ़ी ने एक अलहदा आख्यान और बिम्ब पेश किया है तब का जब राम चौदह साल बनवास काटकर वापस अयोध्या आये हैं. ये नज़्म काबिले गौर है, कुछ शे’र देखें-

पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नजर आए वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फिज़ां आयी नहीं रास मुझे
छः दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे

बाबरी मस्जिद अभी ढहाई नहीं गयी थी, 1989 (2 -6 अप्रैल) में लेखकों-संस्कृतिकर्मियों ने सांप्रदायिकता के खिलाफ लखनऊ से अयोध्या तक एक मार्च निकाला जिसका नेतृत्व कैफ़ी आज़मी ने ही किया था. आज़ादी के बाद तेलंगाना और नक्सलबाड़ी ऐसे दो आंदोलन हैं जिसने छात्रों-नौजवानों-किसानों-अदीबों को मुत्तासिर किया. हिंदी में बाबा नागार्जुन ने तेलंगाना और नक्सलबाड़ी, भोजपुर के आंदोलन का बाहें फैलाकर स्वागत किया तो कैफ़ी ने तेलंगाना नाम से नज़्म ही लिखी.

लहू के सीन-ए-गेती के दाग धोये हैं
जगा के खाक की किस्मत, शहीद सोये हैं
कहीं की फ़ौज सही, इस तरफ का रुख न करे
यहां ज़मीन में बम मनचलों ने बोये हैं
उभरती इंसानियत की तौहीन है तशद्दुद की हुक्मरानी
जबीन-ए-तारीख पर है इक दाग़ आज की मुतलकुल-अनानी (निरंकुश सत्ता)
तुम्हारे हमराह फ़तह-ओ-नुसरत, तुम्हारे क़दमों में कामरानी
मुजाहिदों, वो है राजधानी

जब 1967 में नक्सलबाड़ी के किसानों ने जमींदारों के खिलाफ ‘धमाका’ किया तो इसकी गूँज दिल्ली तक सुनाई पड़ी. बकौल सुरेंद्र प्रताप सिंह (एस.पी.) देश में पहली बार एक ऐसा व्यापक जन आंदोलन छिड़ा था जिसने नक्सलवाद के माध्यम से भारतीय कृषक शक्ति की क्रांतिकारी संभवनाओं को तलाशने का एक विलक्षण प्रयोग आरंभ किया था. करीब आधी सदी के भारतीय वामपंथी आंदोलन की धारा से बिल्कुल अलग. आगे कहते हैं- अब विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति के अगले निर्णायक दौर में इसकी भूमिका को नकार कर कोई भी जनवादी-वामपंथी आंदोलन किसी भी प्रकार का कोई सार्थक हस्तक्षेप नहीं कर सकता. नक्सलबाड़ी आंदोलन के नेता और सिद्धांतकार चारु मजूमदार की याद में उन्होंने ब्रीच कैंडी अस्पताल से नज़्म के जरिये आह्वान किया-

जिससे उछलीं कहकशाएं
जिससे उभरी कायनात
घर से जब भी निकलो बाहर, दोस्तों!
कुछ धमाके भर लो अपनी जेब में।
हर घड़ी हर दम कोई ताज़ा धमाका दोस्तों!
कौन जाने कोई ज़र्रा टूट जाय

1962 में पार्टी लाइन को लेकर जब कम्युनिस्ट पार्टी में टूट पड़ी तो उन तमाम के तमाम लोगों को बड़ा धक्का लगा जो कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी पार्टी मानते थे. उनके लिए तो ये एक सदमे से कम नहीं था जिन्होंने पार्टी के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था. आवारा सज्दे नज़्म में कैफ़ी के दर्द को महसूस किया जा सकता है-

इक यही सोज़े-निहां कुल मेरा सरमाया है
दोस्तों, मैं किसे ये सोज़े-निहां नज़्र करूं
कोई क़ातिल सरे-मक़तल नज़र आता ही नहीं
किस को दिल नज़्र करूं और किसे जां नज़्र करूं

मजाज़ अपनी मशहूर नज़्म ‘नौजवान ख़ातून से’ में कहता है ‘तिरे माथे पर ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन/तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था‘ या फिर फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं ‘और भी दुख है जमाने में मुहब्बत के सिवा/राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा/मुझसे पहली से मुहब्बत मेरी महबूब न मांग‘ इन दोनों से आगे बढ़कर कैफ़ी ने कहा-

क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं बस अश्क़फ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज जवानी ही नहीं
अपनी तारीख का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे – (औरत)

बराबरी और आज़ादी की जो बात इस नज़्म में हैं वो उर्दू नज़्म में बहुत दुर्लभ है. शायर संघर्ष में बराबर साथ रहने को कहता है. जब गैर बराबरी की बुनियाद पड़ी तो सबसे पहले इसकी कीमत औरतों ने ही चुकाई और अब तक चुका रही हैं. कोई भी संजीदा शायर इस सवाल से मुंह मोड़कर शायरी करता है तो उसकी शायरी तब तक मुकम्मल नहीं हो सकती जब तक वो इस सवाल से न टकराये या यूं कहें कि उसे इस सवाल से टकराना ही होगा. और जब इस सवाल से साबका पड़ेगा तो जाहिर है वो वही कहेगा को कैफ़ी ने कही-

ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए/ रुत बदल डाल अगर फलन फूलना है तुझे

कैफ़ी के नज़्मों की बात हो तो मकान नज़्म के बिना बात मुकम्मल नहीं हो सकती. कैफ़ी ने मकान तब लिखी थी जब वो मदनपुरा के इलाके के मजदूरों के बीच काम कर रहे थे उन्हीं के बीच सोते थे. इस नज़्म में मजदूरों के दुःख को महसूस किया है तब बयान किया है. कई बार शायर दुनिया के और खुद के ग़म से बेजार होकर खुद से फरार चाहते हैं. लेकिन कैफ़ी के यहां ये बात बिल्कुल नहीं है. वो दुनियावी रंज-ओ-गम से दोचार होते हैं और सिर्फ दोचार ही नहीं होते बल्कि उस रंज-ओ-ग़म के वजहों की शिनाख्त करते हैं. उम्मीद जगाते हैं कि कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी. इस मायने में कैफ़ी उम्मीद के शायर हैं-

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आयेगी
सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी

कुली क़ुतुब शाह (जो अकबर के ज़माने के शायर हैं, उनको उर्दू का पहला शायर होने का ओहदा हासिल है) और वली दक्कनी (औरंगज़ेब के समय के मशहूर ग़ज़ल गो) के ज़माने में भी ग़ज़ल थी, मीर ने तो ग़ज़ल को बुलंदी पर पहुँचाया। प्रगतिशीलों ने ग़ज़ल से ज्यादा नज़्म को ज्यादा तरजीह दी है। उसकी वजह बकौल ग़ालिब–
ब-क़द्र-ए-शौक़ नहीं ज़र्फ़-ए-तंगना-ए-ग़ज़ल
कुछ और चाहिए वुसअत मिरे बयां के लिए

कैफ़ी ने ग़ज़ल के फॉर्म में भी कलम चलाई है. 1936 में अंजुमन की स्थापना के बाद की उर्दू शायरी जबान और बयान दोनों के लिहाज से एकदम नयी थी. उसने शायरी में जेहत, जिद्दत और समाजी फ़िक्र पैदा की. ग़ज़ल का हुस्नो-जमाल तो वही रहा लेकिन कंटेंट एकदम अलहदा था. मिसाल के तौर पर कैफ़ी की ही एक ग़ज़ल के कुछ अशआर-

खारो-खस तो उठें, रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया, क़ाफ़िला तो चले
चांद-सूरज बुजुर्गों के नक़्शे-क़दम
ख़ैर बुझने दो इनको, हवा तो चले
इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊंगा
आज ईंटों की हुरमत बचा तो चले
बेलचे लाओ, खोदो जमीं की तहें
मैं कहां दफ़्न हूं, कुछ पता तो चले

उर्दू शायरी की एक पुरानी शैली है मसनवी. हिंदुस्तान में मसनवी लेखन की शुरुआत दक्खिन से ही शुरू हुई. 1503 में अशरफ ने ‘नौसारहार’ लिखी. निज़ामी, मुहम्मद अमीन, इशरती, नुसरती आदि दक्खिन के मशहूर मसनवीनिगार हैं. शोला-ए-इश्क़, एजाजे इश्क़, जोशे इश्क़, कमालाते इश्क़ मीर की मशहूर मसनवियां हैं. ‘फरियादे दाग’ दाग देहलवी तो सौदा, मोमिन खां मोमिन, दर्द ने भी इस फॉर्म में लिखा है. लखनऊ के शायरों में दयाशंकर नसीम की ‘गुलज़ारे नसीम’ मशहूर है. इकबाल ने ‘साक़ीनामा’ लिखा। प्रगतिशीलों के यहां मसनवी का कंटेंट एकदम सियासी हो गया. अली सरदार जाफ़री की मसनवी ‘जमहूर’ भी सियासी मसनवी है. कैफ़ी की ‘खानाजंगी’ को उर्दू की पहली सियासी मसनवी कह सकते हैं. बहरहाल खानाजंगी के कुछ अशआर पर गौर फरमाएं-

हो गये बंद कितने कारोबार
कितने मज़दूर बैठे हैं बेकार
मिट गई आस बदनसाबों की
रोटियाँ छिन गईं ग़रीबों की

प्रगतिशीलों ने मिथकों का भी इस्तेमाल किया लेकिन प्रतीकों के जरिए वही बात कही जो उन्हें कहना था. मसलन फैज़ के यहां ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’, ये इबादत नहीं बल्कि मिथकों को मिथकों का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ खड़ा कर देना है. ये प्रगतिशील शायरों के यहां ही मिलता है. ‘इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा’ अल्लामा इक़बाल की लंबी नज़्म है. जिसमें इब्लिश (इस्लामिक माइथोलॉजी में शैतान) और उसके कार्य परिषद के सदस्यों से बातचीत के जरिए दुनिया में अंधेरा कायम करने की बात करता है, कहता है कि अंधेरे का प्रभाव बढ़ा है. इब्लिश यहां साम्राज्यवाद का प्रतीक है. कैफ़ी ने भी ‘इब्लिश की मजलिस-ए-शूरा- दूसरा इजलास’ लिखा. अल्लामा ने इस्लाम में इसका (साम्राज्यवाद) मुदावा खोजा तो कैफ़ी ने कम्युनिज्म का रास्ता बताया जिसके सहारे ‘इब्लिश’ को परास्त किया जा सकता है. ये अल्लामा को कैफ़ी का जवाब भी है.

क्यों फ़रोगे इश्तिराकीयत से तू है दर्दमंद
अब है मुस्लिम भी इसी परचम के नीचे सर बुलंद
इस तरफ से सर नगुनी सरफ़राज़ी उस तरफ
मिस्र को क्यों देखता है देख सुए ताशकंद

कैफ़ी की शायरी में कहीं गुल हैं तो कांटे भी हैं तो शोले भी/ उन्होंने पुरअसर और जिंदगी से भरपूर नज़्में कही हैं. कैफ़ी की शायरी का असर आज भी हमारे दिलो दिमाग पर असर करती है तो उनकी कई वजहें हैं. बकौल अली सरदार जाफ़री – कैफ़ी की शायरी नये दौर की अवामी और एहतेजाजी शायरी है. इसके आर्ट की कसौटी अवाम है, पूरी एक तहरीक़ है.उनकी पूरी शख़्सियत व शायरी को तहरीक, अवाम दोस्ती और इंसानी दर्दमंदी से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता. इसके इलावा उनकी बयान करने का तरीका भी आमफहम है. अगरचे मीर सिर्फ इसलिए मीर नहीं हैं कि उन्होंने 15000 से ज्यादा शे’र कहे हैं बल्कि मीर इसलिए भी मीर हैं कि उनकी भाषा आमफहम है. कमाल की बात ये है कि जिस नज़्म की भाषा एकदम आमफहम है वही कैफी की मशहूर नज़्में हैं.

बहुत कम लोगों को पता होगा कि कैफ़ी ने तंज में थोड़ा नहीं बहुत लिखा है. वो ‘ब्लिट्ज’ में साप्ताहिक कॉलम लिखते थे. उन्होंने एक तंज लिखा है जिसका उनवान है- ‘अप्रैल फूल बन जाना बेज़मीन किसानों का‘. उसका एक टुकड़ा मैं यहां दे रहा हूं गरज ये कि ये मालूम पड़े कि उस ज़माने में भी नेताओं की आलोचना होती थी तब कोई अर्बन नक्सल या एंटी नेशनल नहीं कहा जाता था. तंज का वो टुकड़ा देखें-

मज़मा फिर इंदिरा मैया की जय करने लगा, सचमुच दोनों वक्त रोटी खाने लगा. इतने में मुख्यमंत्रीजी भीतर से बाहर आए, मज़में की ओर देखके मुस्कराए और थैले में से एक कागज निकाल के मज़में को दिखा दिया. चारों ओर घुमाके सबको पढ़ा दिया. कागज पर लिखा था- अप्रैल फूल.

कैफ़ी हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों में रहे लेकिन उनका दिल मिजवां में ही बसता था आखिर में वो मिजवां आ गये जैसे वामिक़ जौनपुरी कज़गगांव. बकौल कैफ़ी-

हाथ आ कर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई
लग गया इक मशीन में मैं भी
शहर में ले के आ गया कोई

कैफ़ी आज़मी ने फिल्मों के गाने भी लिखे. जब वो फ़िल्मी नग्मे लिखना शुरू किए तो शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी, लायलपुरी और साहिर लुधिनायवी जैसे पाए के नागमनिगारों की फिल्म इंडस्ट्री में तूती बोलती थी, बावजूद इसके उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में अपनी खास जगह बनाई और अमर नग्में लिखे.

हकीकत, कागज के फूल, शमा, शोला और शबनम , हीर-रांझा, अनुपमा, इत्यादि फिल्मों के गाने बहुत मशहूर हुए. हीर-रांझा फिल्म का संवाद और ‘गर्म हवा’ जैसी फिल्मों को भला कौन भूल सकता है. ‘हीर-रांझा’ के संवाद के लिए उनको फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया. इसके अलावा कैफी को साहित्य अकादमी, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, ग़ालिब पुरस्कार इत्यादि पुरस्कारों मिले. 1974 में साहित्य और शिक्षा में योगदान के किए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा.

ये गाते हुए कि ‘कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’ कैफी इस दुनिया से 10 मई 2002 को रुखसत हुए. कैफ़ी साहब ने अदब के हर सिन्फ़ में अपनी कलम चलाई बल्कि ये कहना ठीक होगा कि हर सिन्फ़ में उनका कॉन्ट्रिब्यूशन है. उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें लिखीं, नज़्म में अलग मक़ाम ही कैफ़ी का, मसनवी, ड्रामा और तंज के मैदान में भी भरपूर काम किया इसके बदौलत वो हमेशा हमेशा याद किये जायेंगे.

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