भारत-पाकिस्तान सीमा पर अभी भी सैनिक क्यों मर रहे हैं ?

डॉ संदीप पाण्डेय

1947 में विदेशी शासकों की फूट डालो और राज करो की नीति के चलते भारत का विभाजन हुआ जिसमें धार्मिक कट्टरपंथी भी जाने-अनजाने अंग्रेजों के हाथ का खिलौना बन गए. तब से भारत व पाकिस्तान के रिश्तों का खट्टा-मीठा इतिहास रहा है जिसमें कभी हिंसा भड़क उठती है और हमें युद्ध तक पहुंचा देती है.

भारत व पाकिस्तान की सरकारों ने दुश्मनी बना कर रखने की नीति अपनाई है जिसमें अब कई निहित स्वार्थ पैदा हो गए हैं जबकि व्यापारी व आम इंसान शांतिपूर्ण रिश्ते चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि हिंसा में लोगों की जानें जाएं. आखिरकार दोनों तरफ के सैनिक ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के खेतीहर परिवारों के नवजवान ही होते हैं. दोनों तरफ के नेता तो जब चाहते हैं मिल लेते हैं किंतु सामान्य लोगों का अपनी नियति पर कोई नियंत्रण नहीं होता.

जिस तरह से भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी अफगानिस्तान सेे लौटते हुए 2015 में अचानक लाहौर रुक गए व पाकिस्तान के प्रधान मंत्री नवाज शरीफ के पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल हुए, दोनों ओर की खुफिया एजेंसियों के सेवा निवृत प्रमुख इंण्टर सर्विसेज इण्टेलिजेंस के असद दुर्रानी व रिसर्च एवं एनालिसिस विंग के अमरजीत सिंह दुलत ने हाल में संयुक्त रूप से किताब लिखी, दोनों मुल्कों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल नासेर खान जंजुआ व अजीत दोवाल किसी तीसरे मुल्क में मिलते ही रहते हैं, अडानी पाकिस्तान को 4000 मेगावाट बिजली बेचने को इच्छुक हैं, बड़े व्यापारिक घराने ने गुजरात में अपने हित सुरक्षित रखने के लिए गुजरात सीमा पर शांति सुनिश्चित की है तो उत्तरी सीमा पर हमारे सैनिकों की जानें क्यों जाती हैं ?

हमने कभी चीन की सीमा पर किसी भारतीय सैनिक की जान जाते नहीं देखा है. शायद भारत व चीन का कोई अलिखित-अकथित समझौता हो कि एक दूसरे के सैनिकों को मारना नहीं है. यदि ऐसी बात है तो भारत पाकिस्तान के साथ भी इस किस्म का समझौता क्यों नहीं कर लेता ? आखिर हमारे राजनेता, खुफिया एंजेंसियों के प्रमुख व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तो मिलते ही रहते हैं.

हमारा मानना है कि यदि सरकारें आपस के मसलों को नहीं सुलझा पा रहीं तो दोनों ओर के आम लोगों को पहल लेनी चाहिए. यदि दोनों ओर के लोगों को आपस में मिलने जुलने दिया जाए तो कुछ समय बाद दोस्ती और शांति का वातावरण अपने आप ही बनने लगेगा. सरकारों को दोनों तरफ के लोगों को पासपोर्ट व वीजा आदि आसानी से उपलब्ध करा लोगों का मिलना जुलना आसान बनाना चाहिए. चूंकि दोनों ओर के लोगों की एक साझा संस्कृति है इसलिए जहां सरकारें असफल रहीं वहां उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

भारत पाकिस्तान की सीमा पर जम्मू व कश्मीर में श्रीनगर से मुजफ्फराबाद के बीच सड़क से आने-जाने का रास्ता है, पंजाब में अटारी-वाघा सीमा पर पैदल, बस व रेल से आने जाने का रास्ता है और राजस्थान में मुनाबाओ-खोकरापार सीमा से रेल का रास्ता है. भारत में गुजरात अकेला राज्य है जहां पाकिस्तान जाने का कोई रास्ता नहीं जबकि कई मछुआरे एक दूसरे की जेलों में बंद हो जाते हैं. कच्छ, भुज में लोगों के सीमा पार के लोगों से रिश्ते हैं और मौका मिलने पर यहां दोनों मुल्कों के बीच व्यापार फल-फूल सकता है.

यदि गुजरात में खावडा अथवा नडा बेट पर पाकिस्तान के साथ सीमा खुलती है तो आपस में लोगों का मिलना जुलना आसान बनेगा, व्यापार व पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और अंततः शांति व दोस्ती मजबूत होंगी. जो मछुआरे दूसरी तरफ की जेल में बंद हो जाते हैं उनके रिश्तेदार वहां जाकर उनका पता लगा सकते हैं, उन्हें जेल से छुड़ाने का प्रयास कर सकते हैं। इसलिए सीमा खुलना आम इंसानों के हित में होगा.

दोनों ओर के लोगों के मिलने जुलने से जो शांति और सद्भावना का माहौल बनेगा उसमें आपसी समस्याओं को सुलझाना भी आसान होगा. जब सम्बंध सुधरने से हमारा सुरक्षा पर खर्च घटेगा तो विकास पर खर्च करने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो पाएंगे जिससे दोनों ओर के आम इंसानों को लाभ मिलेगा.

 भारत-पाकिस्तान जितनी ही लम्बी दुश्मनी मानने के बाद उत्तर और दक्षिण कोरिया यदि मित्रता की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं तो भारत और पाकिस्तान ऐसा क्यों नहीं कर सकते  ?

दोनों सरकारों को निर्णय लेकर रोजाना शाम वाघा-अटारी पर होने वाले सैन्य कार्यक्रम की जगह शांति कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए जिसमें दोनों ओर के लोगों को बिना पासपोर्ट-वीजा कुछ घंटों के लिए मिलने की छूट दी जानी चाहिए तथा शांति, सद्भावना, दोस्ती व साझा संस्कृति का उत्सव मनाना चाहिए. इस तरह का शांति कार्यक्रम सीमा पर जहां जहां आने जाने का रास्ता खुला है सभी जगहों पर होना चाहिए.

अंततः भारत व पाकिस्तान की सरकारों को सीमा पर मिलने जुलने में बाधा बनने वाली जो भी पाबंदियां हैं वे हटा लेनी चाहिएं और रास्ता एकदम खोल देना चाहिए। यह मानवता की बड़ी सेवा होगी।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर के 2016-17 के ‘ सामाजिक आंदोलनों’ की कक्षा के छात्रों ने इस प्रस्तावित शांति कार्यक्रम की एक रूप-रेखा तैयार की हुई है.

19 जून से 30 जून, 2018 के बीच एक ‘ भारत-पाकिस्तान दोस्ती एवं शांति पदयात्रा ’ का आयोजन किया जा रहा है जो अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से शुरू होगी और पाकिस्तान की सीमा पर नडा बेट तक जाएगी। इस यात्रा को विश्वग्राम, शांति व लोकतंत्र हेतु पाकिस्तान भारत लोकमंच, आगाज-ए-दोस्ती, अल्पसंख्यक संयोजन समिति, गुजरात, गुजरात लोक समिति, बांधकाम मजदूर संगठन, पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फाॅर लेबर एजूकेशन एण्ड रिसर्च, करांची, जन आदोंलनों का राष्ट्रीय समन्वय, मुम्बई सर्वोदय मण्डल, अखिल भारतीय धर्मनिर्पेक्ष मंच, मंथन सामायिकी, कोलकाता, झारखण्ड नागरिक प्रयास, कन्फेडरेशन आॅफ वालेण्टरी एजेंसीज, हैदराबाद, हमारी आवाज, इंसाफ फाउंडेशन, गुजरात मजदूर पंचायत, खुदाई खिदमतगार, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) का समर्थन प्राप्त है।

जब यूरोपीय देश, जो सौ वर्ष से भी कम पहले एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे व जिन्होंने आपसी लड़ाइयों को विश्व युद्ध बना दिए, आज एक ऐसा संघ बना सकते हैं जिसमें एक देश के दूसरे देश में जाने के लिए पासपोर्ट-वीजा की आवश्यकता समाप्त कर दी गई है तो दक्षिण एशिया में ऐसा क्यों नहीं सम्भव है? सौ से अधिक मुल्कों ने संधि कर स्वेच्छा से तय किया है कि वे नाभिकीय शस्त्रों का निर्माण नहीं करेंगे और अपने आप को नाभिकीय शस्त्र मुक्त क्षेत्रों के रूप में  गठित किया है तो भारत व पाकिस्तान ऐसा क्यों नहीं कर सकते? दीर्घ काल में वर्तमान में चलने वाले लुका-छिपी वाले युद्ध का कोई विकप्ल नहीं है सिवाय इसके कि शांति व दोस्ती स्थापित हो, खासकर तब जब नाभिकीय शस्त्रों की उपस्थिति की वजह से दोनों मुल्कों में खुला या पूर्ण युद्ध नहीं हो सकता।

 

[author] [author_image timthumb=’on’]http://samkaleenjanmat.in/wp-content/uploads/2018/06/sandeep-pandey.jpg[/author_image] [author_info]डॉ संदीप पांडेय मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता हैं

 

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