‘ भविष्य का भारत ’ की संघी दृष्टि

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रविभूषण

शिकागो में इस महीने 7 से 9 सितम्बर तक त्रिदिवसीय विश्व हिन्दू कांग्रेस (डब्ल्यू एच सी) के मात्र दस दिन बाद 17 से 19 सितम्बर तक सरसंघ चालक मोहन भागवत को ‘फ्यूचर आॅफ भारत: एन आरएसएस पर्सपेक्टिव ’ पर तीन दिनों तक अपने विचार प्रकट करने की आवश्यकता क्यों हुई ? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ क्या राष्ट्रीय सेकुलर संघ बन रहा है ? दिल्ली के विज्ञान भवन में सम्पन्न यह आयोजन क्या आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया था ? क्या वह राहुल गांधी के उस कथन के जवाब में था जिसमें उन्होंने आरएसएस की तुलना ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से कर दी थी ?

लन्दन में राहुल गांधी ने इस संगठन द्वारा भारत के मूल स्वभाव को बदलने की कोशिश की बात कही थी। मोहन भागवत के इस त्रिदिवसीय भाषण या संबोधन में क्या आरएसएस के मूल स्वभाव में हो रहे बदलाव का जिक्र था ? ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ मिस्र में सुन्नियों का इस्लामिक संगठन है। क्या आरएसएस भारत में हिन्दुओं का संगठन नहीं है ?

भारत पर भागवत विचार अब कुछ समय तक चर्चा और बहस में रहेगा। उनकी चिन्ता और सत्यता पर निष्पक्ष रूप से विचार भी होगा। क्या सचमुच संघ अपने को बदल रहा है ? अब एक करोड़ से अधिक आरएसएस के स्वयं सेवक हैं। 39 देशों में उसकी शाखाएं हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति संघ के स्वयं सेवक रहे हैं। अटल बिहरी वाजपेई भी संघ के स्वयं सेवक थे। राजनाथ सिंह और नितीन गडकरी भी स्वयं सेवक थे। तीन राज्यों के मुख्यमंत्री संघ के स्वयं सेवक थे। प्रतिमाह आठ हजार नये स्वयं सेवक संघ में शामिल हो रहे हैं। अभी आरएसएस की 58,967 शाखाएं हैं।

1925 से अब तक आरएसएस के कई चरण हैं। भारतीय जनसंघ और भाजपा का वैचारिक मूल स्रोत आरएसएस है। आरम्भ में अपने विचारों से जुड़े राजनीतिक दल के गठन को लेकर गोलवलकर और संघ में जो भी थोड़ा-बहुत ऊहापोह रहा हो, पर बाद में ‘हिन्दुत्व’ के विचार को फैलाने में इसकी राजनीतिक शाखा कम महत्वपूर्ण नहीं रही। चौथे लोकसभा चुनाव (1967) में भारतीय जनसंघ को अप्रत्याशित सफलता मिली थी। वह संसद में कांग्रेस के बाद संख्या की दृष्टि से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में इसकी छात्र-शाखा ‘अभाविप’ (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) ने सक्रिय-शामिल होकर एक नयी शक्ति दी। भारतीय जनसंघ ने अपनी पहचान मिटाकर अपने को जनता पार्टी में शामिल कर लिया था।

1980 में भाजपा का जन्म हुआ। सत्तर के बाद के दशक में संघ अधिक सक्रिय हुआ और आडवाणी की रथ-यात्रा तथा राम जन्मभूमि आन्दोलन से इसने शक्ति प्राप्त की। इसके स्वयं सेवक अटल बिहारी वाजपेई का भारत का प्रधानमंत्री बनना एक बड़ी घटना थी। भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं था। यह बहुमत 2014 में उसे हासिल हुआ और पिछले साढ़े चार वर्ष में जितनी घटनाएं घटी हैं, उससे कमोबेश सभी परिचित हैं। भुक्तिभोगी भी हैं। लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं लगभग नष्ट हो चुकी हैं। लोकतंत्र और संविधान दोनों खतरे में हैं। देश का बौद्धिक और चिन्तनशील वर्ग पूरी तरह आरएसएस के खिलाफ हैं।

शिकागो के विश्व हिन्दू कांग्रेस में एक अनुमान के अनुसार 80 देशों के लगभग ढ़ाई हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे। वहां संघ प्रमुख मोहन भागवत के विरुद्ध कुछ लोगों ने नारे लगाये थे। वे शिकागो साउथ एशियंस फाॅर जस्टिस समूह के सदस्य थे जो दुनिया के कई देशों में फासीवाद के उभार का विरोध करते हैं और भारत में भी फासीवाद के उभार को देखते हैं। उनके नारों में ‘हिन्दू फासीवाद’ को रोकने की बात थी और एक बैनर में ‘आरएसएस वापस जाओ’ भी था। इन विरोधियों के साथ हिंस्र व्यवहार किया गया।
एक ही समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दाऊद वोहरा सम्प्रदाय को सम्बोधित करते हैं और सरसंघ चालक मोहन भागवत आरएसएस के बदले स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं। क्या यह सब मोदी की जीत और भाजपा की जीत को आसान करने की कोई सुनियोजित चाल नहीं है ?

युवा समाजशास़्त्री और गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक बद्रीनारायण ने पिछले कुछ वर्षों से ‘ न्यू आरएसएस’ की बात कही है। कई लेख लिखे हैं। क्या सचमुच आज का अरएसएस कल के आरएसएस से एकदम भिन्न है ? क्या उसने अपने को सावरकर-गोलवलकर, हेडगेवार-दीनदयाल उपाध्याय के विचारों से अपने को मुक्त कर लिया है ? हकीकत यह है कि उसकी नाल यहीं बंधी है। ‘हिन्दुत्व’, ‘राष्ट्र’, ‘राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की परिभाषा से वह रंच मात्र भी नहीं डिगा है। क्या ‘भविष्य का भारत’ की उसकी परिकल्पना ‘हिन्दू राष्ट्र’ की नहीं है ? जो अर्थ आरएसएस अपने मन के अनुकूल गढ़ता है, सामान्य जन उससे एकदम भिन्न एक अर्थ ग्रहण करता है। ‘भविष्य का भारत’ का अर्थ हिन्दू भारत या हिन्दू राष्ट्र है। संघ के अपने पक्ष में अपने तर्क हैं। अब मोहन भागवत ने यह कहा है कि बिना मुसलमान के ‘हिन्दुत्व’ नहीं है।

‘विज्ञान भवन’ में सम्पन्न इस त्रिदिवसीय आयोजन में तीन दिनों के मोहन भागवत के भाषण में वैज्ञानिक समझ की कोई बात नहीं थी। ‘बंच आॅफ थाट्स’ में गोलवलकर ने मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट से ‘इंटरनल थ्रेटस’ की बात कही थी, उसका अभी तक विरोध नहीं किया गया है। आरएसएस अपने को कभी सावरकर और गोलवलकर से मुक्त नहीं कर सकता। इन दो ‘महापुरुषों’ के वचन से, इनके ‘हिन्दुत्व’ से वह अलग नही हो सकता। आरएसएस के मूल स्थाई भाव को समझते हैं, वे कभी उनके साथ नहीं हो सकते। न्योता और आमंत्रण तो प्रायः सभी राजनीतिक दलों को दिया गया था, पर किसी ने इस त्रिदिवसीय आयोजन में शरीक होने और मोहन भागवत से संवाद करने की जरूरत नहीं समझी।

विज्ञान भवन में आस्था की बात कही गयी। मोहन भागवत ने राममंदिर के निर्माण को राष्ट्रीय हित में देखा क्योंकि इससे करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। राम उनके अनुसार ‘धर्म का निचोड़/सार-संग्रह’ है, इसलिए समाज के सभी वर्ग को उनका आदर करना चाहिए। मोहन भागवत के और आरएसएस के विचार सबके विचार नहीं हो सकते। मोहन भागवत की चिन्ता बौद्धिक समुदाय में अपनी स्वीकार्यता और सर्वमान्यता की है। जहां आस्था होती है, वहां बहस नहीं होती, तर्क नहीं होता। व्यक्ति या संस्था की छवि भाषणों से नहीं कर्मों से निर्मित होती है। प्रथम सरसंघ चालक हेडगेवार ने हिन्दू समाज को एक करने का संकल्प लिया था, अभियान चलाया था। आरएसएस का यही मार्ग है, यही लक्ष्य है। राममंदिर के निर्माण का सवाल सुप्रीम कोर्ट में है, पर मोहन भागवत का ‘निजी विचार’ यह है कि ‘एक भव्य राम मंदिर जिस किसी उपाय से हो सकता है, शीघ्र होना चाहिए। यहां ‘जिस किसी उपाय’ के आशय को समझना चाहिए। संघ, सरसंघ चालक, स्वयं सेवक, प्रचारक आदि के शब्द प्रयोगों और भाषिक व्यवहारों पर कम ध्यान दिया जाता रहा है। संकेतार्थों से जिस प्रकार मानस और चेतना को निर्मित किये जाने का प्रयास किया जाता है, वह अलग अध्ययन का विषय है।

मोहन भागवत ने तीन दिनों के अपने भाषणों में और प्रश्नकर्ताओं को जो उत्तर दिये हैं, उनमें मुख्य यह है कि आरएसएस अधिक लोकतांत्रिक है, हिन्दू राष्ट्र में मुसलमानों के लिए जगह है। हिन्दुत्व मुसलमानों के बिना नहीं है, हिन्दुत्व ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात करता है, ‘हिन्दुत्व’ की अवधारणा सभी आस्थाओं और धर्मों के लिए समावेशी है, संघ सार्वभौमिक भाईचारे में विश्वास करता है और इस भाईचारे का मूलभूत सिद्धान्त विविधता में एकता है। यह विचार हमारी संस्कृति से आता है जिसे दुनिया ‘हिन्दुत्व’ कहती है। दुनिया इसे हिन्दुत्व नहीं कहती है।

हिन्दू धर्म, हिन्दुइज्म और हिन्दुत्व में अन्तर है। मोहन भागवत इस अन्तर को मिटाते हैं और सबको ‘हिन्दुत्व’ में शामिल कर लेते हैं। उनका तर्क यह है कि इसे ही हम ‘हिन्दू राष्ट्र’ कहते हैं। मोहन भागवत ने भारत की अनेकता और विविधता स्वीकार की और संघ को ‘सार्वभौमिक मानव मूल्यों का अनुयायी’ होने का दावा किया। मोहन भागवत ने साफ शब्दों में यह कहा कि वे कुछ भी नहीं छिपाते। संघ  राष्ट्रहित के बारे में सोचता है। ‘हम देशहित के बारे में बात करते हैं और यदि हमारे पास ताकत है, तो हम जो सही मानते हैं, उस पर जोर देते हैं। हम इसे खुले तौर पर कहते हैं। आरएसएस राजनीति से दूर रहता है लेकिन राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उसका अपना दृष्टिकोण है।’ आरएसएस ने अपना विचार सदैव रखा।

मोहन भागवत ने ‘हिन्दुत्व’ को अपने भाषण में एक नये ढ़ंग से परिभाषित किया। अब वे ‘हिन्दुत्व’ के भीतर सबको लपेटते हैं। संविधान और लोकतंत्र के साथ होने की बात भी करते हैं। वे ‘हिन्दुत्व’ में विश्वबंधुत्व और विश्वकुटुम्बक की धारणा समाहित मानते हैं, जो गलत है। यह एक भ्रम उत्पन्न करता है। ‘हिन्दुत्व’ एक विशेष समय में निर्मित पद है जबकि हिन्दू धर्म का इतिहास बहुत पुराना है। मोहन भागवत ने अपने भाषण में जिस प्रकार ‘हिन्दुत्व’ को परिभाषित किया है, वह उनकी सुविधा के अन्तर्गत है। वे हिन्दू धर्म के विवेचक-विश्लेषक नहीं हैं। ‘हिन्दुत्व’ को देश का एक प्राचीन विचार कहना गलत है। यह कथन सही है कि ‘हिन्दुत्व’ की खोज संघ ने नहीं की क्योंकि संघ का जन्म 1925 में हुआ और सावरकर की ‘हिन्दुत्व’ पुस्तिका 1923 में आई। मोहन भागवत के इस कथन से संघियों को छोड़कर और कौन सहमत होगा कि भारत से निकले सभी सम्प्रदायों का सामूहिक मूल्यबोध हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व की यह परिभाषा मोहन भागवत ने गढ़ी है। उन्होंने हिन्दुत्व के जिन तीन आधारों – देशभक्ति, पूर्वज गौरव और संस्कृति की बात कही है, वह उनके लिए सही नहीं है जो ‘हिन्दुत्व’ की धारणा के विरोधी हैं। क्या हिन्दुत्व के विरोधी देशभक्त नहीं है। संघ और उसके सभी अनुषांगिक संगठनों की कुल सदस्य संख्या 5-6 करोड़ है। क्या इससे अलग सभी भारतवासी राष्ट्रविरोधी हैं ? हिन्दू संस्कृति भारतीय संस्कृति का पर्याय नहीं है। मोहन भागवत के विचारों में उसके अन्तर्विरोधों की तलाश की जा सकती है।

सियासी राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से संघ भले दखल नहीं दे, पर जब उसके स्वयं सेवक चारो ओर बड़े-बड़े पदों पर आसीन हो चुके हों तो वे स्वतः संघ की विचारधारा के पक्ष में ही कार्य करेंगे। वे संघ में ट्रेनिंग पा चुके लोग हैं। अभी तक संघ में चितपावन ब्राहमणों का प्रभुत्व रहा है। एलजीबीटी को अब भले संघ का हिस्सा माना जाय, पर वहां लैंगिक भेद है। तीन दिनों की लेक्चर सीरिज में मोहन भागवत ने जितनी बाते कहीं है, उन पर विचार होता रहेगा। अनुच्छेद 370 और 35 ए की संघ समाप्ति चाहता है। संघ के स्वयं सेवक दूसरे दलों के प्रमुख पदों पर नहीं जाते। हकीकत यह है कि संघ की कथनी और करनी में फर्क है। नरेन्द्र मोदी के भाषणों से प्रभावित जनसमूह आज अपने को ठगा महसूस करता है। वर्णाश्रम व्यवस्था से संघ का खिसकना भाजपा के वोट बैंक के लिए है। मुसलमानों को लेकर संध की नीति कभी नहीं बदली है। ईसाईयत और इस्लाम पुण्य भूमि से बाहर हैं। गुरु जी के समग्र विचार अगर कालातीत हैं तो ‘बंच आॅफ थाॅट्स’ में जो कहा गया है, उसका क्या विरोध किया जाएगा ? मोहन भागवत ने सबके संतुलित और समन्वय विकास की बात कही। नरेन्द्र मोदी ने भी ‘सबका साथ, सबका विकास’ कहा था। सच्चाई सबके सामने है। कब्रिस्तान-श्मशान की राजनीति से असहमति और अब हर तरह के आरक्षण के समर्थन और गोहत्या के खिलाफ कानून बनाने की बात, अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन आदि की बात से लग सकता है कि संघ बदल रहा है जो केवल एक भ्रम है।

संघ भविष्य के भारत को हिन्दू राष्ट्र मानेगा। इसे सभी नहीं मान सकते। राजनीतिक दलों को वोट की चिन्ता है। इसलिए वे खुलकर हिन्दू राष्ट्र के विरोध में खड़े नहीं होंगे, पर बौद्धिक वर्ग जो क्रीतदास नहीं है, वह हिन्दू राष्ट्र का सदैव विरोध करेगा। भविष्य का भारत केवल हिन्दुओं का भारत नहीं हो सकता। नहीं होना चाहिए। हिन्दुत्व और भारतीय तत्व दोनों एक नहीं है। कभी हो भी नहीं सकते हैं।

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