प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती पल्लवी त्रिवेदी की कविताएँ

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निरंजन श्रोत्रिय

 

युवा कवयित्री पल्लवी त्रिवेदी की कविताओं को महज़ ‘प्रेम कविताएँ’ या रागात्मकता की कविताएँ कहने में मुझे ऐतराज़ है।

पल्लवी की विलक्षण काव्य-प्रतिभा प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती हैं जिसमें स्त्री-विमर्श, पुरूष का अहं, रिश्तों की संरचना और मनोभावों के उदात्त स्वरूप सभी कुछ सम्मिलित हैं।

प्रेम को परिभाषित करना वैसे भी दुष्कर है। उसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह ‘मूकास्वादनवत्’ एवं ‘सूक्ष्मतरमनुभव स्वरूपम्’ है। प्रेम की प्रक्रिया का विकास स्थूल से सूक्ष्म और व्यष्टि से समष्टि की ओर होता है। युवा कवयित्री को इसी सूक्ष्म की खोज अपनी कविताओं में है। उनकी यह खोज कई बार अन्वेषण का जुनून बन जाता है।

वे प्रेम के अनछुए पहलुओं को बहुत गंभीर स्पर्श देती हैं। ‘विदा-1’ और ‘हर विदा ब्रेकअप नहीं होती’ ऐसी ही कविताएँ हैं। ‘वी डिपार्ट टू मीट अगेन’ जैसी उक्ति को वह अपनी कविता में एक भिन्न तेवर में चरितार्थ करती हैं–‘जैसे पेड़ करते हैं अपने पत्तों को विदा/ जैसे रास्ता मुसाफिर को/ और चिड़िया अपने बच्चों को।’ विदा को वे दो आत्माओं के बीच स्मृतियों की कभी न खुलने वाली गाँठ बना कर एक ऐसा आप्त वाक्य गढ़ती है जो अपने आप में एक पूर्ण कविता है। इस कविता में आधुनिक तकनीकी दृश्यबंध रचकर वे समूची कविता को मानो एक मल्टीमीडिया स्वरूप प्रदान करती हैं।

जयशंकर प्रसाद के अनुसार प्रेम तृप्ति की इच्छा और आवश्यकता से उत्पन्न एक ऐसा समर्पणमय राग है जो अहं एवं काम से प्रारंभ होकर निरहंकारिता और निष्काम समर्पण की पराकाष्ठा पर पहुँचता है और इसका प्रसार मनुष्य के सम्पूर्ण कर्तृत्व में हो जाता है। ‘कभी ऐसे भी करना प्रेम’ और ‘पाँच इन्द्रियों से प्रेम’ कविताओं में पल्लवी प्रेम के उसी सूक्ष्म रूप का अन्वेषण करती हैं जिसका ज़िक्र अभी किया।

ये कविताएँ एक भारतीय स्त्री के दैनंदिन की ओझल-उपेक्षित वस्तुओं को प्रेम में भिगोकर नए सिरे से अर्थवान बनाती हैं। यहाँ रेखांकित करने योग्य यह है कि इस दुनिया में सेफ्टी पिन्स, खीरा, टमाटर, पुदीने की चटनी और चाँद की बिन्दी के साथ एक कामकाजी स्त्री की वे परेशानियाँ भी सम्मिलित हैं जो अक्सर विमर्श से ओझल रहती हैं-‘मार्च एंड के बोझ की मारी वो/ जब लौटे ऑफिस से/ प्यार से लिटा लेना अपनी गोद में/ मलना बालों में जैतून के तेल को अपनी पोरों से/ और बच्चों-सी गहरी नींद सुला देना/ बस्स…।’ अनुकूल वेदनीयता प्रेम का प्रमुख लक्षण है (अनुकूल वेदनीयतया दुःखमपि सुखत्वेन अभिमन्यते)।

भारतीय काव्य शास्त्र, भक्ति, दर्शन और चिन्तन यह स्थापित करते हैं कि प्रेम का वास्तविक आनंद प्रिय के व्यक्तित्व में खुद को लीन कर देना है। ‘बारिश-सी लड़की’, ‘शुकराना’ और ‘गल्र्स स्कूल की लड़कियाँ’ कविताओं में स्त्री के उन्हीं मनोभावों को सार्थक एवं मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति दी गई हैं। इसमें भी बिम्ब-विधान ऐसा कि पाठक सहसा कह उठे–वाह! ‘लड़की ने धूप से बचने को एक छतरी मांगी/ लड़का दौड़कर गया और बारिश का मौसम उठा लाया।’ भीगते हुए लड़की का बारिश बन जाना, लड़के का उसी बारिश में फिर भीगना प्रेम के साथ हुआ व्यक्तित्वांतरण है जो प्रेम से हार्दिकता, साहचर्य, संयोजकता, परार्थपरता, अनन्यता, आस्था-विश्वास, दृढ़ता, अक्षुण्णता, निर्भयता, मंगल और आनंद की मांग करता है।

युवा कवयित्री पल्लवी ने बारीक काव्य-ध्वनियों से इस मांग को अपनी कविता में जायज ठहराया है। यह वही ध्वनि है जो चिड़िया के कंठ से ‘चीं-चीं’ बन निकलती है और डिप्रेशन में डूबे दिल को रेशम की डोर से बाहर खींच लाती है।‘गल्र्स स्कूल की लड़कियाँ’ कविता एक किशोेरी की नाज़ुक-सी दुनिया की अजब-गजब दास्तान है। यहाँ लड़की के साथ जवान होती बल्कि उसके पक्ष में खड़ी बाउण्ड्री, तड़की दीवारें, बेर, इमली, टेसू और नोटबुक हैं जो एक किशोरी के सहचर हैं। वह यहाँ विद्रोह का ककहरा सीखते हुए एक दूसरी पीढ़ी में तब्दील हो जाती है। यहीं नहीं अपनी बिटिया के सर पर एक खिलंदड़ी चपत लगाते हुए वह एक बार फिर से गल्र्स स्कूल की लड़की बन जाती है। एक समूचे समय का यह अंतरण न सिर्फ दिलचस्प बल्कि बेहद मार्मिक है।

‘जब मैंने ना कहा’ युवा कवयित्री पल्लवी की एक और महत्वपूर्ण कविता है। इन दिनों स्त्री की ‘ना’ विमर्श के केन्द्र में है। फिल्म भी बनी है। रेखांकित करने योग्य यह है कि यह कविता स्त्री देह और मन के आत्मसम्मान की गाथा के साथ प्रेम का उदात्त स्वरूप भी रचती है। पश्चिमी मनोवैज्ञानिक हर्बर्ट स्पेन्सर के व्यापक मनोवेग के एक उपादान ‘काम का शारीरिक आवेग’ ( ) को आसक्ति (। ) में वह भी एक आत्मसम्मान ( ) के साथ रिड्यूस होते देखना हो तो यह कविता अवश्य पढ़ना चाहिए। पल्लवी त्रिवेदी एक बेहद संवेदनशील और असीम संभावनाओं से भरी युवा कवयित्री है जो काव्य-संसार में नीली बद्दी वाली हवाई चप्पल-सी बेफिक्री लिए यूँ ही विचरण करती है लेकिन अपने तमाम जरूरी कामों को छोड़कर चिड़िया को निहारना चाहती है-पूरी ज़िम्मेदारी के साथ!

 

पल्लवी त्रिवेदी की कविताएँ

 

  1. विदा

कब किसी ने बताया सलीका कि कैसे ली जाती है विदा
प्रेम करने के सौ तरीकों वाली किताब भी नहीं बताती
कि विदा प्रेम का जरूरी हिस्सा है
साथी को खुश करने के नुस्खे तो सहेलियों ने भी कान में फूँके थे
माँ भी यदा-कदा सिखा ही देती समझौते करने के गुर

लेकिन विदा और मृत्यु के बावत कोई बात नहीं करता
जबकि दोनों प्रेम और जीवन का अंतिम अध्याय लिखती हैं

इस तरह विदा लेना और देना मुझे आया ही नहीं

गले लगकर रोना बड़ा आसान और प्रचलित तरीका है
पर मुकम्मल तो वो भी न लगा
गाली बक कर दो तमाचों के साथ भी विदा ली जा सकती है
मगर वह इंसानी तरीका नहीं

क्या होता वो सलीका कि विदाई की गरिमा बनी रहती
तमाम शिकवों के बावजूद ?
जैसे पेड़ करते हैं अपने पत्तों को विदा
जैसे रास्ता मुसाफिर को और
चिड़िया अपने बच्चों को

मुझे न पेड़ होना आया, न रास्ता होना
और न चिड़िया होना

खामोशी से किसी को सुलाकर उससे हाथ छुड़ा लेना एक और तरीका है
पर यह तो जुल्म ठहरा
यशोधरा की खाली छूटी हथेली आँसुओं से भरी देखी थी मैंने
और खामोश होठों पर एक उदास शिकवा-
‘सखि, वे मुझसे कह कर जाते’

वादा करके न लौटना एक और तरीका हो सकता है
मगर यह क्रूरता की पराकाष्ठा है और
जन्म देता है एक कभी न मिटने वाले अविश्वास को
हालांकि दोनों तरीकों के मूल में
विदा के दुःख को कम करना होता होगा शायद

मैं इस विदा को टालती रही एक मुकम्मल तरीके के इंतज़ार में
और इस बीच एक सुबह देहरी पर रखा पाया
एक गुड बाय का ग्रीटिंग कार्ड
विदाई का एक बदमज़ा तरीका आर्चीज वाले भी बेच रहे थे

सच तो ये है कि विदा करना कोई किताब नहीं सिखा सकती
कोई समझाइश विदा को आसान और सहज नहीं बनाती

हर विदाई छाती पर एक पत्थर धर जाती
हर विदा के साथ नसें ऐंठ जाती
आँखें एक बेचैन काला बादल हो जाती
हर विदाई के साथ कुछ दरकता जाता
हर विदा के साथ कुछ मरता जाता

कितना टालूँ इस विदा को कि
अब वक्त बार-बार चेतावनी अलार्म दे रहा
‘‘टाइम ओवर लड़की….तुमसे न हो पाएगा’’

हाँ…मुझसे सचमुच न हो पाएगा
कि मरना ही होगा एक बार फिर
ओ गुलज़ार…जानते हो!
सांस लेने की तरह मरना भी एक आदत है

पर अब भी मैं जीवन की आखिरी विदा से पहले
पेड़, रास्ता या चिड़िया होने के इंतजार में हूँ।

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2.  हर विदा ब्रेकअप नहीं होती

सबसे उदास और बदरंग मौसमों में मैंने चुने
सबसे चटक रंग अपने कुर्ते के लिए
दुपट्टे में लगवाई गोटा-किनारी और
आँखों में भर लिए नीलकंठ और नौरंगे के चमकीले रंग

एक ज़र्द और धूसर साँझ जब सीने से लिपट-लिपट जाती तो
मैं भागकर सामने जनरल स्टोर जाती
झटपट ले आती रंगबिरंगी जेम्स की गोलियाँ और
मेरी वाली ऑरेंज को उस सलेटी शाम के माथे पर सजा देती
फिर पहनती अपनी ऑलिव ग्रीन फूलों वाली घेरदार स्कर्ट
और मोजिटो हाथ में लिए देर रात तक सुनती रहती
रेस्त्रां में गिटार थामे गाते उस नवयुवक को

जब रातें नाग बन कर कुंडली मारकर बैठ जाती
मैं मुल्तवी कर देती सोना और रात गुजार देती
चर्च में मिस्टर बीन के बराबर वाली कुर्सी पर बैठे हुए
नागों के पास नहीं है अच्छा हास्य बोध
आखिर थक कर वे वापस लौट ही जाया करते

पीली पड़ चुकी डायरी में कितनी बार रखे मैंने ताज़े फूल
सूखी शाखों को हरियाया ओ’ हेनरी के तरीके से
लगभग ठहर चुके वक्त में मैं चली पागलों की तरह
ठहरने को खारिज करते हुए
बंद पड़ी घड़ियों पर दिन में सिर्फ दो बार नज़र डाली
वक्त सही न था पर मैंने जब देखा सही देखा

मेरे भीतर का शहर जब जब उजड़ा
मैं उन सुनसान सड़कों पर भागी पायलें पहनकर
घुंघरूओं के शोर से कुचला अकेलेपन की कातर चीखों को

जब माथे पर गहरी नींद सोया एक भूला बिसरा चुम्बन अंगड़ाई लेता
जब उन गुजरे सालों की कोई बेरहम स्मृति किवाड़ खटखटाती
जब स्वप्न शत्रु की तरह पेश आने लगते
तब मैं उन प्रेमिकाओं के बारे में सोचती
जिन्हें जन्मों तक श्राप मिला है विरह में होने का
प्रेम में जीती-मरती उन औरतों की गाढ़ी पीड़ा को
मरहम बनाकर लेप दिया अपने एक नन्हे-से दुःख पर

इस तरह मैंने सबसे बुरे दिनों में भी जुटाया
अपने हिस्से की खुशी का एक-एक मॉलीक्यूल

सिर्फ तुम जानते हो कि ये सारी मशक्कत थी
महज एक वादे को निभाने के लिए वरना
उदास औंधे मुँह लेटकर रोते रहना कितना आसान था

और देखो.. मैं तुम्हें तब तक क्रूर मानती रही
जब तक जान नहीं गई कि
दरअसल तुम मुझे क्या सिखाना चाहते थे
अब मैं सुख का बंदोबस्त नहीं करती
सुख को चुनती हूँ…

बात बस कुल इतनी-सी कि
विदा मुलाकातों की डोर का टूटना और
दो आत्माओं के बीच स्मृतियों की कभी न खुलने वाली
एक पक्की गाँठ का लगना है

और अब कौन जानता है यह मुझसे बेहतर कि
हर विदा ब्रेकअप नहीं होती।

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3. कभी ऐसे भी करना प्रेम

जब भी देखो किसी चिड़िया को चहकते-फुदकते
बस उसी को देखना एकटक
यूँ नहीं कि पढ़ते-लिखते, मोबाइल पर बात करते
एक उड़ती निगाह डाली और मुस्कुरा दिए

सारा काम परे रख…देखना बस उस चिड़िया को
आँख में भर लेना उसे उसके पूरे चिड़ियापन के साथ
जीना उस पल को सिर्फ उस चिड़िया के साथ

और ऐसे ही करना प्रेम
जब भी करना
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सारे ब्राण्ड उतार कर देहरी पर छोड़ देना
क्लच को एक झटका देना और सुबह दस बजे से कसे जूड़े को खोल देना
निकाल देना साड़ी के पल्ले की सारी पिनें

आना नीली बद्दी वाली हवाई चप्पल-सी बेफिक्री लिए
हमेशा अपने प्रेमी के पास
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आज उसे चाँद की बिन्दी न लगाना
आँचल में सितारे भी न टाँकना
उसकी देह के लिए नई उपमाएँ तो बिल्कुल न खोजना

मार्च एंड के बोझ की मारी वो
जब वो लौटे ऑफिस से
प्यार से लिटा लेना अपनी गोद में
मलना बालों में जैतून के तेल को अपनी पोरों से
और बच्चों-सी गहरी नींद सुला देना
बस्स…..
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जब लड़ना तो आसमान सर पे उठा लेना
कहना उसे
‘जल्दी टिकट कटा ले बे ऊपर का’
और जब उसके इंतजार का काँटा
दस मिनिट भी ऊपर होने लगे तो
वो दस मिनिट दस युगों की तरह गुजारना
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उसे यूँ ही बाहों में मत भर लेना
सुनो…आज एक काम करना

खाने की मेज पर प्लेटें सजा देना
काट कर रखना खीरा और टमाटर
झटपट बना देना सब्ज़ पुलाव और पुदीने कैरी की चटनी
और जब वो नहाकर ऊपर बाल बाँधती हुई
जाने लगे रसोईघर में
उसे बाहों में भरकर
बेतहाशा चूम लेना
और उसकी आँखों से सुख बरसा देना।

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4.  बारिश-सी लड़की

उसने तेज धूप से कुम्हलाई उस लड़की की आँखों में
झांकते हुए कहा था
‘तुमको भीगना होगा पागल लड़की’
लड़की उन पानीदार आँखों को एकटक देखती रही और
बेसाख्ता बोल पड़ी
‘हाँ, मैं भीगूंगी’

लड़की ने धूप से बचने को एक छतरी माँगी
लड़का दौड़कर गया और बारिश का मौसम उठा लाया

एक पूरा बरसात का मौसम लड़की की छतरी बनता है
एक दीवाना लड़का छतरी को थाम लेता है
लड़की तरबतर हुई जाती है
लड़का मुस्कुराए जाता है
बादल से झरती हैं दुआएँ बूँद बूँद

सूखे को बरसात में बदलने के लिए दीवानापन जरूरी है
और इस कदर दीवाना होने के लिए ज़रूरी है सिर्फ प्रेम
बरसात को छतरी बनाना समझदारी को परे रख पागलपन को चुनना है
एक कभी न उतरने वाले बुखार को छाती से लगा लेना है
मरते दम तक भीगते रहना है
खुद बारिश हो जाने तक भीगते रहना है

लड़की इतना भीगी कि
खुद बारिश बन गई

अब लड़का उस बारिश में भीगता है…।

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5.  शुकराना
क्या तुम जानती हो नन्ही चिड़ियों
कितना कर्जा हो गया तुम्हारा मुझ पर!

तुम ही तो थीं जो अपने रूई से पंखों पर बैठाकर ले गईं मुझे
कुदरत की नर्म बाहों में
तुमसे ही तो सीखा सावन में पत्तों से टिप टिप झरती कविता को महसूसना
तुम्हीं से सीखा नदियों के बहते पानी से दुःख-सुख के किस्से बाँट लेना
तुम ही तो थीं जो उन अकेले, थके-थके
बूढ़े पेड़ों की सूनी आँखों को बांचना सिखा रही थीं
तुम्हें जानते जानते ही तो जान पाई कि
संवाद के लिए निहायत ही गै़र जरूरी चीज है इंसानी भाषा

तुम्हें एकटक निहारते मेरी पीठ पर उगने लगे पंख
तुम्हारे साथ-साथ नापने लगी मैं भी अपना आसमान
मन में गहरे तक कुछ पिघला
कोई हिस्सा नरम हुआ, कुछ धागे सुलझ गए
तुम्हें निहारते-निहारते दिखाई देने लगे वे सारे जादुई नज़ारे
जो आँखों में नहीं आत्मा में बस जाते हैं

तुम्हीं ने समझाए प्रेम के सही मायने कि
कैसे प्रेम सारा आकाश सौंपकर आजाद करता है और
कैसे वही प्रेम सांझ ढले लौटा लाता है अपने घोंसले की ओर

मेरे अकेलेपन के आकाश को कभी सूना नहीं होने दिया तुम्हारे कलरव ने
अनगिन बार भीतर का सन्नाटा गूँजता रहा तुम्हारी चुक-चुक से
जब कभी दिल अंधे कुएँ में धपाक-से डूबने को हुआ
तुम लोग हर बार अपनी चीं चीं की रेशम डोर से खींच लाईं

मनुष्य अगर पूरा मनुष्य हो जाए तो
चिड़िया और मनुष्य में कोई फर्क नहीं होता
मैं थोड़ा और मनुष्य होने की कोशिश में हूँ कि
एक दिन बन सकूँ चिड़िया

तुम्हारा शुक्रिया कैसे अदा करूँ बताओ तो
अच्छा कहो तो..कल कौन-सा दाना खाओगी?
ज्वार ले आऊँ या ब्रिटानिया मारी ?
और हाँ.. जब उदास हो जी या सूझे कोई शरारत
या बस यूँ ही लड़ियाने का मन हो
तो आना और बैठ जाना मेरे काँधे पर
बेझिझक, बेवक्त, बेफिक्र…
मेरी प्यारी बच्चियों …
खुश रहो, चहचहाती रहो संपूर्ण आकाश पर
कि धरती मुस्कुराकर जी सके।

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6. पाँच इन्द्रियों से प्रेम

( श्रवण )

आज सवेरे जब तुम्हें देख रही थी अपलक
परिंदों को दाना डालते हुए
छत पर दो गोरैया, तीन कबूतर और चार गिलहरियों से घिरे
उन्हें प्यार से टेर लगाकर बुलाते हुए
तुम अचानक एक गहरी और शांत आवाज़ में तब्दील हो गए
और मैं लगभग ध्यान मग्न

संसार के सारे स्वर मौन हुए और
तुम गूंजने लगे मेरी देह और मन के ब्रम्हांड में एक नाद की तरह
काटते रहे चक्कर मेरी नाभि के इर्द-गिर्द

मैं उस पल में एक योगिनी थी और तुम
ओम…ओम…ओम…।

………………………………………

( स्वाद )

आज दोपहर मौसम की पहली बारिश और बस…
तुमने देखा मुझे ऐसी तलब भरी निगाहों से
मानो मैं चाय की एक प्याली हूँ
ओह…उत्तेजना से थरथरायी प्याली और
टूट कर बिखर गई एक गर्म आगोश में

और ठीक उस वक्त जब तुम ले रहे थे
बागान की सबसे कोमल पत्तियों की चुस्कियाँ
मैं तलबगार हुई एक अनचीन्हे नशे की
तुम उस क्षण बने अंगूर का महकता बाग
ढेर-से रसीले अंगूर मैंने कुचले, चखे और
डूब कर बनाई सबसे बेहतरीन शराब

अब आँखें बंद कर घूँट-घूँट चखती हूँ तुम्हें
नशा-ए-मुहब्बत बढ़ता जाता हर बूँद के साथ
……………………………..

( स्पर्श )

पूरी ढल चुकी शाम के बाद बुझ चुके सूरज की राख
जब उदासी बनकर जमा हो रही थी चेहरे और निगाहों पर
तुम बन गए थे एक रेशमी रूमाल
मेरी छलछलाई आँख को समेटते, उदासी की राख पोंछते
तुम एक मुलायम छुअन थे
हंस का एक उजला मुलायम पंख थे
किसी नवजात की नर्म हथेली थे

तुम स्वाति का पहली बूँद थे
बेचैन पपीहे पर बरस रहे थे…।
……………………………

( दृश्य )

आधी रात नींद खुली और देखा
तुम टेबल पर झुके कोई कविता बुन रहे थे
लैम्प की उस पीली रोशनी में तुम बन गए
प्रकृति की एक विराट पेंटिंग

सोचते हुए ललाट पर चार गहरी सिलवटें
जैसे सूरज से निकलती पहली किरणें
जिसकी गुनगुनी गर्माहट में
गेहूँ की बाली की तरह पकती थी कविता

प्रमिल आँखों में देर तक टिकी एक बूँद
जो बाद में कविता की किसी पंक्ति में ही गुम हो गई थी
मद्धम लयबद्ध साँसों में महकती थी वो सुनहरी गेहूँ की बाली

मैं देखती रही अडोल उस अलौकिक चित्र को
फिर मैं उस चित्र पर झुकी और अपना नाम लिख दिया
एक पीले चुम्बन से…
……………………………………
मैं अपनी चार इन्द्रियों से चार पहर तुम्हें महसूसती हूँ
और पाँचवी ?

( गंध )

जब जब साँस लेती हूँ तुम बन जाते हो तुम्हारी ही तुर्श महक
जो फूटती है तुम्हारी देह से और समाती है मेरी रूह में….

 

7.  माँ के लिए

समंदर किनारे अपनी सखियों संग पानी उछालती दौड़ जाती है माँ
उसे समंदर से दोस्ती बढ़ानी है
पीठ पर एक बड़ी लहर की धौल महसूस करनी है
पाँव के नीचे गुदगुदाती रेत को अपनी उँगलियों से थपकना है

जंगल के बाहर बैठ माँ हमारा इंतज़ार नहीं करती
एडिडास के जूते और एक लाठी को साथ लेकर वह संपूर्ण जंगल नापती है
उसे भी हॉर्नविल और लंबी पूंछ वाला कोतवाल
किताबों के बाहर की दुनिया में देखना है
उसे भी विशाल बिलों में रहती चींटियों के संसार से परिचित होना है
पेड़ से झरते महुए के नीचे आँख बंद कर खड़ा होना है

माँ की आँखों के धुंधले रेटिना में अब हीरे से चमकते हैं सपने
माँ एक सौ आठ ख्वाहिशों के मनकों वाली माला फेरा करती है

माँ जो एक फ्राॅक से निकल सीधे दुल्हन के जोड़े में
और फिर माँ की साड़ी में समा गई
वह कहाँ जान पाई कि
तमाम रिश्तों के जाल से मुक्त नीले आकाश में उड़ना क्या होता है?
सिर्फ और सिर्फ एक स्त्री होना क्या होता है?

आखिर माँ ने खोज लिए वो हसीन पल जो उस काॅलेज की
पहली बंेच पर उसके लिए रखे थे
जहाँ वो कभी गई ही नहीं

और अब देख रही हूँ माँ को एक मीठा गीत गाती चिड़िया में बदलते

सर में प्यार से उँगलियाँ फिराती
कटहल और गोभी के अचार डालती
जरा देर होने पर जान सुखाती मेरी माँ
दुनिया की सबसे प्यारी माँ है और

पहाड़ों पर चढ़ती, नदी में पाँव डालकर बैठती
मोबाइल में हिंदी टाइपिंग सीखने पर खिलखिला उठती
पिज्जा का नाम लेते ही आँखें चमकाती
बेफिक्री की गहरी नींद सोती मेरी माँ
दुनिया की सबसे प्यारी बच्ची है।

———————

8.  पिता सोते नहीं

एक दिन
पहाड़ की गोद से मचलकर एक नदी फिसलकर भागी
पर्वत मुस्कुराकर आवाज देता रहा
नदी एक हिरनी की तरह कुलांच भरती रही

पहाड़ जागता हुआ सचेत खड़ा है एक पिता की तरह
नदी मैदानों में सितोलिया खेल रही है
घाटियों से गुजरते हुए कोई अलबेली धुन गुनगुना रही है
कभी बेसुध हो नाच रही है तो कभी शहरों से गप्पें हांक रही है
कभी पलटकर पहाड़ को जीभ चिढ़ा रही है

पहाड़ बस मुस्कुराये जाता है

एक नन्ही बिटिया को पिता की उँगली थामे मेले में घूमते देखा था आसमान ने
और चाँद ने बलाएँ लेकर दुआएं बिखेरी थीं अंतरिक्ष में
नदी की दायीं बांह में बंधा है पहाड़ी मिट्टी का तावीज
और बालों में टंकी है एक मेले से खरीदी हेयरपिन

नदिया दौड़े जाती है आँखें मीचे
अपने किनारों के कांधों पर चढ़कर
और रात को
थककर सो जाती है सीने पर दोनों हाथ समेटे

पहाड़ सदियों से सोया नहीं है
उसके बाएँ हाथ की उँगली में अटका है
नदी की फ्रिल वाली फ्रॉक का रेशमी बेल्ट

पहाड़ मोह में नहीं पुत्री के प्रेम में है
आजादी उसका नदी को दिया सबसे बड़ा उपहार है

पिता की गोद से फिसलकर भी
कौन बिटिया ओझल होती है भला
अगर सिर्फ आँखें बंद कर लेना सोना नही ंतो
पिता कभी सोते नहीं

बिटिया को देते हैं दो सफेद पंख
और बस करते हैं परवाह आखिरी सांस तक।

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9. अनुपस्थित

मैंने उसे बोलते सुना है
उसकी अनुपस्थिति में
जबकि उपस्थित होते हुए वह अक्सर खामोश ही रहा है

उपस्थित देह बड़ी मामूली बात होती है
अनुपस्थिति में आदमी ज्यादा ठोस तरीकों से उपस्थित होता है
अनुपस्थिति में सुने जा सकते हैं उन शब्दों के अर्थ
जो जल्दबाजी में बोल भर दिए गए
पढ़े जा सकते हैं इत्मीनान से चेहरे के वो भाव
जो उसके जाने के बाद मेज पर किताब की तरह
छूटे रह गए
महसूस की जा सकती है स्मृतियों की संतरे के छिलके-सी गंध देर तक

उसे यूँ ही ज्यादा देखा, ज्यादा जाना, ज्यादा सुना मैंने
साकार उपस्थिति का एक दिन देता है कई दिन निराकार उपस्थिति के

यूँ ही आते रहा करो दोस्त, जाते रहने के लिए।

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10. गर्ल्स स्कूल की लड़कियाँ

एक साढ़े आठ फीट ऊँची बाउंड्री के भीतर जवान होता है पूरा आकाश
ग्यारह से पाँच तक अनगिन चिड़ियाँ चह चह चहकती हैं इसके कोने कोने में
प्रौढ़ धरती उन घण्टों में बन जाती है एक ग्यारहवीं में पढ़ती चंचल किशोरी
तड़की दीवारें अपनी दरारों से छिपकर देखती हैं एक जीवन उत्सव
इधर से गुजरता बसंत ठिठकता है दो घड़ी और
इन्हीं चिड़ियों के नाम लिख देता है अपने सारे टेसू

क्लास की खिड़की के बाहर गुजरती साइकिल की टिन टिन से
दिल के तार ट्यून करतीं
शर्ट की उधड़ी जेबों में बेर और इमली भरती
नीली स्कर्ट के पीछे उग आए अल्हड़ लाल चाँद को किताबों से ढाँकती
सेफ्टी पिन्स को आड़े वक्त के औजार की तरह कमीज के भीतर
एहतियात से छुपातीं
गल्र्स स्कूल की लड़कियाँ

नोटबुक के पिछले पन्नों पर अपने नाम के पहले अक्षर के साथ
एक दूसरा अजनबी अक्षर लिख
पके सेब-सी मुस्कुरातीं
बाॅयज़ स्कूल के सामने गुजरते हुए
एक झलक ‘अपने वाले’ की पाने के लिए दोनों मुट्ठी भींच दुआ मांगतीं
नाभि के नीचे घाटी में पहली बार चक्कर काटती
एक मछली की प्यास को समझने का जतन करतीं
दिल के तड़ाक से टूटने पर सहेली के काँधे पर भुरभुरी मिट्टी-सी ढहतीं
गल्र्स स्कूल की लड़कियां

भरे बाजार में पहली बार छाती पर सरसराये नाग को याद कर
रात भर सिहरतीं
उस अधेड़ मास्टर के लम्पट स्पर्शों पर सुलग सुलग जातीं
अपनी ढीठ आँखों से बगावत के मायने समझातीं
नारों और हड़तालों का ककहरा सीखतीं
गल्र्स स्कूल की लड़कियाँ

बरसों बाद अपने बच्चों के साथ
उस स्कूल के बाहर से गुजरते हुए कार धीमी करतीं
हसरतों से अपने दीवाने दौर को ताकतीं
अपनी किशोर स्कूल मेट्स के झुण्ड को देख
अनारदानों-सी हँस पड़तीं और फिर
माँ की इस निराली अदा पर चकित बेटी के सर पर चपत लगा कार झटके से बढ़ा देतीं
गल्र्स स्कूल की लड़कियाँ
———————-
11. जब मैंने ‘ना’ कहा

मैंने पहली बार जब ‘ना’ कहा
तब मैं आठ बरस की थी
‘अंकल नहीं…नहीं अंकल..’
एक बड़ी चाकलेट मेरे मुँह में भर दी अंकल ने
मेरे ‘ना’ को चाकलेट कुतर कर खा गई
मैं लज्जा से सुबकती रही
बरसों अंकलों से सहमती रही

फिर मैंने ना कहा रोज ट्यूशन तक पीछा करते उस ढीठ लड़के को
‘ना, मेरा हाथ न पकड़ो’
ना, ना…मैंने कहा था न ‘ना’
मैं नहीं जानती थी कि ‘ना’ एक लफ्ज़ नहीं, एक तीर है
जो सीधे जाकर गड़ता है मर्द के ईगो में
कुछ पलों बाद मैं अपनी लूना सहित औंधी पड़ी थी
मेरा ‘ना’ भी मिट्टी में लिथड़ा दम तोड़ रहा था

तीसरी बार मैंने ‘ना’ कहा अपने उस प्रोफेसर को
जिसने थीसिस के बदले चाहा मेरा आधा घण्टा
मैंने बहुत जोर से कहा था ‘ना’
‘अच्छा! मुझे ना कहती है!!’
और फिर बताया कि
जानते थे वो मैं क्या-क्या करती हूँ अपने बॉयफ्रेंड के साथ
अपने निजी प्रेमिल लम्हों की अश्लील व्याख्या सुनते हुए
मैं खड़ी रही बुत बनी

सुलगने के वक्त बुत बन जाने की अपराधिनी मैं
थीसिस को डाल आई कूड़ेदान में और
अपने ‘ना’ को सहेज लाई

वो जीवनसाथी हैं मेरे जिन्हें मैं कह देती हूँ कभी कभार
‘ना प्लीज़…आज नहीं…’
वे पढ़ेलिखे हैं, जिद नहीं करते
झटकते हैं मेरा हाथ और मुँह फेर लेते हैं निःशब्द
मेरे स्नेहिल स्पर्श को ठुकराकर वे लेते हैं ‘ना’ का बदला

आखिर मैं एक बार आँखें बंद कर झटके से खोलती हूँ
अपने ‘ना’ को तकिए के नीचे सरकाती हूँ और
उनका चेहरा पलटाकर अपने सीने पर रख लेती हूँ
मैं और मेरा ‘ना’ कसमसाते रहते हैं रात भर

‘ना’ क्या है?
एक लफ्ज़ ही तो जो बताता है मेरी मर्जी
खोलता है मेरे मन का ताला
कि मैं नहीं छुआ जाना चाहती तुमसे
कम-अज़-कम इस वक्त

तुम नहीं सुनते
तुम ‘ना’ को मसल देते हो पंखुरी की तरह
कभी बल से कभी छल से
और जिस पल तुम मेरी देह छू रहे होते हो
मेरी आत्मा कट कर गिर रही होती है

कितने तो पुरूष मिले
कितने ही देवता
एक ऐसा इंसान न मिला जो
मुझे प्रेम करता मेरे ‘ना’ के साथ।
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(कवयित्री पल्लवी त्रिवेदी का जन्मः 8 सितम्बर 1974, ग्वालियर में हुआ. शिक्षाः बी.एस-सी., इतिहास में स्नातकोत्तर (विक्रम विश्वविद्यालय,उज्जैन) सृजनः हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ,व्यंग्य और यात्रा संस्मरण प्रकाशित। एक व्यंग्य-संग्रह ‘अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा’ प्रकाशित। बर्ड फोटोग्राफी में विशेष रूचि। सम्प्रतिः पुलिस मुख्यालय, भोपाल में ए.आई.जी.( इंटेलिजेंस ) के पद पर पदस्थ। टिप्पणीकार टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, आरौन, मध्यप्रदेश में प्राचार्य हैं.)

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