( चित्रकार और कला समीक्षक भुनेश्वर भास्कर का आज दिल्ली में असामयिक निधन हो गया। उनके हृदय का आपरेशन होना था, पर उसके पहले ही अचानक गिर पड़ने से उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया, जिसका आपरेशन हुआ। उनकी स्थिति में सुधार हो रहा था, पर आज सुबह उनकी स्थिति अचानक बिगड़ गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका। भुनेश्वर ने आरा में चित्रकला का माहौल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने कई युवाओं को चित्रकला से जोड़ा। राकेश दिवाकर भी उनमें से एक थे। समकालीन जनमत की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उन पर लिखे हुए लेख को दे रहे हैं। -संपादक )
समकालीन कला मूल रूप से नागर संस्कृति का एक हिस्सा है। एक अरसे बाद गँवई पृष्ठभूमि के कला छात्रों ने जब कला-जगत में अपनी उपस्थिति बनायी तब इस सृजन-संसार में लोक-संस्कृति का प्रतिबिंबन सहज ही स्पष्ट होने लगा। इसके अलावे लोक कला की प्रतिकृति का एक बाजार भी खड़ा हुआ। …बहरहाल हम बात करेंगे चित्रकार व कला-आलोचक भुनेश्वर भास्कर की।
श्री बैजनाथ सिंह और पवित्री देवी की चार संतानों में एक भुनेश्वर भास्कर का जन्म 05 फरवरी 1969 को डेढ़गाँव में हुआ जो कि बिहार राज्य के भोजपुर जिले में अवस्थित है। पारिवारिक पृष्ठभूमि किसान की थी। प्रारंभिक पढाई गाँव में हुई। बचपन से ही कला में अभिरुचि थी। लगभग तेरह वर्ष की आयु से ही गाँव के नाटक से जुड़ाव बन गया। नाटक के लिए पोस्टर बनाना, बैकड्रॉप बनाना, रूप-सज्जा आदि का काम वे खूब सुरुचि से करते। 1984 में जगदयाल सिंह उच्च विद्यालय से मैट्रिक करने के बाद आगे की पढाई के लिए आरा आए। यहाँ कला एवं शिल्प महाविद्यालय में दाखिला लिया। सत्र की अनियमितता और देरी की वजह से 1994 में मगध विश्वविद्यालय से ललित कला में स्नातक की उपाधि हासिल की।

भुनेश्वर भास्कर पूर्ण रूप में कलाकार आदमी हैं। उनके जीवन के हर पक्ष में कलात्मकता देखी जा सकती है। पिछली सदी के अंतिम दशक में बिहार के एक छोटे से शहर आरा शहर से उन्होंने अपने कला जीवन की शुरुआत की थी। यद्यपि इस छोटे से शहर में कला एवं शिल्प महाविद्यालय नाम की एक चीज तो जरूर थी और कुछ कला छात्र भी थे, मगर न कोई कला दीर्घा उस समय थी, न आज है। बावजूद इसके भुनेश्वर भास्कर ने कला छात्रों के साथ मिलकर एक कलात्मक माहौल पैदा कर दिया था।
उनके प्रयास से किसी कला दीर्घा न रहने के बावजूद कला प्रदर्शनी और कला कार्यशाला का एक सिलसिला ही बन गया था। प्रदर्शनी के बाद उस पर रिपोर्ट लिखना भी उन्हीं के जिम्मे रहता था। इस तरह उन्होंने चित्रकारी के साथ-साथ लेखन की भी शुरुआत की। सच पूछिए तो हमने प्रदर्शनी करने व देखने की तमीज उन्हीं से सीखी। वे रहते तो आरा में थे मगर पटना, दिल्ली आते-जाते रहते थे और वहाँ के कलाकारों को आरा से जोड़े रखते थे। कला की प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने दिल्ली की राह पकड़ी। फिलहाल दिल्ली में रहकर स्वतंत्र रूप से चित्रकारी कर रहे हैं, साथ ही कला लेखन भी कर रहे हैं।
आरा में वे जहाँ रहते थे, वहाँ कला छात्रों का एक पूरा समूह रहता था। वह जगह दिन और रात कला को समर्पित था। वहाँ चित्रकार, साहित्यकार, रंगकर्मी, पत्रकार सभी आते, गप्पें करते यानी एक अनौपचारिक कला-विमर्श निरंतर चलता रहता। दूसरी तरफ दसियों कलाकार रोज चित्र बनाते और एक दूसरे को दिखाते। वह अजीब माहौल था। कहा जाए तो आरा शहर के कला इतिहास के लिए वह स्वर्णिम दौर था। जब तक वे इस शहर में रहे यहाँ का बौद्धिक जगत उनके कलात्मक हलचल में शामिल रहा।
भुनेश्वर भास्कर बहुत तेजी से काम करते हैं। शायद इसका कारण यह है कि जलरंग में उन्होंने खूब काम किया है। जलरंग की तो खासियत ही है कि आप जितनी चाहे उतनी तेजी में काम कर सकते हैं। पहले जब वे जलरंग में काम करते थे तो अक्सर एक ही बैठक में दो-दो तीन-तीन पेंटिंग पूरी कर देते थे। एक बैठक में पेंटिंग पूरी कर देने की क्षमता बहुत कम कलाकारों में होती है। इसकी दूसरी वजह यह है कि वे जब भी काम करते है एक जुनून के हवाले हो जाते हैं और जब तक काम पूरा नहीं होता वे उसी में डूबे रहते हैं। वे एक प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। प्रयोगधर्मी रचना के स्तर पर भी और प्रदर्शन के स्तर पर भी। एक बार आरा शहर में उन्होंने शामियाना में प्रदर्शनी की थी। जिसमें पूरे शामियाने को पेंटिंग से सजाया गया था। यह अनोखा प्रयोग शहर के लिए नया तो था ही कौतूहल का विषय भी बन गया था।
बिजूका, कौआ और घड़ा
बिजूका, कौआ और घड़ा से भुनेश्वर भास्कर का गहरा नाता रहा है। ये तीनों बहुत दिनों तक भुनेश्वर भास्कर की कलाकृतियों में विभिन्न रंग रूप में केंद्रीय भूमिका में मौजूद रहे। पिछली सदी में ये तीनों चीजें इस प्रदेश के गँवई क्षेत्र की या कहें लोकजीवन की, लोक संस्कृति की, मामूली मगर जरूरी चीजें थीं। लोक संस्कृति के ये तत्व धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहे थे। विज्ञान, तकनीक व उपयोगितावाद की वर्चस्ववादी सांस्कृतिक हमले से विस्थापित ये तीनों रूपक शायद चित्रकार के अवचेतन की गहराई में कहीं शेल्टर बनाए हुए थे और अपने अस्तित्व बचाने के लिए भावपूर्ण संघर्ष कर रहे थे, जिसका प्रतिबिंबन उनके कैनवास पर होता था और फिर वहाँ से प्रेक्षकों को प्रभावित करता था।

भुनेश्वर भास्कर की खासियत थी कि वे जितनी सक्रियता व तल्लीनता से चित्र बनाने थे उतनी ही सक्रियता और समर्पण से प्रदर्शनी भी करते थे। प्रदर्शनी के अवसर पर वे द्वार की सजावट व प्रचार के लिए, घड़ा, बिजूका, कठघोड़वा, कपड़े की चिड़िया, घोड़े, घड़े, टेराकोटा में बने हाथी आदि ढेर सारी लोक संस्कृति की चीजों का इस्तेमाल करते थे यानि पूरे माहौल को कलामय बना देने का हुनर उनमें स्वाभाविक रूप से विद्यमान था। घड़ा और कठघोड़वा, बिजूका और कौआ, हाथी के रूपाकार आज भी उनके चित्रों में दिख जाते हैं। शायद इन रूपाकारों से उनका जन्म जन्मांतर का नाता है जो रोटी कमाने बाहर चले गए उन कमेरे की स्मृतियों में वह (समकालीन कला जगत में) चला आया है। जब भी कलाकार एकांत पाता है, ये रूपाकार बरबस उसके कैनवास पर छा जाते हैं। इस दौरान उन्हें दर्जनों अकादमिक अवार्ड से नवाजा गया तथा कई अखिल भारतीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्रदान किये गये।
रोटी की राजनीति, कला का तिलिस्म और पलायन की पीड़ा
पढ़ाई पूरी करने के बाद रोटी कमानी होती है। और रोटी तो भाई रोटी है, कोई चाँद थोड़े है कि कमबख्त पंद्रह दिन न भी रहे तो काम चल जाएगा। समकालीन दौर में रोटी कमाना कितना मुश्किल है यह कौन नहीं जानता ! यह कैसी राजनीति है, यह कैसी अर्थनीति है कि रोटी दुर्लभ है ? रोटी कमाना सबसे बड़ा काम है। खैर, अर्थनीति और राजनीति की असफलता के बीच कला का तिलिस्म तो सुभान अल्ला है ही। भारतीय कला बाजार जब अपने पतन की ओर बढ़ रहा था। जनसाधारण की तरह बेबस जनसाधारण के रेले में जनसाधारण पर सवार होकर, अपनी स्मृतियों के साथ भुनेश्वर भास्कर ने राजधानी की राह पकड़ी। वहाँ मिली लोगों की अपार भीड़, रोजी की मारा मारी। मिलीं बड़ी-बड़ी आलिशान कला-दीर्घाएँ और मिले एक से बढ़ कर एक हुनरमंद, इन सबके बीच में अपनी जगह बनाना आसान कहाँ था ! खैर, उसी घातक प्रतियोगिता में इन्होंने भी जोर-आजमाइश शुरू की।
पलायन की यह पीड़ा उनके इधर के चित्रों का केंद्रीय भाव बनी। पलायन का अर्थ है अपनी परंपरा से कट जाना, अपनी संस्कृति से कट जाना, अपनी जड़ से कट जाना। यह बहुत पीड़ादायक स्थिति है। लेकिन यह भी सच है कि आदमी इस स्थिति में अपनी मोटरी-गठरी के साथ ही अपनी स्मृतियों में थोड़ी-सी परंपरा, थोड़ी-सी संस्कृति भी लेकर जाता है। उस नई जगह पर जब भी वह जड़ पकड़ता है, स्मृतियों में सहेजी हुई संस्कृति को, स्मृतियों में सहेजी हुए परंपरा को नए तरीके से विस्तार देता है। आधुनिक कृषि संकट और बेरोजगारी के संकट ने लाखों लोगों को पलायन करने को मजबूर किया है। यह पीड़ादायक स्थिति तो जरूर थी मगर उसने जहाँ भी और जब भी जगह पाई जड़ जमाई, अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति को नया विस्तार दिया, जिसकी अभिव्यक्ति भावपूर्ण रूप में भुनेश्वर भास्कर की कलाकृतियों में होती है। 2012 में बनाई गई उनकी एक चित्र श्रृंखला है- ‘ इन टच वीथ ट्रेडिशन’ (In touch with tradition) ।
इस श्रृंखला के चित्रों में मधुमक्खियों की भाँति अनगिनत छोटी-छोटी आकृतियाँ हैं। विभिन्न रंग-रूप की आकृतियाँ, विभिन्न कामों में मशगूल, जैसे आदमियों का बेतरतीब रेला है। सबके पास विभिन्न तरह का हुनर है। ये संख्या में बहुत हैं, हर जगह भरे हुए, जैसे सारी जगह को घेर लेंगे। गहरी पृष्ठभूमि में संयोजित ये हल्के गहरे रंग की कार्यशील मानव आकृतियाँ, नए तरीके से जीवन की अनुकूल स्थितियाँ सृजित कर रही हैं। शायद श्रमशील समूह का यह जीवन संघर्ष, लोगों को साधारण दृश्य लगे, मगर कलाकार की संवेदनशील नजर इसमें मौजूद सौंदर्य को पकड़ती है और उसे प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त करती है।
यद्यपि भुनेश्वर भास्कर की कला जलरंग में अपनी ऊँचाई पर पहुँचती है मगर ऐक्रेलिक और तैल में भी उनकी दक्षता असाधारण है। शायद यह इसलिए है क्योंकि वे काम खूब करते हैं और हमारे यहाँ एक बड़े कवि ने कहा है कि ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’। भुनेश्वर भास्कर ने यह दक्षता अपने अभ्यास और मेहनत से हासिल की है।
कला-लेखन और कलाकार
भुनेश्वर भास्कर ने लेखन की शुरुआत रिपोर्टिंग से की। दरअसल छात्र जीवन के दौरान जब वे कला प्रदर्शनियाँ करते थे, समाचार पत्रों में कला पर रिपोर्ट लिखने वाला कोई न था। पत्रकारों का आग्रह होता था कि प्रदर्शनियों की रिपोर्टिंग (प्रेस विज्ञप्ति) दे दिया कीजिए। तत्कालीन स्थानीय कलाकारों में लिखने या बोलने की क्षमता लगभग नहीं थी। तो यह काम भुनेश्वर भास्कर के जिम्मे आन पड़ा। उस समय अखबारों में कला-संस्कृति का एक पेज भी हुआ करता था। रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी भी भुनेश्वर भास्कर को ही मिली। इस तरह जरूरत के अनुसार उनके लेखन की शुरुआत हुई। अखबारी रिपोर्टिंग से यह सिलसिला पत्रिका की रिपोर्टिंग तक गई। फिर साक्षात्कार और आलेख लिखने की शुरुआत हुई और इस तरह भुनेश्वर भास्कर कलाकार के साथ ही कला-आलोचक भी बने। हालाँकि यह साधारण नहीं था। यहाँ तक के सफर के लिए बहुत कठिन अभ्यास करना पड़ा। वर्तनी, व्याकरण और न जाने क्या क्या ठीक करना पड़ा और इसमें स्थानीय साहित्यकारों और पत्रकारों ने बहुत सहयोग किया।

आज कला पर उनकी कई पुस्तकें हैं जो प्रतिष्ठित प्रकाशनों से छप कर आई हैं। कला के अलावा भोजपुरी लोककला और लोकखेल पर भी उनकी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।
नाटक और प्रदर्शन
बचपन से ही चित्रकार भुनेश्वर भास्कर की गहरी रुचि नाटक में रही है। अपने गाँव की नाटक मंडली के साथ वे लगभग तेरह वर्ष की अवस्था में ही जुड़ गये थे। गाँव में उन्होंने ‘अभागा कर्ण’, ‘टीपू सुल्तान’, ‘हम तोहरा के टिकब’, ‘सस्ता खून, महंगा पानी’ आदि नाटक किए। यह रुचि कालांतर में भी बनी रही। जब कला अध्ययन के लिए वे आरा आए, तो यहाँ भी उन्होंने विभिन्न नाट्य टीमों के साथ जुड़ कर अभिनय, मंच-सज्जा, रूप सज्जा व वेशभूषा का काम किया। इधर उन्होंने बाढ़ से विस्थापित हुए मल्लाह की पीड़ा की बहुत प्रभावशाली परफॉर्मेंस का वीडियो तैयार किया है, जो देखने लायक है।
चित्रकार भुनेश्वर भास्कर ने आरा जैसी बहुत छोटी-सी जगह से उठ कर, आधुनिक समय की तमाम जटिलताओं को झेलते हुए समकालीन कला के तिलिस्म को तोड़ कर वहाँ अपनी जगह बनाने की कोशिश की है , जो वास्तव में बड़ी उपलब्धि है। उनका जीवन छोटे शहर और छोटी जगह में पढ़ने वाले तमाम कला छात्रों के लिए उत्प्रेरक है।






