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प्रतिरोध की संस्कृति और बौद्ध दर्शन विषय पर तुलसीराम स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन

शिवानी


5 फरवरी 2023, रविवार

आज सप्रू हॉल, अंजुमन रूह-ए-अदब इलाहाबाद में जन संस्कृति मंच, इलाहाबाद द्वारा तुलसीराम व्याख्यानमाला की श्रृंखला का 7वाँ कार्यक्रम ‘प्रतिरोध की संस्कृति और बौद्ध दर्शन’ विषय पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. रामनरेश राम के आधार वक्तव्य से हुई, जिसमें उन्होंने तुलसीराम जी के शब्दों को लेते हुए कहा कि बौद्ध दर्शन भारतीय समाज के लिए प्रेरक को सकता है। आगे अपनी बात रखते हुए रामनरेश कहते हैं कि बौद्ध दर्शन ने भारतीय संस्कृति को प्रतिरोध की संस्कृति में बदला। सांस्कृतिक और राजकीय हमले के इस दौर में प्रतिरोध की इस संस्कृति को याद किए जाने की जरूरत है।

अगले वक्ता डाॅ. रामायन राम ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इस समय में हमारी बहुरंगी विचार प्रणालियों को एक रंग में रंगने की और हिन्दू संस्कृति को मुख्यधारा की संस्कृति बनाने की कोशिश की जा रही है, जबकि हमारा इतिहास कभी भी एकांगी, एकरंगी नहीं रहा है, बल्कि समाज के शुरुआत से ही प्रतिरोध की परंपरा बनी रही है, जिसे याद करना वैचारिक परम्परा की जिम्मेदारी है। बौद्ध दर्शन ने हमें एक वैकल्पिक जीवन दर्शन दिया है। यह एक सचेत, सुचिन्तित व्यवहार में लायी गयी प्रणाली है। बौद्ध दर्शन सनातन संस्कृति को चुनौती देती हुई वैकल्पिक, मानवीय, लोकतान्त्रिक परंपरा के संवाहक के रूप में विकसित जीवन दर्शन है।

डॉ. वंदना चौबे ने अपनी बात रखते हुए कहा कि बुद्ध ने समाज को समझने का वैज्ञानिक तरीका सोचा। उन्होंने कहा कि जब तक उत्पादन के संसाधनों पर हमारी हिस्सेदारी नहीं होगी, हम पितृसत्ता और जातिवाद से नहीं लड़ सकते। बौद्ध दर्शन के विषय में वो कहती हैं कि इसे हमें सांस्कृतिक रूप से विकसित करना होगा।


अगले वक्ता के रूप में सूरज बहादुर थापा ने कहा कि दुनिया में सुधार की बात तो बहुत से दर्शन करते हैं, लेकिन दुनिया को बदलने की बात सबसे पहले बुद्ध ने और फिर मार्क्स ने ही की। फासीवादी ताकतों के खिलाफ़ लड़ने के लिए विपक्षी एकता को बढ़ाना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. राजेन्द्र कुमार जी ने की। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी दर्शन जब धर्म के दायरे में आ जाता है तो विकृत हो जाता है। भारतीय दर्शन परम्परा में भौतिकवादी दर्शन रहा है लेकिन जो भी दर्शन तार्किक मूल्यों को समाहित करते रहे हैं, उन्हें समाप्त करने की कोशिश की जा रही है। अपने इतिहास से सबक लेते हुए, जबकि सत्ता हमारे सामने विकल्पहीनता का दौर ला रही है, उस समय हमें यह सीखना है कि हमारे पास हमेशा से बेहतर विकल्प रहे हैं, जिस पर विचार विमर्श करके उसे विकास के बेहतर मूल्यों के विकल्प के रूप में हमें देखना होगा।

कार्यक्रम के अंत मे आभार ज्ञापन अंशुमान कुशवाहा ने किया। कार्यक्रम का संचालन जनार्दन ने किया। कार्यक्रम के दौरान सैकड़ों की संख्या में विश्वविद्यालय के छात्र, अध्यापक, साहित्यकर्मी, राजनीतिक कार्यकर्ता,अधिवक्ता समेत शहर के बुद्धिजीवी शामिल रहे।

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