विकास, विस्थापन और साहित्य (संदर्भ झारखंड)

आज इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है कि ग्लोबल पूंजीवाद के लाभ-लोभ के चलते दुनिया में गरीबी और पर्यावरण का संकट बढ़ता जा रहा है। अपनी लालच के सिवा उसके सामने आदमी और प्रकृति की चिंता का कोई मायने नहीं रह गया है। विकास की पूंजीवादी अवधारणा या रास्ता विनाश का रास्ता बन गया है। वह जीवन और प्रकृति के विनाश का स्रोत बन गया है। आज दुनिया भर में कुलीन आर्थिक संस्थाओं- आइएमएफ़, वर्ल्ड बैंक, एनएफटीए, डब्यूटीओ आदि के खिलाफ़ विेद्रोह हो रहे हैं। विकास के वैकल्पिक रास्ते पर, न्यायोचित और टिकाऊ मानवीय विकास (Equitable and sustainable human development) के रास्ते का सवाल बहस के केंद्र में आ गया है। यहां इस पर बहस में जाने का अवसर नहीं है लेकिन विकास के इस विनाश की पूरी तस्वीर देखनी हो तो हमें आदिवासी क्षेत्रों की ओर रुख करना चाहिये, जहां सबकुछ साफ-साफ अपनी पूरी नग्नता के साथ मौजूद है।

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सतत विकास लक्ष्य के आईने में सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा

  वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सहस्राब्दि विकास के 8 लक्ष्य तय किये थे. जिसका मकसद  2015 तक दुनिया भर में गरीबी, स्वास्थ्य, मृत्यु दर, शिक्षा, लिंगभेद, भुखमरी जैसी चुनौतियों पर काबू पाना था. लेकिन दुर्भाग्य से 2015  तक इन्हें हासिल नहीं किया जा सका. इसके बाद वर्ष 2030 तक के लिये “ सतत् विकास लक्ष्य ” (एसडीजी) का विचार सामने आया जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अगले 15 सालों के लिए नए लक्ष्य तय कर दिए गए हैं. इन्हें टिकाऊ विकास लक्ष्य भी कहा जाता है.…

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स्मृति का गांव बनाम रियल पिक्चर

ओंकार सिंह गांव की बात जेहन में आते ही एक पुर सुकून सा मंजर दिमाग में तैरने लगता है. खेत-खलिहान और इनके बीच दूर तक दौड़ती पगडंडियां. पोखर और बाग की अलमस्ती या फिर आंगन से सीवान तक सुबह-शाम की चकल्लस . ये सब मिलकर भागदौड़ की जिंदगी में मानो एक ख्वाबों की झुरझुरी भर देते हैं. ओह, गांव तो यही है पर हकीकत में यही नहीं. सच में, घर के सहन से लेकर सीवान तक ठीक उसी तरह सिमट चुके हैं जैसे टोला पड़ोसी के व्यवहार. आगंतुक की पहले…

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