वीरेनियत-3: अंत:करण के आयतन को विस्तारित करती कविताओं की शाम

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वीरेन डंगवाल स्मृति में आयोजित जसम का सालाना कार्यक्रम 

बीते 28 सितंबर को आयोजित यह वीरेनियत नाम से तीसरा जलसा था। जन संस्कृति मंच की ओर से इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित इस आयोजन में गुलमोहर हॉल खचाखच भरा था। नए से लेकर पुराने कवि और कविता प्रेमी दोस्तों की यह महफ़िल युवा और वरिष्ठ कवियों को सुनने के लिए जमी हुई थी। लगभग ढाई घंटे चले इस कार्यक्रम में हिंदी कविता का विराट पैनोरमा दिखा, जो मौजूदा सांस्कृतिक हालात और सत्ता संरचना की गहरी आलोचना साझा करने वाला था। यह कार्यक्रम हर वर्ष बग़ैर किसी प्रायोजक के कवियों और कविताप्रेमियों की कोशिशों से आयोजित होता है।  कार्यक्रम में युवाओं के अलावा मुरली ममोहर प्रसाद सिंह, मनमोहन, शुभा, मंगलेश डबराल, संजीव कुमार, अनामिका, रवीन्द्र त्रिपाठी, लीलाधर मंडलोई, बलवंत कौर, इरफ़ान, विनोद तिवारी, अनिल यादव, विभास वर्मा, पल्लव, सविता पाठक आदि भी शामिल थे। आयोजन के सूत्रधार-संचालक थे आशुतोष कुमार।

कार्यक्रम के संचालक, सूत्रधार प्रो. आशुतोष कुमार

दिवंगत अवांगार्द कवि, अनुवादक, आलोचक विष्णु खरे के लिए एक मिनट के मौन से कार्यक्रम शुरु हुआ। वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने अपने सखा-कॉमरेड वीरेन डंगवाल की कविताओं के नवारुण प्रकाशन से छपे मुकम्मल दीवान ‘कविता वीरेन’ का लोकार्पण करते हुए कहा कि वीरेन ऊपर से खिलंदड़ेपन और शरारतों से लबरेज़ था, पर उसके भीतर उपेक्षितों के लिए अजस्र करुणाधारा प्रवाहित रहती थी। ‘रामसिंह’, ‘पीटी ऊषा’ और ‘तोप’ जैसी लोकप्रिय कविताओं के सहारे हमारे समय में वीरेन के काव्यात्मक हस्तक्षेप को रेखांकित करते हुए आख़िर में उन्होंने वीरेन की दुर्दम जिजीविषा को उन्हीं के आख़िरी दिनों की कविता के सहारे याद किया: ‘दोस्तों-साथियों मुझे छोड़ना मत कभी/कुछ नहीं तो मैं तुम लोगों को देखा करूँगा प्यार से/ दरी पर सबसे पीछे दीवार से सटकर बैठा’।

समाज में बढ़ते साम्प्रदायिक विभाजन  के सवाल  को बग़ैर शोर-गुल सधे तरीक़े से उठाने वाले फ़रीद खान की कविता ‘गंगा मस्जिद’ की गहरी उदासी श्रोताओं को स्तब्ध कर गयी: ‘गंगा चूम-चूम कर भिगो रही है मस्जिद को/ मस्जिद मुँह मोड़े चुपचाप खड़ी है।/ गंगा मुझे देखती है/ और मैं गंगा को/ मस्जिद किसी और तरफ़ देख रही है।’ फ़रीद अपनी कविताओं में वृहत्तर समाज में चल रहे अन्यायों की शिनाख्त भी करते हैं और आत्मालोचना को इनसे लड़ने के हथियार की तौर पर बरतते हैं। भूख मूल्य बनाती है और इतिहास रचती है, की बारीक समझ फ़रीद को हमारे समय का प्रतिनिधि युवा स्वर बनाती है। इनके अलावा फरीद ने ‘एक और बाघ’, ‘दादा जी साइकिल वाले’, ‘लकड़सुंघवा’ और ‘माफी’ आदि कवितायें पढीं.

एक स्त्री के लिए ईश्वर वग़ैरह से ज़्यादा ज़रूरी है उसकी नींद, जो उसने पुरुषों को बचाने में खो दी है, की आवाज़ उठाती अनुराधा की कविताएँ उस सांस्कृतिक अभियान का अनिवार्य हिस्सा हैं, जो एक नयी बेहतर दुनिया का सपना देखता है। अनुराधा हमें बार-बार याद दिलाती रहीं कि जेंडर का सवाल सिर्फ़ स्त्री का सवाल नहीं, वह इंसानियत का सवाल है। सामान्य बोध में पैठे स्त्री-द्वेष को उघाड़ती अनुराधा की कविता सम्वेदना का विस्तार करती है। सभ्यता की गुम चोटों की शिनाख्त उन्हीं के शब्दों में: ‘मरहम ने कहा/ खून से नहीं गुम चोट से डरना/  फिर/ मरहम ने गुम चोट की/ प्रेम ने कहा/ विरह से नहीं अपमान से डरना जबकि विरह/ अघोषित अपमान है प्रेम का’। इन कविताओं के साथ ही उन्होंने ‘प्रेम का समाजवाद’, ब्रह्म सत्यम’ और ‘लिखने से क्या होगा’ आदि कविताओं का पाठ किया।

पंकज चतुर्वेदी अपनी पुरानी कविताओं से आगे बढ़ते हुए समकालीन सत्ता संरचना को समझने की काव्यात्मक सूक्तियाँ रचने में लगे हुए हैं। उनकी कविताओं में किसी एक विचार या समझ के काव्य में ढल जाने की चमक है जो श्रोताओं के काव्य-बोध और सत्ता-संरचना बोध, दोनों से जिरह करती है। सत्ता और जनता के बीच का सम्बंध बताने वाली उनकी यह कविता लोगों की ज़ुबान पर हॉल से बाहर निकलने पर भी चढ़ी रही: ‘काजू की रोटी के बारे में/  सुनते-सुनते/  कि उसे हुक्मरान खाते हैं/ घर में एक दिन/  स्वगत मैंने पूछा :/  ‘काजू की रोटी/  होती कैसी है ?/ ‘जीवन-संगिनी ने कहा:/  ‘थोड़ा आटा मिलाना पड़ेगा/ नहीं तो उसकी रोटी बनेगी नहीं/ टूट जायेगी’/ राजा को प्रजा की/ ज़रूरत क्यों है/ समझने के लिए/ इससे बेहतर/  रूपक क्या होगा !’पंकज ने इस के अलावा ‘नया राजपत्र’, ‘संघ की शरण में जाता हूँ’, ‘मलबे का मालिक’ और ‘मैं एक जज था’ समेत कई कवितायें पढीं.

वीरेनियत की महफ़िल

आर चेतनक्रांतिअपनी मर्मबेधी विचारोत्तेजक उदासी और व्यंग्य का रंग लिए सघन कविताओं में वीरता के विचलन को पकड़ने की नायाब नज़र के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने  कविता के इलाक़े में कुछ अद्भुत प्रयोग किए हैं। उन्हें सुनते हुए नज़ीर अकबराबादी की याद आती रही। उसी रंग की सरल-सहज भाषा और बँधाव की कविताएँ, जो श्रोताओं के दिलों में सीधे उतर जाती हैं। सत्ता की संरचना, मज़बूती और कमज़ोरी समझने की अचूक निगाह वाली उनकी कविता ‘पॉवर’ इस लिहाज़ से बेहद प्रभावशाली बन पड़ी: ‘पॉवर में इक कमी थी/ तन्हाई से डरती थी/ चलती थी झुण्ड लेकर/ जब घर से निकलती थी/ फिर बोलती थी ऊंचा ज्यों सामने बहरे हों/ और साथ में छिपाकर हथियार भी रखती थी।/ पॉवर को चाहिए थी थोड़ी सी और पॉवर/ रहती है अधूरी ही पावर बतौर पॉवर’। ‘भय का प्रवाह’और ‘कार’ जैसी कवितायें भी श्रोताओं द्वारा खूब सराही गयीं।

राजस्थान की खाँटी ज़मीन से उपजे अनुभवों को काव्य रसायन में गलाते प्रभात की कविताएँ बेहद मार्मिक थीं। रोज़मर्रा के घरेलू अनुभवों की चाभी से जीवन रहस्यों को खोलती प्रभात की कविताएँ समाज में लगातार बढ़ती क्रूरता और अन्याय के सामान्य हो जाने की विडम्बना को श्रोताओं तक ले जाती है। यों प्रभात की कविताएँ ‘अंत:करण का आयतन’ विस्तारित करने की सफल कोशिशें हैं। रिश्तों को देखने की नई क़िस्म की नज़र प्रभात की कविता का वह दूसरा पहलू था, जिससे श्रोता कविता से तादात्म्य महसूस कर सके। उन्हीं के शब्दों में: ‘कैसा रहा होगा पूरे गाँव में सिर्फ एक जीवित और एक मृतक का होना/ कैसे किया होगा दोनों ने एक दूसरे का सामना/ इससे पहले कि जीवन छोड़े दे/ मरणासन्न को खाट से नीचे उतार लेने का रिवाज है/ बुआ बहुत सोचने के बावजूद ऐसा नहीं कर सकी/ अकेली थी/ और फूफा, मरने के बाद भी उनसे कतई उठने वाले नहीं थे/ जाने क्या सोच बुआ ने मरने के बाद खाट को टेढ़ा कर/ फूफा को ज़मीन पर लुढ़का दिया’। प्रभात ने ‘लोकगायिका’, ‘गुम बच्चे की याद’, ‘काम’ और ‘एक बार बात’ समेत अन्य कई कवितायें पढीं.

हमारे दौर की हिंदी कविता के विन्यास और विचार, दोनों पहलुओं से अनवरत जूझते हुए नया सम्भव कर सकने की सिफ़त वाले कवि देवी प्रसाद मिश्र ने ‘प्रतीक्षालय’ शीर्षक कविता का पाठ किया। आधुनिकता और परम्परा, सामान्य जन और अभिजन, क्रांतिकारी और अवसरवादी, साम्प्रदायिक और सेक्युलर, जीवन के विविध पहलुओं को कवि ने एक जादुई काव्यात्मक विधि से एक प्रतीक्षालय में ला खड़ा किया है। यों दूसरे स्तर पर प्रतीक्षालय एक विराट रूपक में बदल जाता है। बहस के लिए श्रोताओं को झकझोरती इस कविता का पूरा असर लगभग महाकाव्यात्मक था।  कविता के आख़िर में काव्य-नायक की हताशा उसी के शब्दों में सुनिए: ‘“मैं प्रतीक्षालय में अचनाक खड़ा हो गया, तो मेरी बगल की लड़की ने कहा कि आपकी रेलगाड़ी अभी नहीं आई है, मैंने कहा कि मुझे लगा कि समकालीन भारतीय राज्य और समाज के पराभव की कथा फिल्म और मॉकेमेंट्री खत्म हो गई और जन-गण-मन शुरू हो गया, तो मैं लिंच होने से बचने के लिए खड़ा हूं।’

वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने अपनी कविताओं के ज़रिए श्रोताओं को विचारोत्तेजक काव्य-बहस में शामिल किया। किसिम-किसिम की राजनीति के लगातार सत्ता केंद्रित होते जाने और पुरानी क़िस्म की राजनीति के चुक जाने की परिघटना का काव्यात्मक भाष्य करती उनकी कविता ‘ऐसा नहीं है’ श्रोताओं को सोचने के लिए उत्तेजित कर गयी: ‘यह एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर/ खुला मैदान है कहीं भी मूत लो, किधर भी निपट आओ/ असल सचाई तो ये है कि/ जो उत्तरसत्य पर ईमान लाए, है वही इस ज़मीन का सच्चा नागरिक।’ ‘आसिफ़ा के नाम’ कविता में असद ज़ैदी ने आसिफ़ा के दुःख को कायनात के स्तर पर फैला दिया। उनकी आसिफ़ा हम सब की आसिफ़ा है, यह श्रोताओं ने महसूस किया: ‘और हाँ आसिफ़ा, उस अलबेले अरिजीत सेन कलाकार को अपना समझना/ वह अजीबो-गरीब तुम्हें चरागाह में मटरगश्ती करता दिखाई देगा/ अपने किसी घोड़े को बता देना उसके पास जाकर शराफ़त से हिनहिनाए/ जब वह तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हो/ तो उसे रोककर कहना सिगरेट बुझा दे और/ उसके हाथ में थमा देना साफ़ पानी का एक गिलास।’

इस आयोजन के आख़िरी कवि थे गौहर रज़ा। उर्दू कविता की रवानी और रवायत से सँवरी उनकी नज़्म जनता पर मौजूदा राजनीतिक निज़ाम के दमन का दस्तावेज़ थी। फ़ैज़ की कविता की ज़मीन को समकालीन करते हुए उन्होंने पढ़ा: ‘ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है/ दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है/ जब पढ़े थे ये मिसरे तो क्यों था गुमाँ/ ज़र्द पत्तों का बन, फ़ैज़ का देस है/ दर्द की अंजुमन, फ़ैज़ का देस है/ बस वही देस है/ जो कि तारीक है/ बस उसी देस तक है/ खिज़ाँ की डगर/ बस वही देस है ज़र्द पत्तों का बन/ बस वही देस है दर्द की अंजुमन।’ उर्दू कविता की रवायत को और आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ‘दुआ’ शीर्षक कविता पढ़ी जिसमें बेटियों के हिजाब से बाहर निकलने, उनके ‘बिगड़ने’ की कामना की गयी थी।

आयोजन स्थल पर लगे नवारुण के स्टॉल पर ‘कविता वीरेन’ के अलावा और भी कई किताबें थीं, फ़िल्मकार और कार्यकर्ता संजय जोशी न सिर्फ़ आयोजन बल्कि इस स्टॉल को भी सम्भाल रहे थे। गोष्ठी के बाद श्रोता कविताओं पर बहस करते हुए किताबें भी ख़रीदते दिखे।

(जसम दिल्ली सह सचिव अनुपम सिंह की ओर से जारी )

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