Tuesday, May 17, 2022
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‘ किसानों का जज्बा हमें उम्मीद से भर रहा है, ऊर्जावान बना रहा है ’

किसान आंदोलन प्रति एकजुटता व्यक्त करने सिंघु बार्डर पर पहुंचे लेखक- संस्कृतिकर्मी 

“कृषि का मामला तो राज्य सूची में आता है। राज्यों के अधिकार क्षेत्र में मोदी नीत केन्द्र सरकार की दखलंदाज़ी साफ तौर पर ग़ैर कानूनी है। तीनों कृषि बिल असंवैधानिक हैं। इन्हें धोखे से पास कराया गया है। इनको हर हाल में रद्द होना है।”

“अगर ये कानून किसानों के हित में हैं। उनकी माँग पर बनाए गए हैं तो सरकार हमें बताए कि किन किसानों अथवा किसान-संगठनों ने इनकी माँग की थी? ठगी का सरकारी खेल अब नहीं चलेगा।”

“राष्ट्रीय राजमार्ग पर गड्ढे खुदवाना तो दण्डनीय अपराध है। यह कृत्य चाहे असामाजिक तत्व करें या सरकार। ग़ैरकानूनी कार्य हर हाल में दण्डनीय रहेगा। सरकार को इस अपराध के लिए कब दण्डित किया जाएगा?”

“किसानों पर वाटर कैनन चलवाने, कंटीले तारों से रास्ता रुँधने, नेशनल हाइवे को क्षतिग्रस्त करने वाली सरकार क्या तत्काल बर्खास्त नहीं की जानी चाहिए?”

“इसी तरह नोटबंदी की गई थी, जीएसटी लागू हुई थी, धारा तीन सौ सत्तर को रद्द किया गया था, सीएए, एनआरसी को पेश किया गया था, तालाबंदी करके अर्थव्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया गया था। इस सरकार ने देश को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।”

“इस बार मोदी सरकार का पाला किसानों से, पंजाब और हरियाणा के किसानों से पड़ा है। उन्हें अपने मुँह की खानी पड़ेगी। इन जनद्रोही कानूनों को रद्द करना पड़ेगा।”

 

जो किसान अन्न उपजाते हैं, वे विचार भी उपजाते हैं।

प्रतिरोध के टिकाऊ तरीके भी वे निर्मित कर सकते हैं, करते हैं, कर रहे हैं।

संघर्षरत किसानों के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करने के लिए संस्कृतिक-वैचारिक संगठनों – न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, दलित लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ के सदस्य आज 7 दिसंबर को सिंघु बार्डर पहुँचे। इस टीम में अली जावेद, आशुतोष, वंदना, हीरालाल राजस्थानी, बजरंग बिहारी, अनुपम सिंह, हरपाल सिंह भारती, मनोज
प्रवीण, आशीष मिश्र आदि शामिल थे।

संगठनों की तरफ से अली जावेद ने अनवरत चल रही विशाल जनसभा में वक्तव्य दिया और आंदोलन का पुरज़ोर समर्थन करते हुए किसानों की मांगों को सर्वथा उचित बताया। उनका कहना था कि किसान विरोधी, देशविरोधी कानून तत्काल वापस होना चाहिए।

कई किलोमीटर में फैले इस जनसमूह से बाबस्ता होने, उनसे समर्थन में नारे लगाने के लिए हम संगठन सदस्य चलते रहे।
उपस्थित जनसमुदाय का जज्बा हमें उम्मीद से भर रहा था, ऊर्जावान बना रहा था।

ऐसी जागृति ही आरएसएस के फासिस्ट मंसूबों पर रोक लगा सकती है। देश को बर्बाद होने से बचा सकती है। किसानी को कार्पोरेट कब्जे में जाने से।

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