समकालीन जनमत
चित्रकला

संजीव सिन्हा के चित्रों में लोक का जीवन संघर्ष और कला

कलाकार अपने समकाल से जुडा़ हुआ एक संवेदनशील , स्वप्नदर्शी , कल्पनाशील महत्वकांक्षी प्राणी होता है | वह अपने आस पास की चीजों , घटनाओं और परिस्थितियों को गौर से देखता , समझता व उससे प्रभावित होता है | उसमें से जो चीजें , घटनाएं व परिस्थितियां उसे गहराई से प्रभावित करती हैं उसकी अभिव्यक्ति उसकी कलाकृतियों में होती है | मतलब यह कि दृश्यगत चीजें या घटित घटनाएं या विभिन्न परिस्थितियां कलाकार के संवेदनशील मस्तिष्क में एक भावानुभूति ( हर्ष ,शोक, विषाद आदि ) जाग्रत करती हैं | इस भावानुभूति को वह कलाकृतियों में व्यक्त करता है |

इसके अलावे उसकी कलाकृतियों में अपने समकाल की स्वप्निल कल्पनाशीलता , महत्वकांक्षी उत्कंठा और घोर विवशता भी व्यक्त होती है | कलाकार विभिन्न सृजन माध्यम में इसे व्यक्त करता है | व्यक्त करने के साथ ही वह दुःखद स्थितियों के बदलाव का आकांक्षी भी होता है तथा मौजूद सुखद स्थितियों पर आसक्त भी होता है | वह दुनियां के सौन्दर्य को भी चित्रित करता है और उसके विद्रुपता को भी एक्सपोज करता है | संजीव सिन्हा के रचनाक्रम में इसे देखना समीचीन होगा |

 

संजीव सिन्हा का जन्म 19-10-1982 में बिहार राज्य के भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा में हुआ था | पिता विजय कुमार सिन्हा बाजार समिति में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी व माता मालती सिन्हा गृहणी थी | तीन भाई में संजीव बीच में थे | उनकी पढाई लिखाई आरा में ही हुई | बचपन से ही कला में गहरी रुचि थी जो समय के साथ बढ़ती गई | माध्यमिक तक शिक्षा हासिल करने के बाद कला महाविद्यालय में प्रवेश के साथ उन्होंने कला जगत में बकायदे कदम रखा | महाविद्यालय में प्रवेश के बाद उन्होंने शहर में सक्रिय तमाम कलाकारों के साथ जीवंत संबंध विकसित किया |

संजीव में सीखने की गजब उत्कंठा थी | वे किसी से भी कुछ सिखने की कोशिश कर रहे थे | सभी कार्यक्रमों में भाग ले रहे थे | उस दौर में शहर में मुख्यतः दो कला समुह सक्रिये था , फ्रीलांस और कला कम्यून | संजीव ने दोनों समुह के साथ गंभीरता से काम किया | स्थानीय स्तर की कला गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ साथ उन्होने अनेक अखिल भारतीय व राज्य स्तरीय प्रतिष्ठित कला प्रदर्शनियों व कला कार्यशालाओं में भागीदारी की | अपने सराहनीय कलाकृतियों के लिए अनेक सम्मान व पुरस्कार अर्जित किया |

निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले कलाकारों के साथ जैसा कि अक्सर होता है संजीव पर भी कम ही उम्र से आर्थिक दबाव बढ़ता गया | रोजमर्रे की चुनौतियों के साथ उन्होंने कला की चुनौतियों का साहसपुर्ण तरीके से सामना किया | फिलहाल संजीव कला अध्यापन के साथ साथ कला समुह कला कम्यून , सर्जना ट्रस्ट के साथ जुड़ कर , फोटोग्राफी और भोजपुरी लोक चित्रकला में नये तरीके से काम कर रहे हैं | भोजपुरी लोक कला को समर्पित पत्रिका आखर से भी वे जुडे़ हुए हैं |

मामूली दृश्यों में मौजूद गैरमामूली तत्व

छायाचित्रण दृश्य कला का एक सशक्त माध्यम है | कैमरे के आविष्कार ने दृश्य कला जगत में अमूल चूल परिवर्तन ला दिया | जिसके परिणाम स्वरूप चित्रकला में कई बदलाव हुए | हलाकि शुरुआत में कई तरह की आशंकाए उठी मगर बाद में बहुत से चित्रकारों ने छायाचित्रण को एक औजार बना लिया | समकालीन दौर में कई चित्रकार छायाचित्रण भी करते हैं | चित्रकार संजीव सिन्हा भी एक अच्छे फोटोग्राफर हैं | संजीव सिन्हा के छाया चित्र मामूली दृश्यों में मौजूद गैरमामूली तत्व से दर्शकों का साक्षात्कार कराते है | मामूली से दिखने वाले दृश्य में मौजूद विशेषता जब एक्सपोज होती है वह कला बन जाती है |

हमारे आस पास रोज ऐसे हजार दृश्य उपस्थित होते हैं जिस पर गौर किया जाना चाहिए | जैसा कि मशहुर अमेरिकी लेखिका व चिंतक हेलेन एडम्स केलर ने कहा है कि ” लोग देख कर भी नहीं देखते ” | आदमी देखता सुनता तो है , गौर नहीं करता | जब कोई फोटोग्राफर उसे क्लिक करता है तो उस दृश्य की खासियत हमें आश्चर्यचकित कर देती है |

संजीव अपने फोटोग्राफी के लिए ऐसे ही किसी मामूली दृश्य को चुनते हैं | किसी दृश्य के टूकडे़ की अर्थपूर्ण खासियत को एक्सपोज करना मामूली बात नहीं होता | वह अनयास ही प्रकट होता है और जल्दी हीं लुप्त हो जाता है | खास अवसर पर ( छाया प्रकाश , भाव भंगिमा की खास उपस्थिति ) दृश्य को खास एंगल से क्लिक करना बहुत मेहनत का काम है | जिसे संजीव बहुत कुशलता से अंजाम देते हैं | जैसे ” किसी गरीब और भूखे बच्चे के लिए एक केला भी कितना तृप्ति दायक हो सकता है यह उनके एक छायाचित्रण में देखा जा सकता है |

बच्चे की आकृति में मौजूद भाव भंगिमा से केले का स्वाद और बच्चे द्वारा पायी गयी तृप्ति छाया चित्र में इस करीने से उभर आई है कि यह भाव दर्शकों तक सहज ही पहुँच जाती है | संजीव अपने छायाचित्रण में तकनीकी प्रयोग किसी चमत्कार के लिए नहीं बल्कि भाव की सम्प्रेषणीयता के लिए करते हैं |
लोक कला के लोकतत्व और समकाल

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हर क्षेत्र के कलाकार को अपने क्षेत्र की लोक कला विशेष प्रिय होती है | संजीव सिन्हा को भी भोजपुरी लोक चित्रकला से विशेष प्रेम है | भोजपुरी चित्रण में प्रमुखतः पिडि़या और कोहबर चित्रण की परम्परा रही है | एक भाई के सलामती के लिए एक विशेष पर्व के अवसर पर दिवाल पर बनाया जाता रहा है तथा दूसरा विवाह के अवसर पर | ये दोनों खास अवसर पर ही महिलाओं के द्वारा बनाए जाते रहे हैं | हमारे यहां की लोक कलाएं मूलतः कृषि संस्कृति से उपजी हुई हैं | जिसमें मिट्टी गोबर वनस्पतियां आदि प्रमुख कला सामग्री के रुप में प्रयुक्त होती है |

राजनीतिक आर्थिक बदलाव के परिणाम स्वरूप धिरे धिरे खेती किसानी से लोक का मोह भंग होता गया | पेशा के रुप में लोग दूसरे विकल्प अपनाने लगे | मिट्टी गोबर से दूर होते जीवन में मिट्टी गोबर से जन्मी कला से गोबर मिट्टी भी दूर होने लगे | यानि लोक जीवन में आए बदलाव के साथ कला ने भी अपने को बदला और कालांतर में यह दीवार के साथ ही कागज पर भी उकेरी जाने लगी | (चावल पीस कर ) ऐपन , हल्दी ,सेम के पत्ते , सिंदुर आदि की जगह कृत्रिम रंग , कपड़े और बांस , कंडे आदि की जगह तुलिका का इस्तेमाल होने लगा | साथ ही तत्कालीन सुख दुख उपासना आस्था की जगह समकालीन दुःख,दर्द,  उत्सव उपासना आस्था विषय बनने लगे |

 

सत्ता संस्कृति या बाजारवादी संस्कृति की कोशिश रहती है कि लोक कलाओं में कला सामग्री तो समकालीन इस्तेमाल हो लेकिन विषय वस्तु तत्कालीन रहे यानि पारम्परिक व रुढी़वादी रहे | इसे साफ शब्दों में कहें तो सत्ता संस्कृति व बाजारवादी संस्कृति लोक कलाओं को लोक जीवन से काट कर ‘ लकीर की फकीर ‘ बना देना चाहती हैं | चुकि लोक संस्कृति , सत्ता संस्कृति के सामानांतर ही नहीं खडी़ होती वरन उसे चुनौति भी देती है | सो सत्ता संस्कृति की यह जोरदार कोशिश रहती है कि लोक संस्कृति को ( शास्त्रीयता , परंपरा , रुढी़ की बेडि़यों में जकड़ कर ) दरबारी संस्कृति बना दिया जाए |

संजीव सिन्हा विनम्रता से इसे खारिज कर देते हैं | उनका लोक चित्रण , समकालिन लोक जीवन से गहराई से जुड़ता है | जिसमें समकालीन लोक जीवन के दुख सुख उत्सव शोक , स्वप्न चित्रित होते हैं | भोजपुरी शैली को वे पिडि़या कोहबर के अलावे होली दशहरा दिवाली छठ सकरात से भी जोड़ते हैं | रोपनी , कटनी , पीटनी के साथ मजदूरी और संघर्ष से भी जोड़ते हैं |

कोरोना काल में लोक जीवन भारी त्रासदी के दौर से गुजर रहा है | संजीव सिन्हा के चित्रों में एक तरफ कोरोना से बचाव में लगे लोगों ( स्वास्थ्य कर्मी , पुलिस व सहयोग में लगे सामाजिक कार्यकर्ता ) के लिए सम्मान है तो कोरोना से बचाव के उपाय भी हैं | संचार तंत्र के चरम विकास के इस युग में भी बेसहारे बेचारे व मजबूर बना दिए गये राजपथ पर पैदल घीसट रहे मजदूरों के लाचारी भूख मुफलीसी दुःख दर्द दमन की हर कथा भी संजीव के चित्रों में तफ्सील से दर्ज होती है | लोक कलाओं की जीवंतता लोक जीवन से जुड़ कर ही कायम रह सकती है | संजीव सिन्हा का लोकचित्रण इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है |

 

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चूँकि लोक कलाकार पेशेवर नहीं होते , वे विधिवत प्रशिक्षित नहीं होते इसलिए उनकी कला में एक स्वाभाविक अनगढ़ता होती है | इसके साथ सरल तरीके से मेहनत मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं सो उनकी कला में इस अनगढ़ता के साथ सरलता व सहजता आती है | पेशेवर कलाकार चुकि विधिवत प्रशिक्षित होता है , उसका जीवन संघर्ष जटिल होता है , उसके चित्र में एकदम स्वाभाविक रुप से दक्षता व जटिलता आ ही जाते हैं | तकनीकि स्तर पर संजीव सिन्हा ने इसे तोड़ने का प्रयास जरुर किया है लेकिन कला तो भीगी जमीन है पांव के निशान आ ही जाते हैं |

वैसे आज के दौर में लोक जीवन का परिष्कार भी हुआ है और उसके जीवन संघर्ष भी जटिल हुए हैं सो उसके चित्रण में अब दक्षता व जटिलता का आना लाजिमी भी है | बहरहाल संजीव सिन्हा के लोकचित्रण की सबसे बड़ी पूंजी उसकी जीवंतता है | जो कि लोक जीवन के सुख दुख से करीबी रिश्ते का परिणाम है | संजीव सिन्हा का यह प्रयास लोक चित्रण को समकालीन आयाम देने वाला है | लोक जीवन की समकालीनता से जुड़ कर ही लोक कला की धारा अपनी जीवंतता कायम रख सकती है |

आज की राजनीतिक आर्थिक परिघटनाएं , लोक जीवन को प्रभावित करती है | संजीव सिन्हा इसके मुक दृष्टा बन कर नहीं रहते | उनकी रचनाशीलता श्रमशील लोक जीवन के साथ खडी़ होती है | श्रमशील लोक जीवन के संघर्ष से यह दुनिया खुबसूरत बनती है | चाहे बहुमंजिली इमारत हो या दैत्याकार मशीनें या फिर यह आधुनिक लोकतंत्र , स्वतंत्रता व बंधुता व समता के सपने , श्रमशील लोक के श्रम व संघर्ष के वगैर कबाड़ ही ठहरेंगे |

संजीव सिन्हा की सौन्दर्य दृष्टि में इस श्रमशील लोक के श्रम और संघर्ष की महत्वपूर्ण भुमिका है | नारी आकृतियां लगभग ढेर सारे कलाकारों की कलाकृतियों में महत्वपूर्ण होती हैं | संजीव सिन्हा की कलाकृतियों में भी नारी आकृतियां प्रमुखता से चित्रित हैं | एक दौर में संजीव सिन्हा ने कॉल गर्ल के जीवन संघर्ष पर एक भावपूर्ण श्रृंखला बनाई है | आधी आबादी की हैसियत आज भी हासिए पर ही है | हलाकि अपने निरंतर संघर्ष के साथ नारी मुख्यधारा में अपना स्थान बनाती जा रही है | संजीव के चित्रों में इसी तरह की संघर्षशील नारी आकृतियां प्रमुखता पाती हैं |

जहां तक चित्रण माध्यम की बात है संजीव सिन्हा जल रंग ऐक्रेलिक आयल मिक्स मिडिया व पोस्टर कलर का समान रुप से इस्तेमाल करते हैं | लोक चित्रण के लिए प्रमुखतः पोस्टर कलर तो चित्रण के लिए मिश्रित माध्यम उनको प्रिये हैं | संजीव का प्रयास रहता है कि रंगो से मिट्टी व सेम के पत्ते की झलक आए | परिणाम स्वरूप उनके वर्ण विन्यास से एक उदास व स्थिर भाव उत्पन्न होता है | हलाकि रेखाओं के लयात्मक इस्तेमाल से वे चित्रों में गतिशीलता देने का प्रयास जरुर करते हैं | निरंतर लंबी सक्रियता से उन्होंने माध्यम पर दक्षता हासिल कर ली है |

संजीव सिन्हा क्राफ्ट भी बहुत ही सुंदर बनाते हैं | इनके द्वारा बनाए गए मोमेंटो तो बहुत ही कलात्मक होते हैं | यह कहा जा सकता है संजीव सिन्हा बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं | उनके पास कला के कई हुनर है जिसके सटिक इस्तेमाल से वे कलात्मक गतिशीलता को सार्थक दिशा दे रहें हैं | इधर बच्चों को भोजपुरी चित्रण सिखाने के लिए , सर्जना ट्रस्ट से उनकी दो किताबें भी प्रकाशित हुई है | बच्चों के कलात्मक विकास के लिए वे लगातार कार्यशाला भी आयोजित करते हैं | संजीव सिन्हा की निरंतर कलात्मक सक्रियता सुखद है |

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