Wednesday, May 18, 2022
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तीन तलाक़ अध्यादेश

क्या कोई समाचार चैनल है जिसने तत्काल/त्वरित तीन तलाक़ के खिलाफ अध्यादेश पर चर्चा करने से पहले खुद को और दर्शकों को विवाह व तलाक़ के सिविल/दीवानी तथा आपराधिक/फौजदारी मामलों के बीच अन्तर के बारे में शिक्षित करने का समय भी लिया है ? ज्यादातर मीडिया चैनल इस भ्रामक तथ्य को फैला रहे हैं कि जो मुस्लिम शौहर गैर कानूनी ढंग से तलाक़ दे पत्नियों को बेसहारा कर देते हैं उसको अपराध की श्रेणी में लाकर एक ‘विशेषाधिकार’ को समाप्त कर देता है, जिसका फायदा मुसलमान पुरुषों को अकेले ही मिला हुआ था.

सच्चाई यह है कि सभी समुदायों के पुरुष कानूनी रूप से वैध तलाक की कार्यवाही के बिना ही एकतरफ़ा तलाक़ दे अपनी पत्नियों को बेसहारा छोड़ देते हैं, चले जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ एक बार में तत्काल तीन तलाक को स्वीकृति देती थी, और उनका ऐसा करना बिल्कुल गलत था – सुप्रीम कोर्ट के स्वागत योग्य आदेश ने इस कानूनी स्वीकृति की स्थिति को ख़त्म कर दिया है। अब जरूरी यह है कि ऐसे धार्मिक संस्थानों व काज़ियों को तत्काल तीन तलाक़ को स्वीकृति देने से रोकने के लिए निवारक के रूप में नीति लायी जाए कि ऐसा करने पर उनके पंजीकरण को तुरंत रद्द कर दिया जाए।

अब गैर कानूनी ढंग से तलाक़ देने को कानूनी स्वीकृति ना मुसलमानों को है और ना हिंदुओं को. पर सवाल यह है कि अगर एक मुस्लिम गैर कानूनी ढंग से तलाक दे पत्नी को बेसहारा छोड़ देता है तो इसको अपराध की श्रेणी में कैसे लाया जा सकता है जबकि एक हिंदू जब ऐसा करता है तो उसे आपराधिक/फौजदारी श्रेणी में नहीं लाया जाता, इसे दीवानी कानून के दायरे में ही रखा जाता है ?

दूसरे शब्दों में, यहां मुद्दा ‘समान नागरिक संहिता/यूनिफॉर्म सिविल कोड’ का नहीं है, मुद्दा यह है कि त्वरित #tripletalaq अध्यादेश भारत के मौजूदा समान आपराधिक/फौजदारी कानून का उल्लंघन करता है  क्योंकि यह अध्यादेश केवल मुसलमानों द्वारा पत्नी को बेसहारा छोड़ने पर उनके के लिए एक विशिष्ट आपराधिक कानून का निर्माण कर रहा है जबकि हिंदू पुरुष का ऐसा करने पर तो उनके खिलाफ सिर्फ सिविल/दीवानी कानून के अंतर्गत कार्यवाही हो सकती है, उन्हें जेल नहीं भेजा जाता।

देश के प्रधान मंत्री खुद भी तो अपनी पत्नी जसोदाबेन को बिना वैध रूप से तलाक़ दिए ही उनसे अलग ज़िन्दगी बिता रहे हैं. जसोदा बेन ने कितनी बार कहा है कि वह मोदी जी के साथ रहना चाहती है पर मोदी जी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया. जसोदा बेन की स्थिति में हज़ारों महिलाएं हैं, हर समुदाय की – पर उनके पतियों पर आपराधिक कार्यवाही के लिए कोई कानून नहीं है – 498A को छोड़ कर जिसके तहत किसी भी समुदाय की महिला वैवाहिक क्रूरता का शिकायत कर सकती है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ में तो एक तरफा तलाक़ के लिए एक नाम है – ‘त्वरित तीन तलाक’ क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक़ के अन्य कानूनी तरीके भी हैं. पर पति द्वारा एकतरफा तलाक़ देकर – या बिना तलाक़ दिए ही पत्नी को छोड़ देने वाली कुप्रथा सभी समुदायों में प्रचलन में है जहां पति “मैं तुम्हें तलाक देता हूं” कहे बगैर ही तलाक दे देते है. तलाक के सभी एकतरफा, मनमाने रूप अवैध होने चाहिए। पर इन्हें दीवानी कानून के तहत ही होने चाहिए न कि क्रिमिनल /फौजदारी कानून के तहत.

त्वरित तीन तलाक या पति द्वारा दिए गए किसी अन्य तरह के एकतरफा तलाक़ – या ऐसा तलाक़ देने की मंशा से कहे गए क्रूर शब्दो को वैवाहिक क्रूरता मानकर कोई भी महिला चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम या फिर अन्य किसी समुदाय की, 498 ए वाले आपराधिक कानून के तहत शिकायत कर सकती है. इसमें खास मुसलमानों के लिए किसी नए कानून की ज़रूरत नहीं है.

दूसरी ओर निकाह हलाला को अपराधकृत होना चाहिए क्योंकि यह परंपरा के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर यौन उत्पीड़न और हिंसा को थोप देता है। निकाह हलाला जारी करने व बढावा देने वाली किसी भी धार्मिक संस्था पर भी अपराधिक मुकदमा चलाना चाहिए।

भारत में महिलाओं की स्थिति पर एक उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट ने सभी समुदायों के व्यक्तिगत – पर्सनल – कानूनों मे लैंगिक न्याय की दृष्टि से सुधार के लिए विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत की हैं। यह सरकार उस रिपोर्ट को क्यों अनदेखा करती है व इसके बजाय इस बात को प्रचलित क्यों करती है कि मुस्लिम पुरुष महिलाओं के प्रति विशिष्ट रूप से क्रूर हैं ? (मैं उस रिपोर्ट की सिफारिशों के संक्षिप्त विवरण के लिए टिप्पणियों में एक लिंक पोस्ट करूंगी, जो कि जरुरी और पढ़ने योग्य है)

जिस तरह से ज्यादातर मीडिया त्वरित ट्रिपल तलाक़ विरोधी अध्यादेश को गलत तरीके से प्रस्तुत रहे हैं वह मुझे 2013 की याद दिलाता है जब मीडिया ने झूठ फैलाया था कि कानून सहमति की उम्र कम करने के लिए संशोधित किया जा रहा था, जब कि वास्तव में इसके ठीक उलट, सहमति की उम्र बढ़ायी जा रही थी, जिससे युवाओं में सहमति के रिश्तों को बलात्कार की श्रेणी में लाया जा रहा था.

जिस तरह से त्वरित #tripletalaq अध्यादेश को संसद में या हमारे मीडिया में बिना सूचित, तार्किक बहस और महत्वपूर्ण जांच के बिना प्रस्थापित किया जा रहा है वह भयावह और शर्मनाक है.

मीडिया के मेहनती और जिम्मेदार वर्गों को तुरंत उपरोक्त चिंताओं के लिए जगह बनानी चाहिए ताकि चर्चा की जा सके, और उच्च स्तर की समिति की सिफारिशों के लिए व्यापक और सार्वजनिक रूप से चर्चा भी कायम हो सके। संसद पर तत्काल तीन तालाक पर बहस करने पर जोर देने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए ताकि कानून पारित होने से पहले किसी भी तरह के कानून पर बहस की जाए। अध्यादेश वापस ले लिया जाना चाहिए।

कविता कृष्णन
कविता कृष्णन भाकपा माले की पोलित ब्यूरो की सदस्य और आल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन (एपवा ) की सचिव हैं
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