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लोकतांत्रिक अधिकारों के रक्षार्थ राष्ट्रीय अधिवेशन

पीयूसीएल की ओर से आईटीओ नई दिल्ली के मालवीय स्मृति संस्थान में विभिन्न समसामियक विषयों पर (31 अगस्त व 1 सितंबर) दो दिवसीय अधिवेशन आयोजित किया गया। पहले दिन का कार्यक्रम तो निर्विघ्न संपन्न हुआ लेकिन दूसरे दिन कार्यक्रम के दूसरे सत्र के समय संस्थान की ओर से नोटिस जारी करके सूचना दी गई हॉल बुक कराने वाले व्यक्ति नेे कार्यक्रम के आयोजकों की विचारधारा और चरित्र के बारे में हमें कुछ नहीं बताया था। लेकिन कार्यक्रम के पहले दिन हमारे सदस्यों ने पाया कि हमारे परिसर में आयोजित किया जा रहा ये कार्यक्रम और आयोजकों के बारे में तथ्यों का खुलासा किया। और उन्होंने निर्णय लिया कि हमारा ये परिसर ऐसे संस्था के लिए उपलबध नहीं है जो हमारी विचारधारा, चरित्र और राष्ट्रीय हित के खिलाफ़ है।
अतः हम त्वरित कार्रवाई करते हुए तत्काल प्रभाव से इस सेमिनार को निरस्त करते हैं और संस्था से आग्रह करते हैं कि वो बिना किसी विवाद या प्रतिरोध के अपना कार्यक्रम पूरी तरह से समाप्त कर दें। जबकि गेट के बाहर कई हिंदुत्व उग्रवादी जय श्री राम और भारत माता के नारे लगाते हुए कार्यक्रम में शामिल लोगों को प्रतिक्रिया के लिए उत्तेजित कर रहे थे। सूचना पाकर मौके पर पहुंची दिल्ली पुलिस ने मामले को सम्हालते हुए उग्रवादी हिंदुत्व तत्वों को दूसरे फ्लोर के एक कमरे में तब तक बंद रखा जब तक कि कार्यक्रम में शामिल लोगों ने वो परिसर छोड़ नहीं दिया।

कार्यक्रम निरस्त करने का नोटिस

अधिवेशन का पहला दिन


पहले दिन का कार्यक्रम उद्घाटन सत्र के साथ शुरु हुआ। इसके बाद रेला के कलाकारों ने प्रतिरोध के गीत सुनाए।
ऐपवा की कविता कृष्णन और पीयूसीएल के वी. सुरेश ने परिचय और स्वागत किया।
लोकतांत्रिक अधिकारों की चुनौतियां: पहला सत्र:
मनोरंजन मोहंती ने इस सत्र की अध्यक्षता की। जबकि NFIW की एनी राजा ने पहले वक्ता के तौर पर बोलते हुए कहा- “एनडीए-1 ने बच्चों को टूल्स के रूप में इस्तेमाल किया। हरियाणा में बोर्ड में हाईएस्ट नंबर लानेवाली लड़की के साथ गैंगरेप किया गया। वे मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं पर हिंदू समाज की स्त्रियों के अधिकारों के बारे में जुबान नहीं खोलते। वो मनुस्मृति लागू कर रहे हैं देश पर और मनुस्मृति महिलाओं को बराबर का हक़ नहीं देता।
अभी पिछले महीने एक रोज मोदी जी टीवी पर प्रकट हुए कहने लगे अब प्रसव में महिलाओं को 5 हजार रुपए दिए जाएंगे बस शर्त इतनी है कि वो उनका पहला प्रसव हो और उनकी उम्र 19 वर्ष से ज्यादा हो। लोगों ने तालियां पीटा कि मोदी ने उपहार दे दिया। अरे दे दिया की छीन लिया। खाद्य सुरक्षा बिल के तहत पिछली सरकार ने मातृत्व सुरक्षा भी दी थी। इसमें महिलाओं को प्रसव के वक्त 6 हजार रुपए मिलते थे। मोदी ने उसमें से 1 हजार कम कर दिये। पहले हर प्रसव पर पैसे मिलते थे अब सिर्फ प्रथम प्रसव पर मिलेगा। राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक 35 प्रतिशत महिलाएं 19 वर्ष से कम आयु में मां बनती हैं। यानि मोदी ने इन 35 प्रतिशत महिलाओं को भी इस योजना के लाभ से बाहर कर दिया है।”
अगले वक्ता के तौर पर अमन बिरादरी के हर्ष मंदर ने कहा- “हम देश भर में मॉब लिंचिंग का शिकार हुए 30 परिवारों से मिलकर आए हैं। वो परिवार इस वक्त कितने बुरे हालात से गुजर रहे हैं। 10 अप्रैल 2019 को गोकशी के शक़ में झारखंड के जुरमु गांव में प्रकाश लकड़ा की पीट पीटकर हत्या कर दी गई। जबकि वो अपने तीन साथियों के साथ मृत बैल का मांस काट रहे थे। क्योंकि मृत बैल के मालिक ने उनसे बैल की खाल निकालने को कहा था। पुलिस ने जब हस्तक्षेप किया तो प्रकाश लकड़ा जिंदा था लेकिन उसे अस्पताल ले जाने के बजाय पुलिस थाने ले गई। जिससे इलाज न मिलने के चलते उसकी मौत हो गई। भीड़ ने उसके साथ बर्बरता की हद तक सुलूक करते हुए उसका पेनिस भी काट लिया था। एनआरसी के जरिए ये लोग भूमिहीन निरक्षर लोगों को अपनी नागरकिता साबित करने को कहते हैं, और उनकी नागरिकता छीन लेते हैं, अब इसके बाद वे मुस्लिम पर्सनल लॉ और मंदिर आदि के बहाने हमसे और भी अधिकार छीन लेंगे।”
फिल्मकार संजय काक ने कहा- “कश्मीर में इन्फर्मेशन बंद है औऱ सब नेता अंडररिटेंशन हैं। ये ह्युमनेटेरियन कैस्ट्रफे है। वहां डॉ इलाज नहीं कर सकते, मेडिसिन ऑर्डर नहीं कर सकते। एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है। ये मानवता के खिलाफ़ अपराध है। कश्मीर मसले पर भारत के लोगों में चुप्पी है। ये चुप्पी खतरनाक है।”
NAPM की मीरा संघमित्रा ने कहा- “एक संघी महिला पूजा शकुन पांडेय को जज बनाकर मनुस्मुति को ही अप्लाई किया गया है। अभिव्यक्ति की आजादी का दमन किया गया है। संस्थाओं और ढांचे के भीतर की आवाज़ को कुचला जा रहा है। गालियां और ट्रॉल न्यू नॉर्मलाइजेशन है। जिसमें प्रश्न नहीं पूछना है, साइंस टेंपर नहीं है, प्रतिरोध नहीं है। ये जहरीला समय है। प्रतिरोध का सड़कों पर न आना चिंताजनक है। तमिलनाड़ु में एंड़ी-चोटी का दम लगाने के बावजूद वो नहीं जीत सके। क्योंकि वहां का सेकुलरिज्म नेहरु से अलग पेरियार और अंबेडकर की सोच से संबद्ध है। वो पिछले 40 साल से शाखाओं के जरिये गांव-कस्बों तक पहुंच गए हैं। हमें भी 40 साल पहले ये करना चाहिए था लेकिन हम नहीं गए। हमें भी गांव गांव घर घर कस्बों कस्बों तक जाना होगा वहां के लोगों तक संवैधानिक समझ पहुंचाने के लिए। हमें उनके खिलाफ़ लड़ने के लिए दलित, फेमिनिस्ट, आदिवासी सभी संगठनों को एक संवैधानिक धागे में जुड़ना होगा।”
NTUI के अशोक चौधरी ने कहा- “आज जो संविधान की बात करेगा वही देशद्रोही है। आज मजदूर, दलित आदिवासी किसी से जुड़ा मसला हो सीधे सीआरपीसी लगता है सिविल नहीं। अपना अधिकार मांगने के लिए रिलायंस मजदूर जेल में हैं। मारुती मजदूर जेल में हत्या की सजा काट रहे हैं। सरकार ने मध्यवर्ग के समाज को आज बुरी तरह भ्रमित किया हुआ है। आज इस समाज के लिए सरकार जो कह रही है वही राष्ट्र है, वही देश है, वही धर्म है, वही विकास है। वो मध्यवर्ग का समाज बुरी तरह डरा हुआ है।


आज सत्ता से बचने की नहीं उसे चुनौती देने की ज़रूरत है। आंदोलन के तरीके बदलने होंगे। एक साथ चलना होगा। आज ज़रूरत है कि आदिवासी दलितों मुसलमानों के इतिहास को जाना जाए। आजादी की लड़ाई में उनकी भूमिका को पहचाना जाए।”
ड्रैकोनियन कानून और असहमति का दमन : दूसरा सत्र
दूसरा सत्र कानूनों का दुरुपयोग, UAPA और दूसरे ड्रैकोनियन कानूनों में संशोधन, असहमतियों और फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन के अधिकारों का अपराधीकरण विषय पर था।
पहले वक्ता के तौर पर SAHRDC के रवि नायर ने कहा- “मॉब लिंचरों की इंप्युनिटी और इम्युनिटी (दंडाभाव व प्रतिरक्षा) कानूनों का उल्लंघन है। क्या विडंबना है कि वीरप्पन का एनकाउंटर करनेवाले विजय कुमार को जम्मू-कश्मीर का सुरक्षा सलाहकार बनाया दिया जाता है। एक सिविल सोसायटी के तौर पर हम फेल हुए हैं। हमें स्टेट को चुनौती देना होगा।”

दूसरे वक्ता के तौर पर IFTU की अपर्णा ने कहा- “मनुवादी सरकार और कैपिटलिस्ट के बीच एक पैकेज डील के तहत ही सबकुछ हो रहा है। कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। यूपी में गुंडा एक्ट लगाया गया है। तेलांगाना में पीडी एक्ट है ऐसे हर राज्य़ में एक्ट हैं। चंद्रशेखर पर एनएसए लगाकर प्रताड़ित किया गया। मजदूर कानूनों में फेरबदल किया गया है। एससी, एसटी एक्ट में फेरबदल किया गया है। ट्रेड यूनियनों को बैन कर दिया गया है।”
तीसरे वक्ता के तौर पर PUDR राधिका चितकारा ने कहा- “पिछले 8 साल से पहले के नोटिफिकेशन को ही कॉपी पेस्ट करके हर दो साल पे सिमी बैन को रिन्यू कर दर दिया जाता है। उस पर एक भी विचार तक नहीं होता। एसआईटी का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है। गलत तथ्यों और आंकड़ों के जरिए लोगों को गुमराह किया जा रहा है। जांच एजेंसी के तौर पर एनआईए समझौता एक्सप्रेस और मस्जिद धमाकों को साबित करने में नाकाम हो जाते हैं। जबकि निर्दोष लोगों को गलत तरीके से अभियुक्त बनाकर जेल में रख दिया जाता है।”
अगले वक्ता के तौर पर रिहाई मंच के राजीव यादव ने कहा- “यूपी में पिछले तीन साल में 3599 एनकाउंटर हुए हैं। जिसमें 73 लोग मारे गए हैं। 8000 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। 11000 लोग घायल हुए इन एनकाउंटर में। जबकि 13000 लोगों पर गुंडा एक्ट लगाया गया है। 15000 लोगों पर आतंकवाद की धाराएं लगाई गई हैं। अब तो यूपीकोका भी आनेवाला है। 15 अगस्त और 26 जनवरी को उनके पोस्टर लगाए गए हैं। दलितों और मुसलमानों पर सबसे ज्यादा एनएसए लगाए गए हैं।जबकि एनकाउंटर सबसे ज्यादा दलित, मिस्लिम और ओबीसी के किये गए हैं।”
इसके बाद अधिवक्ता नित्या रामाकृष्णन ने कहा- “ब्राह्मणवाद पूंजीवाद के खिलाफ़ तमिलनाडु में पोलिटिकलाइज किया गया है। जबकि बाकी भारत में ये नहीं हुआ। कांग्रेस के पास आईडियोलॉजी नहीं है। हमें इतिहास से सीखने की ज़रूरत है। ब्राह्मणवादी सत्ता 2000 साल से सत्ता में है। हमें आरएसएस से सीखने की ज़रूरत है कि वो इतने सारे क्षेत्रों में एकसाथ कैसे काम कर रहा है। कश्मीर की न्यूज फेसबुक पर शेयर करने पर साइबर क्राइम के तहत जेल में डाल दिया गया।”
‘दोयम’ बनाने के लिए को नागरिकता को पुनर्परिभाषित करना
इस सत्र का विषय दोयम की राजनीति, एनआरसी, नागरिकता बिल, लोगों का निर्वासन था। इस सत्र को तपन बोस ने मॉडरेट किया।
सबसे पहले बोलते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा – “इतनी बड़ी संख्या में लोगों को राज्यविहीन कर देना युद्ध थोपने का काम है। सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से जनता पर ये बोझ डाल दिया है कि आप साबित करो कि आप विदेशी नहीं हो। आप भारत के नागरिक हो इसे साबित करने का जिम्मा आप पर है। जब मैं बिल्कुल शुरुआत में इस केस को लेकर दो जज के बेंच के सामने हाजिर हुआ तो जो जज थे उनमें से एक असम के थे, वो इस मुद्दे पर पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे। मैंने उनके सामने तीन जजों क बेंच वाले 1995 के लालबाबू हुसैन केस के फैसले का हवाला देकर बिल्कुल वही प्रश्न उठाया जोकि इल्केटोरल रोल में रजिस्ट्रेशन को लेकर था। जो यह था कि चुनाव ऑथोरिटी ये कैसे डिसाइड करेगी कि कोई भारतीय नागरिक है या विदेशी। चुनाव आयोग ने पांच डॉक्युमेंट की लिस्ट दी थी जो पेश करना था।
तो प्रश्न ये उठा कि क्या कोई ऑथोरिटी दूसरे डॉक्युमेंट या मौखिक गवाही को स्वीकार करने से मना कर सकती है जोकि इतना ही रिलेवेंट हो जोकि ये साबित करता हो कि फला व्यक्ति भारतीय नागरिक है। कोई मौखिक गवाही दे और 10 लोोगों का एफीडेविट पेश करे जोकि कहता हो कि हां ये आदमी या औरत मेरे गांव में पिछले 50 साल से लगातार रह रहा है तो वो प्रमाणित नहीं होता। और सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि नहीं आप किन्ही 5 डाक्युमेंट में नहीं बांध सकते। और कोई भी रिलेवेंट डाक्युमेंट को उनकी जगह स्वीकार करने से मना नहीं कर सकते। लेकिन असम एनआरसी मामले में दो जजों की बेंच ने तीन जजों की मेजोरिटी से दिए फैसले को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।”
अगले वक्ता के तौर पर पत्रकार लेखक संजय हजारिका ने कहा- “नागरिकता संशोधन बिल दरअसल गलतियों का पुलिंदा है। इसे यूं समझिये कि यदि आप 1987 के बाद पैदा हुए हैं तो आपको आपकी माता पिता का बर्थ सर्टिफिकेट चाहिए। भारतीय जेलों की क्षमता 3 लाख है। 20 लाख लोगों को आप अपराधी बना दिये हो तो रखोगे कहां। आपके पास कोई प्लान नहीं है। ये जीनोसाइड है।”
अधिवक्ता मिहिर देसाई ने कहा- “ये पलायन और प्रवास से जुड़ा जटिल मसला है। ये असम में बंगाली प्रवासियों से जुड़ा मसला है इसे किसी भी तरह असम असमियों के लिए कहकर जस्टीफाई नहीं किया जा सकता है। नहीं तो कल को दूसरे राज्यों के प्रवासियों के सामने भी संकट खड़ा होगा। ये पूरी तरह से पूंजीवादी संकट है। जो सस्ते श्रम की चाहत से पैदा हुआ है। पूंजापति और खेत मालिक आज भी सस्ते श्रम के लिए प्रवासियों को वरीयता देते हैं। 1946 में पूर्वी बंगालियों के पलायन से पैदा हुआ। सबकुछ मिक्स हो गया है जिससे कन्फ्युजन पैदा हुआ है। इससे ज्यादा लोग अभियुक्त हुए हैं। पूर्वाग्रह और खराब डॉक्युमेंटेशन ने स्थितियों को और बिगाड़ा है।”
इसके बाद अकाडमिक मीनाक्षी बुरागोहेन ने कहा- असम एनआरसी दरअसल एक बहुत जटिल और बहुस्तरीय मसला है। इसमें हिंदू-मुस्लिम कम्युनल ऐंगल नहीं। एनआरसी को समझने के लिए 1951 के बाद के असम का इतिहास जानना होगा। 1971 मार्कर वर्ष है। एनआरसी का बेस कम्युनल नहीं है, लेकिन ये कम्युनलाइज किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन बिल में दूसरे देशों के हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों को छूट देकर।”
आखिरी वक्ता के तौर पर MASUM के कीरिति रॉय ने कहा- “एनआरसी आर्टिकल 21 का खुला उल्लंघन है जिसमें कुछ कागजों के बिना पर किसी की नागरिकता को खारिज किया जा रहा है।”
अनुच्छेद 370 निरस्त करना, लोकतंत्र और शांति को अवमूल्यित करना : पांचवा सत्र
इस सत्र का विषय था ‘कश्मीर में लोगों और उनके अधिकारों का दमन’। इस सत्र को कविता कृष्णन ने मॉडरेट किया।
पहले वक्ता के तौर पर JKPM की शेहला रशीद ने कहा- “वो कहते हैं जहां नहीं जीत सकते वहां जनता को बदल दो, और बदल दिया। इलेक्टोरली नहीं कर पाये तो फासीवादी रास्ते से कर दिए। उन्होंने कश्मीर पर चढ़ाई की। प्रो रिजवान की पुलिस कस्टडी में हत्या कर दी गई। हमारी पूरी पीढ़ी प्रताड़ना देखते हुए बड़ी हुई। जिसे हमारे साथ इंट्रोगेशन के नाम पर किया जाता था उसे बाद में हमने जाना कि ये टॉर्चर है। कश्मीर में सरकार रिकॉर्ड नहीं बना रही कि कितने लोगों को अरेस्ट किया। कश्मीर एक महीने से कैद में है और वहां हेल्थ की समस्या है।”
अगले वक्ता के तौर पर अकाडमिक सुशील खन्ना ने कहा- “कश्मीर का हाल गाजा पट्टी से भी बुरा है। लोग अरेस्ट हैं, युद्ध के हालात हो गए हैं और मीडिया कह रही है मोदी ने सब हल कर दिया है। कश्मीर में ये सब बहुत पहले से हो रहा है। भारत ने कश्मीर के साथ एक उपनिवेश जैसा बर्ताव किया है। कश्मीर के प्रति सुप्रीमकोर्ट का रवैया भी बहुत अच्छा नहीं रहा है।”
युवा पत्रकार राहुल कोटियाल ने कहा- “मोबाइल और इंटरनेट हमारी जिंदगी के महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कश्मीर में 26 दिन से सब कम्युनिकेशन बंद है। मैंने 9 अगस्त को फेसबुक पर लिखा कि कल मैं कश्मीर जा रहा हूँ और आप विश्वास नहीं करोगे कि कितने लोगों ने कमेंट्स में अपने घर का एड्रेस लिखते हुए लिखा सर आप मेरे घर भी जाइए और वापिस आकर बताएं कि मेरे घर के लोग कैसे हैं।”
इसके बाद सत्र के आखिरी वक्ता के रूप में रीता ने अपनी बात रखी।

दूसरा दिन


‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की राजनीति और सैन्यीकरण : पहला सत्र
दूसरे दिन का पहला सत्र का विषय सैन्य राज्य; दमनित अधिकार, कार्पोरेट का संसाधनों पर कब्जा और एक्टिविस्टों का संदिग्ध के तौर पर शिकार, पूर्वोत्तर भारत में शांति प्रक्रिया और लोकतंत्र का उल्लंघन। नवशरन सिंह ने इस सत्र को मॉडरेट किया।
पहले वक्ता के तौर पर पोलिटिकल एक्टिविस्ट सोनी सोरी ने कहा- “लोग सोचते हैं कि सरकार बदलने से झारखंड के हालात बदल गए हैं पर कुछ नहीं बदला। टाटा की जमीन वापिस करना मिसाल के तौर पर बताते हैं। लेकिन ये सच नहीं है। टाटा से जमीन हमने कोर्ट में लड़कर जीती है। वहां अभी भी एनकांउटर हो रहे हैं, आदिवासी महिलाओं का शोषण हो रहा है। एक लड़की को उठा ले गए सेना के लोग, गैंग रेप किया । कोर्ट में गई पुलिस थाने में बुलाकर प्रताड़ित करने लगी, बाद में वो पुलिस प्रताड़ना से आजिज आकर सुसाइड कर ली। पुलिस पकड़कर ले जाती है और पूछती है मरोगे या जियोगे। जब कहेंगे जीना चाहते हैं तो कहते हैं सरेंडर करोगे या जेल जाओगे। जब कहेगा सरेंडर करेंगे तो वो बताएंगे कि ये माओवादी था अपने से सरेंडर किया है। यह झारखंड पुलिस का खुला खेल चल रहा है। सब जानते हैं। नंदराज पहाड़ आंदोलन को लीड करनेवाले एक युवक जब अपने 14 अन्य साथियों के साथ काम कर रहा था, पुलिस ने उसे घेरकर हत्या कर दी । हर किसी पर वो यूएपीए लगा रहे हैं।”
खूंटी जिले के कार्यकर्ता सागू मुंडा ने कहा- “खूंटी जिले में 2016 में पत्थलगड़ी आंदोलन चला। सरकार ने कहा हमने संविधान की गलत व्याख्या की। 5 अनुसूची क्षेत्र हैं। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में कार्पोरेट को बिठाने के लिए घाघरा गांव में 26 जून को बैठक हुई। जिसे प्रशासन ने चाारों ओर से घेर लिया। हमने पुलिस से कहा आप 5 लोग आइए, हम बैठकर बात करेंगे। पुलिस ने कहा- नहीं, आप 10 लोग आइये हम थाने में बैठकर बात करेंगे। पुलिस डर रही थी और हम भी डर रहे थे। अगले दिन सुबह 7 बजे फायरिंग शुरु कर दी पुलिस ने। आंसूगैस छोड़े। बहुत लोग भगदड़ में घायल हुए। दो साल हो गए आज भी कहीं 10 लोग जुटते हैं तो पुलिस पकड़कर जेल में डाल देती है। स्कूलों में सीआरपीएफ कैंप लगे हैं।”
अगले वक्ता के तौर पर वकील शालिनी गेरा ने कहा – “उत्तरी बस्तर में कांकेर का सैन्यीकरण हो रहा है। वहां कार्पोरेट की इंट्री चालू है। राव घाट पहाड़ी जोकि बेहतरीन लौह अयस्क का भंडार है। उसे खनन का प्रपोजल गया 1998 में पर्यावरण मंत्रालय ने मना कर दिया। फिर बिलाई प्लांट बंद होने के कगार पर खड़े होने का बहाना देकर प्रपोजल को स्वीकार करवाया गया। विरोध करने पर रावघाट संघर्ष समिति के नेता को जेल में डाल दिया गया। और बंदूक की नोक पर ग्रामसभा करवाकर एनओसी ली गई टाउनशिप के लिए।”
NPMHR के नीन्गुलो क्रोम ने कहा नागालैंड के नागा समुदाय के लोगों के अधिकारों पर बात करते हुए कहा- “ हमने हमेशा से कहा है हमारा रिश्ता भारत की जनता के साथ दोस्ती से बनेगा सरकार से नहीं। आजादी के बाद हमने तय कियी कि हम आजाद रहेंगे, किसी के साथ नहीं जाएंगे। नेहरू ने हमें डराया, लाल बहादुर शास्त्री ने जनसंहार की बात की। 1997 में सीजफायर की घोषणा हुई। बिना शर्त बात करने, प्रधानमंत्री के स्तर पर बात करने और तीसरे देश में बात करने के शर्त पर। पहले ये कहा गया कि शांति प्रक्रिया की कोई टेरीटोरियल बॉर्डर नहीं होगा। बाद में विरोध होने पर इसे नागालैंड तक सीमित कर दिया गया। वाजपेयी सरकार ने माना की नागाओं का खास इतिहास है। और फिर हमारा विश्वास मजबूत हुआ तो 2004 में हमने भारत में आकर वार्ता की। मध्यस्थ स्वराज कौशल और फिर पद्मनाभन ने भारत नागालैंड की साझी संप्रभुता की बात की। 2015 से भारत सरकार के प्रतिनिधि रवि हैं। मोदी सरकार ने कहा है कि हम तीन महीने में समाधान कर देंगे। हम भयभीत हैं कि कहीं ये कश्मीर की तरह हमपर समाधान ऊपर से तो नहीं थोपेंगे।”


दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अधिकारों को निशाना बनाना: दूसरा सत्र
इस सत्र का विषय था
हिंदुत्व सेना द्वारा आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यकों पर हमले को बढ़ावा देने में राज्य की सहापराधिता, संवैधानिक अधिकारों पर लक्षित हमला, जनान्दोलनों पर हमला। इस सत्र को रवि किरण जैन ने मॉडरेट किया।
पहले वक्ता के तौर पर अकाडमिक आनंद तेलतुंबड़े ने बेहद निराशा के साथ शुरुआत करते हुए कहा- “मैंने बाहर जाने के तमाम अवसरों को छोड़कर इस देश में रहकर काम करने को वरीयता दी। लेकिन ये देश अब रहने लायक नहीं है। मैं ये देश छोड़ दूंगा। ये लोग फासीवादी ब्राह्मणवाद को थोप रहे हैं। कल को वो आरक्षण खत्म कर देंगे। दलित लोग मोदी के ड्रामे को नहीं समझ रहे। न ही प्रगतिशील दलितों को समझ रहे। उन्होंने जाति की पहचान पर हिंदू की पहचान थोप दी। क्योंकि जाति की पहचान में बहुसंख्यक की पहचान नहीं हो रही थी। 70 सालों में हमने जो हासिल किया था वो सब इन्होंने रिवर्स कर दिया है। ये बहस और इंटिलेक्चुअल को पनपने नहीं दे रहे।”
इसके बाद लोककलाकार कलादास देहरिया ने कहा- “वो लगातार हमारी संस्कृति पर हमला कर रहे हैं। हम प्रकृतिपूजक हैं और हमसे बजरंगबली पुजवाए जा रहे हैं। हमारे रविदास के मंदिर को तोड़ दिया गया। भिलाई स्टील प्लांट में एक समय 90 हजार स्थायी कर्मचारी थे आज 16 हजार हैं जिसे अगले दो वर्षों में वे घटाकर 5 हजार तक ले आएगें। भिलाई प्लांट के नजदीक हॉस्पिटल सेक्टर की बिल्डिंग को 4 बुलडोजर लगाकर तोड़ा गया जहाँ मजदूरों का परिवार रहता था। इनमें से अधिकांश दलित लोग थे।”
इसके बाद JJM की अलोका कुंजुर ने कहा- 5 अनुसूची का इलाका धारा 370 से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस सरकार ने हमारे सवाल ही गायब कर दिए हैं। पत्थलगड़ी आंदोलन को खत्म करने के लिए गैंगरेप का प्रोपोगैंडा सरकार द्वारा रचा गया। वो लोग लड़कियों, औरतों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हम लोगों ने जब इसका पर्दाफाश कर दिया तो उन्होंने हमारे पीछे पूरा प्रशासन लगा दिया। आज सरना कोड की लड़ाई चल रही है। शहर में मुस्लिमों की लिंचिंग हो रही है। पत्थलगड़ी आंदोलन में शामिल रहे 89 गांवों में 44 गावों के प्रधानों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा लगाया गया है। एक ग्राम प्रधान सुखराम मुंडा की हत्या कर दी गई है। अफीम की खेती की परंपरा शुरु हुई है लेकिन एक भी एफआईआर अफीम के खेती के खिलाफ नहीं दर्ज की गई है। 36 मोटरसाइकिलों पर देशद्रोह का केस लगाया गया है। खूंटी कोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। वकील हमारे केस नहीं लड़ रहे। स्टेनस्वामी की प्रापर्टी कुर्क कर दी गई।
मानवाधिकार अधिवक्ता वहाब खान ने कहा- “एक पास्को एक्ट का केस 9 दिन में कान्क्ल्यूड कर दिया गया। लेकिन यूएपीए के मामले नहीं होंगे। क्योंकि ये फैब्रीकेटिड और पोलिटिकली मोटीवेटेड केस होते हैं। एनआईए ने सिर्फ दो फेक करेंसी के आधार पर चार लोगों को गिरफ्तार कर यूएपीए लगा दिया जबकि उनका कोई ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड तक नहीं है।”
आखिरी वक्ता के तौर पर गुजरात के समाजसेवी एक्टिविस्ट मुर्शीद ने कहा –“ पहले गुजरात में हर 10 साल में एक बड़ा दंगा होता था । अभी दंगों का स्वरूप बदल गया है । अब छोटे छोटे दंगे लगातार होने लगे हैं। अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर बात नहीं होती न समुदाय के अंदर न समुदाय के बाहर। गुजरात में कोई अल्पसंख्यक मंत्रालय कोई विभाग नहीं है, न ही बजट में एक रुपए का प्रावधान है उनके लिए। ओला उबर तक हमारे इलाके की बुकिंग कैंसिल कर देते हैं 25 रुपए हर्जाना भरकर। जांहपुरा में सरकारी पानी नहीं आता। लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट 10.5 है। 9वीं क्लास में 50% लड़कियों का इनरोलमेंट नहीं होता। इसाइयों के डॉक्युमेंट में हिंदू लिखा है। उन्हें डराकर कहा जाता है नहीं तो आपका एससी/एसटी का दर्जा खत्म हो जाएगा। एक पादरी की मुत्यु हुई तो उन्हें गाड़ने नहीं दिया गया, उन्हें जलाया गया। अमरेली के एक मुस्लिम लड़के को पुलिस ने गोली मार दिया। हमने विरोध मेें विधानसभा का घेराव किया तो पुलिस ने अमरेली जिले के 25 घरों को तोड़ दिया। मुर्गे-मुर्गियों तक को मार डाला, जानवरों को खोलकर जंगल में भगा दिया, सब पर मुकदमा दर्ज किया।”

 

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समकालीन जनमत

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