साहित्य-संस्कृति

यथार्थवाद की आधारशिला है सेवासदन – ज्ञानेन्द्रपति

वाराणसी : हिन्दी के अप्रतिम कथाकार प्रेमचन्द की 138वीं जयन्ती पर ‘‘क’’ कला वीथिका, लंका में उनके प्रथम हिन्दी उपन्यास ‘‘ सेवासदन ’’ पर आधारित फिल्म का प्रदर्शन व परिचर्चा का आयोजन किया गया.

 सेवासदन आज से 100 वर्ष पहले लिखा गया उपन्यास है जिसमें प्रेमचन्द ने सामाजिक विडम्बनाओं पर करारा प्रहार किया है.

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रख्यात कवि ज्ञानेन्द्रपति ने सेवासदन की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे यथार्थवाद की आधारशिला के रूप में निरूपित किया.  सेवासदन आज भी हिन्दी साहित्य के लिए आदर्श है.  उन्होंने सेवासदन और तत्कालीन बनारस के अन्तर्सम्बन्धों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बनारस की सामाजिक संरचना को समझने के लिए सेवासदन एक महत्त्वपूर्ण रचना है.  प्रेमचन्द ने 100 वर्ष पूर्व सामाजिक कुरीतियों व असमानता को जैसे व्यक्त किया था वह आज भी उसी तरह है, यह चिन्तन का विषय है.

प्रो. सदानन्द शाही ने कहा कि सेवासदन में प्रेमचन्द ने जो सवाल उठाया था उस सवाल का जवाब हम इन 100 वर्षों में भी नहीं खोज पाए हैं. सारी शिाक्षा-दीक्षा, स्त्री-विमर्श एवं नारी सशक्तीकरण के बावजूद वह सवाल अपनी जगह जस का तस बना हुआ है. प्रेमचन्द स्त्री-मुक्ति के सवाल को यों ही  नहीं उठा रहे थे, बल्कि सामाजिक संरचना में मौजूद कड़ियों की पड़ताल कर रहे थे. सेवासदन को माध्यम बनाकर हम ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं जहाँ स्त्रियों को किसी सेवासदन में शरण न लेनी पड़े.

अतिथियों का स्वागत व धन्यवाद ज्ञापन ‘‘क’’ कला वीथिका की संस्थापिका प्रो. मृदुला सिन्हा ने किया। संचालन रूद्रप्रताप सिंह ने किया. इस  अवसर पर डॉ जाह्नवी सिंह, आशा राय, शालिनी राय, मनोज राय, डॉ नीतू टहलानी, विश्वमौलि, धीरज गुप्ता, आशीष भारद्वाज, समृता यादव, स्वाति सिंह, सूर्यप्रकाश, प्रियंका, इन्दु शेखर त्रिपाठी आदि लोग उपस्थित रहे.

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