ज़ेर-ए-बहस

न्यायपालिका से जुड़े कुछ अहम सवाल

कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के अतिरिक्त न्यायपालिका लोकतंत्र का एक प्रमुख अंग है। न्यायपालिका का मुख्य कार्य सबको समान रूप से न्याय प्रदान करना है जो सदैव संभव नहीं हो पाता है। इस वर्ष, 2018 के आरम्भ और अन्त की दो घटनाओं से कुछ सवाल स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है।

12 जनवरी 2018 को अप्रत्याशित रूप से सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने, चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, कूरियन जोसेफ और मदन बी लोकुर ने प्रेस कांफ्रेन्स की। दीपक मिश्र भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। पहली बार मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ उनके वरिष्ठतम जजों ने केस आवंटन और बेंच बहाली को लेकर आरोप लगाये थे और लोकतंत्र के खतरे में होने की बात कही थी। उनकी बात मुख्य न्यायाधीश नहीं सुन रहे थे, जिससे उन्हें प्रेस कांफ्रेन्स करनी पड़ी थी और भारतीय जनता के समक्ष अपनी बातें रखनी पड़ी थी।

जे चेलमेश्वर 22 जून 2018 को सेवा निवृत हुए, रंजन गोगोई 3 अक्टूबर 2018 को भारत के मुख्य न्यायाधीश बने, कूरियन जोसेफ 29 नवम्बर को सेवा निवृत हुए और न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर 30 दिसम्बर 2018 को सेवा निवृत होंगे।

सेवा निवृति के कुछ ही दिन बाद 2 दिसम्बर 2018 को कूरियन जोसेफ ने टाइम्स आॅफ इंडिया को दिये अपने विशेष इंटरव्यू में पुनः पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र द्वारा केसों के आवंटन में निष्पक्ष रूप से जजों के चयन न करने की बात कही और उन जजों को केस देने की बात कही, जो राजनीतिक रूप से चुके हुए थे। यह सामान्य आरोप नहीं है। न्यायमूर्ति कूरियन जोसेफ ने दूसरे दिन भी अपनी कही बातें दुहराई। उन्होंने चार वरिष्ठतम जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश को यह कहने की बात कही कि उनके द्वारा लिये गये निर्णय स्वतंत्र नहीं प्रतीत होते हैं। मुख्य न्यायाधीश से कोई सकारात्मक उत्तर उनके साथी वरिष्ठतम जजों को प्राप्त नहीं हुआ था और उसके बाद भी वे चुनिन्दा जजों को केस आवंटित कर रहे थे जो राजनीतिक रूप से ‘बायस्ड’ थे। दो दिन इन दो बिन्दुओं को दुहराना सामान्य घटना नहीं है।

स्पष्ट है कि कूरियन जोसेफ अपनी बात पर अडिग है। ए. जी. नूरानी ने अपने लेख ‘ प्रेसर्स आॅन जजेज ’ (फ्रन्ट लाइन, 4 जनवरी 2019) में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों धनंजय वाइ चन्द्रचूड़ और ए. एन. खानविलकर से यह पूछना ‘ सही और उचित ’ माना है कि क्यों इन्होंने जो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के साथ लम्बे समय तक बैठे, अपने को अलग नहीं किया। ए. जी. नूरानी के अनुसार ये दोनों न्यायमूर्ति यह जानते थे कि मुख्य न्यायाधीश सवालों के घेरे में हैं, उन्होंने इन्हें समर्थन भी दिया है और इनके साथी जजों की इनसे नाराजगी भी है। ए. जी. नूरानी ने सुप्रीम कोर्ट के इन दो जजों का नामोल्लेख कर इनके मौन पर सवाल खड़े किये हैं।

जहां तक न्यायपालिका पर दबाव और सरकारी प्रभाव का प्रश्न है, यह नया नहीं है। न्यायमूर्ति कूरियन जोसेफ और साथी जजों का यह सोचना कि मुख्य न्यायाधीश को बाहर से कोई नियंत्रित कर रहा है, कोई नई बात नहीं है, पर पहले से इस समय में स्पष्ट अन्तर है। पहले मुख्य न्यायाधीश बनाने की परम्परा रही है। पहली बार ऐसी स्थिति जवाहरलाल नेहरू के समय उत्पन्न हुई थी, जब पहले मुख्य न्यायाधीश हरीलाल जयकिशन दास कानिया की मृत्यु 6 नवम्बर 1951 को हुई। वरिष्ठतम जज एम पतंजलि शास्त्री थे, पर कइयों का विश्वास था कि कि नेहरू की पसन्द बी के मुखर्जी या एस आर दास थे, जो वरीयता में तीसरे या चौथे थे। उस समय मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री ही बने।

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 1975-77 का वर्ष अंधकारग्रस्त माना जाता है। अगर आज भारत में लोकतंत्र कायम है, तो इसका बड़ा श्रेय ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण केशवानन्द भारती निर्णय को है, जिसमें न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की संवैधानिक बेंच ने विधायिका को सर्वोपरि न मानकर संविधान को सर्वोपरि माना था। 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने 13 सदस्यीय बेंच का गठन किया था। 23 अप्रैल 1973 को इनमें से सात जजों ने संसद का अधिकार सीमित माना था।

न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना अपने साहस और स्वतंत्र निर्णय के लिए विख्यात रहे हैं। उन्होंने ‘हैबिअस कापर्स’ केस में बहुमत के विचार से अपनी असहमति दर्ज की थी। उन्होंने यह लिखा था कि संविधान और भारत का कानून जीवन और स्वतंत्रता को कार्यपालिका की पूर्ण शक्ति की दया पर निर्भर रहने की अनुमति नहीं देता। दांव पर कानून का नियम है। इन्दिरा गांधी ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को छोड़कर न्यायमूर्ति ए एन रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया था और फिर उन्होंने हंसराज खन्ना को छोड़कर एम. एच. बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ चार जजों में रंजन गोगोई भी थे, पर वे मुख्य न्यायाधीश बने। न्यायमूर्ति कूरियन जोसेफ ने सेवा निवृति के बाद इंटरव्यू में जो कहा है वह सुप्रीम कोर्ट के जजों की निष्पक्षता और स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है। ‘कारवां’ पत्रिका के जुलाई 2018 के अंक में प्रकाशित लेख ‘द डार्केस्ट आवर: दीपक मिश्राज शैडो ओवर द सुप्रीम कोर्ट’ में (पृष्ठ 30 से 53 तक)  जज बी एस लोया के केस पर भी विचार किया गया है।

अभी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने एक ट्वीट में यह लिखा है कि हरेन पांडया, तुलसी राम प्रजापति, जस्टिस लोया, प्रकाश थोम्बे, श्रीकान्त खाण्डेलकर, कौसर बी और सोहराबुद्दीन शेख में से कोई भी मारा नहीं गया था। सभी स्वाभाविक रूप से मरे थे। यह सुविदित है कि इन सातों की हत्या की गयी थी, पर न्याय इनके पक्ष में नहीं गया।

ए. जी. नूरानी ने ‘प्रेसर्स आॅन जजेज’ लेख में कई ऐसे उदाहरण दिये हैं, जिनसे सभी अवगत नहीं थे। उन्होंने मुहम्मद करीम छागला का उदाहरण दिया है कि मुख्य न्यायाधीश पर रहते हुए उन्होंने ‘पब्लिक प्लेटफार्म’ पर राजनीतिक भाषण दिये थे, जिसकी आलोचना प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश हरीलाल जे कानिया ने की थी। छागला ने नेहरू को लिखे 29 जुलाई 1953 के अपने पत्र में नेहरू की प्रशंसा ही नहीं की थी अपितु यह भी लिखा था कि आपके नियंत्रण में उनकी अपनी सेवा है। सरकार की कठपुतली बनकर सही अर्थों में न्याय नहीं किया जा सकता। प्रश्न न्यायपालिका की अखण्डता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता का है जिसे सरकारें अपने हित में कायम नहीं रहने देना चाहतीं और तब सब कुछ माननीय न्यायमूर्तियों पर निर्भर करता है कि वे न्याय किसके हित में करते हैं।

इस वर्ष के आरम्भ (जनवरी ) और अन्त (दिसम्बर) के महीनों को देखें, तो न्यायपालिका से जुड़े कई ऐसे सवाल सामने आते हैं, जिनसे हमें बाद में भी जूझना पड़ेगा। इस महीने (दिसम्बर 2018) का एक भिन्न उदाहरण मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुदीप रंजन सेन का है। 10 दिसम्बर 2018 को अमन राणा की याचिका पर एकल पीठ की सुनवाई में 34 पृष्ठों के अपने आदेश में उन्होंने यह टिप्पणी की है कि आजादी के समय ही भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था।

महत्वपूर्ण यह है कि यह कथन किसी राजनेता और धार्मिक नेता का न होकर मेघालय के उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश का है। अपने आदेश में उन्होंने यह कहा है कि भारत को इस्लामिक देश बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, नहीं तो यह भारत और पूरी दुनिया के लिए कयामत होगी।

आदेश में यह लिखा – ‘आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था। पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामिक देश धोषित किया और इसी तरह भारत को भी हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था। लेकिन ये एक धर्मनिरपेक्ष देश बना रहा।’

यह आदेश संविधान के विरुद्ध है क्योंकि संविधान में भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यह आदेश ‘भारत के संविधान का उल्लंघन ’ है। नागरिकता प्रमाण-पत्र से जुड़े मामले की सुनवाई के बाद दिया गया यह आदेश क्या साबित करता है ? न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को कौन और क्यों बाधित कर रहा है ? न्यायाधीश ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार करते हैं। जिस प्रकार भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेन्स हमेशा के लिए दर्ज हो गयी है, उसी प्रकार 10 दिसम्बर 2018 को मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुदीप रंजन सेन का भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाने का कथन भी दर्ज होगा।

सुदीप रंजन सेन ने सहायक सालिसिटर जनरल को अपने निर्णय की प्रति प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और कानून मंत्री को पहुंचाने को कहा। प्रधानमंत्री से उन्होंने यह आग्रह भी किया कि वे पाकिस्तान, बांगला देश और अफगानिस्तान से आये हुए हिन्दुओं, सिखों, जैनों, बौद्धों, पारसियों, इसाइयों, खासियों, जैनतियाओं और गारों को नागरिकता प्रदान करें।

इस वर्ष मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था और मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संदीप रंजन सेन के कथन की निन्दा कर कुछ राजनीतिक दलों ने इनके विरुद्ध भी महाभियोग की बात कही है। एक वर्ष के भीतर मुख्य न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव से न्यायपालिका पर बड़ा सवाल उठता है। ए. जी. नूरानी ने सुदीप रंजन सेन के बयान के बाद ब्रिटिश जज लाॅर्ड दैनिंग (23.01.1899-05.03.1999) जो आधुनिक समय के सबसे बड़े ब्रिटिश जज के रूप में सुख्यात हैं, के इस कथन को उद्धृत किया है कि ‘मैदान में उतरे भी और फिर विवाद की वजह से उड़ रही धूल से अंधे भी हो गये।’

वर्तमान मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह कहा है कि अगर संविधान की सीख हमने नहीं मानी, तो अराजकता बढ़ेगी। कूरियन जोसेफ ने न्यायपालिका के समक्ष छाये और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मंडराते संकट के संबंध में एक प्रश्न के उत्तर में यह कहा है कि ‘नहीं बता सकता कि संकट खत्म हो गया।’ प्रश्न सरकार और न्यायपालिका के बीच संबंध का है। यह मानना गलत होगा कि सरकारें न्यायपालिका को सर्व स्वतंत्र बने रहने देंगी और यह मानना भी गलत होगा कि सभी न्यायाधीश पक्षपात रहित होंगे। खतरा भीतर से है और बाहर से भी। उदाहरण कई हैं और सब आज के नहीं हैं। ताजा उदाहरण सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा राॅफेल डील को लेकर दी गयी जानकारी का है, जिसमें उसने कैग और पी ए सी (पब्लिक एकाउण्ट कमेटी) को लेकर गलत जानकारियां दी हैं, जिन्हें अब सरकार की ओर से ‘टाइप और व्याकरण की भूल’ कहा गया है।

अब सरकार ने ‘टाइपिंग एरर’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आवेदन किया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में इसका उल्लेख किया था। सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या निर्णय/आदेश देता है, यह अगले वर्ष की बात है, पर मुख्य सवाल यह है कि न्यायपालिका से जुड़े सवाल क्या हल हो जायेंगे ? कौन हल करेगा ? सरकार ? संभव नहीं लगता।

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