माया सिंह
(हम क्रांतिकारियों की छवि प्रायः लार्जर दैन लाइफ बना देते हैं। उनकी जिंदगी के छोटे-छोटे प्रसंगों, उनकी कमजोरियों या उनके बहुत सारे सहयोगियों के बारे में कम अवगत होते हैं। भोजपुर आंदोलन के संस्थापक कॉ. जगदीश मास्टर साहब की जयंती और शहादत दिवस 10 दिसंबर के मौके पर हम उनके छोटे भाई की पत्नी माया सिंह की यादों को साझा कर रहे हैं, जिसे कवि आरपी वर्मा ने जनमत को उपलब्ध कराया है। माया सिंह बोकारो में रहती हैं। उनकी यादों की लहरों के बीच कई तथ्य संकेतन ही रह गए हैं या दो पंक्तियों के बीच की खाली जगह में मौजूद हैं। बेशक यह राजनीतिक दृष्टि से लिखा गया संस्मरण नहीं है, परंतु इसकी खासियत है कि यह भोजपुर की क्रांतिकारी वामपंथी राजनीति के व्यावहारिक पहलू को समझने में मददगार है– संपादक)
लीला महतो के वंश की चौथी पीढ़ी में एक बालक का जन्म हुआ। स्वयंबर महतो उसके दादा थे और सुदामा महतो पिता। उसका नाम जगदीश रखा गया। नाम के अनुरूप वे ही बड़ा होकर गरीबों, दलितों तथा सताये हुए लोगों के लिए मसीहा बने।
जगदीश का बचपन बहुत ही अच्छे ढंग से बीता। बचपन में ही मां को खो देने के बावजूद उनकी परवरिश बहुत अच्छी तरह से हुई। वे मध्यम किसान परिवार में जन्मे, लेकिन सम्मिलात (संयुक्त) परिवार में रहने पर उन्हें किसी तरह के अभाव का सामना नहीं करना पड़ा। दादाओं के वे लाड़ले थे। घर में पहले पोता के आने से सभी खुश थे।
उन्होंने बहुत अच्छे नंबरों से मैट्रिक की परीक्षा पास की और साइंस कॉलेज, पटना से इंटर किया। उसके बाद राजेंद्र कॉलेज, छपरा से बी.एससी. पास किया। बाद में औरंगाबाद के अम्बा स्कूल में मैथ के टीचर की नौकरी की। उस समय तक उनका जीवन अच्छी तरह से चल रहा था पर समाज की कुरीतियां, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब में भेदभाव उन्हें हमेशा अंदर से कचोटते रहते थे। किसी पर अत्याचार होते देखकर उनका खून खौल उठता था। लेकिन वे अकेले अपने मन में जूझते रहते थे।
1954 में 10 जून को उनकी शादी हुई थी। वे पत्नी कमलेश्वरी देवी के साथ सुखमय जीवन बीता रहे थे। 1966 में उनके घर में तीन बेटियों के बाद एक पुत्र हुआ। उस समय तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि 1967 की एक घटना ने उथल-पुथल मचा दिया। (जगदीश मास्टर उस विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार का. रामनरेश राम के चुनाव एजेंट थे। उन्होंने सामंतों द्वारा किये जाने वाली फर्जी वोटिंग का विरोध किया, तब उन पर उन लोगों ने जानलेवा हमला किया– संपादक) घर के लोग लगभग मरणावस्था में उन्हें आरा ले गये। अथक प्रयास के बाद उनकी जान बच गयी। उन्होंने जैन स्कूल, आरा में मैथ टीचर के रूप में नौकरी कर ली। स्कूल और घर में ट्यूशन भी करने लगे। लेकिन समाज को बदलने और कुरीतियों को दूर करने के संबंध में हमेशा सोचते रहते थे। पढ़ाते भी और लोगों से मिलकर उन्हें सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित भी करते।
उन्होंने बदलाव की शुरुआत अपने घर से ही करने की ठानी। मैं इसका पहला जरिया बनी। जब मैं 15 साल की थी, तब पश्चिम बंगाल के बर्णपुर में रहती थी। स्कूल की फाइनल परीक्षा देकर अपने गांव आयी हुई थी। वह 1968 का साल था। मास्टर साहब ने मुझे देखा और अपने भाई से शादी के लिए पसंद कर लिया। वे बिना तिलक-दहेज और रीति-रिवाज के शादी के पक्ष में थे। लग्न नहीं रहने के कारण दोनों पक्ष उस समय शादी के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने मेरे पिता जी को समझा-बुझाकर राजी कर लिया। सिर्फ चार-पांच रिश्तेदार मुझे लेकर नवादा स्थित चतुरी साव के घर गये थे। उनमें मास्टर साहब और परिवार के कुछ लोग भी थे। इस तरह शादी के पहले ही मैं ससुराल एकवारी चली गई और उसी दिन यानी 6 जून 1968 को मेरी शादी जयमाल विधि से कर दी गयी। मैं उनके घर की बहू बन गयी। वे मेरे जेठ हो गये।
धीरे-धीरे परिवार और गांव के लोग मुझे अपनाने लगे। मास्टर साहब अपनी बात मनवाने में कितना माहिर थे, यह इसका उदाहरण है। एकवारी से मैं अपने मायके चली गयी। 1969 के मार्च में दीदी कमलेश्वरी देवी से मिलने नवादा गयी। उस समय वहां की स्थिति देखकर बहुत दुखी हुई। दीदी के फेफड़ा में पानी हो गया था और पटना के डॉ. घोषाल से इलाज चल रहा था। वे काफी कमजोर लग रही थीं। दोनों देवर जो वहां रहते थे और पढ़ाई करते थे, एकवारी चले गए। उनका बड़ा बेटा अशोक भी उन्हीं लोगों के साथ गांव चला गया। यहां सिर्फ बड़ी बेटी उर्मिला और छोटा बेटा अनिल रह गया था। वे भी नीचे के कमरे में रहते थे। दीदी और बच्चे की देखभाल उनकी मां करती थी। दीदी का मायका कुछ दूरी पर ही था। डॉक्टर से दिखाने के लिए मेरे पति ही ले जाया करते थे। घर में कुछ खाने-पीने का सामान भी नहीं था। शायद मायके से ही आता था। वैसे मास्टर साहब उनकी देखभाल और खान-पान में कोई कमी नहीं करते थे। डॉक्टर जैसा कहते थे, वैसा ही खाना-पीना देते थे। मेरे पति वहीं किसी स्कूल में पढ़ाने लगे थे। वे भी शुक्रवार से रविवार तक मेरे मायके में रहने लगे।
फिर मैंने सुना कि मास्टर साहब ने नौकरी छोड़ दी और सबको एकवारी पहुंचा दिया। उसके बाद वे पार्टी के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो गये। 1969 के दिसंबर में मैं जब एकवारी गई, तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। सारा परिवार एक साथ था। दीदी की तबीयत तो खराब रहती ही थी। लेकिन मुझे बच्चों के साथ रहकर बहुत खुशी होती थी। दोनों देवर और एक भगीना, जो मेरी ही उम्र के थे, वहीं रहते थे। मेरे पति भी वहीं आकर रहने लगे। सबके साथ रहने पर मुझे बहुत खुशी महसूस होती थी।
मास्टर साहब कभी आते, तो हम तीनों को तीर-धनुष चलाना सिखाते थे। फिर दो-तीन दिनों के बाद चले जाते। यह सिलसिला चलता रहा। गांव में बदलाव की बयार बहने लगी। जब टोले में कभी मीटिंग होती थी, तो उसमें औरतों की संख्या ज्यादा होती थी। मास्टर साहब दूसरे गांव-जवार में भी मीटिंग करते। उनका काफिला धीरे-घीरे विस्तार पाने लगा। लोग भी जागरूक होने लगे। गांव-जवार में उनकी तूती बोलने लगी। अब वे रात में ही आते और खाना खाने के बाद अपने साथियों के साथ चले जाते।
भोजपुर का अधिकांश एरिया अंदर-अंदर ही सुलग रहा था। यह सब देख-सुनकर दबंगों को बर्दाश्त नहीं हो रहा था। वे सब मास्टर साहब को पकड़ने की कोशिश करते रहते, पर वे उनके हाथ नहीं लग रहे थे। मास्टर साहब अपनी पुरानी पहचान मिटा चुके थे। अब दबंगों की नजर घर में रहने वाले लोगों पर थी। वे पुलिस को लेकर साथ आते। कुछ तोड़-फोड़ करते और चेतावनी देकर चले जाते। बाबू जी जो घर के मुखिया थे, उन पर ज्यादा बोझ पड़ने लगा। जब मैं वहां थी उस समय पंद्रह सदस्य थे, जो घर में रहते थे। खाना-पीना से लेकर दवा-दारू, कपड़ा-लत्ता तक सारा बोझ उन्हीं लोगों पर था। वह भी सिर्फ खेती से करना था। वे लोग नाराज भी होते थे। उन लोगों का गुस्सा भी जायज था, लेकिन कुछ बोल नहीं पाते थे। मेरे पति को बाहर जाकर नौकरी करने-ढूँढ़ने के लिए कहा जाने लगा। मैं अपनी सास के साथ घर के कामों में ही उलझकर रह गई। फिर भी मैं मार्क्स-लेनिन की लिखी हुई किताबें पढ़ती थीं। दीदी को जब छोटी बेटी हुई, उसके बाद काम का बोझ और बढ़ गया। चारों बच्चों को संभालना, खाना बनाना, खिलाना मेरी दिनचर्या हो गई।
मैं जब से इस घर में आई, दीदी को बीमार ही देखा या गर्भवती ही पाया। कभी उन पर तरस भी आता और गुस्सा भी। मास्टर साहब द्वारा दिए गए काम में उनकी रुचि नहीं रहती थी। मेरे पति नौकरी की तलाश में जगह-जगह भटकने लगे थे। गांव की स्थिति बहुत ही खराब रहने लगी थी। ऐसी स्थिति देख बाबू जी ने मार्च 1971 में मुझे अपने मायके भेज दिया। मैंने सुना कि मास्टर साहब अंडर ग्राउंड हो गए हैं। कभी कभी वे साधु जी (रामेश्वर अहीर) के साथ मेरे मायके आते और मुझे लाल किताब या मार्क्स-लेनिन की लिखी हुई किताबें दे जाते। एक बार उन्होंने राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ दी। वह मुझे काफी अच्छी लगी। चीन के माओत्से तुंग और चाउ एन लाई के बारे में पढ़ने को मिला।
मास्टर साहब एक बार बीमार पड़ने पर साधु जी के साथ मेरे घर आए। साधु जी तो सुबह चले गए, लेकिन वे पंद्रह-बीस दिन वहीं रुके। वे एक रूम में बंद रहते, खाते-पीते और दवा भी लेते, जिसे मैं गांव के डॉक्टर से पूछकर लाती थी। इस दौरान मैं उनके बारे में अधिक जानने लगी। उन्हें खाने में आग में सिंकी हुई लिट्टी और जमा दही बहुत अच्छा लगता था। जब भी वे आते मेरी मां उनकी पसंद का खाना जरूर बनाती। बातों-बातों में उन्होंने एक दिन बताया कि वे दलित परिवार के घर में रात में रुके थे। खाना में उन्हें चूहे की सब्जी और चावल मिला। जो उनसे न खाते बन रहा था न मना करते। किसी तरह रसा के साथ उन्होंने चावल खा लिया। लेकिन उनलोगों को इसका आभास भी नहीं होने दिया। वैसे वे खाने के मामले में ज्यादा शौकीन नहीं थे। जो मिल जाता खा लेते थे। बहुत नाप-तौलकर ही खाते थे। वे बचपन से ही पेट के मरीज थे। शरीर भी दुबला-पतला था, लंबाई पांच फीट दो ईंच ही थी। लेकिन उनमें काम करने की क्षमता बहुत अधिक थी। कहां से आ रहे हैं, यह तो वे बताते थे, लेकिन कहां जा रहे हैं यह पूछने से मना करते थे। वे अनुशासनप्रिय थे और दूसरों से ऐसा ही चाहते थे। इस तरह समय धीरे-घीरे बीतता रहा। फिर ऐसा हुआ कि तीन-चार माह सिर्फ साधु जी आते और रात में चले जाते। मैं मास्टर साहब के बारे में पूछती तो कहते कि वे दूसरे कामों में फंसे हुए हैं। तुम्हारे लिए कुछ किताबें दी है। वैसे साधु जी अपने डील-डौल से मुझे कुछ-कुछ डरावना लगते थे, लेकिन उनका व्यवहार बहुत अच्छा था। उनकी आवाज बहुत रोबीली औैर जोश से भरी हुई होती थी। मुझे सचमुच वे कद्दावर नेता लगते थे।
बाद में मुझे पता चला कि मास्टर साहब के पैर में गोली लगी थी। कोई भी डॉक्टर भय के कारण उनका इलाज करना नहीं चाहता था। साधुजी उनके पैर में पट्टी बांधकर किसी तरह मेरे पिताजी के पास बर्णपुर ले गए। पिताजी बर्णपुर हॉस्पीटल में मेन नर्स के रूप में काम करते थे। उनका ज्यादातर काम आपरेशन थियेटर में ही होता था। वे मास्टर साहब का घर में ही इलाज करने लगे। क्वार्टर में रहने के कारण वहां किसी को कोई शक भी नहीं हुआ। दो महीने में वे ठीक हो गए और फिर मेरे घर उनका आना-जाना होने लगा। उसी समय वे मुझे बंदूक चलाना सिखाने लगे। उसमें ज्यादा सहयोग साधुजी का ही रहता था। मैं भी पार्टी की सदस्य जैसा होती जा रही थी। मास्टर साहब ने मुझे ‘लता’ नाम दिया था।
एकवारी में हमारे घर-परिवार पर तरह-तरह के अत्याचार होने लगे थे। छोटे बाबूजी, मंझले बाबूजी, देवर रोहित और चचेरे देवर कामेश्वर को जेल में डाल दिया गया। डुगडुगी बजाकर खेती पर रोक लगा दी गई। किसी को हमारे घर में काम या खेती करने नहीं दिया जा रहा था। एकवारी में सिर्फ बड़े ससुर, मेरी सास, दीदी, छोटे देवर वासुदेव, एक भगीना और पाँच बच्चे ही रह गए थे। देवर और भगीना आठवी-नौंवी में पढ़ते थे। लेकिन किसी ने हार नहीं मानी।
1972 में मेरे पति की नौकरी बोकारो में हो गई। बाबूजी लोग जेल में थे। मैं भी अपने पति के साथ उनसे मिलने के लिए आरा जेल गयी थी। पति सबके बेल के लिए ही बोकारो से मेरे मायके आए थे। नई नौकरी थी। बारह हजार रुपये का इंतजाम करना कठिन लग रहा था। लेकिन किसी तरह सबका बेल हो गया, केस लंबे समय तक चला।

इस बीच मेरी तबीयत खराब रहने लगी। मेरे पूरे शरीर में सूजन हो गया। कुछ अंदरूनी दिक्कत थी। मैं जून 1972 में अपने भैया के साथ बर्णपुर चली आई। वहां मुझे ऑपरेशन करवाना पड़ा। ऑपरेशन थियेटर में अपने बाबूजी को देखकर मैं नर्वस हो गई। बाबूजी उस समय बेहोश करने वाले एनेस्थेटिस्ट हो गए थे। ऑपरेशन के बाद दवा-सूई चला और मैं कुछ ठीक हो गई। मेरे पति बर्णपुर आए और 26 नवंबर 1972 को मुझे बोकारो ले गए। मास्टर साहब जब 10 दिसंबर 1972 को शहीद हुए तब मैं बोकारो में थी। मेरे पति को गहरा सदमा लगा और मैं भी अंदर से हिल गई। 1973 में साधुजी मुझसे मिलने आए थे। उनके साथ डॉ. निर्मल, कर्ण तथा चार-पांच और व्यक्ति भी थे। उन्होंने बताया कि उस दिन मास्टर साहब उनसे भी चलने के लिए कह रहे थे। लेकिन माहौल गर्म था। इसलिए उन्होंने उनको मना किया। लेकिन वे अकेले ही चले गए और वह अनहोनी हो गई। (मास्टर साहब के साथ का. रामायण राम भी थे। आयर के एक क्रूर और ऐय्यास सामंत थाना सिंह के सफाए के बाद वहाँ से निकलते वक्त वे लोग बिहिया में मह्थीन माई के मंदिर के पास शहीद हुए थे- सं.)
मास्टर साहब अपना कार्य करके जा चुके थे। मैं जिनको जानती थी, वे लोग धीरे-धीरे चले गए। उनके स्थान पर नये लोग आते गए। मास्टर साहब ने जो अभियान शुरू किया था, वह अपने चरम पर पहुंच गया। मास्टर साहब की शहादत के बाद गांव के दबंगों ने एक दिन हमारे घर पर धावा बोल दिया। उनके पास बंदूक और अन्य हथियार थे। लेकिन घर और टोले के लोग सचेत थे। जवाबी कार्रवाई की गई। चार-पांच हमलावर बुरी तरह जख्मी हो गए। उसके बाद उनलोगों ने कभी चढ़ाई नहीं की। टोले में नौजवान रात भर जगकर पहरा देते और किसी भी अनहोनी से मुकाबले के लिए तैयार रहते। एक बार खलिहान के पास किसी के घर में मीटिंग चल रही थी, तो किसी ने पुलिस को खबर कर दी। दोनों तरफ से गोलियां चलीं। लेकिन मीटिंग करने वाले बच नहीं पाए। शहीद होने वालों में दो औरतें भी थीं। एकवारी गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था। लेकिन पार्टी का काम रुका नहीं था। वह जोरो-शोर से चल रहा था। उनमें से कर्ण जिन्हें मैं अच्छी तरह जानती थी। वे अंबा के रहने वाले थे। औजार सप्लाई वही करते थे।
मास्टर साहब जो ज्योति जलाकर गए, वह दिनो-दिन तेज होती गई। हालांकि मुश्किलें भी थीं। गांव में बाहर से कोई आ जा नहीं रहा था। लोग अपनी बेटियों की शादी एकवारी गांव में करना नहीं चाह रहे थे। लेकिन धीरे-धीरे समय ने करवट बदला। दिन-महीना-साल बीतते गए। मैंने अपनी इच्छा और सपनों को मास्टर साहब के परिवार पर न्यौछावर कर दिया। मास्टर साहब के पाँचों बच्चों की शिक्षा पूरी हो गई। बेटे-बेटियों की शादी हो गई। वे सब अपनी जिंदगी में खुश हैं। लेकिन मास्टर साहब जैसा कोई नहीं हुआ।
अब मैं बहत्तर साल की हो गई हूं। इस उमर में अब न कोई इच्छा बची है न शौक। मैंने अपने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे। अब थक चुकी हूं। मुझे लगता है कि मैंने अपना फर्ज काफी अच्छी तरह से निभाया। मेरी तीन बेटियां भी अच्छी तरह सेटल हो गई हैं। मैं सबके लिए खुश हूं। लेकिन जीवन की इस संध्या-बेला मे बहुत अकेलापन लगता है। शायद इसी को जिंदगी कहते हैं। मास्टर साहब पर लिखने के लिए बहुत सारी खट्टी-मीठी यादें हैं। पर अब बस यहीं अंत कर रही हूं।

