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ज़ेर-ए-बहस

बीजेपी के लिए वोट गोडसे के लिए वोट है

 

आइए मोदी को याद दिलाएं –:

1947 में उनके नायक गोलवलकर ने कहा था कि यदि आरएसएस को मजबूर किया गया तो वह भारत से मुसलमानों को बाहर निकालने का विरोध करने वाले गांधी जी को तुरंत खामोश करा देगी.

तो फिर गोडसे को लेकर मोदी के संगठन के मन की बात को व्यक्त करने वाली प्रज्ञा ठाकुर को लेकर मोदी यह दिखावा क्यों कर हैं कि वे “प्रज्ञा ठाकुर को क्षमा नहीं कर सकते” ?

इस बात को पूरी तरह जानते हुए कि प्रज्ञा ठाकुर अभिनव भारत’ संगठन से जुड़ी हुई हैं जो कि सावरकर और गोडसे के वंशजों द्वारा स्थापित एक आंतकी संगठन है जिसका उद्देश्य हिंसा फैला कर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है, मोदी और भाजपा ने उन्हें 2019 में अपनी पार्टी के चुनाव अभियान का शुभंकर बनाया. इस सच्चाई को मोदी गाँधीजी के लिए घडियाली आंसू बहाकर धो नहीं सकते हैं.

मैं 23 मई का इंतजार करते हुए ‘मेजरिटेरियन स्टेट: हाउ हिंदू नेशनलिज्म इज़ चेंजिंग इंडिया’ नाम के किताब को पढ़ रही हूँ जिसमें एक अध्याय में क्रिस्टोफ़ जाफरलॉट ने गोलवलकर के एक भाषण को उद्धृत किया है, जिसमें गांधीीजी को धमकी दी गई है|

गोलवलकर ने 8 दिसंबर 1947 को 2500 संघ कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मुसलमानों को हर हाल में भारत से बहार निकालना होगा और पाकिस्तान को नष्ट करना होगा, “यदि कोई हमारे रास्ते में खड़ा होता है तो हमें उसे भी खत्म करना होगा, चाहे वह नेहरू की सरकार हो चाहे किसी की भी सरकार हो।”

और आखिर यह गांधीजी ही थे जो संघ के रास्ते में खड़े थे और हिंदू मुस्लिम एकता के लिए संघर्ष कर रहे थे. गोलवलकर ने गांधीजी के बारे में कहा, “महात्मा गांधी उन्हें (हिंदुओं) को ज्यादा देर तक गुमराह नहीं कर सकते । हमारे पास ऐसे साधन हैं जिससे हम ऐसे लोगों को तुरंत खामोश कर सकते हैं लेकिन हिंदुओं के प्रति ऐसा व्यवहार हमारी परंपरा के प्रतिकूल है, पर यदि हमें मजबूर किया गया तो हम यही रास्ता अख्तियार करेंगे। ”

इसी तरह के भाषणों को लेकर सरदार वल्लभभाई पटेल ने गोलवलकर को लिखे अपने पत्र में कहा था – “उनके (आरएसएस के सभी नेताओं के) भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे हुए थे …. इसी जहर के अंतिम परिणाम के रूप में देश को गांधीजी के बहुमूल्य जीवन का बलिदान भुगतना पड़ा । … गांधीजी की मृत्यु के बाद आरएसएस के लोगों ने खुशी व्यक्त की और मिठाई बांटी। “

गोलवलकर को लिखे पटेल के इस पत्र को देशराज गोयल कि किताब ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में पूरा उद्धृत किया गया है।

भारत के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में गांधी जी की हत्या के लिए माहौल बनाने में आरएसएस की भूमिका की फिर से पुष्टि की है :-

“..राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा … हमारी रिपोर्ट्स से यह बात सिद्ध होती है कि इन दो संस्थाओं (मुख्यतः आरएसएस) की गतिविधियों ने देश में ऐसा माहौल तैयार किया जिसके कारण यह भयानक त्रासदी (गांधी जी की हत्या) संभव हुई ।”
– सरदार पटेल के पत्राचार, खंड 6, संपादक : दुर्गा दास।

भाजपा और खुद मोदी भी सरदार पटेल के व्यक्तित्व को नेहरू के व्यक्तित्व के खिलाफ भीड़ा देने की कोशिश करते हैं. पर सच तो यह है कि पटेल और नेहरू में जो भी मतभेद थे, वे दोनों गांधीजी से प्यार करते थे – और संघ और हिंदू महासभा के लोग, सावरकर और गोडसे जैसे लोग, गांधीजी से नफरत करते थे.

प्रज्ञा ठाकुर, अनंत हेगड़े जैसे गोडसे भक्त और खुद मोदी भी गांधीजी की महानता का बखान कर रहे हैं. पर मोदी एक सीधा सवाल हर देशवासी को पूछना चाहिए – आप गांधीजी को सिर्फ ‘स्वच्छता’ का प्रतीक बताते हैं. आपके लिए चैलेंज है – कि कम से कम एक बार इस सच को कहिए कि गांधीजी भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए आतंकी गोडसे के हाथों शहीद हुए? एक बार तो देश से कहिए कि देशवासियों को गोडसे के रास्ते – यानी आतंक और नफरत के रास्ते – से दूर, गांधीजी के रास्ते – यानी प्यार और एकता के रास्ते पर चलना चाहिए?

संघ की तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ मधु किशवर ने गोडसे की तुलना भगत सिंह से कर डाला. यह तो गांधीजी का भी और भगत सिंह का भी अपमान है. भगत सिंह के विचार गांधीजी के विचारों से अलग थे, पर वे गांधीजी का कभी असम्मान नहीं किए, उनके प्रति हिंसा की बात तो दूर! जब लाला लाजपत राय सांप्रदायिक मुस्लिम-विरोधी रणनीति करने लगे तो भगत सिंह और उनके साथियों ने उनका भी विरोध किया. पर उन्होंने अपने विरोधियों की हत्या नहीं की!

और भगत सिंह सांप्रदायिक नफरत और हिंसा के खिलाफ संघर्ष करते हुए ‘किर्ति’ पत्रिका में ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ लेख लिखे, जिसमें उन्होंने लिखा, “भारत के नवयुवक में इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है।… इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।”

मधु किशवर ने गोडसे की तुलना भगत सिंह से करके वही किया जिसके बारे में हरिशंकर परसाई ने कभी व्यंग्य में कल्पना किया था!

सत्य की अतिशयोक्ति से व्यंग्यकार और कार्टूनिस्ट अपना काम करते हैं, और इससे सत्य पर रोशनी डालता है. पर अतिशयोक्ति ही सत्य हो जाए, तब बेचारा व्यंग्‍यकार क्या करें?!

परसाई ने गांधीजी को लिखे पत्र में कहा:

“यह सभी जानते हैं कि गोडसे फांसी पर चढ़ा, तब उसके हाथ में भगवा ध्वज था और होठों पर संघ की प्रार्थना- नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि…..

“गोडसे को भगत सिंह का दर्जा देने की कोशिश चल रह रही है. गोडसे ने हिंदू राष्ट्र के विरोधी गांधी को मारा था. गोडसे जब भगत सिंह की तरह राष्ट्रीय हीरो हो जायेगा, तब तीस जनवरी का क्या होगा? अभी तक यह ‘गांधी निर्वाण दिवस है’, आगे ‘गोडसे गौरव दिवस’ हो जायेगा….

“जब तीस जनवरी को गोडसे की जय-जयकार होगी, तब यह तो बताना ही पड़ेगा कि उसने कौन-सा महान कर्म किया था. बताया जायेगा कि इस दिन उस वीर ने गांधी को मार डाला था. तो आप गोडसे के बहाने याद किए जायेंगे. अभी तक गोडसे को आपके बहाने याद किया जाता था. एक महान पुरुष के हाथों मरने का कितना फायदा मिलेगा आपको? लोग पूछेंगे- यह गांधी कौन था? जवाब मिलेगा- वही, जिसे गोडसे ने मारा था.”

भाजपा के लिए एक एक वोट, हमें ऐसे कि दु;स्वप्न के नज़दीक ले जाता है. 23 मई के बाद अगर कोई गैर भाजपाई सरकार बनती है तो उसका पहला काम होना चाहिए, देश के सभी स्कूलों में और पूरे समाज में संवैधानिक मूल्यों के बारे में शिक्षा देना. और ऐसी शिक्षा में सबसे पहले सिखाना होगा कि गांधीजी कैसे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए शहीद हुए, गोडसे की विचारधारा क्या थी, और यह नफरत भरी विचारधारा क्यों भारत के अस्तित्व के लिए खतरनाक है.

गांधीजी, अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों पर माला चढ़ाना काफी नहीं है – उनके मूल्य, उनके विचार, उनके आपसी मतभेदों को उन्होंने कैसे हल किया, यह समझाना ज़रूरी है. ये तीनों ही, और नेहरू भी, अपने अपने तरीके से देश के अल्‍पसंख्यकों और कमज़ोर वर्गों के हितों की रक्षा को ही लोकतंत्र की परीक्षा समझते थे. इन बातों की समझ मज़बूत हो, तभी जाकर शायद हमारे देश का लोकतंत्र इतना मज़बूत हो पाएगा कि उसमें नफरत और अज्ञान भरी संघी राजनीति इसमें जड़ नहीं जमा पाएगी.

(लेख का हिंदी तर्जुमा समकालीन जनमत टीम के साथी दीपक कुमार ने किया है)

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