प्रेमचंद और अक्तूबर क्रांति

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यह महान अक्टूबर क्रान्ति का सौवां साल है. अक्टूबर क्रान्ति दुनिया भर के मेहनतकशों के लिए एक अवश्यम्भावी स्वप्न था जिसे लेनिन के नेतृत्त्व में संपन्न किया गया था. 25 अक्टूबर को, रूसी मजदूरों, सैनिकों तथा अन्य मेहनतकशों ने, पूंजी पर टिकी व्यवस्था के अंत और दुनिया के पहले समाजवादी राज्य की स्थापना का ऐलान किया था। इसने न सिर्फ दुनिया भर में समाजवादी मूल्यों के लिए चल रहे संघर्षों को ठोस रूप से संचालित किए जाने का आधार उपलब्ध कराया बल्कि पूंजीवाद के शोषणकारी और विनाशकारी रूप से दुनिया को बचाए जाने का रास्ता भी दिखा दिया था.

जाहिर है कि किसी जनांदोलन और युग परिवर्तनकारी घटना का प्रभाव सिर्फ उस दायरे में ही घटित नहीं होता जहाँ कि वह घट रही होती है बल्कि ऐसी युगांतरकारी घटनाओं से निर्मित सामाजिक चेतना जिन सरोकारों को खडा करती है उससे राजनीति के साथ-साथ साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी वैश्विक और एक दूरगामी प्रभाव छोड़ती है.

रवींद्र नाथ टैगोर ने बोल्शेविज्म क्रांति के द्वारा शोषण, उत्पीडऩ तथा वंचनाओं से मुक्त एक नया समाज बनाने के उद्यम को देख-जानकर, सिर्फ तेरह वर्ष बाद, 1930 लिखा था: ‘अगर यहां नहीं आया होता तो मेरी जीवन यात्रा अधूरी रह जाती…जो पहली चीज मेरे दिमाग में आती है, यह कि क्या असाधारण साहस है… वे एक नयी दुनिया बनाने के लिए दृढ़ निश्चय हैं। उनके पास खोने के लिए जरा भी समय नहीं है क्योंकि सारी दुनिया उनके खिलाफ है…। अगर मैंने खुद अपनी आंखों से नहीं देखा होता तो मैं कभी इस पर भरोसा नहीं कर सकता था कि अज्ञान तथा अपमान के अंधेरे में डूबे लाखों लोग न सिर्फ साक्षर बन गए हैं बल्कि मनुष्य होने की गरिमा भी हासिल कर सके हैं। यहां वे दूसरी नस्लों के लिए भी उतनी ही मेहनत कर रहे हैं, जितनी अपने लिए…।’

यह संकेत है यह बताने के लिए कि दुनिया भर के साहित्य और संस्कृति पर बोल्शेविक यानी कम्युनिस्ट क्रान्ति का क्या प्रभाव पडा. यहाँ कुछ बातें उपन्यास सम्राट प्रेमचंद और अक्टूबर क्रांति के रिश्ते के बारे में करना अभीष्ट है.

आनंद प्रकाश ने समयांतर के जनवरी,१७ अंक में लिखा है कि ‘रूस की १९१७ में हुई बोल्शेविक क्रान्ति ऐसी घटना थी, जिसके बाद सोच और विश्लेषण के कारक बदले थे और उससे पूर्व की स्थिति में लौटना या उनसे निर्देश प्राप्त करना प्रगति और विकास को ध्यान में रखते हुए संभव न था. अवश्य ही योरोपीय या फिर विश्व सन्दर्भ में वोल्शेविक क्रान्ति के बीज सत्रहवीं सदी की इंग्लिश क्रान्ति में मौजूद थे जो प्रगतिकामी नेता आलिवर क्रामवेल के नेतृत्त्व में घटित हुई थी, और यह सिलसिला अठारहवीं सदी के सफल अमरीकी मुक्ति आन्दोलन एवं फ़्रांस के अत्यंत निर्णायक क्रान्ति-संघर्ष से गुजरता हुआ उन्नीसवीं सदी के अनेक उपनिवेश-विरोधी उभारों के दौरान चलता रहा था.

अपने सन्दर्भ में १८५७ का मुक्ति संग्राम याद करें. ‘ प्रेमचंद के ‘महाजनी सभ्यता ’, पुराना जमाना : नया जमाना, राज्यवाद और साम्राज्यवाद, साहित्य का उद्देश्य जैसे निबंधों, कुछ महत्वपूर्ण उपन्यासों, पत्रों तथा प्रगतिशील लेखक संघ के माध्यम से अर्जित सक्रिय संगठन कर्ता की उनकी भूमिकाओं से यह पता चलता है कि एक नई विश्व व्यवस्था की आहटों से वे न सिर्फ बखूबी परिचित थे बल्कि भारत जैसे देश में, जहाँ कि मुक्ति आन्दोलन चल रहा हो, इससे निःसृत मूल्यों और विचार प्रक्रिया को लागू करने के प्रति प्रयत्नशील भी थे.

प्रेमचंद दुनिया भर के समाजों में यथास्थितिवाद के खिलाफ उठ खड़े हुए तमाम मुक्ति आंदोलनों के नायकों के व्यक्तिगत रूप से प्रशंसक थे. प्रसंगवश बता दें कि विविध प्रसंग खंड-एक में पहला ही निबंध अंग्रेजी क्रान्ति के उन्नायक ओलिवर क्रामवेल पर है. इसमें उन्होंने ‘उस जमाने में रिआया पर बेजा जुल्मों की भरमार के कारण’ सिविल वार में क्रामवेल के शामिल होने को उनकी जिन्दगी का सबसे बड़ा और याद रखने के काबिल रखा जाने वाला काम बताया है.

कहना न होगा कि भारत में चल रहे स्वाधीनता आन्दोलन के भीतर गांधी जी के प्रबल आभामंडल के बावजूद कम्युनिज्म की दस्तक बोल्शेविज्म के साथ ही सुनाई देने लगती है. साहित्य के क्षेत्र में गांधी जी के प्रभावों की चर्चा के बीच एक बात अलक्षित रह जाती है कि बोल्शेविज्म से हिंदी साहित्यकारों ने क्या सबक लिए ? आलोचक रामचन्द्र शुक्ल ने प्रसाद की कामायनी में कम्युनिज्म की आहट सुनी थी. यह वही क्रांति थी जिसके युग परिवर्तनकारी अर्थ को पहचान कर, रूस से हजारों मील दूर, गुलाम भारत में प्रेमचंद ने 1918 में दयानारायण निगम को भेजे एक पत्र में लिखा था कि, ‘मैं करीब-करीब बोल्शेविस्ट उसूलों का कायल हो गया हूं।’

साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी रवैये का एक निरंतरता में अनुपालन जितना प्रेमचंद के यहाँ दीखता है, वैसा हिंदी के किसी और लेखक में नहीं. असंख्य मजदूर, किसान, स्त्रियाँ पहले-पहल जबकि समाज में उनके नायकत्व की संभावना क्षीण थी प्रेमचंद की रचनाओं में यह नायकत्व हासिल कर रहे थे. उनके उपन्यास ‘ रंगभूमि ’ के केंद्र में नायक सूरदास हैं.

प्रेमचंद संभवतः पहले रचनाकार है जिन्होंने हिंदी उपन्यास की ‘कर्मभूमि’ बदली. यद्यपि रंगभूमि के पहले प्रेमाश्रम में भी प्रेमचंद किसान समस्या उठाते है पर समाज में असमान भूमि वितरण और उससे जुड़े उत्पादन संबंधों के पीछे छिपे वर्गीय हितों की तीक्ष्णता ज्यादा ताकतवर तरीके से रंगभूमि में ही जाहिर हुई हैं. उन्हें पता है कि ‘शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है. उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है. उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएं और उनके मुकदमेबाजी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने ग़रीबों का गला घोटा जाता है. शहर के आस-पास ग़रीबों की बस्तियां होती है.’ अमीरी गरीबी के खिलाफ साजिश से ही फलती फूलती है. ज्यादातर पढने-लिखने की सुविधाएं अमीरों को ही हासिल है. ऐसी व्यवस्था में न्याय के लिए बनाई गई संस्थाएं बहुधा अमीरों के हित साधन के माध्यम भर है. शहर के रात के अँधेरे में ग़रीबों का गला घोटने के लिए दुरभिसंधियां की जाती है.

रंगभूमि के नायक सूरदास इस दुरभिसंधि के शिकार होते हैं. उनकी पराजय इस दुरभिसंधि के कारण होती है. सूरदास जिन्दगी भर जिस युद्ध को लड़ते रहे हैं अंत में उसमें हार जाते हैं. उपन्यास के अंत में मृत्यु के ठीक पहले वे कहते हैं –‘बस बस, अब मुझे क्यों मारते हो, तुम जीते मैं हारा. यह बाजी तुम्हारे हाथ रही, मुझसे खेलते नहीं बना. तुम मँजे हुए खिलाड़ी हो, हम नहीं उखड़ता, खिलाड़ियों को मिलाकर खेलते हो और तुम्हारा उत्साह भी खूब है. हमारा दम उखड़ जाता है, हाँपने लगते हैं, और खिलाड़ियों को मिलाकर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मारपीट करते हैं, कोई किसी को नहीं मानता. तुम खेलने में निपुण हो, हम अनाड़ी हैं. तालियाँ क्यों बजाते हो, यह तो जीतनेवालों का धर्म नहीं ? तुम्हारा धर्म तो है हमारी पीठ ठोकना. हम हारे तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धाँधली तो नहीं की. फिर खेलेंगे, जरा दम तो लेने दो, हारकर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे, और एक न एक दिन हमारी जीत होगी, जरूर होगी.’’

पूंजीवादी समाज की जीत का कारण खेलने में उनकी ‘ निपुणता ’ है. यह निपुणता तमाम आपसी प्रतिस्पर्धा और हित आधारित अंतर्विधों के बावजूद ग़रीबों के हितों के खिलाफ उनकी आपसी एकता है. यह एकता ग़रीबों के खिलाफ एक संयुक्त ‘धांधली’ है. जबकि ग़रीबों की अशिक्षा, सतावर्ग के तिकड़मो की नासमझी, आपसी एकजुटता का अभाव सत्ता के साथ होने वाले युद्ध में उनकी हार का सबब है. बिना ग़रीबों, वंचितों, और जाहिर है उसका बड़ा हिस्सा श्रमिक समुदाय से आता है, की वास्तविक एकता के बिना सत्ता से सत्य के इस युद्ध में विजय की कल्पना नहीं की जा सकती. इस सूरदास के व्यक्तित्त्व की तुलना गांधी जी से की जाती है. पर सूरदास गांधी जी की तरह किसी आदर्शवाद का शिकार नहीं है. वह जानता है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत बिना निर्णायक युद्ध के नहीं होगा और इस युद्ध में वंचितों की एकता सबसे कारगर भूमिका निभाएगी.

18 मार्च 1928 को गोरखपुर से निकलने वाले ‘ स्वदेश ’ में प्रकाशित प्रेमचंद के एक लेख, ‘राज्यवाद और साम्राज्यवाद’ के पुनर्प्रस्तुति के बहाने से एक बहस खड़ी करने की कोशिश की गई कि प्रेमचंद साम्यवादी थे अथवा नहीं ? अव्वल तो यह कि लेखक से पार्टी कार्यकर्ता होने की उम्मीद करना बेमानी है. समाज में चल रही राजनीति के बरक्स लेखक की स्वतंत्र और रचनात्मक सत्ता होती है. उसकी रचनात्मक सता का सम्मान समाजों के आधुनिक होने की प्रक्रिया में बढ़ता ही गया है. यह जरूर है कि राजनीति की तरह ही लेखक की भी एक विश्वदृष्टि होती है. अपने रचनात्मक संवेगों को वह उसी दिशा में संचालित भी करता है. तो देखना यह चाहिए कि लेखक के रचनात्मक संवेगों के स्रोत किस वैचारिकता के मेल में हैं ?

जनसत्ता में छपे उस लेख के साथ स्वघोषित, स्वनामधन्य प्रेमचंद शिरोमणि कमलकिशोर गोयनका की एक टिप्पणी लगी हुई है. बाद में इस लेख और टिप्पणी को प्रमोट करते हुए जनसत्ता सम्पादक ओम थानवी द्वारा फेसबुक पर एक पोस्ट में पूछा गया कि क्या प्रेमचंद मार्क्सवाद या साम्यवाद के अनुयायी थे ? या उन पर जबरन लेबल लगाया जाता है ? वास्तविकता यह है कि प्रलेस की स्थापना लन्दन में हुई थी। उसकी स्थापना में हिंदी का एक भी लेखक शामिल नहीं था। प्रेमचंद ने एक लेख लिखकर जनवरी 1936 में इसका स्वागत जरूर किया। फिर उसके पहले अधिवेशन की अध्यक्षता भी की, जिसमें एक बार भी मार्क्सवाद का नाम नहीं लिया। अगले रोज उन्होंने आर्य समाज के सम्मलेन की अध्यक्षता की।

प्रेमचंद साम्यवादी थे या नहीं, इसकी पड़ताल में मैंने उपन्यास सम्राट की कुछ रचनाओं के हवाले देखे तो एक विद्वान ने अपनी वाल पर लिखा कि पात्रों के हवाले क्या होता है, वहां पात्रों के विचार बोल रहे हैं, प्रेमचंद के नहीं। बात सही है। लेकिन प्रेमचंद अपने लेख में जो कहें, वह ? उसके बारे में हम क्या मानें ?

‘स्वदेश’ के 18 मार्च, 1928 के अंक में प्रेमचंद का एक लेख छपा था “राज्यवाद और साम्राज्यवाद”। इसमें प्रेमचंद के ये शब्द साम्यवाद के बारे में हैं: “एक समय था जब साम्यवाद निर्बल राष्ट्रों को आशा से आंदोलित कर देता था। सारे संसार में जब प्रजावाद की प्रधानता हो जाएगी, फिर दुख या पराधीनता या सामाजिक विषमता का कहीं नाम भी न रहेगा। साम्यवाद से ऐसी ही लंबी-चौड़ी आशाएं बांधी गई थीं; मगर अनुभव यह हो रहा है कि साम्यवाद केवल पूंजीपतियों पर मजूरों की विजय का आंदोलन है, न्याय के अन्याय पर, सत्य के मिथ्या पर, विजय पाने का नाम नहीं। यह सारी विषमता, सारा अन्याय, सारी स्वार्थपरता जो पूंजीवाद के नाम से प्रसिद्ध है, साम्यवाद के रूप में आकर अणु मात्र भी कम नहीं होगी, बल्कि उससे और भी भयंकर हो जाने की संभावना है।”

साम्यवाद के पूंजीवाद से भी भयंकर होने का खतरा ? वह भी प्रेमचंद को ? गौर करें कि यहाँ प्रेमचंद का कोई पात्र नहीं, प्रेमचंद खुद बोल रहे हैं ! प्रेमचंद समतावादी, साम्प्रदायिकता-विरोधी और प्रगति के हामी थे इसमें कोई शक नहीं। लेकिन उन्हें इतने वर्ष बाद किसी विचार या उससे बंधे घोड़े पर बिठाना उपन्यास-सम्राट के साथ ज्यादती है।”

सम्पादक की मुश्किल यह है कि उन्होंने यह सारे सवाल कमलकिशोर गोयनका के साक्ष्य पर पूछ डाले. खुद कोई जहमत उठाने की जरूरत नहीं समझी. जनसत्ता में पुनर्प्रकाशित इस लेख का शीर्षक जानबूझकर ‘पूंजीवाद से भयंकर है साम्यवाद’ किया गया है। क्या किसी संपादक को इसका नैतिक हक है ? वैसे प्रेमचन्द ने यह आरोप नहीं लगाया है बल्कि एक संभावना व्यक्त की है। अपने मंसूबे को जबरदस्ती प्रेमचंद के मुँह में डालने की कोई आवश्यकता न थी। जो लोग रोज किसी लेखक के कहीं जाने और न जाने को लेकर इतना चिंतित आज भी रहते हैं उन्हें प्रेमचंद का प्रलेस के स्थापना सम्मेलन में और आर्य समाज की गोष्ठी में जाना एक जैसा लग ही सकता है, इसमें क्या आश्चर्य ? और गोयनका का आरोप है कि 1928 में लिखे प्रेमचंद के इस लेख तक उनका चिंतन प्रौढ़ता तक पहुँच चुका था और साम्यवादी सरकारों के गुणावगुणों के समाचार अखबारों में आने लगे थे. इन्हीं कमल किशोर गोयनका ने ‘प्रेमचंद: प्रतिनिधि संचयन’ का भी सम्पादन किया है जो 2013 में ही सस्ता साहित्य मंडल से प्रकाशित हुआ है. इसके ‘ लेख एवं सम्पादकीय ’ खंड के अंतर्गत ‘नया ज़माना: पुराना जमाना ’, (1919), प्रगतिशील लेखक संघ के सभापति के रूप में दिया गया भाषण, और ‘महाजनी सभ्यता’ लेख संकलित है जबकि ‘राज्यवाद और साम्राज्यवाद’ लेख नदारद.

1919 में दया नारायण निगम को लिखे पत्र जिसमें प्रेमचंद अपने वोलशेविक उसूलों के कायल होने की बात स्वीकारते है, को छोड़ भी दिया जाए ‘नया ज़माना : पुराना जमाना का यह हिस्सा द्रष्टव्य है- “ आने वाला ज़माना अब किसानों और मजदूरों का होगा. दुनिया की रफ़्तार इसका साफ़ सुबूत दे रही है. हिन्दुस्तान इस आबोहवा से बेअसर नहीं रह सकता….इन्कलाब के पहले कौन जानता था कि रूस की पीड़ित जनता में इतनी ताकत छिपी हुई है…स्वराज्य की बेकार और बेमतलब सदाओं पर तकिया करके बैठने का वक्त अब नहीं क्योंकि आने वाला जमाना अब जनता का है और वह लोग पछताएँगे जो जमाने के कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेंगे.”

प्रेमचंद ने 1936 में ही अपना ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख लिखा, उनका आख़िरी पूर्ण उपन्यास ‘गोदान’ इसी साल प्रकाशित हुआ. गोदान में होरी के विपरीत गोबर का व्यक्तित्त्व प्रतिरोधी चेतना से लैस है. मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्त्व वही करता है. मातादीन के प्रसंग में सिलिया के परिजनों का गुस्सा, मालती और मेहता के बीच का आपसी सहजीवन ऐसे संकेत है जिनसे समझा सकता है कि प्रेमचंद अपने समय में आने वाले समाज की आहट देख पा रहे थे. 1936 में ही प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना भी हुई.

यह कहना कि प्रगतिशील लेखक संघ लन्दन में स्थापित हुआ था, एक झूठ के सिवा कुछ नहीं है और यह भी कि संयोगवश या आपद्-धर्म के रूप प्रेमचंद ने सभापतित्त्व नहीं ग्रहण किया था. भारत में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बन्ने भाई के प्रयत्नों से वे पहले से न सिर्फ वाकिफ थे बल्कि उसमें सक्रिय कार्यकर्ता की भूमिका में थे. 28 नवंबर 1934 को जैनेन्द्र कुमार को एक पत्र में उन्होने लिखा कि-‘ प्रयाग में लेखक संघ का विवरण तुम्हें मिल गया होगा। बहुत से साहित्यिक उसमें मिल गए हैं, लेकिन दिमाग वाला आदमी अभी तक नजर नहीं आता। यूं हमारे यहाँ दिमाग वाले हैं ही कितने। तुम इस संघ में आ मिलो और ऐक्टिव इन्टरेस्ट लो तो शायद कुछ हो। मेरा नाम सभापति के लिए पेश किया गया है। मेरा नाम सभापति के लिए पेश किया गया है। मेरे जैसा सभापति जिस संस्था का हो वह क्या होगी। मैंने डॉ भगवान दास, पंडित वेंकटेश नारायण तिवारी या पंडित नरेन्द्रदेव जी का नाम प्रपोज किया है।’

प्रेमचंद यह समझते थे कि बड़ा लेखक अगर ऐक्टिव इन्टरेस्ट लेगा तो उससे संगठन और लेखक दोनों का फायदा होगा। ये बहुत से साहित्यिक जो लेखक संघ में मिल गए गए थे वे आखिर कौन थे? जबकि दावा है एक भी लेखक शामिल नहीं था. जबकि सचाई यह है कि न सिर्फ प्रलेस की स्थापना बल्कि उसके बाद भी उसकी सांगठनिक जिम्मेदारी का निर्वाह प्रेमचंद के द्वारा किया जाता रहा.

दिल्ली में लेखको की एक सभा कायम की थी प्रेमचंद ने। सज्जाद जहीर को इसकी जानकारी देते हुए लिखा कि- ‘हमने देहली में एक हिंदोस्तानी सभा कायम की है जिसमें उर्दू और हिंदी के अहले अदब (साहित्यकार) बाहम तबादलए-खयालात (पारस्परिक विचार विनिमय)कर सके। सियासी मुदब्बिरों ने जो काम खराब किया है उसे अदीबों को पूरा करना पड़ेगा,अगर सही किस्म के अदीब पैदा हो जाए।’ लेखक राजकिशोर को लगता है कि निःसंदेह राजनीति से निराश हो जाने के बाद ही प्रेमचंद ने लिखा होगा कि साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है।  लेकिन ऐसे ही नहीं कहा था प्रेमचंद ने कि-साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। राजनीति की हर दक़ियानूसी को वे साहित्य और संस्कृतिकर्म के सहारे दूर करना चाहते थे। उसके जरूरी औजार राजनीति के समानांतर अच्छे साहित्य और संगठन के भीतर वे देख पा रहे थे। एक पत्र में उन्होंने सज्जाद जहीर को लिखा कि ‘एक नौजवान हिन्दी एडीटर ने जो देहली के एक सिनेमा अखबार का एडिटर है, हमारे जलसे पर यह एतराज किया है कि इस जलसे की सदारत (अध्यक्षता), तो किसी नौजवान को करनी चाहिए थी ,प्रेमचंद जैसे बूढे आदमी इसके सद्र क्यों हुए ? उस अहमक को यह मालूम नहीं कि यहां वही जवान है जिसमें प्रोग्रेसिव रूह हो। जिसमें ऐसी रूह नहीं वो जवान होकर भी मुर्दा है।’ उनके लिए नौजवान का मतलब ही था प्रगतिशील खयालात से युक्त व्यक्ति।

अब जब निगाह हर चीज को संदिग्धता और साजिश मानने को राजी हो जाए आँख के सामने की चीज भी देखना मुश्किल हो जाता है. प्रेमचंद के लिए ‘वोलशेविक उसूल’ क्या थे उसे देखना हो तो सबसे आख़िरी निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ पढ़ना चाहिए. जिस निबंध को इतना तूल दिया गया सम्पादक और टिप्पणीकार के मंतव्य के साथ मिलाकर पढ़ने पर लगता है मानो वह साम्राज्यवाद को साम्यवाद से बेहतर श्रेष्ठ विश्व व्यवस्था सिद्ध करने के लिए लिखा गया है. जबकि उस निबंध में केंद्र में वोलशेविक क्रान्ति के बाद दुनिया के साम्राज्यवादी देशों के भीतर श्रमिक और वंचित हितों की बात करने वाली पार्टियों की खबर ली गई है. जो अपनी मूल प्रकृति में अपने देशों के भीतर श्रमिक हितों के खिलाफ व्यापारिक हितों की अनदेखी का साहस नहीं उठा पाते.

आखिर क्या कारण है कि हिन्दुस्तान के भीतर भी आजादी के आन्दोलन के भीतर किसानों-मजदूरों के नेतृत्त्वकारी भूमिका को कांग्रेस सहित तमाम मुख्यधारा के राजनीतिक दल स्वीकार नहीं कर पाते.जबकि आन्दोलन के भीतर सर्वाधिक सक्रिय भूमिका उनकी ही थे. आखिर क्यों प्रेमचंद के पात्रों को बार बार पूछना पड़ता है कि कहीं ऐसा तो नहीं हो जाएगा कि जान की जगह पर गोविन्द गद्दी पर बैठ जाएंगे.

जिन्हें इस बात की चिंता है कि सभापति के रूप में दिए गए भाषण में प्रेमचंद ने एक बार भी मार्क्सवाद का नाम नहीं लिया उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्या कारण है कि ‘ राज्यवाद और साम्राज्यवाद ’ निबंध में प्रेमचंद ने फ्रांस, बेल्जियम, इंग्लैण्ड जैसे देशों का नाम तो लिया पर रूस का नाम क्यों नहीं लिया. वे इसका कोइ जवाब नहीं देंगे क्योंकि 1919 में ही ‘ वोलशेविक उसूलों के कायल ’ प्रेमचंद 1936 में भी ‘नई सभ्यता का सूर्य’ कह रहे थे और मान रहे थे कि “धन्य है वह सभ्यता, जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है, जल्दी या देर से दुनिया उसका पदानुसरण अवश्य करेगी…यह सभ्यता अमुक देश की समाज-रचना अथवा धर्म-मजहब से मेल नहीं खाती या उस वातावरण के अनुकूल नहीं हैं-यह तर्क नितांत असंगत है. ईसाई मज़हब का पौधा यरूशलम में उगा, और सारी दुनिया उसके सौरभ से बस गई. बौद्ध धर्म ने उत्तर भारत में जन्म ग्रहण किया और आधी दुनिया ने उसे गुरु दक्षिणा दी. मानव-स्वाभाव अखिल विश्व में एक जैसा ही है. छोटी-मोटी बातों में अंतर हो सकता है; पर मूल स्वरुप की दृष्टि से सम्पूर्ण मानव जाति में कोइ भेद नहीं. जो शासन-विधान और समाज-व्यवस्था एक देश के लिए कल्याणकारी है, वह दूसरे देशों के लिए भी हितकर होगी. हाँ, महाजनी सभ्यता और उसके गुर्गे अपनी शक्ति भर उसका विरोध करेंगे, उसके बारे में भ्रमजनक बातों का प्रचार करेंगे, जन साधारण को बहकाएँगे, उनकी आँखों में धुल झोकेंगे; पर जो सत्य है एक-न-एक दिन उसकी विजय होगी और अवश्य होगी.”

हर चीज को अलग अलग खांचे में बांटकर देखने वाली दृष्टि के लिए प्रेमचंद का अंतरराष्ट्रीयतावाद बेमानी ही होगा. महाजनी सभ्यता के गुर्गे अब लेनिन की मूर्ति तोड़ने में लगे हुए हैं जबकि नेपाल से लेकर मेक्सिको तक लेनिन नई सभ्यता के सूर्य की किरण बनकर चमक रहे हैं.


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