पुस्तक

पूंजीवाद क्या है

2020 में हेमार्केट बुक्स से हदास थिएर की किताब ‘ ए पीपुल’स गाइड टु कैपिटलिज्म: ऐन इंट्रोडक्शन टु मार्क्सिस्ट इकोनामिक्स ’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने अपनी बात वर्तमान हालात से शुरू की है । उनका कहना है कि इस समय लोगों की मौतों का कारण केवल एक विषाणु ही नहीं है। हम सब ऐसी सामाजिक व्यवस्था के भी शिकार हैं जो बमवर्षकों को खरीदने पर धन खर्चने में कोई संकोच नहीं करती लेकिन मास्क और वेंटीलेटर जैसे जीवनरक्षक उपायों के लिए उसके पास धन की कमी हो जाती है। दशकों की बजट कटौती के चलते अस्पताल ध्वस्त हो गये हैं और विभिन्न देशों की सरकारें वेंटीलेटरों के उत्पादन और वितरण की कोई केंद्रीय योजना बनाने की जगह खुले बाजार से उन्हें हासिल करने की होड़ में झोंक दी गयी हैं। दुनिया भर में सरकारों का रवैया अलग अलग रहा है । जिन देशों ने व्यापक पैमाने पर परीक्षण पर जोर दिया वहां महामारी का प्रसार धीमा रहा। संक्रमित लोगों की पहचान करके संक्रमण का प्रसार रोक दिया गया। इसके विपरीत विश्व पूंजीवाद का केंद्र अमेरिका इस महामारी का भी केंद्र बन गया । सट्टा बाजार में महामारी से पैदा गड़बड़ी के संकेत मिलते ही दुनिया की सबसे धनी सरकार ने वित्तव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए तो अरबों डालर झोंके लेकिन महामारी के प्रसार को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं की। ऐसे हालात में मशहूर लोगों की जांच की खबर तो सुनायी देती है लेकिन अधिकांश स्वास्थ्य कर्मियों को बिना किसी सुविधा के महामारी से जूझने के लिए छोड़ दिया गया।

यह विध्वंस नजर हाल में आया लेकिन चल बहुत दिनों से रहा था। सभी जानते हैं कि खेती के उद्योगीकरण, वन जीवन में शहरी दखल और जीव जंतुओं के औद्योगिक किस्म के उत्पादन का व्यापक चलन शुरू होने से अनेकानेक नये वायरस पैदा हो रहे हैं। दूसरी ओर दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं में बजट की व्यवस्थित कटौती ने तमाम देशों को ऐसे हालात से निपटने में अक्षम बना डाला। जब कोरोना का हमला हुआ तो उसने वर्गीय विषमता को जाहिर कर दिया। आर्थिक संकट की बात तो हो ही नहीं रही है। सेहत संबंधी इस संकट के प्रकट होते ही अर्थतंत्र गोते लगाने लगा। इसकी कीमत कामगारों को चुकानी पड़ी। रोजगार छूमंतर हो गये और तालाबंदी के चलते पूंजीवाद का इंजन ठहर गया। उत्पादन ठप होने से आपूर्ति में भी रुकावट आ गयी। बड़े पैमाने पर छंटनी से मांग में गिरावट आने लगी। लेखिका को इस स्थिति में पूंजीवाद की कार्यपद्धति की समझ बेहद जरूरी लगती है।

असल में इस महामारी ने 2007 से जारी मंदी जनित समाजार्थिक प्रक्रियाओं को त्वरित कर दिया है। इस मंदी ने सामाजिक ध्रुवीकरण को गहरा दिया था। पिछले तीस सालों से संपदा के वितरण में भारी विषमता बरती जा रही है। इसके चलते दुनिया भर में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आ गयी। इनमें से अरब वसंत, अमेरिकी अकुपाई आंदोलन, स्पेन के विद्रोह, चीन में हड़तालों की लहर तथा हांग कांग और इरान में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन केवल कुछेक हैं। इनमें लोगों की भागीदारी वियतनाम युद्ध विरोधी आंदोलन या नागरिक अधिकार आंदोलन से अधिक रही है। इस महामारी ने इन पर अस्थायी रोक लगा दी है लेकिन उनके फूट पड़ने की वजहों की मौजूदगी के चलते उनमें कभी भी उभार हो सकता है। सड़क पर जारी विरोध के अनुपात में ही वैचारिक बदलाव भी देखने को मिला। पूंजीवाद को खारिज करने वालों की तादाद बढ़ रही है और उनमें से बहुतेरे लोग समाजवाद के पक्ष में खड़े हो रहे हैं। बर्नी सांडर्स के उभार में इस रुझान को ठोस अभिव्यक्ति मिली जिसने स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से लेकर नस्ली न्याय और वर्गीय विषमता तक प्रत्येक महत्व के सवाल पर राष्ट्रीय बहस को बुनियादी रूप से बदल दिया। इसके साथ ही एक और बात नजर आयी ।

वर्तमान सड़ी गली व्यवस्था के प्रति विक्षोभ का लाभ दक्षिणपंथी विचारों और आंदोलनों को भी मिला। इससे पूरी दुनिया में तानाशाह शासकों का उभार हुआ और उनमें नव फ़ासीवादी प्रवृत्तियों के भी संकेत मिले। इसके साथ ही अमेरिकी पूंजीवाद के चलते धरती पर भी संकट आ खड़ा हुआ। ऐसे तूफानी समय से कोई पीढ़ी शायद ही हाल के दिनों में गुजरी होगी। हमारे इस समय के गहरे सवाल क्रांतिकारी सिद्धांत की मांग कर रहे हैं। इन सभी बुनियादी सवालों को अगर कभी उठाया भी गया तो लोगों ने असंबद्ध समझकर उन्हें परे हटा दिया।

असल में युद्ध, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और उत्पीड़न से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गहराई से जुड़ी हुई है । इसके चलते ही बहुतेरे युवा इस समय पूंजीवाद का विकल्प तलाश रहे हैं। इस मामले में लेखिका ने याद दिलाया है कि पूंजीवाद का सबसे गहन विश्लेषण कार्ल मार्क्स नामक क्रांतिकारी ने प्रस्तुत किया था। 150 साल पहले के उनके लेखन में हमें पूंजीवाद के समूचे गतिपथ की भविष्यवाणी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए इसके बावजूद उनके विश्लेषण की मूल बातों में बहुत अंतर नहीं आया है। संकट उसके साथ लगे रहते हैं, दमन और शोषण पर उसका निर्माण होता है तथा सामाजिक और पर्यावरणिक विध्वंस में उसकी अतार्किकता जाहिर होती है। मार्क्स का चिंतन आज के कार्यकर्ताओं के लिए मूल्यवान औजार है। इसके सहारे मुट्ठी भर अमीरों की इस दुनिया को समझने और बदलने में आसानी होगी। इस दुनिया में कुछ लोगों के लाभ के लिए अधिकांश लोगों का शोषण होता है, उन्हें मताधिकार से भी वंचित कर दिया जाता है, उनका सब कुछ छीन लिया जाता है। इस व्यवस्था के भरोसे शायद यह धरती और मानवता इस सदी को सुरक्षित पार न कर सकेंगे।

लेखिका ने इस दुनिया को समझने के लिए अर्थशास्त्र पढ़ने की कोशिश की लेकिन उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा। उनका कहना है कि पूंजीवाद और अर्थशास्त्र को जान बूझकर रहस्यमय बनाया गया है ताकि उनके बारे में आम लोगों से अधिक बात विशेषज्ञ कर सकें। वंचितों के लिए इसमें संदेश निहित होता है कि व्यवस्था और विचारों की जटिल दुनिया को समझना आपके बस की बात नहीं, उन्हें प्रभावित करना तो बहुत दूर की बात है। इस रहस्य का भेदन करने वाले मार्क्सवादी अर्थशास्त्र पर भी अधिकतर पुरुषों का कब्जा है। ऐसी स्थिति में उन्होंने मार्क्स के ग्रंथ ‘ पूंजी ’ को पढ़ना शुरू किया और उससे तब तक जूझती रहीं जब तक अर्थतंत्र की दुनिया उनके लिए बोधगम्य न हो गयी । इस वजह से उन्हें उम्मीद है कि उनकी यह किताब अर्थतंत्र की दुनिया उनके जैसे पाठकों के लिए खोलेगी।

किताब में मार्क्स की ‘ पूंजी ’ का अनुसरण किया गया है । मार्क्स ने ‘पूंजी’ के तीन खंड इस पूंजीवादी व्यवस्था के क्रांतिकारी रूपांतरण हेतु मजदूर आंदोलन को सैद्धांतिक हथियार उपलब्ध कराने के लिए लिखे थे। मार्क्स मानते थे कि समूची मानवता के भविष्य के लिए मजदूर वर्ग का यह काम अत्यावश्यक है इसलिए वे इसके पक्ष में भावुकता की जगह ठोस वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करना चाहते थे। पूंजीवादी व्यवस्था की अंदरूनी कार्यपद्धति और अंतर्विरोधों की खोज के लिए मार्क्स ने वैज्ञानिक छानबीन की पद्धति अपनायी। वे जानते थे कि आर्थिक रूपों के विश्लेषण के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र या रसायन मदद नहीं कर सकते इसलिए उन्होंने इस काम के लिए अमूर्तन का सहारा लिया। अमूर्तन के बल पर उन्होंने इस व्यवस्था के प्रमुख तत्वों को अलगाया और उनके शुद्ध रूप में उनका विवेचन किया। इस तरह पक्की बुनियाद डाल लेने के बाद उन्होंने जटिलतर तत्वों को स्पष्ट किया ताकि पाठक गहन धारणाओं को ठोस यथार्थ पर लागू कर सके। पूंजीवादी व्यवस्था की सतह पर चल रही हलचल को भेदकर गहराई में कार्य्ररत नियमों और प्रवृत्तियों को उद्घाटित करना उनकी पद्धति की सबसे बड़ी खूबी है।

मार्क्स बताते हैं कि पूंजीवाद उत्पादन का एक सामाजिक संबंध है। कहने का मतलब कि मुनाफ़े का स्रोत बेहतर गणना या मौलिक सोच नहीं बल्कि दो वर्गों के बीच का शोषणकारी संबंध है। हमारे सामाजिक जीवन में मालिक और कामगार जब एक दूसरे से मिलते हैं तो एक के पास मूल्य उत्पादन के साधनों का मालिकाना होता है और दूसरे के पास जिंदा रहने के लिए अपना श्रम बेचने के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं होता। कामगार को चाहे जितना भी जरूरी समझा जाये लेकिन कार्यस्थल पर जीवन मरण के सभी फैसले मालिक ही लेते हैं और मुनाफ़ा भी उनकी ही जेब में जाता है। इस तरह पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन और विनिमय कुल मिलाकर ऐसे शोषणकारी संबंध से निर्धारित होता है। यह संबंध न तो प्राकृतिक है और न ही अजर अमर होता है। पूंजीवाद के आरम्भिक विकास के समय जन समुदाय को उनकी जमीन से जबरिया बेदखल किया गया था ताकि पूंजीवाद को फलने फूलने का माकूल माहौल मिल सके। पूंजीवाद को समझने के लिए वर्ग और शोषण बेहद बुनियादी धारणाएं हैं और उनको ऐतिहासिक संदर्भ में ही समझा जा सकता है इसलिए लेखिका ने किताब की शुरुआत पूंजी के जन्म की कहानी से की है । इससे पुस्तक में आगे जो बातें बतायी गयी हैं उनका संदर्भ बनेगा । समझ आयेगा कि पूंजीवादी व्यवस्था मनुष्य और धरती को पराधीन बनाकर पैदा हुई है ।

इसके आगे के दो अध्यायों में माल, मूल्य और मुद्रा जैसी अमूर्त धारणाओं का विवेचन किया गया है । मार्क्स ने पहले खंड के शुरुआती तीन अध्यायों में इन्हें स्पष्ट किया है। इन अध्यायों की थोड़ी जटिलता को लेकर मार्क्स ने पाठकों को चेतावनी दी थी क्योंकि अर्थशास्त्र के अध्ययन में इस पद्धति का पहले कभी उपयोग नहीं किया गया था। इसीलिए लेखिका ने ठोस उदाहरण देकर आसान भाषा में बात को समझाने की कोशिश की है। इसके बाद के दो अध्यायों में मुनाफ़े के स्रोत और पूंजीवादी शोषण के खास रूप को समझाया गया है। इसके लिए पूंजी, श्रम और वर्ग समाज जैसी धारणाओं की समझ जरूरी है। इसके बाद ही होड़ और संचय जैसी संचालक शक्तियों को देखना सम्भव होता है। किताब के आखिरी अध्यायों में पूंजीवाद में निहित अंतर्विरोधों की पहचान की गयी है जिनके ही चलते आखिरकार वैकल्पिक समाज का आधार तैयार होता है। सबसे अंत में वर्तमान समय की विशेषता के रूप में कर्ज और वित्त बाजार का विश्लेषण किया गया है।

इसी अध्याय में हालिया महामंदी का भी विश्लेषण है । ऐसा इसलिए नहीं कि यह संकट प्रधान तौर पर वित्तीय संकट है। होना तो इसे संकट वाले पूर्व अध्याय में चाहिए था लेकिन कर्ज की भूमिका को अच्छी तरह समझे बिना इसकी सही व्याख्या सम्भव नहीं थी। पश्चलेख में आगामी गिरावट के बारे में कुछ विचार व्यक्त किये गये हैं ताकि मनुष्य और धरती पर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के घातक नतीजों की तस्वीर साफ हो सके ।

इसमें मार्क्स की ‘पूंजी’ से ढेर सारे उद्धरण दिये गये हैं। कहीं कहीं प्रसंगानुसार उनकी अन्य किताबों की भी बात की गयी है। वजह मार्क्स के लेखन में पाठकों की रुचि पैदा करना है। इसमें अर्थतंत्र की कार्यपद्धति का विवेचन है। यह कार्यपद्धति दमन और साम्राज्यवाद से तथा पर्यावरण के विनाश से नाभिनालबद्ध है। आम लोग अर्थशास्त्र को संख्याओं से जोड़कर देखते हैं। मार्क्सवादियों के लिए अर्थतंत्र का संबंध बुनियादी रूप से मनुष्य और उसके जीवन से है। मार्क्सवाद सही गलत का कोई खाका नहीं, निरंतर गतिमान सामाजिक संबंधों पर लागू होने वाला जीवंत सिद्धांत है। इसके चलते मार्क्सवादियों में आपस में विवाद मौजूद हैं। लेखिका ने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए भी पूंजीवाद की उत्पत्ति, संकट सिद्धांत और वित्तीय पूंजी की भूमिका के बारे में विवादों का परिचय दिया है।

इस दुनिया में केवल पूंजीवादी विनाश ही नहीं है, बल्कि मानव चेतना, रचनात्मकता और संघर्ष से उपजी उम्मीद भी है। मार्क्स ने इसी तरह की उम्मीद के आधार पर बनने वाली एक वैकल्पिक दुनिया का सपना रचा है । इस वैकल्पिक दुनिया को हमें ही लड़कर हासिल करना होगा

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