Tuesday, May 17, 2022
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समलैंगिक और ट्रांस जेंडर लोगों के सम्मान और बराबरी के अधिकार पर हमला है सेक्शन 377

सेक्शन 377 एक कलंक है क्योंकि ये समलैंगिक और ट्रांस जेंडर लोगों के सम्मान और बराबरी के अधिकार पर हमला है. यहां दिल्ली उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक जजमेंट ने अंबेडकर के उस बात पर ज़ोर दिया था कि हमारे देश के कानून और सरकार को सामाजिक नैतिकता नहीं बल्कि संवैधानिक नैतिकता का साथ देना चाहिए और इसे समाज में विकसित करना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के जजमेंट को उलट दिया था. पर सर्वोच्च न्यायालय के निजता के अधिकार वाले जजमेंट ने 377 वाले फैसले को असंवैधानिक बताया और 377 के खारिज होने के रास्ते को खोला. दुखद है कि भारत सरकार अब भी खुलकर 377 के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है बल्कि न्यायालय पर ही फैसले को छोड़ रही है. मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा दोनों ही अन्तर धार्मिक और अन्तर जातीय विवाह के मामलों में भी लव जेहाद वगैरह का हौवा खड़ा करके संवैधानिक नैतिकता और लोगों के निजता पर हमला करती है. इसलिए समलैंगिक और ट्रांस लोगों के सम्मान और स्वायत्तता का भी स्वागत करने में उसे कठिनाई हो रही है जब कि वामपंथ, कांग्रेस आदि ने बहुत पहले ही खुलकर 377 का विरोध किया है और उसके खिलाफ जागरूकता तैयार करने का काम किए हैं.

सेक्शन 377 के पक्ष में जो तर्क आ रहे हैं वे भेदभावपूर्ण ही नहीं, हास्यास्पद भी हैं. सेक्सुअल ओरियंटेशन यानी यौन रुझान प्रकृति से तय होता है, यह किसी के मर्ज़ी से तय नहीं होती. ना ही ये कोई विकृति है. समलैंगिक इंसान को ‘अप्राकृतिक ‘ और ‘ अपराधी ‘ करार देना क्रूरता है, मानवाधिकार के खिलाफ है. प्रकृति के कई हज़ार जीवों में भी समलैंगिक व्यवहार दिखता है. हर दौर के इंसानी समाज में, और भारत में भी, समलैंगिक लोग हमेशा रहे हैं. जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय में एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा, समलैंगिक लोग एक दूसरे से कितना गहरा प्यार करते हैं, यह इस बात से पता चलता है कि 377 जैसे कानून के तहत गिरफ्तारी के भय के बावजूद प्यार करते हैं.

1917 के रूसी क्रांति के बाद रूस की क्रांतिकारी सरकार ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया. भारत में समलैंगिकता को अपराध बनाने वाले तो अंग्रेज़ ही थे. अंग्रेज़ चले गए पर अपना कानून छोड़ गए, जिसे भेदभावपूर्ण लोग ‘भारत की संस्कृति ‘ कहते हैं !

सुरेश कौशल ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि 377 के हट जाने से भारत के सैनिक आपस में समलैंगिक संबंध बनाने लगेंगे. कौशल जी किस तरह की कल्पनाएं और भय पालते हैं, इस बात से पता चलता है. पर हर बात पर ‘ बार्डर पर सैनिकों ‘  की कसमें खिलवाना हास्यास्पद है. अब 377 के लिए भी सैनिकों को क्यों बहाना बनाया जाए !

हमारे देश में हर वर्ष कितने समलैंगिक बच्चे, युवा और लोग समलैंगिक या ट्रांस होने के लिए प्रताड़ना के चलते आत्महत्या करते हैं. इसलिए 377 को ख़त्म करके, ऐसे सभी यौन अल्पसंख्यकों को सम्मान और ताकत देने के लिए काम करना होगा और यह सरकार की ज़िम्मेदारी होगी और समाज की भी.

आजकल के माहौल में आए दिन मॉब हिंसा की घटनाएं हो रही हैं जिसमें जो कोई भी ‘अलग ‘ दिखता हो उसकी हत्या हो सकती है. नैतिकता के नाम पर पहरेदारी भी हो रही है जहां भाजपा के नेता खुद प्रेमी युगल को पीटते हुए पाए जा रहे हैं क्योंकि लड़की हिंदू है और लड़का मुसलमान. ऐसे में 377 को ख़त्म करना तो ज़रूरी है ही –  नैतिकता के नाम पर पहरेदारी और हिंसा के माहौल से भी संघर्ष करते हुए समलैंगिक और ट्रांस लोगों के लिए सुरक्षित हालात भी बनाना होगा.

 

[author] [author_image timthumb=’on’][/author_image] [author_info]यह लेख महिला और समानता के मुद्दों पर मुखर और अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन ने लिखा है. लेख में प्रयुक्त तस्वीरें साभार गूगल से प्राप्त की गयीं हैं.[/author_info] [/author]

कविता कृष्णन
कविता कृष्णन भाकपा माले की पोलित ब्यूरो की सदस्य और आल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन (एपवा ) की सचिव हैं
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