समकालीन जनमत
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वसंत तुम कहाँ हो ?

पीयूष कुमार


 

इस साल कैलेंडर पर वसंत जल्द आ गया लगता है क्योंकि जाड़े को भी इस वर्ष ‘मैं झुकेगा नई’ का स्वैग चढ़ा हुआ है। उत्तर में बर्फवारी हो रही, उसके नीचे कोहरा और बारिश। ऐसे में स्वेटर निकालकर तह करने में पखवाड़ा या महीना भर और है शायद। लेकिन अपने इधर धूप की आंखों में चमक जरूर आ गयी है। पक चुके जंगल झरने की तैयारी कर रहे हैं। कम होती मैदानी नदी अपने किनारों पर अलसा रही है। जिन एक-दो पत्तों को नयेपन की जल्दी है, वे आवारा होती हवा का आँचल थाम निकल लिए हैं। अभी कुदरत के पांव भारी हैं जिससे उसकी चाल मद्धिम है।

उधर खेतों में सरसों की अब भी खिल रहे हैं जिसे देखकर शहरी उच्च और मध्यवर्ग के अंतस में शाहरुख खान की तरह खुद को पोज मारते फ़ोटो लेकर फेसबुक, इंस्टाग्राम में चैंपने की लहर उठ रही है। वसंत तो सोशल मीडिया में आकर ही रहता है चाहे धरती में आये न आये। इस साल खेत ज्यादा समय तक पियर पियर दिख रहे थे। खेतों में इस लंबे वसंत की वजह एक किसान ने बताई कि इस बरस सरसों का तेल रिकार्ड महंगा हो गया था सो इस बखत हम लोगों ने ज्यादा सरसों लगाई है। अब सोचिए इस महंगाई में वसंत का खयाल कोई कितना करे जब जिंदा रहना ही विकास होता जा रहा। किसान को तो फूलों के बजाय सरसों की खरही बड़ी होने की आस रहती है।

अब आगे का समय पूर्णपातन का है और कुसुमन का भी। फिर पल्लवन और फलन से नवसृजन होगा। प्रकृति के इस सृजन में हम कहाँ हैं, यह विचारने का भी अवकाश मिल जाये तो मन मे वसंत आ ही गया समझो। मैं जंगलों में रहता हूँ तो यह सब अनुभूत कर पा रहा हूँ। जंगली होना बहुत सुखद है। इन पेड़-पौधों का आदिम राग जब अंतस में उतरता है, तब समझ आता है कि यही राग वसंत है। जंगली होना मतलब प्रकृति के सहअस्तित्व को समझना और मनुष्यता को जीना है। जंगली होना अधकचरे दिमाग के शहरियों को शायद ही कभी समझ आएगा। उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक इस वर्ग के लिए जंगली होने का मतलब हू – हू करते फिल्मों में दिखाए जानेवाले आदिवासी हैं जो संसाधनों पर कब्जा किये बैठे हैं।

खैर, घर में जो आम का पेड़ है, उसमें छुप छुपा के एक मौर दिख रहा। सोचता हूँ इतना लजाने की क्या जरूरत है बौराने के लिए। इधर उधर देखता हूँ तो वसंत के लक्षण किसी और पौधे पर नहीं दिख रहे। अब समझ आया कि यह आम का मौर लजा क्यों रहा है। मौर को लेकर भिखारीदास का वह छंद याद आता है जिसमें नायिका अपनी सहेली को आम के मौर देकर अपने प्रेमी के लिए संदेश भेजती है – ” वसंत आ गया, तो भी तुम नहीं आये, तो फिर अब आने में क्या तुक है। बस एक काम करिबी सखी, आम मौर देबी और यह कहिबी, बा अमराई ने राम राम कही है”

अब अमराइयों की, उसकी छाँह की बात कोई नहीं करता। अब अमराई बची भी कहां। शहरों में कंक्रीट के जंगल में पेड़ पौधों के मिजाज का अब कौन हवाल है। वसंत और फागुन में इंसान की बात करना तो खैर, इतिहास की बात हो गयी। आज नव राजनीतिक कट्टरवाद ने तो अन्तस् में कुछ बची खुची करुणा के बीजों को भी खत्म कर दिया है। लोकतंत्र, समता, संविधान रूपी वसंत से युवाओं को मतलब नहीं दिखता। वह अब द्वेष और हिंसा का खाद पानी पा रहा है सो वही फूलेगा फलेगा। यह अच्छे से दिख भी रहा है। काश, पागलपन में बौराया यह मन आम के इन मौरों को देख पाता, देख पाता कि इस आम की, इन अमराइयों की प्रतीक्षा कितनी प्रीतिकर है। कब नन्हीं अमिया फलें, कब बस्तर में ‘आमा जोगानी’ त्योहार हो तो उसके बाद खाएं। कब बाढ़ें और उसमें चेर धरे। कब मिट्ठू आये कुतर दे तो और मीठे हो जाएं। पर ऐसा हो चला है कि कौव्वा आकर ठारें मार रहा और वक्त के आम को सड़ा रहा है।

छत्तीसगढ़ी में लक्ष्मण मस्तूरिया ने लिखा – “राजा बरोबर लगे मउरे आमा, रानी सही परसा फुलवा.. मन डोले रे मांग फगुनवा…” पर इस बार राजा तो आ गया है, रानी का इंतज़ार है। रानी अभी तैयारी में हैं फिर तो जंगल मे आग लगेगी। फिलवक्त जो लोग तकनीक और उत्तर आधुनिक युग मे व्यस्त हैं, जिन्हें वसंत और फागुन छूकर नहीं गुजर रहा, उनसे कहना चाहूंगा कि उस अमराई ने राम राम कही है।

बगीचों और गमलों के पौधों में भी वसंत आएगा पर इंसानों की तरह उनके अपने-अपने वसंत होंगे। चूंकि बगीचे में फूल मुस्कुराते हैं और वन में हंसते हैं। इसलिए जंगली बनकर हंसना होगा। जैसा कि हजारी दादा ने कहा है कि वसन्त आता नहीं, लाया जाता है, तो लाने के उदिम करने होंगे। सबसे प्रेम करना होगा अन्यथा जीवन मे वसंत एक अगोरा का ही नाम रहेगा। 13 वीं सदी में वसंत कैसे आता था, अमीर ख़ुसरो से सुनिए –

सकल बन फूल रही सरसों।
सकल बन फूल रही सरसों।
अम्बवा फूटे, टेसू फूले,
कोयल बोले डार-डार,
और गोरी करत सिंगार,
मलनियाँ गेंदवा ले आईं कर सों,
सकल बन फूल रही सरसों।

तरह तरह के फूल खिलाए,
ले गेंदवा हाथन में आए।
निजामुदीन के दरवज़्ज़े पर,
आवन कह गए आशिक रंग,
और बीत गए बरसों।
सकल बन फूल रही सरसों।

आशिक से याद आया, यह तो मदनोत्सव का आरम्भ भी है। पुराने प्रेमी इन दिनों को मदनोत्सव के रूप में मनाते थे और बाबा वेलेंटाइन की कृपा से नए प्रेमी भी इस उत्सव को कायम रखे हुए हैं। ऐसे मौसम में आशिकों को को फ़ैज साहब के शब्दों में टेर लगाना चाहिए – “गुलों में रंग भरे, बादल ओ बहार चले… चले भी आओ कि मौसम का कारोबार चले… ”

सभी के मन मे वसंत बना रहे।

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