कब रुकेगा पहाड़ से पलायन                                                    

फील्ड रिपोर्टिंग

उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से लोगों का पलायन एक चिंता का विषय है। हिमालय वर्षों से लोगों के लिए  आश्रयदाता और जीवन दाता / जीवन रेखा रहा है । मध्य हिमालय तो समूची हिमालयी संस्कृति का केंद्र रहा है । यहाँ से यहीं के लोगों का चले जाना काफ़ी दुःख की बात है । साथ ही साथ लोगों के इस तरह जाने से एक समूची संस्कृति पर खतरा मंडराने लगा है । इस सम्बन्ध में कई तरह की संकल्पनाएं रही हैं किन्तु किसी ठोस कारण का पता नहीं लग पाया है ।

वैसे पलायन मानव इतिहास की एक प्रमुख विशेषता रही है  किन्तु इतनी तेज़ी से किसी खास जगह को छोड़ कर जाना इसे चिंताजनक बना देता है । लोगों से बात करें तो अधिकांश लोग यही कहते  हैं क्या कोई जाना चाहता है अपनी थाती छोड़ कर। कुछ हुआ ही नहीं यहाँ, नहीं जायेंगे तो खायेंगे क्या? ये सवाल और गहराई से सोचने को विवश करते हैं।

भारत के मानचित्र पर उत्तराखंड राज्य 9 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आया । राज्य में 13 जिले हैं । मानचित्र  में  10 जिले पूर्ण रूप से पहाड़ी हैं । शेष तीन में देहरादून जिले का कुछ हिस्सा भी पहाड़ी ही है । उत्तराखण्ड का कुल क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किलोमीटर ह । क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का 19 वां राज्य है ।  पूर्व, उत्तर और उत्तर पूर्व में अन्तराष्ट्रीय सीमाएं जो क्रमशः नेपाल, चीन (तिब्बत) से हैं । राष्ट्रीय सीमाएं उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश से हैं। भौगोलिक विस्तार की बात करें तो यह 28˚43’ उत्तरी अक्षांश से 31˚27’ उत्तरी अक्षांश और 77˚ 34’ पूर्वी देशांतर से से 81˚02’पूर्वी देशांतर तक विस्तृत है।

भौतिक मानचित्र पर नज़र डालें तो अधिकांश भाग राज्य का पहाड़ी और दुर्गम है। यहाँ उत्तराखंड का भौतिक मानचित्र देने का मात्र ये उद्देश्य है कि लोग राज्य कि भौगोलिक स्थिति को समझें ।

इतिहास में प्रवास

मानव इतिहास में प्रवसन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना खुद मानव का । अगर अमेरिकन भूगोलविद ग्रिफिथ टेलर की मानें तो मानव प्रजाति का उदगम क्षेत्र मध्य एशिया है और यहीं से संसार के अन्य भागों को प्रवसन हुआ। इसपर और भी मत हो सकते हैं जैसे अफ्रीका से पूरी धरती पर मानव प्रवसन हुआ या कुछ और भी। इसी को जनसंख्या का स्थानांतरण (Migration) या गमनागमन  (Movement of Population) कहते हैं।

किसी क्षेत्र में प्रवास/पलायन को समझने से पहले हमें समग्र में प्रवास को देखना होगा । इसके सभी पक्षों पर विचार करना होगा  स्थानीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर प्रवास को समझना होगा.  भूतकाल में हुए वृहद् मानव प्रवासों पर नज़र डालनी पड़ेगी। उनके प्रभावों को समझना होगा । तभी हम किसी क्षेत्र विशेष से हो रहे पलायन को समझ पायेंगे। वर्तमान में बड़े स्थानांतरण पिछली सदी में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए जिनको कि  अब तक के सबसे बड़े मानव  प्रवासों के रूप में गिना जाता है। इसका अर्थ हुआ कि अतीत काल से ही मानव पलायन होते रहे हैं और ये होते ही रहेंगे।

उत्तराखंड हिमालय से होने वाला प्रवास/पलायन

अगर उत्तराखंड के संदर्भों में पलायन/प्रवास को देखें तो यहाँ एक अलग ही प्रतिरूप नज़र आता है । उत्तराखंड राज्य की मांग ही इस आधार पर थी कि एक अलग पहाड़ी -हिमालयी राज्य, जहाँ यहाँ के लोग, यहाँ के संसाधनों के साथ अपना गुज़र बसर कर सकें। एक गाँव में रहने वाला व्यक्ति भी इतना कर ले कि उसको कहीं बाहर न जाना पड़े संघर्ष के लिए । लेकिन क्या ऐसा हो पाया। आंकड़े तो कहते हैं कि राज्य बनने के बाद पलायन बढ़ा है। लोग अपने घर-गाँव छोड़ने को ज्यादा मजबूर हुए हैं या मजबूर किये गए हैं।

यह कहना कि प्रवास नहीं होना चाहिए पूरी तरह से सही नहीं  है। लेकिन उसकी क्या गति हो, उसके क्या कारण हों, इनको देखा जा सकता है।  उत्तराखंड के संदर्भों में प्रवासन के कारण आर्थिक ही ज्यादा लगते हैं। सरकारों ने बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने में भी काफी  देर कर दी,या यूँ कहें कि बुनियादी सुविधाएं हैं ही नहीं ।

यहाँ कुछ उदाहरण देना चाहूँगा।  बात सबसे पहले स्वास्थ्य से शुरू करते हैं। अल्मोड़ा जिले का चैखुटिया विकास खण्ड जो जिला मुख्यालय से लगभग 90 किमी दूर है । यहाँ के अस्पताल में एक भी महिला चिकित्सक नहीं है । एक महिला चिकित्सक थीं उनको भी कुछ समय पूर्व रानीखेत सम्बद्ध कर दिया गया । लोगों ने आन्दोलन भी किया मगर सिर्फ दिलासा मिला. लोग मरते रहे, परेशानी झेलते रहे । भीमताल के पास कई ऐसे गाँव हैं जो अभी तक सड़क से नहीं जुड़े हैं । कई बार खबरें आती हैं कि फलां महिला / पुरुष को चारपाई पर रख कर 10  किमी सड़क तक लाये।

एक उदाहरण अभी हाल का लेते हैं। लॉकडाउन के कारण पूरे देश के साथ उत्तराखंड भी बंद था। जब  ग्रीन जोन में व्यसायिक प्रतिष्ठान खुलने की बात आई थी सबसे आवश्यकीय चीज़ों में शराब और गुटखा था जबकि कई सारे छोटे दुकानदार चाय आदि बेचते हैं उनको नहीं खोला गया। सरकार के ऐजेंडे में ऐसे लोग हैं ही नहीं। लोगों के पास यहाँ करने को बहुत कुछ है नहीं दरअसल।

एक और बात, उत्तराखंड से हज़ारों लोग महानगरों में काम करते हैं, जो लॉक डाउन के बाद तेज़ी से पहाड़ लौट रहे हैं। लोग उनको ताने दे रहे हैं। अब आई पहाड़ की याद? आज तक कहाँ थे ? क्या कोई खुद की मर्जी से जाता है अपनी धरती छोड़ कर ? परिथितियाँ मजबूर करती हैं सबको। कई लोग जो पहाड़ की खुली हवा-पानी छोड़ कर बेहतर भविष्य की चाह में दिल्ली आदि शहरों को जाते हैं, वे वहां दड़बों में रहने को मजबूर हैं। वहां अभी उनका कोई भविष्य है नहीं तो और कहाँ जायेंगे ?

 

पहले जब हम गाँव में रहते थे खेती में काफी पैदावार थी । यहाँ तक कि उपराँव(पहाड़ में असिंचित जमीन को उपराँव और सिंचित ज़मीन को तलांव खा जाता है) ज़मीन में भी ठीक-ठीक अनाज होता था। दालें तो बाज़ार से लेते ही नहीं थे । गहत, भट्ट, रैंस, उड़द और मसूर आदि खेतों से ही आता था। ये बात महज़ 20 साल पहले की है । लेकिन अब खेती में अनाज है ही नहीं। लोग बाहर जाने पर विवश हैं । जहाँ पानी की सुविधा है वहां के  लोगों ने सब्ज़ी उत्पादन में काम किया है।

रानीखेत के पास मंगचौड़ा, मकडू आदि गाँव काफ़ी सब्ज़ी उगाते हैं और आत्मनिर्भर हैं। कुछ गाँवों में अनाज भी अच्छा पैदा हो रहा है। ‘जौ’ जैसी पौष्टिक फसलें लोग उगा रहे हैं लेकिन सरकार उदासीन है। लोगों को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। धीरे-धीरे वे खेती किसानी छोड़ते हैं और बाहर निकल जाते हैं। बाहर एक बहुत निर्मम संसार है जहाँ वो हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं लेकिन कोरोना काल में उनको भगा दिया जाता है। तब वो लोग सिर्फ ‘ फंसे हुए नागरिक ‘ या फिर ‘ वायरस के वाहक ‘ होते हैं।

डींगा गाँव की कहानी

पलायन की स्थिति को समझने के लिए अल्मोड़ा जिले के ताड़ीखेत और द्वाराहाट विकास खंडों के कुछ गांवों का अध्ययन भी किया गया। ताड़ीखेत ब्लॉक के डींगा गाँव के सत्रह वर्षीय देवेन्द्र कहते हैं कि स्कूल के लिए काफ़ी दूर जाना पड़ता है। गर्मियों में पीने के पानी की बहुत दिक्कत हो जाती है। करीब दो किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है । वहीँ की एक वृद्धा कमला देवी का कहना है पहले इन खेतों में इतना अनाज होता था अब देखो सब खेती मर गई हमारी । गाँव में दो नौले थे पहले, अब एक भी नहीं । दोनों नौलों को देखने जब हम गये तो उनका वजूद ही खत्म हो गया था ।

कमोबेश इसी तरह की स्थिति सब जगह पाई गयी। कोई गाँव ऐसा नहीं है जहाँ से पलायन न हो । पलायन की यह पीड़ा प्राथमिक स्कूलों में भी देखने को मिली. बच्चे बहुत कम हैं । शिक्षक दस -बारह बच्चों को लेकर पढ़ा रहे हैं । कई गांवों में घर बंद मिले । दरवाज़ों पर लगे ताले, उधड़ा हुआ रंग उन बखलियों (कुमाऊं में श्रंखलाबद्ध घरों को बाखली कहा जाता हैए तल्ली बाखली, मल्ली बाखली, पार बाखली ) के पुराने वैभव की कथा कहता है जहाँ कभी लोगों के  ठहाके गूंजते थे ।

 

पहाड़ के मन को कौन पढ़ेगा

 पलायन के पक्षों और सिद्धांतों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि उत्तराखंड हिमालय में होने वाले प्रवास की प्रवृत्ति एकतरफा है। जो व्यक्ति पलायन कर रहे हैं, उनके लौट के आने की सम्भावना नहीं के बराबर है। उन लोगों का यहाँ की अर्थव्यवस्था में भी किसी तरह का कोई योगदान नहीं है। दूसरा जिन क्षेत्रों से पलायन हो रहा है वे उजाड़ होते जा रहे हैं।

एक प्रवृत्ति इस प्रवास की यह भी कि यह यहाँ के मैदानी क्षेत्रों हल्द्वानी, रुद्रपुर, हरिद्वार, देहरादून आदि की तरफ हो रहा है।  इन शहरों पर भी जनसंख्या का दबाव साफ़ महसूस किया जा सकता है। हल्द्वानी में कई बार गंदे पानी या पानी न मिलने या रसोई गैस कि किल्लत की खबरें अखबारों में आती रहती हैं जो चिंताजनक है। समय रहते अगर पहाड़ों के विकास की ओर नहीं देखा गया तो वो दिन दूर नहीं जिस दिन ये शहर गन्दी बस्तियों में तब्दील हो जायेंगे। विकास का मॉडल भी ऐसा होना चाहिए जो यहाँ के भू-भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है । पर्यटन, फल-सब्ज़ी उत्पादन,  फलों  को संरक्षित करके जैम, अचार, चटनी इत्यादि बनाना, जड़ी बूटी उद्योग, छोटे कल पुर्जे वाले उद्योग जो पर्यावरण के लिए घातक नहीं हों, ऐसे उद्योग यहाँ लगाये जा सकते हैं. पर्यटन केद्रों के रूप में उन जगहों को विकसित करना जो अभी तक सामने नहीं आ पाये हों । पहाड़ों से सम्बन्धित कलाओं को संरक्षित कर भी रोज़गार पैदा हो सकते हैं ।

मुझे तो पहाड़ को लेकर अभी तक किसी भी सरकार की ऐसी कोई दृष्टि ही  नज़र नहीं आती जो युवाओं के मन को पढ़ सके, बूढों की भावनाओं को समझ सकें, महिलाओं की समस्याओं को जान सके और बच्चों के लिए एक उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित कर सके। अगर कोई सरकार ऐसा कर पाने में समर्थ है, तभी पलायन रुकेगा वरना हम पहाड़ी मजबूर होते रहेंगे अपनी थाती छोड़ने को।

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