अगर कहीं मैं तोता होता, तो क्या होता ?

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कई दशक पहले एक हिन्दी कवि ने एक कविता लिखी थी ‘अगर कहीं मैं तोता होता, तो क्या होता ?’ पांच वर्ष पहले सुप्रीम कार्ट ने सी बी आई को, जो देश की बसे बड़ी जांच एजेन्सी है, पिंजड़े में बन्द तोता कहा था। केन्द्रीय जांच ब्यूरों यानी सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगेन्द्र सिंह ने 1996-97 में करीब बीस वर्ष पहले ही यह कहा था कि राजनीतिक वर्ग कभी इस संस्था को स्वतंत्रता नहीं देगा।

सी बी आई का सिद्धान्त है – उद्योग, निष्पक्षता और ईमानदारी। 1941 में इसका गठन स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट के रूप में हुआ था। युद्ध और आपूर्ति विभाग के ‘ट्रांजैक्शन’ में घूस और भ्रष्टाचार की जांच के लिए। बाद में यह विभाग गृह विभाग के अन्तर्गत आया – 1996 में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टीब्लिशमेंट एक्ट के तहत। मार्च 2017 के अनुसार इसके कर्मचारियों की कुल संख्या 7224 है, जिसके 21.84 प्रतिशत पद कुल 1589 रिक्त हैं। लगभग डेढ़ वर्ष पहले इसका वार्षिक बजट 698.38 करोड़ था। सी बी आई में डेढ़-दो सौ एस पी हैं, चार हजार के लगभग डी एस पी हैं। दो दर्जन से अधिक डी आई जी हैं और एक दर्जन संयुक्त निदेशक हैं। एक समय इस संस्था को विपक्ष ‘कांग्रेस ब्यूरो आॅफ करप्शन’ कहा करता था। इस संस्था को सरकारों ने अपने हित में कमजोर कर डाला।

नरेन्द्र मोदी ने 24 जून 2013 को भविष्यसूचक बात कही थी कि सी बी आई में राष्ट्र को विश्वास नहीं है। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अब मोदी सरकार ने 23 अक्टूबर की मध्यरात्रि में सी बी आई के निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की अनुशंसा पर अवकाश पर भेज दिया है और नागेश्वर राव को अन्तरिम निदेशक बनाया है। तोता अब पिंजड़े से बाहर है और इसकी पूरी संभावना है कि वह फिर पिंजड़े में डाल दिया जाय।

नब्बे के दशक में ही सरकार से सी बी आई की स्वतंत्रता का सवाल सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया था। न्याय का राज चलाने के लिए सी बी आई की स्वतंत्रता की बात बार-बार कही गयी है, पर किसी भी सरकार ने इसे स्वतंत्र नहीं होने दिया। सी बी आई के संस्थापक निदेशक डी पी कोहली थे – 1 अप्रैल 1963 से 31 मई 1968 तक। उस समय से अब तक के 55 वर्ष के इतिहास में पहली बार संस्था-प्रमुख को छुट्टी पर भेजा गया है जिसके खिलाफ निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.

सी बी आई में पहले भी इसके पूर्व निदेशक ए पी सिंह और रंजीत सिन्हा पर आरोप लगे हैं और उनकी जांच भी हुई है, पर इस बार का मामला उन सबसे अलग है। अब एक साथ सी बी आई, सी पी सी, राॅ और जिसे ‘मरणासन्न ब्यूरोके्रेसी’ कहा जाता है, सब पर कई सवाल खड़े हो गये हैं। इस एजेन्सी, सी बी आई के निदेशक और विशेष निदेशक के बीच विवाद और संघर्ष का सिलसिला लगभग डेढ़ वर्ष से चल रहा था।

निदेशक आलोक वर्मा पहले दिल्ली के पुलिस कमीश्नर थे। 1979 बैच के अरुणांचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केन्द्र शासित प्रदेश कैडर के आई पी एस अधिकारी आलोक वर्मा की छविे एक कुशल प्रशासक की है। सी बी आई अधिकारियों को अपने पहले सम्बोधन में उन्होंने भ्रष्टाचार से दूर रहने की सलाह दी थी। मीडिया से उनका सम्पर्क नहीं है और किसी भी विवाद में उनका नाम नहीं था। उन्होंने निदेशक रहते हुए कभी कोई इंटरव्यू नहीं दिया है। विशेष सचिव के रूप में राकेश अस्थाना को प्रोन्नति दिये जाने पर अक्टूबर 2017 में उन्होंने अपनी असहमति प्रकट की थी क्योंकि राकेश अस्थाना का नाम एक रिश्वत केस में था। इस पूरे घटना-क्रम को समझने के लिए सी बी आई में पिछले दो वर्ष में हुई कुछ प्रमुख घटनाओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

सी बी आई के पूर्व निदेशक अनिल सिन्हा के रिटायरमेन्ट के दो दिन पहले दूसरे नम्बर के वरिष्ठतम अधिकारी आर के दत्ता का तबादला मोदी सरकार ने गृह मंत्रालय में कर दिया। आर के दत्ता सी बी आई के विशेष निदेशक थे। गुह मंत्रालय के जिस विशेष सचिव के पद पर उन्हें स्थानान्तरित किया गया था, वह पद नव निर्मित था। दत्ता 2016 में विशेष निदेशक के रूप में प्रोन्नति किये गये थे। वे सी बी आई के वरिष्ठ अधिकारी थे। उन्होंने 2 जी स्पेक्ट्रम, कोयला ब्लाॅक आवंटन और अगस्टा वेस्टलैंड जैसे मामले की जांच की थी। दत्ता ने कहा था ‘सीबीआई प्रमुख बनने के लिए मेरी सभी योग्यताएं थीं। लेकिन मुझे किसी भी कारण दिये बिना अचानक हटा दिया गया।’

यहां यह जानना जरूरी है कि अनिल सिन्हा जो सी बी आई निदेशक बने, पहले विशेष निदेशक थे। सरकार की मंशा कुछ और थी। 2 दिसम्बर 2016 को अनिल सिन्हा के रिटायर होते ही गुजरात कैडर के आई पी एस अधिकारी राकेश अस्थाना को सी बी आई का अन्तरिम निदेशक बनाया गया। कहा यह जाता है कि वर्ष 2000 राकेश अस्थाना के कैरियर का टर्निग प्वाइन्ट है, जब गुजरात में उनकी भेंट तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवानी से हुई थी। वे 1984 बैच के हैं और 1996 में लालू यादव के चारा घोटाले की जांच के बाद अधिक चर्चित हुए थे। आडवाणी के गुजरात आने के समय वे उनके सुरक्षा प्रबन्धों के जांच अधिकारी थे। आडवाणी से उन्होंने स्टेट गेस्ट हाउस में भेंट की थी। उस समय आडवाणी ने उनसे उनके आदर्श पुरुष के बारे में पूछा था। अस्थाना ने वल्लभ भाई पटेल का नाम लिया था। 2002 में आडवाणी ने नरेन्द्र मोदी से उनका परिचय कराया। मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय की संस्तुति पर मोदी ने उन्हें 2002 के साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन हादसे की जांच सौंपी। कहा जाता है कि अस्थाना द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट से मोदी को ‘रिलीफ’ मिली। इस समय से मोदी के गुजरात के 22 ब्यूरोक्रेट दिल्ली लाये गये और दिसम्बर 2016 के आरम्भ में राकेश अस्थाना को सी बी आई का अन्तरिम निदेशक बनाया गया। उनके अन्तरिम निदेशक बनाये जाने को सुप्रीम कोर्ट में 5 दिसम्बर 2016 को प्रशान्त भूषण ने चुनौती दी क्योंकि राकेश अस्थाना का नाम स्टर्लिंग बायोटेक की डायरी में दर्ज था और इस मामले में स्वयं सी बी आई ने एफ आई आर दर्ज किया था।

1 फरवरी 2017 को सी बी आई का निदेशक आलोक वर्मा को बनाया गया जिनका सी बी आई में कार्य करने का कोई पूर्वानुभव नहीं था। निदेशक बनने के लगभग नौ महीने बाद 21 अक्टूबर 2017 को आलोक वर्मा ने सी वी सी से राकेश अस्थाना के खिलाफ स्टर्लिंग बायोटेक से 3.88 करोड़ घूस लेने की शिकायत की थी फिर भी राकेश अस्थाना को सी वी सी ने प्रोन्नति करने की मंजूरी दी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही आलोक वर्मा को सी बी आई का पूर्णकालिक निदेशक बनाया गया था। इसी समय से इन दोनों अधिकारियों के बीच संघर्ष बढ़ा, जिसकी परिणति तीन दिन पहले इन दोनों को छुट्टी पर भेजने में हुई।

इस वर्ष 24 अगस्त को राकेश अस्थाना ने कैबिनेट सेक्रेटरी को निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ शिकायतें भेजीं। दो महीने बाद 21 अक्टूबर को मोहन कुरैशी मामले में राकेश अस्थाना पर रिश्वत के सिलसिले में सी वी आई ने केस दर्ज किया और अगले दिन 22 अक्टूबर को अस्थाना की टीम देवेन्द्र कुमार को गिरफ्तार किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट में राकेश अस्थाना ने एफ आई आर को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई और देवेन्द्र कुमार को एजेन्सी की सात दिन की हिरासत में भेजा। इसके बाद सी वी सी ने निदेशक व विशेष निदेशक को अवकाश पर भेज दिया। राकेश अस्थाना दिल्ली हाईकोर्ट गये थे और आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट गये।

जो मोइन कुरैशी निदेशक और विशेष निदेशक के झगड़े में प्रमुख रूप से शामिल हैं, उनके बारे में भी हमें जानना चाहिए। कौन है मोइन कुरैशी ? मोइन कुरैशी कानपुर का मीट कारोबारी है जिसने दून स्कूल और सेंट स्टीफेंस काॅलेज, दिल्ली से शिक्षा प्राप्त की है। 1993 में इसने उत्तर प्रदेश के रामपुर में मीट कारोबार आरम्भ किया। 15 अक्टूबर को सी बी आई ने राकेश अस्थाना के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करते हुए कुरैशी से तीन करोड़ रुपये घूस लेने का इन पर आरोप लगाया है। इसके दो महीने पहले 24 अगस्त को राकेश अस्थाना ने कैबिनेट सेके्रटरी से आलोक वर्मा की शिकायत की थी, उसमें मोइन कुरैशी से जुड़े मामले में सतीश सना से उन पर दो कारोड़ रुपये लेने का आरोप लगाया था। सतीश सना हैदराबाद का व्यापारी है जो पहले आंध्र प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड का कर्मचारी था।

राकेश अस्थाना पर एफ आई आर सतीश सना की शिकायत पर दर्ज की गयी थी। शिकायत यह थी कि उसने अपने खिलाफ जांच रोकने के लिए राकेश अस्थाना को तीन करोड़ रुपये दिये। इस प्रकार सी बी आई के निदेशक विशेष निदेशक पर और विशेष निदेशक निदेशक पर घूस लेने का आरोप लगा रहे हैं।
सी बी आई के पूर्व निदेशक अमर प्रताप सिंह पर भी मोइन कुरैशी की सहायता करने का आरोप लग चुका है। सी बी आई ने अपने पूर्व निदेशक ए पी सिंह पर न केवल प्राथमिकी ही दर्ज की थी अपितु उनके आवास पर छापेमारी भी की थी। पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा से भी मोइन कुरैशी का संबंध था। मोइन कुरैशी ने 90 बार सी बी आई प्रमुख रंजीत सिन्हा से मुलाकात की थी जिनमें 74 बार मुलाकात मोइन कुरैशी के ठिकानों पर जनवरी-अगस्त 2014 में मारे गये छापे के बाद हुई थी।

सी बी आई के डी एस पी देवेन्द्र कुमार मोइन कुरैशी के खिलाफ केस में जांच अधिकारी थे जिनके घर और कार्यालय में 20-21 अक्टूबर को कई गोपनीय दस्तावेज प्राप्त किये गये। इस पूरे काण्ड में दुबई में काम करने वाला विचैलिया मनोज और उसका भाई सोमेश भी है जिसने सतीश सना को आश्वस्त किया था कि सी बी आई के सहयोग से मामले को रफा-दफा करा देंगे। सतीश सना के अनुसार सोमेश ने उनसे तीन करोड़ रुपये अग्रिम मांगे थे। सोमेश ने सतीश को यह बताया था कि बात करने करने वाले राकेश अस्थना थे और प्रमाण स्वरूप् उसने वाट्स अप एप् डीपी दिखाई।

सी बी आई ने मनोज कुमार को गिरफ्तार कर लिया है। कुरैशी से जुड़े मामले में ही राकेश अस्थाना ने आलोक वर्मा पर सतीश सना से दो करोड़ रुपये लेने का आरोप लगाया था। इस प्रकार अभी एक मांस व्यापारी मोइन कुरैशी आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच की लड़ाई का मुख्य कारण है। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। सच-झूठ का पता बाद में चलेगा।

फिलहाल इस घटना से एक साथ संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न उठ रहे हैं। राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच करने वाले सभी अफसरों का तबादला कर दिया गया है। ए के बस्सी का तबादला अंडमान निकोबार किया गया है जो डिप्टी एस पी थे। इसी प्रकार एडिशनल एस पी का तबादला जबलपुर किया गया है। जिन तेरह अधिकारियों के तबादले किये गये है, उनमें अरुण कुमार, ए साई मनोहर, वी मुरुगेसन संयुक्त निदेशक हैं और अमित कुमार, मनीष कुमार सिन्हा, तरुण गौबा, जसबीर सिंह, अनीष प्रसाद, के आर चैरसिया डी आई जी हैं।

प्रशान्त भूषण ने नवनियुक्त अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव के खिलाफ गंभीर शिकायतें बतायी हैं। यह माना जा रहा है कि उन्हें सी बी सी कमिश्नर के बी चौधरी की बैकिंग है। यह भी कहा जाता है कि वे वेकैंया नायडू के कारण, उनकी अनुशंसा पर सी बी आई में लाये गये। इन्हें सी बी आई का ‘ब्लैक शिप’ भी कहा गया है। 4 अक्टूबर को अरुण शौरी और प्रशान्त भूषण ने सी बी आई डायरेक्टर आलोक वर्मा से रफाल सौदे को लेकर भेंट की थी और एफ आई आर करने की मांग की थी। आलोक वर्मा द्वारा विदेश मंत्रालय से किये गये कुछ प्रश्नों की भी बात कही गयी है जिसकी अभी तक पुष्टि नहीं हो पायी है। विपक्ष यह मान रहा है कि आलोक वर्मा को अवकाश पर रफाल डील के कारण भेजा गया है। अभी कुछ छुपा हुआ भी है और प्रकट भी है। यह स्पष्ट हो चुका है कि सरकार राकेश अस्थाना के साथ है, नहीं तो उनके खिलाफ जांच कर रहे सभी अधिकारियों का एक साथ तबादला क्यों किया जाता।

सी वी सी के अनुसार आलोक वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप थे और वे जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे। आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में सात आधारों पर सरकार द्वारा उन्हें छुट्टी पर भेजे जाने को चुनौती दी है। सी बी आई प्रमुख की नियुक्ति दो वर्ष के लिए प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और सुपीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कमेटी करती है। इसलिए हटाने का या छुट्टी पर भेजने का निर्णय भी यही कमेटी कर सकती है। इस तर्क का जवाब सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की बेंच देगी।

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